अयोध्या केसः हिंदू पक्षों को 'रामलला विराजमान' की अहमियत समझने में 104 साल लग गए

  • 8 नवंबर 2019
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अयोध्या के बहुचर्चित और विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के ज़मीन के मुक़दमे में आज रामलला विराजमान सबसे प्रमुख हिंदू पक्ष के तौर पर दिखाई दे रहे हैं.

लेकिन, एक हक़ीक़त ये भी है कि हिंदू पक्ष को भगवान श्रीराम यानी आज के रामलला विराजमान की क़ानूनी अहमियत समझने में 104 बरस लग गए.

अयोध्या की विवादित ज़मीन के मालिकाना हक़ को लेकर क़ानूनी लड़ाई औपचारिक रूप से आज से क़रीब 135 साल पहले यानी सन 1885 में शुरू हुई थी. लेकिन, इस मामले में किसी हिंदू पक्ष ने 'रामलला विराजमान' को भी एक पक्ष बनाने का फ़ैसला 1989 में लिया था.

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पहली बार हाई कोर्ट के एक रिटायर्ड जज, जस्टिस देवकी नंदन अग्रवाल, भगवान राम के प्रतिनिधि के तौर पर अदालत में पेश हुए थे और भगवान का दावा कोर्ट के सामने रखने की कोशिश की थी.1885 में अयोध्या के एक स्थानीय निवासी रघुबर दास ने 16वीं सदी की बाबरी मस्जिद के ठीक बाहर स्थित चबूतरे पर एक मंदिर बनाने की इजाज़त मांगी थी.

अयोध्या के लोग इस जगह को राम चबूतरा कहकर पुकारते थे. लेकिन, एक सब-जज ने मस्जिद के बाहर के चबूतरे पर मंदिर बनाने की इजाज़त देने से इनकार कर दिया. ग़ौरतलब है कि मंदिर बनाने की इजाज़त देने से इनकार करने वाले वो सब-जज एक हिंदू थे.

राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में, 'रामलला विराजमान' को भी एक पक्ष बनाने की ज़रूरत मशहूर वक़ील और भारत के पूर्व अटॉर्नी जनरल लाल नारायण सिन्हा ने बताई थी.

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1963 का लॉ ऑफ़ लिमिटेशन क्या कहता है?

सिन्हा ने हिंदू पक्षकारों को समझाया कि अगर वो अपने मुक़दमे में भगवान को भी पार्टी बनाते हैं, तो उससे उनकी राह की क़ानूनी अड़चनें दूर होंगी. ऐसा माना जा रहा था कि मुस्लिम पक्ष, लॉ ऑफ़ लिमिटेशन यानी परिसीमन क़ानून के हवाले से मंदिर के पक्षकारों के दावे का विरोध करेंगे.

1963 का लॉ ऑफ़ लिमिटेशन यानी परिसीमन क़ानून, किसी विवाद में पीड़ित पक्ष के दावा जताने की सीमा तय करता है.

हिंदू पक्षकारों के दावे के ख़िलाफ़ मुस्लिम पक्ष इस क़ानून के हवाले से ये दावा कर रहे थे कि सदियों से वो विवादित जगह उनके क़ब्ज़े में है और इतना लंबा समय गुज़र जाने के बाद हिंदू पक्षकार इस पर दावा नहीं जता सकते.

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1 जुलाई 1989 को फ़ैज़ाबाद की अदालत में क्या हुआ था?

रंजना अग्निहोत्री, हिंदू महासभा की तरफ़ से वक़ीलों की लंबी चौड़ी फ़ौज की एक प्रमुख सदस्य हैं.

वे कहती हैं कि, "इस विवाद में भगवान श्रीराम 'अपने सबसे क़रीबी दोस्त' देवकी नंदन अग्रवाल के माध्यम से एक पक्षकार के तौर पर शामिल हो गए. इसके बाद से इस मुक़दमे को परिसीमन क़ानून के हर बंधन से आने वाले समय में अनंत काल के लिए छूट मिल गई."

रंजना अग्निहोत्री ने बीबीसी को लखनऊ में बताया कि, "जब एक जुलाई 1989 को फ़ैज़ाबाद की अदालत में रामलला विराजमान की तरफ़ से दावा पेश किया गया, तब सिविल कोर्ट के सामने इस विवाद से जुड़े चार मुक़दमे पहले से ही चल रहे थे. इसके बाद, 11 जुलाई 1989 को इन सभी पांच मामलों को इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में ट्रांसफर कर दिया गया."

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यहां ध्यान देने वाली अहम बात ये है कि हाई कोर्ट के सामने 1987 से ही उत्तर प्रदेश सरकार की एक अर्ज़ी विचाराधीन थी. इसमें यूपी सरकार ने उच्च न्यायलय से आग्रह किया था कि अयोध्या विवाद के सभी मुक़दमे, जो फ़ैज़ाबाद की सिविल कोर्ट में चल रहे हैं, उन्हें हाई कोर्ट में भेज दिया जाए.

आख़िरकार हाई कोर्ट ने सितंबर 2010 में इस मामले में अपना फ़ैसला सुनाया जिस में अदालत ने अयोध्या की विवादित ज़मीन को तीन पक्षों, निर्मोही अखाड़ा, रामलला विराजमान और यूपी सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड में बांटने का फ़ैसला सुनाया था. लेकिन, इलाहाबाद हाई कोर्ट का ये फ़ैसला किसी भी पक्ष को मंज़ूर नहीं था.

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तब किसी ने विरोध नहीं किया

सभी पक्षों ने इसके ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की. सर्वोच्च अदालत ने सभी पक्षों को सुनने के बाद 17 अक्टूबर 2019 को अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया.

मज़े की बात ये है कि जब इस मुक़दमे में रामलला विराजमान को भी एक पक्ष के तौर पर शामिल करने की अर्ज़ी दी गई, तो इसका किसी ने विरोध नहीं किया था.

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के वक़ील ज़फ़रयाब जिलानी इस बारे में कहते हैं कि, "भगवान की याचिका का विरोध करने का कोई सवाल ही नहीं था, क्योंकि इस केस में भगवान भी एक इंसान की तरह ही पक्षकार थे. रामलला विराजमान को भी एक पक्षकार बनाना हमारे विरोधी पक्ष का वैधानिक हक़ था. क्योंकि इसके बग़ैर इस विवाद में अपने दावे के हक़ में पेश करने के लिए उनके पास पर्याप्त दस्तावेज़ी सबूत नहीं थे."

अब आगे क्या?

अब जबकि इस विवाद में देश की सर्वोच्च अदालत का फ़ैसला आने में ज़्यादा दिन नहीं बचे हैं, तो इस बात की अटकलें तेज़ हो गई हैं, कि आगे क्या होगा.

सवाल ये भी उठ रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला अगर मंदिर के हक़ में जाता है, तो कहीं निर्मोही अखाड़ा और रामलला विराजमान के बीच तो संघर्ष नहीं छिड़ जाएगा.

वकील रंजना अग्निहोत्री कहती हैं कि, "इन दोनों पक्षों के बीच टकराव का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता."

रंजना अग्निहोत्री इसके बाद कहती हैं, "शैव संगठन होने की वजह से निर्मोही अखाड़ो को उस स्थान पर सदैव ही भगवान की पूजा अर्चना का विशेषाधिकार हासिल रहा है. फ़ैसला आने के बाद भी निर्मोही अखाड़ा अपने इसी अधिकार के तहत भगवान राम की पूजा करता रहेगा. ऐसे में टकराव का सवाल ही कहां से पैदा होता है?"

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