जम्मू-कश्मीर: ख़ास दर्जा ख़त्म, तो क्या अब सामान्य होंगे हालात?

  • 1 नवंबर 2019
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केंद्र सरकार ने 5 अगस्त, 2019 को ऐतिहासिक फ़ैसला करते हुए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 और 35-ए को निष्प्रभावी करते हुए जम्मू कश्मीर राज्य के पुनर्गठन का फ़ैसला लिया. इसके तहत 31 अक्तूबर, 2019 से राज्य की जगह दो केंद्रशासित प्रदेशों की व्यवस्था अस्तित्व में आ गयीं.

अनुच्छेद 370 से जम्मू कश्मीर को नाममात्र की स्वायत्तता हासिल थी, लेकिन इसे निरस्त कर दिया गया ताकि इलाके में विकास को बढ़ावा देने और आतंकी गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए सुरक्षा बलों पर सीधे केंद्र का नियंत्रण हो.

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दरअसल मौजूदा केंद्र सरकार को यह लगा कि बीते तीन दशक से राज्य में सुरक्षा बलों की भारी तैनाती के बाद भी न तो कश्मीरी जनता पूरी तरह काबू में है और न ही वहां होने वाले विद्रोह प्रदर्शनों को दबाया जा सका है.

ऐसे में उन्होंने एक देश, एक संविधान के विचार को यहां लागू करने का फ़ैसला किया.

जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा निरस्त किए जाने से जम्मू कश्मीर राज्य का संविधान और उनका अपना झंडा भी निरस्त हो गया है. इससे ढेरों कश्मीरियों की भावनाएं आहत हुई हैं.

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सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं

सरकार के अचानक और एकतरफ़ा ढंग से लिए गए इस फ़ैसले को अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक भी बताया जा रहा है. यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट में इस फ़ैसले की समीक्षा सम्बन्धी कई याचिकाएं दाखिल की गई हैं.

26 अक्टूबर, 1947 को जम्मू-कश्मीर के महाराजा और भारत सरकार के बीच हुए विलय के समझौते के मुताबिक यह राज्य भारत का अभिन्न हिस्सा है हालांकि इसके कुछ हिस्से भारतीय प्रशासन के तहत आते हैं तो कुछ पाकिस्तान और चीन के अधिकार क्षेत्र में.

इस पूरे क्षेत्र को अपने आधिपत्य में लेने के लिए भारत लगातार अपनी प्रतिबद्धता जताता आया है लेकिन अब तक इस पूरे हिस्से पर उसका नियंत्रण नहीं हो सका है.

यहां तक कि 1965 और 1971 के युद्ध में भारत ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर पर क़ब्ज़ा जमा लिया था लेकिन संयुक्त राष्ट्र के 1948 के प्रस्ताव के प्रावधानों के तहत नियंत्रण रेखा की गरिमा को बनाए रखने के लिए भारत को जीते हुए हिस्सों को वापस करना पड़ा था.

यूएन का 1948 का प्रस्ताव भारत और पाकिस्तान के लिए कश्मीर विवाद के सौहार्दपूर्ण हल निकालने की बाध्यता से सम्बन्धित है.

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शासन और मानवाधिकार मामलों पर असर

राज्य में चरमपंथियों और आंतरिक विद्रोह का समर्थन करने वाले अलगाववादी नेता अमूमन राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर हिरासत में ही रहते हैं. लेकिन 5 अगस्त, 2019 के बाद से, तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों यानी फ़ारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला और महबूबा मुफ़्ती समेत मुख्यधारा के राजनेताओं को भी, बिना किसी आपराधिक मामले के, हिरासत या घर में नज़रबंद रखा जा रहा है.

कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़, कुल मिलाकर 4,000 से ज़्यादा नेता, सामाजिक कार्यकर्ता, कारोबारी और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को केंद्र सरकार की जल्दबाजी और संदेहास्पद प्रक्रिया के जरिए हिरासत में लिया गया है.

आम जनजीवन पर पाबंदियां जारी हैं, लोग बेरोक टोक कहीं आ जा नहीं सकते. संचार के साधनों पर पाबंदियां हैं और कश्मीर घाटी में लॉकडाउन जैसी स्थिति है.

इन वजहों से बीते तीन महीने से यह पूरा इलाका कटा हुआ है और मानवाधिकार संकट का सामना कर रहा है.

मानवाधिकार उल्लंघन से सम्बन्धित मामलों पर देश के अंदर और देश के बाहर, ख़ासकर यूएन में, लगातार बात हो रही है. लोगों की आवाज़ों को दबाने और मीडिया पर जानबूझ कर अंकुश लगाए जाने को लेकर लोगों में गंभीर चिंताएं हैं.

हालांकि सत्तारूढ़ पार्टी के शीर्ष नेता इस बात को बार-बार दुहरा रहे हैं कि उन्होंने अपने चुनावी घोषणा पत्र का एक वादा पूरा किया है.

देश भर में भी इसको लेकर उत्साह का माहौल दिखा है लेकिन घाटी के लोग बेहद दुखी और अपमानित महसूस कर रहे हैं.

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डिजिटल अर्थव्यवस्था में व्यवधान

अपने सभी नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा करने की भारी ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार पर होती है, ताकि लोग गरिमापूर्वक जीवन जी सकें.

कश्मीर के लोगों का न केवल अपने परिवार और दोस्तों से संपर्क टूट गया है बल्कि वे सामाजिक-आर्थिक सुविधाओं का लाभ भी नहीं ले पा रहे हैं.

इंटरनेट सुविधाएं उन तक नहीं पहुंच पा रही हैं. लोगों की शारीरिक और मानसिक इलाज से सम्बन्धित योजना आयुष्मान भारत पूरी तरह से बाधित है.

इसी तरह से मनरेगा के तहत मज़दूरी का भुगतान, विधवा पेंशन, वृद्धावस्था पेंशन और छात्रवृति की योजनाएं भी बुरी तरह प्रभावित हुई हैं.

जब तक सरकार संचार नेटवर्क पूरी तरह से बहाल नहीं करती है, तब तक नागरिकों के आर्थिक कल्याण की योजनाओं को लागू कर पाना संभव नहीं होगा.

दोनों केंद्र शासित प्रदेश यानी जम्मू,कश्मीर और लद्दाख में कुल 22 ज़िले हैं. यहां के ज़िले एक दूसरे से जलवायु और भौगोलिक तौर पर काफ़ी अलग होते हैं.

विषम जलवायु के चलते इनमें से कईयों का संपर्क कई महीनों तक कट जाता है. प्रत्येक जिले के विकास की रणनीतिक योजना पर कभी विचार नहीं किया गया जिसकी कमी के चलते इलाके का आर्थिक विकास भी नहीं हुआ.

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नए शासन के सामने विकास की चुनौतियां

घाटी से आने वाली ख़बरें ठीक नहीं हैं और निवासियों के बीच बढ़ते अलगाव की ओर इशारा कर रही हैं.

दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि वे सब लोग जो ये मानते आए थे कि कश्मीर का भविष्य भारत के साथ सुरक्षित है, वे सब अपने अपने घर में नज़रबंद हैं और केंद्र सरकार के एकतरफ़ा और अलोकतांत्रिक कार्रवाई से बेहद निराश हैं.

केंद्र सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती तो यह बताने की है कि पूर्ण राज्य का दर्जा छिनने से कश्मीर के लोगों को कोई नुकसान नहीं होगा, उनकी सामाजिक और आर्थिक आकांक्षाओं का हनन नहीं किया जाएगा.

31 अक्तूबर, 2019 के बाद हालात में क्या बदलाव होंगे, इसे समझने के लिए कई बातों पर ध्यान दिया जा सकता है.

पहली बात यह है कि, नए प्रशासनिक सेटअप में क्षेत्र के कहीं तेज़ विकास का वादा किया गया है, जबकि भारी सुरक्षा व्यवस्था और नियंत्रण से लगातार हो रही घुसपैठ के चलते इलाके में निवेश की प्रक्रिया बाधित रहेगी.

भारतीय अर्थव्यवस्था में भी गिरावट का दौर है, ऐसे में आधारभूत ढांचों के विकास के लिए थोड़ा ही पैसा सरप्लस होगा.

जैसा कि सब जानते हैं कि जम्मू कश्मीर की अर्थव्यवस्था में पर्यटन क्षेत्र केंद्रीय भूमिका निभाता है, यहां हर महीने दो लाख पर्यटक पहुंचते थे. लेकिन अभी इतनी संख्या में पर्यटक नहीं पहुंच रहे हैं और आंतरिक राजस्व के लिहाज से नुकसान हो रहा है.

दूसरी बात यह है कि पूरा का पूरा प्रशासनिक ढांचा पहले की तरह ही रहने वाला है.

उदाहरण के लिए जम्मू-कश्मीर में, हमेशा केंद्र में सरकार चलाने वाली पार्टी और राज्य की किसी अहम पार्टी के गठबंधन की सरकार रही है.

अमूमन राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा रहता था, जो एक तरह से केंद्र का शासन ही माना जाता है. ऐसे में दो केंद्रशासित प्रदेश होने पर, यहां शासन करना और लोगों से किए वादों को पूरा करने की ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार की हो जाएगी.

इसके लिए केंद्र को एक प्रभावी शासन व्यवस्था बनानी होगी. विधानसभा चुनाव लंबित हो जाएंगे जबकि ज़मीनी स्तर पर शासन को बेहतर बनाने के लिए स्थानीय निकायों के चुनाव होंगे.

ध्यान देने लायक बात यह है कि जम्मू-कश्मीर में पंचायती राज व्यवस्था के तहत पहले कभी स्थानीय शासन व्यवस्था नहीं रही है.

इसकी वजह यह है कि गांव से ब्लॉक और ब्लॉक से ज़िला स्तर की तीन चरणों वाली व्यवस्था अतीत में कभी बनी ही नहीं.

स्थानीय इलाकों के विकास संबंधी योजनाओं के बनने और उसे लागू करने की राह में सबसे बड़ी चुनौती स्थानीय प्रशासन में प्रशिक्षण और अनुभव की कमी साबित होगी.

तीसरी अहम बात यह है कि दोनों केंद्रशासित प्रदेशों के निवासियों में नस्लीय विविधता है जिसके चलते छद्म राष्ट्रवाद के नाम पर विभिन्न समुदायों की भावनाओं को भड़काना आसान हो जाएगा और सांप्रदायिकता के आधार पर मतदाताओं का ध्रुवीकरण संभव होगा.

इसी संदर्भ में देखें तो पाकिस्तान के साथ तनाव और कश्मीर में संकट की स्थिति का इस्तेमाल आम संसदीय और विधानसभा चुनाव में ध्रुवीकरण के लिए किया जाता है.

एक लोकतांत्रिक और संघीय व्यवस्था में ध्रुवीकरण की राजनीति, सामाजिक समूहों में सदभाव बढ़ाने की राह की सबसे बड़ी बाधा है.

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सामाजिक समूहों में सद्भाव बढ़ाए बिना विकास योजनाओं को लागू करना संभव नहीं होगा. ऐसा लगता नहीं है कि सत्तारूढ़ सरकार अब तक अपनाए गए पक्षपातपूर्ण नजरिए में कोई बदलाव लाना चाहती है, ऐसे में लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार की गुजांइश कम ही है.

इलाके में तेज़ी से विकास की उम्मीदों के विपरीत, यहां लंबे समय से चले आ रहे शटडाउन और इंटरनेट सुविधाओं पर पाबंदी के चलते गंभीर चिंताएं उठ रही हैं.

इसके चलते लोग शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं, जो उनका संवैधानिक अधिकार है.

हालांकि शैक्षणिक संस्थान और बाज़ार खुले हुए हैं लेकिन मोबाइल फ़ोन पर पाबंदी, सड़कों पर सुरक्षा बलों की भारी तैनाती और पब्लिक सेफ़्टी एक्ट (पीसए)- आर्म्ड फ़ोर्सेज स्पेशल पावर एक्ट (एएफएसपीए) जैसे सख़्त क़ानून में गिरफ़्तारी की वजह से आम लोगों की भागीदारी नगण्य है.

इतने कड़े क़ानून देश के किसी दूसरे केंद्रशासित प्रदेश में नहीं हैं.

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भविष्य की राह

सत्ता का दुरुपयोग करते हुए बिना किसी अपराध के राजनीतिक विरोधियों को हिरासत में रखने से भारतीय लोकतंत्र पर दाग लगा है.

हिरासत में रखे गए सभी लोगों की रिहाई के बिना, लोकतांत्रिक सिद्धांतों को बनाए रखने और कानून का शासन लागू करने के लिए राजनीतिक प्रक्रिया को शुरू करना संभव नहीं होगा.

इसलिए सरकार को हिरासत में और अपने घरों में नज़रबंद रखे गए सभी लोगों को रिहा करना चाहिए.

कश्मीर की जटिल स्थिति का भारत और पाकिस्तान के बीच राजनीतिक विवाद से भी नज़दीकी सम्बन्ध रहा है. इस विवाद की वजह से दोनों देशों के बीच तीन युद्ध हो चुके हैं.

इसके अलावा छद्म युद्ध की स्थिति भी जारी रही है. इसके चलते इलाके में सुरक्षाबलों की भारी तैनाती है. सीमा पार से क्रास फायरिंग भी होती रहती है, आतंकी और अलगाववादी गतिविधियां भी चलती रहती हैं.

इसलिए इस इलाके में शांति और विकास सुनिश्चित करने के लिए पाकिस्तान के साथ बातचीत प्रक्रिया को तुरंत शुरू किए जाने की जरूरत है.

जो देश सांस्कृतिक संबंधों को बढ़ावा देने और व्यापार-व्यवसाय में संलग्न होने के लिए लोगों को एक दूसरे से संपर्क करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं, वो आर्थिक अवसरों की स्थिति में सुधार करते हैं. इससे सीमा पार आतंक की गतिविधियां भी कम हो जाती हैं.

यानी भारत और पाकिस्तान चाहें तो आपसी समझ और सहयोग से सीमा पार आतंकी गतिविधि की समसया को खत्म कर सकते हैं. इलाके के सतत विकास के लिए शांति अनिवार्य शर्त है.

आख़िर में, कारगर लोकतांत्रिक शासन के लिए विभिन्न राष्ट्रीय राजनीतिक दलों और जम्मू कश्मीर के राजनीतिक नेताओं को अपने अपने वैचारिक मतभेदों को पीछे छोड़कर धर्मनिरपेक्षता के आधार पर सामंजस्य स्थापित करना चाहिए ताकि एकता बनी रहे और इलाके में सतत विकास और शांति कायम रहे.

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