अभिजीत बनर्जी - एस्थर डूफ़ेलो को नोबेल दिलाने का उदयपुर कनेक्शन- ग्राउंड रिपोर्ट

  • 28 अक्तूबर 2019
अभिजीत बनर्जी इमेज कॉपीरइट Getty Images

1996 की शुरुआती सर्दियों की बात है. उदयपुर के समाजसेवी अजय मेहता अपने छोटे भाई उदय मेहता से मिलने अमरीका गए थे. उदय मेहता एमआईटी में पढ़ाते थे और उस दौरान किसी दिन उदय अपने बड़े भाई को अपने ही एक साथी के घर खाने पर लेकर गए.

खाने की उस टेबल पर बातचीत के दौरान ही उदय मेहता के साथी ने कहा कि वह ग़रीबों के बीच एक ख़ास तरह का प्रयोग करना चाहते हैं ताकि उनके जीवन में सुधार लाया जा सके. अजय मेहता ने उनकी बातों को समझते हुए उन्हें उदयपुर आने का निमंत्रण दे दिया.

छह महीने बाद एमआईटी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अपने एक साथी के साथ उदयपुर पहुंच गए. ये प्रोफेसर थे अभिजीत बनर्जी और उनके साथ उदयपुर आए सज्जन थे माइकल क्रेमर. अभिजीत बनर्जी जिस प्रयोग की शुरुआत करने उदयपुर पहुंचे थे उसे आरसीटी यानी रैंडम कंट्रोल्स मैथडॉलॉजी कहा जाता है.

चौंकिए नहीं, अभिजीत बनर्जी- एस्थर डूफ़ेलो और माइकल क्रेमर को जिस आरसीटी यानी रैंडम कंट्रोल्स मैथडॉलॉजी के लिए साल 2019 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार मिला है, उसकी शुरुआत 1996 में उदयपुर में हुई थी.

तब अजय मेहता उदयपुर के ग्रामीण इलाक़ों में काम करने वाली संस्था सेवा मंदिर के सर्वेसर्वा हुआ करते थे. उन्होंने बीबीसी से बातचीत में बताया, "उन्होंने अपना पहला प्रयोग हमारी स्कूली शिक्षा के साथ किया था. उस वक़्त सेवा मंदिर उन इलाक़ों में स्कूली शिक्षा का कार्यक्रम चलाया करता था जहां सरकारी स्कूल नहीं थे. हम चाह रहे थे कि उन स्कूलों में एक शिक्षक को बढ़ाकर दो-दो शिक्षक कर दिए जाएं."

क्या था पहला प्रयोग

जब सेवा मंदिर अपने इस काम के बारे में बता ही रहा था, तब मीटिंग में शामिल माइकल क्रेमर ने कहा कि इस व्यवस्था में हम रिसर्च करके देखते हैं, आप सारे स्कूलों में एक साथ इसे लागू नहीं कीजिए.

सेवा मंदिर से जुड़ी रतन पालीवाल बताती हैं, "हमने इस प्रोजेक्ट के लिए अपने 47 सेंटरों का चुनाव किया. इसमें आधे सेंटरों में उन्होंने दो-दो शिक्षकों को नियुक्त करने का सुझाव दिया और आधे सेंटर में एक-एक शिक्षक ही रहे."

अभिजीत बनर्जी और माइकल क्रेमर ने एमआईटी के जमील-एक्शन पॉवर्टी लैब (जे-पीएल) के तहत सेवा मंदिर के साथ मिलकर क़रीब डेढ़ साल तक इस अध्ययन को चलाया. उसके बाद उन्होंने जो रिपोर्ट बनाई, वह आम धारणा के बिलकुल उलट थी. उन्होंने बताया कि स्कूलों में दो शिक्षकों को रखने का कोई फ़ायदा नहीं हो रहा है.

इसके बदले उन्होंने स्कूलों में बुनियादी सुविधा बढ़ाए जाने की बात कही. अजय मेहता बताते हैं, "दरअसल हमें लगता था कि दो शिक्षकों की नियुक्ति से स्थिति बेहतर होगी लेकिन अभिजीत बनर्जी और माइकल क्रेमर ने हमारी सोच को बदलकर रख दिया."

Image caption अजय मेहता ने अभिजीत बनर्जी को उदयपुर आने का निमंत्रण दिया था

इस सेंटर के साथ अभिजीत बनर्जी ने अपने प्रयोग को अगले कई साल तक जारी रखा. आख़िर ये सेंटर किस तरह से काम करते हैं, ये जानना भी कम दिलचस्प नहीं है. सेवा मंदिर उन इलाक़ों में जाकर स्कूली कार्यक्रम चलाती है जहां सरकारी स्कूल नहीं पहुंच पाए हैं. प्राथमिक स्तर की शिक्षा देने वाले इन सेंटरों में पढ़ाने वाला टीचर स्थानीय समाज का ही चुना जाता है, जिसे ग्रामीण स्तर पर बनी कमेटी के देखरेख में काम करना होता है.

अमूमन ऐसे सेंटर सरकारी केंद्रों की इमारतों में ही चलाए जाते हैं, उदयपुर से क़रीब 30 किलोमीटर दूर छील भीलवाड़ा में सेवा मंदिर का ऐसा ही एक सेंटर है, वहां सेंटर चलाने की ज़िम्मेदारी स्थानीय युवती के ज़िम्मे हैं, वह अपनी स्थानीय बोली में 15-20 बच्चों को गिनती सिखा रही हैं.

ख़ास बात यह है कि वह कैमरे के माध्यम से अपनी गतिविधि के बारे में जानकारी सेवा मंदिर के मुख्यालय तक भेजती हैं, तस्वीर खींचकर. ताकि यह पता चलता रहे कि स्कूल में पढ़ाई चल रही है या नहीं, या फिर कितने बच्चों की उपस्थिति है. कैमरे के माध्यम से तस्वीर लेने की यह तकनीक 2003 में अभिजीत बनर्जी-एस्थर डूफ़ेलो और माइकल क्रेमर की तिकड़ी ने ही दी थी. इस सरल उपाय के ज़रिए व्यवस्था पर दूर दराज़ से भी निगरानी संभव थी, ये प्रयोग ख़ासा कामयाब रहा है और बाद में इसे दूसरी तमाम जगहों पर अपनाया गया.

इससे शिक्षकों की ग़ैरहाज़िरी की समस्या का निदान मिला. इसी प्रयोग के दौरान अभिजीत बनर्जी ने इंसेंटिव देने का तरीक़ा अपनाया. उन्होंने 20 दिन से ज़्यादा पढ़ाने वाले टीचरों को प्रति दिन के हिसाब से अतिरिक्त पैसा देना शुरू कराया, इससे टीचरों की उपस्थिति में काफ़ी सुधार हुआ. अभिजीत बनर्जी- एस्थर डूफ़ेलो-माइकल क्रेमर, इन तीनों के नज़रिए में ये बात शामिल है कि समाज के दबे पिछड़े लोगों को हाशिए से मुख्यधारा में लाने के लिए सरकार को इंसेंटिव या पैसा ख़र्च करने में संकोच नहीं करना चाहिए.

12 साल में कर डाले कई प्रयोग

बहरहाल स्कूली शिक्षा के इसी प्रोजेक्ट के तहत 1997 में एस्थर डूफ़ेलो भी पहली बार भारत पहुंचीं, तब डूफ़ेलो अभिजीत बनर्जी के अधीन अपनी पीएचडी कर रही थीं. डूफ़ेलो को भी उदयपुर का माहौल पसंद आया.

Image caption जब अभिजीत बनर्जी ने उदयपुर में काम किया तब नीलिमा खेतान सेवा मंदिर की प्रमुख थीं

उदयपुर से करीब 50 किलोमीटर दूर आदिवासी इलाक़े झाबला में काम करने वाले हिम्मत लाल गमेती कहते हैं, "डूफ़ेलो यहां के लोगों के बीच काम करने को लेकर हमेशा उत्साहित दिखती थीं. मेन रोड से दस किलोमीटर तक हमें पैदल चलकर पहुंचना होता था, कई बार तो वह दौड़कर पहुंच जाती थीं. हमारी शादी में भी आई थीं और बहुत देर तक नाची थीं."

सेवा मंदिर और अभिजीत बनर्जी की टीम, दोनों को एक दूसरे का साथ पसंद आया. सेवा मंदिर ने इसके बाद इलाक़े के स्वास्थ्य समस्याओं को लेकर एक बड़ा प्रयोग करने के लिए अभिजीत बनर्जी को तैयार किया.

अजय मेहता कहते हैं, "अभिजीत बनर्जी की एक बड़ी ख़ासियत यह है कि वह हमेशा तथ्यों और आंकड़ों की बात करते हैं. वह कोई भी बात तभी मानेंगे जब विषय से संबंधित प्राथमिक आंकड़ा उनके पास हों."

लिहाज़ा स्वास्थ्य सेवाओं के स्तर को भांपने के लिए अभिजीत बनर्जी ने 2003 में इस इलाक़े में एक लंबा शोध किया. उस वक़्त सेवा मंदिर की सीईओ रहीं नीलिमा खेतान बताती हैं, "स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर जब अभिजीत जी ने काम करना शुरू किया तो इलाक़े के आस पास क़रीब 100 गांवों की स्वास्थ्य सुविधाओं पर उन्होंने ख़ुद से सर्वे कराना शुरू किया."

इसमें सेवा मंदिर के साथ-साथ उदयपुर में शैक्षणिक मुद्दों पर काम करने वाली संस्था विद्या भवन भी साझेदार बना. क़रीब डेढ़ साल तक चले शोध अध्ययन के बाद जब नतीजे निकले तो किसी को यकीन ही नहीं हुआ, जिस ज़िले के आधिकारिक आंकड़ों में कहा जा रहा था कि 50 प्रतिशत से ज़्यादा बच्चों का पूर्ण टीकाकरण हो रहा है, वहां अभिजीत बनर्जी ने अपने आंकड़ों से बताया कि महज़ 2.66 प्रतिशत बच्चों का ही पूर्ण टीकाकरण हो पाया है.

इस आंकड़े के बारे में नीलिमा खेतान बताती हैं, "हमें ये तो मालूम था कि हालात बेहद ख़राब हैं, लेकिन इतने ख़राब होंगे, इसका अंदाज़ा नहीं था. इस बात ने अभिजीत और डूफ़ेलो को भी बेचैन कर दिया था. वे चाहते थे कि स्थिति सुधरे. हम लोग भी स्थिति में बदलाव चाहते थे."

इमेज कॉपीरइट JOHAN JARNESTAD/ROYAL SWEDISH ACADEMY

दो साल तक चले शोध के बारे में उस दौर में सेवा मंदिर की सीईओ रहीं नीलिमा खेतान कहती हैं, "हमने जो रैंडमली 120 गांव चुने थे उन्हीं में प्रयोग शुरू किया. 60 गांव कंट्रोल के थे, 60 गांव ट्रीटमेंट के थे. इन 60 में से 30 में हमने केवल सप्लाई को बेहतर किया यानी कैंप बेहतर लगता था. जबकि 30 में हमने सप्लाई के साथ दाल देना शुरू किया था. कंट्रोल के गांवों में स्थिति बेहतर होकर 6 प्रतिशत तक पहुंची. सप्लाई बढ़ाने यानी कैंपों की संख्या बढ़ाने के पूर्ण टीकाकरण की दर 18 प्रतिशत तक पहुंच गई. जबकि मोबाइल क्लिनिक और टीके के साथ दाल देने पर पूर्ण टीकाकरण की दर 39 प्रतिशत तक पहुंच गई."

इस प्रयोग की कामयाबी का ज़िक्र इन तीनों को 2019 में नोबेल पुरस्कार दिए जाने के दौरान नोबेल समिति ने भी किया है.

दाल वाला कांसेप्ट कैसे आया, इस बारे में नीलिमा खेतान बताती हैं, "स्थिति कैसे सुधरे, इस पर सोच विचार चल रहा था. एक-दो दिन में कई तरह के विचार सामने आए. उस वक़्त हमारी टीम में प्रियंका सिंह काम करती थीं. उन्होंने ये सुझाव रखा कि क्यों ना हम लोगों को एक किलोग्राम मूंग की दाल दें."

दाल का कनेक्शन क्या है

ये विचार अभिजीत बनर्जी को बहुत पसंद आया, हालांकि उस दौर में भी एक किलोग्राम मूंग की दाल 40 रूपये प्रति किलोग्राम हुआ करती थी.

लेकिन सवाल यही है कि क्या महज़ एक किलोग्राम मूंग की दाल से स्थिति में बदलाव हो गया था. इस बारे में पूछे जाने पर नीलिमा खेतान बताती हैं, "नवजात बच्चों को पांच टीके की ज़रूरत होती है और बच्चे की मां को दो टीके लगते हैं. हम लोग हर टीके पर एक किलोग्राम दाल देने का काम किया करते थे."

प्लेबैक आपके उपकरण पर नहीं हो पा रहा
इस साल इकॉनामिक्स का नोबेल पुरस्कार जिस काम के लिए दिया गया है, वह उदयपुर से शुरू हुआ था.

अभिजीत बनर्जी ने जिन इलाक़ों में काम किया है, उसमें एक झाबला उदयपुर शहर से 45-50 किलोमीटर दूर स्थित है. झाबला मेन रोड से क़रीब 10 किलोमीटर अंदर जाने पर आता है. यहां की एक स्थानीय महिला ने बताया कि हमें दाल का मिलना बहुत अच्छा लगता था.

हालांकि अब तो इस इलाक़े में रोड बन चुका है लेकिन दूर दराज़ में पहाड़ी इलाक़े में बसे इन गांवों की बस्तियों में पहुंचने के लिए पैदल ही जाना होता है, जहां पहुंचते ही आज भी आम लोगों की ज़िंदगी के बेहद मुश्किल होने का अंदाज़ा हो जाता है. एक-एक बूंद पानी से लेकर जीवन के दूसरी तमाम ज़रूरतों के लिए इलाक़े के लोगों को संघर्ष करना पड़ता है.

बहरहाल, सेवा मंदिर ने 2003-04 से शुरू हुए अपने इस प्रोजेक्ट को 2018 में बंद कर दिया. इसकी वजह बताते हुए सेवा मंदिर के मौजूदा सीईओ रौनक शाह बताते हैं, "ये कार्यक्रम काफ़ी हिट साबित हुआ था. लेकिन समय के साथ हमें अपने कार्यक्रमों को बदलना होता है ताकि नई समस्याओं पर काम कर सकें. नवजात बच्चे के टीकाकरण को लेकर सरकरी योजना भी बड़े पैमाने तक लोगों तक पहुंच रही है, उसकी जगह हम दूसरे तरह का काम कर रहे हैं."

वैसे सेवा मंदिर का दावा है कि उन्होंने एक दशक से भी लंबे समय तक चले अपने इस प्रोजेक्ट में 20 हज़ार बच्चों का पूर्ण टीकाकरण कर उन्हें असमय मौत के मुंह में जाने से बचाया. लेकिन अगर इस शोध अध्ययन और तकनीक को सही ढंग से राज्य प्रशासन के साथ शेयर किया जाता तो शायद पूरे राजस्थान में या पूरे देश में इसे अपनाया जा सकता था. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया.

छाली भीलवाड़ा में एक बुज़ुर्ग दाई ने बताया कि हमारे इलाक़े में बच्चे की खांसते खांसते मौत हो जाती थी, लेकिन लोग टीका लगवाने नहीं जाते थे. लेकिन दाल मिलने की उम्मीद से महिलाएं टीका लगवाने पहुंच जाती थीं.

हालांकि सेवा मंदिर से जुड़े कई लोगों का मानना है कि अभिजीत बनर्जी की कोशिश ये थी कि लोगों को कुछ टोकन दिया जाना चाहिए ताकि लोग टीका लगवाने के लिए सामने आएं. सेवा मंदिर से जुड़ी अंजेला जोशी बताती हैं, "उन्होंने आम लोगों की मजबूरी समझ ली थी, अगर एक दिन के लिए महिला टीका लगवाने जाए तो उस दिन की दिहाड़ी मज़दूरी नहीं कर पाएगी, लिहाज़ा उन्होंने अपनी बैठकों में हमेशा इस पहलू पर ज़ोर देते हुए कहा है कि उन्हें घर से बाहर लाने के लिए कुछ इंसेंटिव देना चाहिए."

इमेज कॉपीरइट Himmat Lal Gameti/BBC
Image caption उदयपुर के एक गांव में एस्थर डूफ़ेलो अपनी बहन ऐनी डूफ़ेलो के साथ

आम लोगों की ज़िंदगी बेहतर करने की कोशिश

1996 में पहली बार उदयपुर आए अभिजीत बनर्जी, एस्थर डूफ़ेलो और माइकल क्रेमर अपनी आरसीटी विधि के ज़रिए क़रीब 2008 तक उदयपुर के ग्रामीण और आदिवासी इलाक़ों में प्रयोग करते रहे. रतन पालीवाल बताती हैं कि महिलाओं में एनीमिया की स्थिति हो या फिर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में एएनएम (सहायक नर्स) की अनुपस्थिति के बारे में सटीक-सटीक जानकारी अभिजीत बनर्जी के शोध अध्ययनों से ही पता चला.

अभिजीत बनर्जी के इन शोध अध्ययनों को सेवा मंदिर उदयपुर ज़िला स्वास्थ्य विभाग से शेयर भी करती रही थीं. वैसे नोबेल पुरस्कार मिलने के चलते अभिजीत बनर्जी के जिस प्रयोग की इतनी चर्चा हो रही है, उसकी चर्चा उसी दौर में होनी चाहिए थी ताकि इसके असर का दायरा उदयपुर से बाहर निकलकर देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंच पाता.

हालांकि पूरे राजस्थान में स्थिति बहुत बेहतर हो गई हो, नहीं कहा जा सकता. क्योंकि राज्य के स्वास्थ्य विभाग के मुताबिक़ 80 प्रतिशत बच्चों को पूर्ण पोषण मिल चुका है लेकिन नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे के मुताबिक़ यह आंकड़ा 55 प्रतिशत के आसपास ही है.

हालांकि उदयपुर से अभिजीत बनर्जी का कनेक्शन बना रहा. अजय मेहता बताते हैं कि जब अभिजीत बनर्जी को अपनी पुस्तक 'पुअर इकॉनामिक्स' का भारत में विमोचन करना था, तो उन्होंने 16 जुलाई, 2011 को उदयपुर में ही इसका विमोचन रखा था. उन्होंने अपनी इस पुस्तक में उदयपुर से संबंधित तमाम प्रयोगों के बारे में विस्तार से बताया है.

नीलिमा खेतान बताती हैं, "अभिजीत बनर्जी और एस्थर डूफ़ेलो, केवल आंकड़ों में विश्वास करने वाले अर्थशास्त्री नहीं हैं. वे चाहते हैं कि उनके काम से आम लोगों की ज़िंदगी में बेहतर बदलाव आए."

अब अभिजीत बनर्जी, एस्थर डूफ़ेलो और माइकल क्रेमर को नोबेल पुरस्कार मिलने और उसमें सेवा मंदिर की भूमिका को लेकर सेवा मंदिर के संचालकों में एक गर्व का भाव नज़र आता है. आने वाले दिनों में सेवा मंदिर अभिजीत बनर्जी, एस्थर डूफ़ेलो और माइकल क्रेमर के सार्वजनिक सम्मान की योजना बना रहा है.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

बीबीसी न्यूज़ मेकर्स

चर्चा में रहे लोगों से बातचीत पर आधारित साप्ताहिक कार्यक्रम

सुनिए

मिलते-जुलते मुद्दे

संबंधित समाचार