कश्मीर: बाहरी लोगों पर क्यों बढ़ रहे हमले

  • सलमान रावी
  • बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
जम्मू-कश्मीर

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जम्मू-कश्मीर के लिए पिछले तीन महीनों में अक्टूबर का महीना सबसे हिंसक रहा है.

पांच अगस्त को अनुच्छेद 370 के प्रावधान ख़त्म किए जाने के बाद केंद्र सरकार इतने बड़े फ़ैसले के बावजूद सब कुछ हिंसा-मुक्त होने का दावा करती रही. हालांकि कश्मीर घाटी में छिट-पुट घटनाओं की खबरें आती रहीं.

लेकिन अक्टूबर माह में चरमपंथियों ने अचानक एक के बाद एक हिंसक वारदातों को अंजाम देना शुरू किया. इस हिंसा में चरमपंथियों के निशाने पर मूलतः जम्मू कश्मीर के बाहर से आए लोग रहे. इनमें ज़्यादातर लोग कारोबारी, मज़दूर और ट्रक चालक थे.

14 अक्टूबर से अब तक चरमपंथी हिंसा में लगभग 10 से 12 लोग मारे गए जो देश के विभिन्न प्रांतों से जम्मू कश्मीर पहुंचे थे.

कब कब हुई घटनाएं

  • 29 अक्टूबर को जम्मू कश्मीर के कुलगाम में चरमपंथियों ने पश्चिम बंगाल के छह मज़दूरों को लाइन में खड़ा करके गोलियां चलाई, जिसमें पांच मज़दूरों की घटनास्थल पर ही मौत हो गई जबकि एक मज़दूर की हालत गंभीर बताई जा रही है.
  • 28 अक्टूबर सोपोर बस स्टैंड पर हुए ग्रेनेड हमले में 15 नागरिक घायल हुए.
  • 28 अक्टूबर को ही अनंतनाग में दो ट्रक ड्राइवरों की हत्या.
  • 24 अक्टूबर को राजस्थान से ट्रक लेकर आये ड्राइवर की हत्या. ट्रक का घायल ख़लासी पंजाब के होशियारपुर का रहने वाला बताया जाता है. चरमपंथियों ने तीन ट्रकों में आग भी लगा दी.
  • 16 अक्टूबर को ईंट-भट्ठे पर काम कर रहे छत्तीसगढ़ के मज़दूर की हत्या. इसी इलाक़े में पंजाब से आये सेब के कारोबारी की हत्या.
  • 14 अक्टूबर को दक्षिण कश्मीर में राजस्थान के ट्रक ड्राइवर की गोली मारकर हत्या.

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'बोलने वाला कोई नहीं'

जम्मू कश्मीर पर नज़र रखने वालों का मानना है कि ये बीते दशक में पहली बार हुआ है जब चरमपंथियों ने एक ख़ास तौर पर बाहरियों को निशाना बनाया है.

वरिष्ठ पत्रकार अनुराधा भसीन इसे 'एक ख़तरनाक घटनाक्रम' के रूप में देख रहीं हैं.

उनका कहना है कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ जब सिर्फ़ जम्मू कश्मीर में बाहर से आए लोगों पर इस तरह के हमले हुए हों.

वो कहती हैं, "प्रमुख दलों के नेता समेत क्षेत्रीय और अलगाववादी नेता भी या तो जेलों में क़ैद हैं या अपने घरों में नज़रबंद हैं. इसलिए इन घटनाओं के विरोध की आवाज़ें भी नहीं आ पा रहीं हैं. पहले जब हालात सामान्य थे और अगर कोई ऐसी घटना होती थी तो सब इसका विरोध करते थे. इस विरोध की वजह से चरमपंथी भी इस तरह घटनाओं को अंजाम देने की हिम्मत नहीं जुटा पाते थे. लेकिन अब तो खौफ़नाक ख़ामोशी का दौर है जब कोई आवाज़ कहीं से नहीं आ रही है."

अनुराधा भसीन के अनुसार पहले जब कभी आम नागरिकों की हत्या हुई भी तो कश्मीरियों ने उसका विरोध किया और वो भी मुख़र होकर. मगर अब कोई बोलने वाला ही नहीं है.

अनुच्छेद 370 और 35 A के तहत जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा मिला हुआ था. इस प्रदेश में भारतीय दंड संहिता और सीआरपीसी की जगह रणबीर दंड विधान लागू था. यानी भारतीय संविधान के कई ऐसे विषय थे जो यहां लागू नहीं थे. यहाँ बाहर के लोगों को ज़मीन खरीदने का अधिकार भी नहीं था.

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संसद में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म होने के बाद जम्मू कश्मीर में विकास के रास्ते खुल जाएंगे और यहाँ बड़े पैमाने पर निवेश होगा जिससे रोज़गार के नए मौक़े सृजित होंगे.

अनुच्छेद 370 के प्रावधान हटाए जाने के फ़ैसले का जम्मू में लोगों ने स्वागत किया मगर कश्मीर घाटी के लोगों को लगने लगा कि अब बाहरी लोग यहाँ आकर बसने लगेंगे.

कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि चरमपंथियों की ओर से अचानक बाहरी लोगों पर हमले की एक वजह यह भी हो सकती है.

जम्मू कश्मीर के राज्यपाल के सलाहकार केवल शर्मा ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि चरमपंथी, जम्मू कश्मीर के विकास को रोकने के लिए इस तरह की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं.

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उनका ये भी दावा था कि "सेना, सरकार और स्थानीय प्रशासन चरमपंथियों को मुंह तोड़ जवाब भी दे रही है. लद्दाख़ और जम्मू कश्मीर दो केंद्र शासित राज्यों के रूप में अस्तित्व में आ रहे हैं. चरमपंथी कोशिश में हैं कि हिंसक घटनाओं को अंजाम देकर शांति से हो रही इस प्रक्रिया में बाधा पहुंचे. लेकिन वो नाकाम रहे हैं."

सरकारी अमले को भी लगता है कि चरमपंथी बाहरियों को यहां आने से रोकने के लिए ही बाहरी मज़दूरों और ट्रक चालकों को निशाना बना रहे हैं.

राजस्थान ट्रक ट्रांसपोर्ट संघ ने अचानक चरमपंथी हमलों में आई तेज़ी पर चिंता व्यक्त की है.

संघ ने तय किया है कि अब राजस्थान के ट्रक जम्मू कश्मीर नहीं जाएंगे जब तक सरकार और प्रशासन उनके लिए सुरक्षा के पुख़्ता इंतज़ाम नहीं करता.

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क्या हासिल होगा?

कभी चरमपंथी रहे सैफ़ुल्लाह, अब भारतीय जनता पार्टी में हैं. वो कहते हैं कि इस नए घटनाक्रम का दूरगामी असर पडेगा.

हालांकि उनके अनुसार पहले चरमपंथी इस तरह बाहर से आये लोगों को निशाना नहीं बनाते थे. आम नागरिकों को भी नहीं.

उनका मानना है कि ये हिंसा बिलकुल अलग तरह की है जिसके परिणाम प्रदेश के लोगों के लिए नाकारात्मक भी हो सकते हैं.

सैफ़ुल्लाह कहते हैं, "अगर चरमपंथी लगातार प्रदेश से बाहर से आये लोगों पर हमले करते रहेंगे तो फिर जम्मू कश्मीर से भारत के विभिन्न प्रांतों में रहने या नौकरी के लिए आने वाले लोगों की सुरक्षा को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो जाएगा. लड़ाई कश्मीरियों की है. दूसरे राज्यों से आये लोगों का क़त्ल करके चरमपंथियों को क्या हासिल होगा."

उनका कहना था कि अब सबको आगे का सोचना चाहिए कि किस तरह जम्मू कश्मीर में हालात बेहतर हो सकते हैं और शांति स्थापित हो सकती है. वो कहते हैं कि चरमपंथियों ने नए तरीक़े की हिंसा को अंजाम देना शुरू कर दिया है जो सबके लिए नुक़सानदेह है.

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सुनील पंडिता सामाजिक कार्यकर्ता हैं और जम्मू में रहते हैं. वो कहते हैं कि अचानक चरमपंथी हमलों में आई तेज़ी का सरकार को जवाब देना चाहिए क्योंकि ये हिंसा इतने कड़े प्रतिबंधों और सुरक्षा के चाक-चौबंद बंदोबस्त के बीच हो रही है.

उनका कहना है, "अगर इस समय केंद्र की सत्ता में कोई और दल होता और जम्मू कश्मीर में इस तरह की हिंसा हो रही होती तो भारतीय जनता पार्टी हाय तौबा मचा देती. सरकार भी ज़्यादती कर रही है और चरमपंथी भी. कश्मीरी फिर दोनों के बीच पिस रहे हैं. अब तो बाहर के लोग भी पिस रहे हैं. मैं कश्मीरी पंडित हूँ लेकिन मुझे कश्मीर घाटी जाने की अनुमति नहीं है जबकि यूरोप के सांसद वहां जा रहे हैं."

31 अक्टूबर को जम्मू कश्मीर एक केंद्र शासित राज्य बन जाएगा जबकि लद्दाख दूसरे केंद्र शासित राज्य के रूप में अस्तित्व में आ जाएगा.

सारी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं और दोनों ही राज्यों के लिए उपराज्यपालों की नियुक्ति भी हो गई हैं.

हालांकि, चरमपंथी हिंसा में अचानक आई तेज़ी ने सरकारी अमले को चिंता में डाल दिया है.

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