कश्मीर में मज़दूरों की हत्या, मुर्शिदाबाद में मातम

  • 30 अक्तूबर 2019
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स्थानीय टीवी चैनलों पर मंगलवार देर रात जैसे ही कश्मीर घाटी में चरमपंथियों के हाथों पांच मज़दूरों की हत्या की खबर फ्लैश हुई, हज़ारों किलोमीटर दूर पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के दो गांवों में सन्नाटा फैल गया.

लोग तुरंत अपनों की ख़ैरियत जानने के लिए फ़ोन मिलाने लगे. कुछ लोग भाग्यशाली रहे, लेकिन कुछ लोगों की आशंका सच साबित हुई.

ऐसे ही लोगों में अजिदा बीबी भी हैं. उनके पति कमरुद्दीन भी मृतकों में शामिल हैं.

सेब तोड़ने के सीजन में इस ज़िले के कई गांवों से सैकड़ों लोग मज़दूरी के लिए कश्मीर घाटी जाते रहे हैं.

रात को पुलिस की एक टीम ने भी जिले के बहालनगर और ब्राह्मणी गांवों का दौरा किया था. कल रात से ही पूरे इलाके में मरघट जैसा सन्नाटा छाया हुआ है.

बुधवार सुबह से ही कांग्रेस नेता अधीर चौधरी समेत विभिन्न राजनीतिक दलों के लोग हरसंभव सहायता के आश्वासन के साथ पीड़ितों के घर पहुंचने लगे हैं. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस घटना पर गहरा शोक जताते हुए पीडित परिवारों की हरसंभव सहायता का भरोसा दिया है.

चरमपंथी हमले में पांच लोगों की मौत की खबर सुनने के बाद पूरे गांव ने बेचैनी में रात भर जाग कर ही गुजारी है.

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मुर्शिदाबाद के सागरदीघी थाने के प्रभारी सुमित विश्वास ने बताया, "बहालनगर गांव से वहां गया 15 मजदूरों का एक दल वहां एक घर में किराए पर रहता था. मंगलवार शाम को चरमपंथियों ने उनको घर से निकाल कर अंधाधुंध फायरिंग की. इससे पांच मजदूरों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया. "

"मृतकों में रफ़ीक शेख (28), कमरुद्दीन शेख (30), मुरसालिम शेख (30), नईमुद्दीन सेख (30) औऱ रफ़ीकुल शेख (30) शामिल हैं. उनके अलावा गंभीर रूप से घायल ज़हीरुद्दीन अनंतनाग के अस्पताल में जीवन और मौत के बीच जूझ रहे हैं."

मरने वालों में सबसे दुर्भाग्यशाली कमरुद्दीन रहे. उनको बुधवार को ही घर वापसी की ट्रेन पकड़नी थी.

कमरुद्दीन की बेवा अजिदा बीबी बताती है, "सोमवार को ही उनसे बात हुई थी. उन्होंने वहां हालत खराब होने की बात कहते हुए बुधवार को ट्रेन पकड़ कर घर लौटने की बात कही थी. मंगलवार रात को टीवी पर खबर देखने के बाद अजिदा ने कई बार कमरुद्दीन को फोन किया. लेकिन उधर से कोई जवाब नहीं मिला. उसी समय वह किसी अनहोनी की आशंका से कांप उठी."

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आधी रात के बाद पुलिस के गांव में पहुंचने पर उनकी आशंका और बढ़ गई. लेकिन रात को पुलिस ने सरकारी तौर पर मृतकों के घरवालों को कोई सूचना नहीं दी.

कमरुद्दीन के एक परिजन फ़िरोज़ शेख बताते हैं, "घाटी में उपद्रव औऱ अशांति को ध्यान में रखते हुए कमरुद्दीन इस साल वहां नहीं जाना चाहता था. लेकिन बाकी युवकों के राजी होने पर वह महज 15 दिनों के लिए गया था. यहां लौट कर नवंबर के पहले सप्ताह से उसे खेतों में धान की कटाई करनी थी. लेकिन होनी को शायद कुछ और मंज़ूर था."

बहालनगर के रहने वाले रफीक शेख एक बेटा-बेटी छोड़ गए. उसके पास गांव में मामूली ज़मीन है.

रफ़ीक के पिता गफूर कहते हैं, "क्या करें? यहां कोई काम नहीं है. इसी वजह से सेब तोड़ने के सीजन में गांव के बहुत से युवक दो-तीन महीने के लिए कश्मीर घाटी में जाते हैं. कौन जानता था कि यह मेरे बेटे का आखिरी दौरा साबित होगा?"

एक अन्य मृतक रफीकुल शेख के पिता सादिकुल ने बताया, "रफीकुल 27 दिन पहले ही कश्मीर गया था."

लोकसभा में कांग्रेस के नेता और जिले के सांसद अधीर चौधरी कहते हैं, "केंद्र सरकार घाटी में सब कुछ सामान्य होने का झूठा दावा करती रही है. सरकार की बातों पर भरोसा कर ही इलाके के कई युवक इस बार वहां गए थे. लेकिन इस घटना से साफ है कि वहां हालात सामान्य नहीं हैं."

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अधीर ने बुधवार सुबह बहालपुर जाकर मतकों के परिजनों से भी मुलाकात की.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस घटना पर गहरा शोक जताते हुए मृतकों के परिजनों को सरकार की ओर से हरसंभव सहायता देने का भरोसा दिया है. यहां जारी एक बयान में उन्होंने कहा, "यूरोपीय संघ के सांसदों की टीम के दौरे के दिन ही इतनी बड़ी घटना से साफ है कि घाटी में हालात बेहद खराब हैं."

तृणमूल कांग्रेस के मुर्शिदाबाद जिले के एक नेता जहीरुल शेख बताते हैं, "इलाके के सैकड़ों युवक मजदूरी के लिए घाटी में जाते रहे हैं. अब सरकार प्रयास करेगी कि उनको यहीं रोजगार मिले ताकि युवकों को जान हथेली पर लेकर घाटी में नहीं जाना पड़े."

सागरदीघी के तृणमूल विधायक सुब्रत साहा कहते हैं, "यह बेहद दुखद घटना है. हम पीड़ित परिवारों के साथ हैं."

अब इलाके के पांच घरों और उनमें रहने वालों को ही नहीं बल्कि पूरे गांव को मृतकों के शवों के यहां आने का इंतज़ार है.

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