पाकिस्तान का क़रीबी सऊदी क्यों आ रहा भारत के साथ?

  • 28 अक्तूबर 2019
मोदी और सऊदी क्राउन प्रिंस क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ अल सऊद इमेज कॉपीरइट Reuters
Image caption मोदी और सऊदी क्राउन प्रिंस क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान बिन अब्दुल अज़ीज़ अल सऊद

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिन के दौरे पर सऊदी अरब जा रहे हैं. वो 28 अक्तूबर को रियाद पहुचेंगे और 29 अक्तूबर को सऊदी किंग सलमान से मुलाक़ात करेंगे.

सऊदी अरब के सरकारी निवेश फ़ंड एजेंसी सावरेन वेल्थ फंड की ओर से आयोजित फ्यूचर इनवेस्टमेंट इनिशिएटिव फ़ोरम को भी प्रधानमंत्री संबोधित करेंगे.

मोदी के इस दौरे में विदेशी संस्थागत निवेश पर बात होनी है. इसके अलावा रुपे की लांचिंग और हज यात्रियों की संख्या बढ़ाने पर भी बात होनी है.

प्रधानमंत्री मोदी घरेलू आर्थिक सुस्ती से जहां जूझ रहे हैं वहीं वैश्विक आर्थिक गिरावट के कारण सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था भी संकट में है.

ऐसे में दोनों देशों के नेताओं के बीच बड़े क़रारों पर सबकी निगाहें हैं. भारत और सऊदी अरब के बीच रिश्तों पर पढ़ें मध्य-पूर्व मामलों के जानकार क़मर आगा का नज़रिया.

नज़रिया

भारत और सऊदी अरब के बीच व्यापारिक संबंध बहुत घनिष्ट हैं. भारत का 17 प्रतिशत तेल और 32 प्रतिशत एलपीजी वहां आयात होता है. दोनों देशों के बीच तकरीबन 27.5 अरब डॉलर का व्यापार है.

इसमें अकेले 22 अरब डॉलर के पेट्रोलियम पदार्थ भारत ख़रीदता है जबकि भारत महज 5.5 अरब डॉलर का निर्यात करता है.

तो भारत के लिए ये व्यापारिक असंतुललन चिंताजनक है. दूसरी ओर सऊदी अरब भी भारत में 100 अरब डॉलर का निवेश करना चाहता है.

इसलिए माना जा रहा है कि पीएम मोदी के मौजूदा दौरे में तेल और ऊर्जा का क्षेत्र पर बातचीत होगी.

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लेकिन सऊदी अर्थव्यवस्था भी इस समय सुस्ती का शिकार है.

इसकी वजह है कि तेल की क़ीमतें काफ़ी कम हो गई हैं और यमन के साथ जंग में शामिल होने के कारण सऊदी अरब का खर्च बढ़ा है.

अभी तक सऊदी अरब की अर्थव्यवस्था तेल पर निर्भर रही है लेकिन अब वो अन्य क्षेत्रों में भी निवेश करना चाहते हैं.

इसीलिए वो भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया में निवेश कर पैसा बनाना चहता है. साथ ही अपने यहां भी सऊदी अरब काफ़ी बदलाव ला रहा है, टूरिज़्म को बढ़ावा दे रहा है और नई कंपनियां खोल रहा है.

लेकिन व्यापारिक और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के अलावा भारत का सऊदी अरब से और भी हित जुड़े हुए हैं.

वहां लगभग 15 लाख भारतीय काम करते हैं, जिनसे भारत को कई अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा हासिल होती है.

एक बड़ा पेट्रोकेमिकल कांप्लेक्स भारत के मध्यप्रदेश में बन रहा है जिसमें सऊदी अरब और यूएई का बहुत बड़ा योगदान है.

अरब ने जो 100 अरब डॉलर के निवेश की बात कही है उसमें रिलायंस एनर्जी और बीपीसीएल के साथ समझौता होना भी शामिल है. उम्मीद है कि इस दफ़े शायद समझौता हो जाए.

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भारत रणनीतिक तौर पर तेल का रिज़र्व भी बना रहा है. दक्षिण भारत में इस तरह के तेल रिज़र्व बन चुके हैं. भारत तीसरा रिज़र्व भी बनाना चाहता है कि आपात स्थिति में या अचानक क़ीमतों में उछाल के समय वो इसका इस्तेमाल कर सके. इस परियोजना में भी सऊदी अरब और यूएई काफ़ी मददगार हो सकते हैं.

हालांकि भारत की नीति है कि वो लगभग तीन महीने तक का तेल रिज़र्व बनाया जाए. यानी इतने समय के लिए अगर तेल आयात न भी तो भी काम चल सके.

लेकिन जो तत्काल मुद्दे हैं उसमें भारतीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने का मामला अहम है.

क्या है सऊदी की भूमिका

इसमें कोई शक नहीं कि सऊदी अरब से व्यापारिक संबंधों का असर पड़ेगा, हालांकि एक देश की ओर से किया गया निवेश काफ़ी नहीं होगा.

वैश्विक अर्थव्यवस्था बहुत कमज़ोर हो गई है. हमें पश्चिम देशो से निवेश आने की जो उम्मीद थी वो अभी नहीं आ पा रहा है.

हालांकि जापान और दक्षिण कोरिया से उम्मीद है क्योंकि उनके साथ भारत के अच्छे संबंध हैं और यहां भारी निवेश की उनकी योजनाएं भी हैं. इस निवेश का एक बड़ा हिस्सा तो भारत आ भी चुका है. दक्षिण कोरिया और जापान की जितनी भी बड़ी कंपनियां हैं, उनकी सबसिडियरी कंपनियों का परिचालन भारत में हो रहा है.

भारत ने दक्षिण और उत्तर भारत के बीच एक व्यापारिक कॉरिडोर बनाने वाला है और जब ये तैयार हो जाएगा अन्य विदेशी कंपनियां भी यहां आएंगी, जहां स्मार्ट सिटी बनेगी, औद्योगिक टाउन बनेंगे.

ये सारी योजनाएं तो हैं लेकिन इसमें थोड़ी देरी हो रही है क्योंकि भूमि अधिग्रहण, श्रम क़ानूनों को लचीला बनाने और बैंकिंग सेक्टर में सुधार को लेकर अभी बहुत किया जाना बाकी है. इन सब योजनाओं में सऊदी अरब की प्रमुख भूमिका है.

सऊदी के पास अब कितना बचा है तेल और कब तक चलेगा

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दूसरी तरफ़ ये भी है कि ईरान से जो तेल भारत आता था वो बंद हो गया है और इसलिए अब भारत को सऊदी अरब और ईराक़ से तेल लेना पड़ रहा है.

भारत और सऊदी अरब के रिश्तों में पाकिस्तान भी एक बड़ा फ़ैक्टर है.

चूंकि राजनीतिक संबंध भारत और सऊदी अरब के बिल्कुल अलग हैं. सऊदी अरब को भी कश्मीर के मुद्दे पर बहुत आपत्ति नहीं है. बल्कि खाड़ी के अधिकांश देशों ने माना है कि ये भारत का अंदरूनी मामला है.

इसलिए ऐसा नहीं लगता कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर ये खाड़ी देश भारत के लिए कोई विरोध पैदा करेंगे.

यहां तक कि जम्मू कश्मीर के विशेष राज्य के दर्ज़े को ख़त्म किए जाने के बाद यूएई और बहरीन ने पीएम मोदी को अपने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाज़ा.

और सऊदी अरब खाड़ी देशों का एक तरह से अगुआ है.

भारत की कितनी निर्भरता

भारत और सऊदी अरब के बीच एक दूसरे पर निर्भरता काफ़ी बढ़ गई है. और ये रिश्ते लगातार बढ़ते चले जा रहे हैं. इसी का नतीजा है कि कभी पाकिस्तान के साथ पूरी तरह रहने वाला सऊदी अरब अब भारत के क़रीब आ रहा है. इसका एक बड़ा कारण उसकी 2008 में आई लुक ईस्ट की नीति भी रही है.

हालांकि पाकिस्तान के साथ उसके संबंध अन्य क्षेत्रों में भी हैं. पाकिस्तान दक्षिण एशिया का पहला मुल्क है जिसने वहाबी तहरीक को लेकर सऊदी अरब को वैधता प्रदान की.

दूसरी बात ये भी है कि पाकिस्तान और सऊदी अरब की सेनाओं के बीच बहुत घनिष्ट संबंध हैं.

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लेकिन दोनों देशों के बीच थोड़ा तनाव भी है क्योंकि सऊदी का मानना था कि ईरान के साथ तनाव में पाकिस्तान खुलकर उसका साथ देगा और यमन के युद्ध में बड़ी भूमिका निभाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

वैश्विकरण के दौर में आर्थिक हित महत्वपूर्ण हो गए हैं और राजनीति पीछे चली गई है. भारत चूंकि बढ़ती अर्थव्यवस्था है तक़रीबन ढाई ट्रिलियन की, तो सऊदी अरब इसका लाभ लेना चाहता है.

समस्या ये है कि इस समय खाड़ी के देश काफ़ी कमजोर हो गए हैं. वे आपस में बंटे हुए हैं. यमन का युद्ध ख़त्म होने का नाम ही ले रहा है.

क़तर से सऊदी अरब का तनाव पैदा हो गया है. कुल मिलाकर गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल में एक किस्म की दरार पड़ गई है. भारत और सऊदी अरब की बातचीत में चरमपंथ एक बड़ा मुद्दा होगा.

भारत चाहता है कि चरमपंथ पर एक अतंरराष्ट्रीय सम्मेलन बुलाया जाए जिसमें सभी देश मिलकर इसपर एक नीति तय करें.

इस संबंध में सऊदी अरब और भारत के बीच काफ़ी सहयोग रहा है और जब जब भारत ने किसी के प्रत्यर्पण की अपील की है, उसने माना है.

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हालांकि अफ़ग़ानिस्तान तालिबान से सऊदी अरब के बहुत क़रीबी संबंध हैं.

सऊदी और पाकिस्तान चाहते हैं कि अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की सत्ता आए जबकि भारत चाहता है कि वहां एक सेक्युलर सरकार बने.

ये एक ऐसा मामला है जो भारत और सऊदी अरब के बीच अलग अलग नज़रिया है.

अब देखना ये है कि प्रधानमंत्री मोदी के मौजूदा दौरे में किन किन मुद्दों पर सहमति बनती है और क्या क़रार होते हैं.

ये भी ख़बरें हैं कि कुछ रक्षा सौदों पर भी दोनों देशों के बीच बातचीत हो सकती है.

(बीबीसी संवाददाता संदीप राय से बातचीत पर आधारित.)

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