महाराष्ट्र: बीजेपी के 'छोटे भाई' शिवसेना को अब क्या चाहिए

  • 25 अक्तूबर 2019
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महाराष्ट्र में बीजेपी और शिवसेना में बड़ा भाई कौन है, बीते कुछ समय में ये चर्चा अक्सर होती रही है. चुनाव नतीजे आने के बाद शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने साफ़ कर दिया कि बड़ा भाई, छोटा भाई अब नहीं चलेगा, दोनों बराबर के पार्टनर हैं.

शिव सेना ने अपने मुखपत्र 'सामना' के सम्पादकीय में लिखा है कि चुनाव परिणाम संकेत दे रहे हैं कि जनता अब सत्ता में बैठे लोगों का 'अहंकार' बर्दाश्त नहीं करेगी. जानकार मानते हैं कि शिव सेना का ये संदेश अपने 'बड़े भाई' यानी भारतीय जनता पार्टी की तरफ़ इशारा है.

नतीजों के बाद शिव सेना ने भारतीय जनता पार्टी पर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है. अब शिव सेना सत्ता में 50:50 भागीदारी के फ़ॉर्मूले पर ज़िद पकड़ चुकी है. इसका एक मतलब ये है कि आधे कार्यकाल तक भारतीय जनता पार्टी का मुख्यमंत्री हो और आधे कार्यकाल के लिए शिव सेना का.

लेकिन देवेन्द्र फडणवीस ने जब गुरुवार देर शाम पत्रकारों से बात की तो ऐसा लगा कि किसी वाद-विवाद में नहीं पड़ना चाहते. उन्होंने 50:50 फ़ॉर्मूले का ज़िक्र तो किया मगर उन्होंने स्पष्ट नहीं किया कि ये फ़ॉर्मूला आखिर लागू कैसे होगा? अलबत्ता उन्होंने 15 निर्दलीय उम्मीदवारों से संपर्क में होने की सूचना ज़रूर साझा की.

भाजपा को निर्दलीयों की ज़रूरत क्यों

सवाल है कि अगर सब कुछ ठीक है तो गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिलने के बाद भी फडणवीस जीते हुए निर्दलीय उम्मीदवारों से संपर्क की बात क्यों कर रहे हैं?

विश्लेषक इसे अलग अलग तरह से देखने की कोशिश कर रहे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार अनुराग त्रिपाठी के अनुसार, गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिलने के बावजूद अगर भारतीय जनता पार्टी निर्दलीय उम्मीदवारों से संपर्क में है तो कुछ तो गड़बड़ है.

वो कहते हैं: "पूर्ण बहुमत मिलने के बाद तो राज्यपाल से मिलना चाहिए न कि निर्दलीय विधायकों से. ये संकेत हैं कि सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है. वैसे भी भारतीय जनता पार्टी की जीत के नगाड़े मुंबई में तो खामोश ही रहे जबकि शिव सेना ने ठाकरे परिवार के राजकुमार माने जाने वाले आदित्य ठाकरे की जीत का जमकर जश्न मनाया."

वैसे अगर दोनों दलों की बात की जाए तो पहले वर्ष 1995 से लेकर 1999 तक शिव सेना बड़ा भाई था जबकि भाजपा छोटे भाई की भूमिका में थी. ये बात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उस दौरान भी निर्दलीय उम्मीदवारों के समर्थन से ही सरकार बनी थी. उस सरकार में शिव सेना के दो मुख्य मंत्री थे - पहले मनोहर जोशी बाद में नारायण राणे.

उस विधानसभा चुनाव में शिव सेना को 73 सीटें मिली थीं जबकि भारतीय जनता पार्टी को 65. इसलिए निर्दलीयों का समर्थन सरकार के लिए महत्वपूर्ण था.

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क्या कोई रस्साकशी है

शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे का दावा है कि उन्होंने अपने घटक दल यानी भाजपा के साथ गठबंधन के लिए तय शर्तों पर ही काम किया और 288 में से 124 सीटों पर चुनाव लड़ा. बाक़ी की सीटें भारतीय जनता पार्टी के लिए छोड़ दीं थीं. ये सब पहले से तय की गई गठबंधन की शर्तों के हिसाब से हुआ था.

मगर वो कहते हैं कि "अब छोटा भाई और बड़ा भाई" जैसी कोई बात नहीं है और बराबर की भागीदारी से ही सरकार चल सकती है.

शिव सेना के इस रुख ने गठबंधन के भविष्य पर कुछ पुराने सवालों को फिर खड़ा कर दिया है. भाजपा नेता वैसे तो कुछ खुलकर नहीं कह रहे लेकिन सब कुछ ठीक होने का दावा कर रहे हैं. पार्टी की प्रवक्ता श्वेता शालिनी भी कहती हैं कि गठबंधन में सरकार बनाने को लेकर कोई रस्साकशी नहीं है.

लेकिन कुछ नेता दबी ज़ुबान से कह रहे हैं कि इस बार शिव सेना को मनाने में मुश्किल होगी क्योंकि ठाकरे परिवार से किसी ने पहली बार चुनाव लड़ा और जीता है. ऐसे में शिव सेना चाहेगी कि मुख्यमंत्री उनका भी हो. वो आदित्य ठाकरे की तरफ संकेत कर रहे थे जिन्होंने मुंबई के वरली विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीता है.

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दीवाली बाद साफ़ हो पाएगी तस्वीर

शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन एक 'स्वाभाविक गठबंधन' माना जाता रहा जो वर्ष 1986 से साथ मिलकर चुनाव लड़ते आये हैं. मगर 2014 के विधानसभा चुनावों में इन दोनों के बीच पहले से कोई गठबंधन नहीं हुआ. जो गठबंधन हुआ, वो चुनाव के बाद हुआ. इन चुनावों में भाजपा को 122 सीटें मिलीं थीं वहीं शिव सेना को 63 सीटें हासिल हुई थीं.

इस बार दोनों दलों ने मिलकर भी चुनाव लड़ा मगर दोनों को पहले की तुलना में कम सीटें मिलीं. जबकि प्रचार के दौरान भाजपा अकेले अपने दम पर 200 सीटें जीतने की बात कह रही थी.

Image caption आदित्य ठाकरे को जीत की बधाई देता पोस्टर

मौजूदा राजनीतिक हालात में विश्लेषकों को दो स्थितियां नज़र आती हैं. पहला, 50:50 के फ़ॉर्मूले पर भाजपा सहमत हो जाए. दूसरा, एनसीपी और निर्दलीय भाजपा को समर्थन दे दें. एनसीपी के भाजपा को समर्थन देने के आसार कम हैं. तीसरी सूरत में शिव सेना को एनसीपी और कांग्रेस समर्थन दे दें. मगर अब तक के राजनीतिक हालात में इसके आसार भी कम हैं.

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक निखिल वागले के अनुसार ना तो एनसीपी ऐसा चाहेगी और ना ही कांग्रेस. क्योंकि दोनों के अपने अपने वोट बैंक हैं जो शिव सेना और भाजपा की विचारधारा से सहमति नहीं रहते.

फिलहाल तो राजनीतिक रस्साकशी जारी है और ऐसा लग रहा है कि पूरी तस्वीर अब दीवाली के बाद ही स्पष्ट हो पाएगी.

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