कश्मीर में यूरोपीय सांसदों के जाने पर मोदी सरकार से विपक्ष के सवाल

  • 29 अक्तूबर 2019
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पाँच अगस्त को जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म होने के बाद से पहली बार यूरोप के 27 सांसदों का दल राज्य का दौरा करने जा रहा है. कहा जा रहा है कि सांसदों का यह दल जम्मू-कश्मीर के अलग-अलग इलाक़ों में जाकर ज़मीन सच्चाई देखेगा.

जम्मू-कश्मीर के दौरे से पहले इस दल ने सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से मुलाक़ात की.

ये सांसद ब्रिटेन, फ़्रांस, जर्मनी और पोलैंड के हैं. कहा जा रहा है कि ये कोई आधिकारिक दौरे पर नहीं जा रहे बल्कि ये निजी हैसियत से आए हैं. सोशल मीडिया पर ये बात भी कही जा रही है कि इनमें से ज़्यादातर सांसद दक्षिणपंथी विचार के क़रीब हैं. इस दौरे में भारत के एनएसए दफ़्तर की अहम भूमिका बताई जा रही है.

इससे पहले भारत ने अमरीकी सीनेटर क्रिस वान हॉलेन के कश्मीर जाने के अनुरोध को ठुकरा दिया था. विपक्षी पार्टी कांग्रेस और सीपीएम ने कहा है कि भारतीय नेताओं और सांसदों पर कश्मीर जाने को लेकर सरकार ने पाबंदी लगा रखी है और विदेशी सांसदों को जाने दे रही है.

कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ट्वीट कर पूछा है, ''यूरोप के सांसदों का जम्मू-कश्मीर में एक निर्देशित दौरे का स्वागत किया जा रहा है जबकि भारतीय सांसदों के जाने पर पाबंदी लगी है.''

सोमवार शाम यूरोपीय यूनियन के प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात की और उनसे कश्मीर समेत व्यापार से जुड़े कई मुद्दों पर चर्चा की.

प्रधानमंत्री ने इस मौक़े पर किसी देश का नाम लिए बग़ैर कहा कि विश्व के सामने आज सबसे बड़ी समस्या आतंकवाद और आतंकवाद का वित्तपोषण करने वाले हैं.

उन्होंने कहा, "भारत और यूरोप जैसे विविध और गणतांत्रिक समुदायों के सामने आज आतंकवाद और कट्टरपंथ सबसे बड़ी चुनौती है. आतंकवाद से लड़ने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग की ज़रूरत है."

"जो भी आतंकवाद का समर्थन करते हैं, उनकी मदद करते हैं या फिर इस तरह के काम में लगे लोगों या संगठनों की मदद करते हैं या फिर आतंकवाद का समर्थन करने की नीति अपनाते हैं, उनके ख़िलाफ़ कड़े कदम उठाए जाने चाहिए. आतंकवाक को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए."

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जम्मू-कश्मीर के दौरे पर जा रहे यूरोपीय संघ के नेता भी अपने दौरे को लेकर काफ़ी उत्साहित दिखे.

प्रतिनिधिमंडल में शामिल ब्रिटेन की लिबरल पार्टी के नेता बिल न्यूटन डन ने कहा, "मैंने कश्मीर की स्थिति के बारे में लोगों से काफ़ी कुछ सुना है और हम यहां की ज़मीनी सच्चाई जानना चाहते हैं और जानना चाहते हैं कि लोग कैसे हैं."

"हम कुछ स्थानीय लोगों से बात करेंगे क्योंकि हम चाहते हैं कि सभी की ज़िंदगी ख़ुशहाल हो."

वहीं जम्मू-कश्मीर के पूर्व उपमुख्यमंत्री और बीजेपी नेता कविन्द्र गुप्ता को लगता है कि सरकार को यूरोपीय संघ के प्रतिनिधिमंडल को सीमा के नज़दीक के इलाक़ों में ले जाया जाना चाहिए.

हो रही है दौरा रद्द करने की मांग

यूरोपीय संघ के 28 सदस्यों का ये अनौपचारिक प्रतिनिधिमंडल है जो 29 अक्टूबर को जम्मू-कश्मीर के दौरे पर जा रहा है. राज्यसभा के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने इस दौरे को तुरंत रद्द करने की मांग की है.

ट्विटर पर उन्होंने लिखा, "मुझे आश्चर्य है कि विदेश मंत्रालय ने यूरोपीय संघ से जुड़े नेताओं के जम्मू-कश्मीर में दौरे की व्यवस्था उनकी निजी हैसियत में की है. ये हमारे राष्ट्रीय नीति के ख़िलाफ़ है. मैं सरकार से अपील करता हूं कि ये अनैतिक है और इस दौरे को तुरंत रद्द किया जाए."

जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की नेता महबूबा मुफ्ती ने इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पर सरकार से सवाल किए.

उन्होंने इस बात की ओर इशारा किया कि अब भी जम्मू-कश्मीर के तीन पूर्व मुख्यमंत्री समेत कई नेता या तो गिरफ्तार हैं या फिर नज़रबंद हैं. इनमें ख़ुद महबूबा मुफ्ती, फ़ारूख़ अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला शामिल हैं.

महबूबा मुफ्ती ने कई ट्वीट किए और लिखा, "अगर कश्मीर की स्थिति का जायज़ा लेने के लिए यूरोपीय संघ के नेताओं को वहां जाने की इजाज़त मिल सकती है तो अमरीकी सीनेटरों को क्यों नहीं?"

एक अन्य ट्वीट में उन्होंने लिखा, " प्रतिनिधिमंडल को प्रदेश के तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों से मिलने क्यों नहीं दिया जा रहा. किसी भी सूरत को दो बातें हो सकती हैं- अगर ये प्रतिनिधिमंडल स्थिति को सामान्य बताते हैं तो फिर जिन्हें हिरासत में रखा गया है उन्हें छोड़ा जाना चाहिए और इंटरनेट सुविधा बहाल की जानी चाहिए. अगर वो कहते हैं कि स्थिति सामान्य नहीं है तो फिर ये सरकार के लिए शर्मनाक़ होगा."

हाल में भारत सरकार ने कश्मीर दौरे के लिए अमरीकी सीनेट की एक नेता की गुज़ारिश को ख़ारिज कर दिया था. इसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी काफ़ी चर्चा भी हुई थी.

31 अक्टूबर को जम्मू-कश्मीर राज्य दो केंद्र शासित प्रदेशों - जम्मू कश्मीर और लद्दाख - में तब्दील हो जाएगा.

इस बीच यूरोपीय संघ के सदस्यों का ये दौरा अहम माना जा रहा है लेकिन कइयों को इस पर संदेह है कि क्या ये प्रतिनिधिमंडल आम लोगों से उनके मन की बात जान पाएगा.

कश्मीर टाइम्स की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन का नज़रिया -

पिछले तीन महीनों से सरकार ने न किसी राजनीतिक प्रतिनिधिमंडल को, न बाहर के किसी एनजीओ को, यहां तक कि विदेशी पत्रकारों पर भी एक तरह से पाबंदी लगा रखी है.

तो ये अचानक एक नया प्रतिनिधिमंडल आ रहा है. ये किस हद तक स्वतंत्र रूप से काम करेगा या फिर एक ट्यूटर्ड दौरा होगा ये तो देखना होगा.

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Image caption जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता यासीन मलिक की पत्नी मुशाल मलिक. 27 अक्टूबर को ली गई इस तस्वीर में वो पाकिस्तान के इस्लामाबाद में भारत सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर हुए प्रदर्शनों में शामिल हुई थीं.

क्या कश्मीर में लगाई गई पाबंदियां हटाई जाएंगी दौरे से पहले. मुझे लगता है कि फ़िलहाल इस बारे में कुछ कहना ठीक नहीं है क्योंकि पता नहीं इनके नतीजे क्या रहेंगे और क्या ये महत्वपूर्ण साबित भी होगा या फिर ये केवल दिखाने के लिए एक नमूना पेश कर रहे हैं.

अगर एक चुने हुए समूह को कश्मीर जाने दिया जा रहा है तो उनकी स्वतंत्रता पर सवाल खड़ा होगा.

मैं ये नहीं मानती कि ये दौरा रद्द कया जाना चाहिए. मेरा मानना है कि प्रतिनिधिमंडल समेत सभी के लिए रास्ता खोले जाने चाहिए.

अगर सरकार कहती है कि सब कुछ ठीक है तो पर्यटन के लिए कश्मीर को खोल दिया गया है, लेकिन वहां न तो राजनेता जा सकते हैं न ही मीडियावाले. इस तरह की पाबंदियां होंगी तो साफ़ ज़ाहिर है कि कुछ तो समस्या है.

सरकार एक ख़ास किस्म के लोगों की आवाजाही बंद करना चाहती है. मेरा ख़याल है कि ऐसा नहीं होना चाहिए ताकि कश्मीर की जो सच्चाई है वो बाहर निकल सके.

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31 अक्टूबर को जम्मू-कश्मीर राज्य आख़िरकार दो केंद्र शासित प्रदेशों - जम्मू कश्मीर और लद्दाख - में तब्दील हो जाएगा. क्या ऐसे में ये दौरा अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए किसी तरह का संकेत है?

मेरा मानना है कि अपनी ये अपनी छवि बनाने की बात है और शायद उस पर कोई फ़र्क़ पड़ेगा. लेकिन स्थिति पर कोई सकारात्मक या नकारात्मक फ़र्क़ पड़ेगा ऐसा नहीं लगता.

किससे बात करेगा प्रतिनिधिमंडल

दक्षिण कश्मीर के इलाक़े से या फिर श्रीनगर के डाउनटाउन इलाक़ों से जहां लोगों पर अधिक पाबंदिया लगाई गई थीं और लोगों पर अधिक असर पड़ा है वहां से मिली कई रिपोर्ट्स से अंदाज़ा मिला है कि लोग ख़ौफ़ के मारे किसी से कुछ बोल नहीं रहे.

फिर एक वीआईपी टीम को ले जाकर जो अलग से बैठेगी वो किस तरह के लोगों से मिलेगी? उनकी सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम होंगे और वो गाँव गाँव जाकर लोगों से तो नहीं मिलेंगे.

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लोग बात करना नहीं चाहते क्योंकि उन्हें लगता है कि अगर वो बात करते हैं तो फिर से उन पर किसी तरह की ज़ोर जबर्दस्ती होगी.

क्या इनके सामने वो खुल के बेझिझक बात कर सकेंगे? यही सबसे बड़ा सवाल है. ऐसे में फिर इस टीम के नतीजे भी एकतरफ़ा रहेंगे. उसमें सभी पक्ष तो नहीं रहेंगे.

अभी भी कई बड़े नेता और अलगाववादी नेता या तो गिरफ्तार हैं या फिर हिरासत में हैं. आला नेता ही नहीं बल्कि दूसरी क़तार और तीसरी क़तार के नेता भी हिरासत में हैं या फिर गिरफ़्तार हैं. और तो और ब्लॉक स्तर के नेता भी क़ैद में हैं.

व्यापार समूह के लोग, वकील, एनजीओ के लोग, अकादमिक लोग भी कै़द में हैं या फिर नज़रबंद हैं. तो ऐसे में ये प्रतिनिधिमंडल बातचीत किससे करेगा.

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