दिल्ली के प्रदूषण के लिए दिवाली के पटाख़े कितने ज़िम्मेदार?

  • 28 अक्तूबर 2019
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दिल्ली और इससे जुड़े इलाकों में तापमान गिरने और दिवाली मनाए जाने के बाद हवा की गुणवत्ता बेहद ख़राब स्थिति में पहुंच चुकी है.

दुनिया भर के अलग अलग शहरों में वायु प्रदूषण की हालत बताने वाली वेबसाइट एयर क्वालिटी इंडेक्स के मुताबिक़, 28 अक्टूबर की सुबह दस बजे दिल्ली दुनियाभर में दूसरा सबसे प्रदूषित शहर बन गया.

Image caption 28 अक्टूबर को सुबह दस बजे लिए गए आंकड़ों पर आधारित

27 अक्टूबर की शाम 11 बजे के बाद से 28 अक्टूबर सुबह तक दिल्ली में आनंद विहार से लेकर तमाम दूसरे इलाकों में वायु प्रदूषण के आंकड़े अपने उच्चतम स्तर पर रहे.

उत्तर भारत में दिवाली के बाद पीएम 2.5 कई जगहों पर अपने उच्चतम स्तर पर रहा.

कितना ख़तरनाक है पीएम 2.5

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, साल 2016 में पांच साल से कम उम्र के एक लाख से ज़्यादा (101 788.2) बच्चों की मौत के लिए प्रदूषण ज़िम्मेदार था.

'एयर पॉल्यूशन एंड चाइल्ड हेल्थ: प्रेसक्राइबिंग क्लीन एयर' नाम की इस रिपोर्ट में प्रदूषण के बढ़ते स्तर के कारण बीमारियों के बढ़ते बोझ को लेकर सावधान किया गया है.

रिपोर्ट में बताया गया है कि बाहर की हवा में मौजूद पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) 2.5 के कारण पांच साल की उम्र के बच्चों की सबसे ज़्यादा मौतें भारत में हुई हैं.

पार्टिकुलेट मैटर धूल और गंदगी के सूक्ष्म कण होते हैं जो सांस के ज़रिए शरीर के अंदर जाते हैं.

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इसके कारण भारत में 60,987, नाइजीरिया में 47,674, पाकिस्तान में 21,136 और कांगों में 12,890 बच्चों की जान चली गई.

इन बच्चों में लड़कियों की संख्या ज़्यादा है. कुल बच्चों में 32,889 लड़कियां और 28,097 लड़के शामिल हैं.

प्रदूषण से सिर्फ़ पैदा हो चुके बच्चे ही नहीं बल्कि गर्भ में मौजूद बच्चों पर भी बुरा असर पड़ता है.

रिपोर्ट कहती है कि प्रदूषण के कारण समय से पहले डिलीवरी, जन्म से ही शारीरिक या मानसिक दोष, कम वज़न और मृत्यु तक हो सकती है.

ऐसे तो प्रदूषण का सभी पर बुरा असर माना जाता है, लेकिन रिपोर्ट की मानें तो बच्चे इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं.

ट्विटर पर बहस जारी

दिवाली के बाद भारत के ट्विटर ट्रेंड्स में #DelhiChokes और #CrackersWaliDiwali नाम के दो हैशटेग ट्रेंड कर रहे हैं.

इन ट्रेंड्स पर कुछ लोग दिल्ली की हवा में प्रदूषण बढ़ने के लिए दिवाली के पटाख़ों को ज़िम्मेदार ठहरा रहे हैं.

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वहीं, एक दूसरा वर्ग इसके लिए उन सभी कारकों को सामने रख रहा है जो दिल्ली के बढ़ते प्रदूषण के लिए ज़िम्मेदार हैं.

ट्विटर यूज़र तोयाज़ चतुर्वेदी लिखते हैं, "सबको दिवाली के पटाखों से दिक़्क़त होती है, लेकिन कभी कोई ईद पर जो हज़ारों लाखों बकरों की क़ुर्बानी के नाम पर बली चढ़ती है उस पर किसी को आपत्ति क्यों नहीं होती?"

लेकिन फेसबुक से लेकर ट्विटर पर आम लोगों के बीच बहस का केंद्र बिंदू ये है कि दिल्ली पर चलाए जाने वाले पटाख़े दिल्ली के वायु प्रदूषण के लिए कितने ज़िम्मेदार हैं.

बीबीसी ने अपनी रियलिटी चेक सिरीज़ में इस पहलू की पड़ताल की है.

इसकी पड़ताल करने के लिए बीबीसी ने दो शोधार्थियों के शोध का अध्ययन किया जिन्होंने इस पहलू की वैज्ञानिक जांच की है और उनसे बात करके इस मुद्दे की तह में जाने की कोशिश की है.

दिवाली के पटाख़ों का असर

यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिनेसोटा के शोधार्थी धनंजय घई और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ फाइनेंस एंड पॉलिसी ने दिल्ली के प्रदूषण में पटाखों की भूमिका पर एक अहम शोध किया है.

इन शोधार्थियों ने पाया है कि दिवाली के पटाखों का दिल्ली के वायु प्रदूषण पर कम असर पड़ता है.

लेकिन ये कम असर भी दिल्ली की हवा के लिए बेहद ख़तरनाक साबित होता है.

ये अध्ययन दिल्ली की पाँच जगहों से जुटाए गये आंकड़ों पर केंद्रित है. इसके लिए साल 2013 से 2016 के बीच डेटा इकट्ठा किया गया था.

दिवाली का त्योहार हिंदू कैलेंडर के अनुसार सामान्य तौर पर अक्तूबर के तीसरे हफ़्ते से नवंबर के दूसरे सप्ताह के बीच मनाया जाता है.

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अक्सर यही वो समय भी होता है जब किसान खेतों में पराली जलाते हैं. ऐसे में अध्ययनकर्ताओं ने सबसे ज़्यादा ग़ौर दिवाली वाले सप्ताह पर किया.

इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले धनंजय घई ने बीबीसी को बताया, "पराली जलाने की घटनाओं को स्थापित करने के लिए हमने नासा से सेटेलाइट तस्वीरें लीं और उनका इस्तेमाल किया."

साल 2013 से लेकर 2016 के बीच, चार में से दो बार दिवाली का त्योहार उस वक़्त नहीं पड़ा था जब किसान अपने खेतों में पराली जला रहे थे.

इन सालों में दिल्ली की एक लोकेशन पर कोई बड़ी औद्योगिक गतिविधि रुकने से वायु प्रदूषण और मौसम पर जो असर हुआ वो भी अध्ययनकर्ताओं ने दर्ज किया.

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रिसर्चरों ने पाया कि दिवाली के अगले दिन हर साल पीएम 2.5 की मात्रा क़रीब 40 फ़ीसदी तक बढ़ी.

जब इस आंकड़े को घंटों के आधार पर देखा गया तो रिसर्चरों ने पाया कि दिवाली के दिन शाम 6 बजे से अगले पाँच घंटे बाद तक (यानी क़रीब 11 बजे तक) पीएम 2.5 में 100 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई.

दिल्ली के प्रदूषण को मापने वाले प्राधिकरण ने भी पाया है कि साल 2016 और 2017 में दिवाली के बाद प्रदूषण तेज़ी से बढ़ा.

प्रदूषण में शामिल तत्व

जमशेदपुर में हुई एक रिसर्च में भी पाया गया कि दिवाली के दौरान प्रदूषण तेज़ी से बढ़ता है.

लेकिन इस रिसर्च से ये भी पता चल पाया कि पटाखों के कारण वायु में कौन-कौन से संघटक तेज़ी से बढ़ जाते हैं.

रिसर्च के अनुसार, वायु में बढ़ने वाले संघटक

  • पीएम 10
  • सल्फ़र डाइऑक्साइड
  • नाइट्रोजन डाइऑक्साइड
  • ओज़ोन
  • आयरन
  • मैगनीज़
  • बैरीलियम
  • निकेल

भारत का केंद्रीय पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड भी मानता है कि पटाखों से 15 ऐसे तत्व निकलते हैं जिन्हें मानव शरीर के लिए ख़तरनाक और ज़हरीला माना जाता है.

लेकिन ये भी मानना होगा कि इनमें बहुत सारे तत्व गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण में भी पाये जाते हैं.

अन्य कारण

ये भी पाया गया है कि सभी पटाखे अधिक मात्रा में पीएम 2.5 नहीं छोड़ते.

बड़े पटाखों में ही पीएम 2.5 की सघनता ज़्यादा होती है.

दिवाली के दौरान लोग तोहफ़े बाँटने के लिए निकलते हैं और इस कारण से लगने वाला ट्रैफ़िक जाम भी प्रदूषण बढ़ने का एक बड़ा कारण माना जाता है.

क्या दिवाली के दौरान गाड़ियों से होने वाला प्रदूषण शहर में वायु प्रदूषण बढ़ने का सबसे बड़ा कारण कहा जा सकता है?

इस सवाल पर रिसर्चर कहते हैं कि आगामी रिसर्च में उन्हें इस तथ्य पर भी ग़ौर करना होगा.

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