भूपत डाकू को दी थी पाकिस्तान ने अपने यहाँ शरण

  • 3 नवंबर 2019
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जब भी पाकिस्तान में भारत के किसी अपराधी को शरण दी जाती है पूरी दुनिया की निगाहें उस तरफ़ घूमती हैं.

1993 में मुंबई बम विस्फोटों के बाद मुख्य आरोपी दाऊद इब्राहिम के पाकिस्तान भागने और वहाँ बस जाने की ख़बरें आईं तो भारत ने इसे एक बहुत बड़ा मुद्दा बना लिया.

हालांकि पाकिस्तान की तरफ़ से हमेशा इस बात का खंडन किया जाता रहा कि दाऊद इब्राहिम उसकी भूमि पर रह रहा है.

लेकिन दाऊद से क़रीब 40 साल पहले भी एक मौका ऐसा आया था जब पाकिस्तान ने भारत से भागे डाकू भूपत को अपने यहाँ शरण दी थी.

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पचास के दशक में भूपत डाकू गुजरात और राजस्थान में ख़ासा कुख्यात हो चुका था और कहा जाता है कि जुलाई 1949 और फ़रवरी 1952 के बीच भूपत और उसके गैंग पर 82 हत्याएं करने के आरोप लगे थे. इनमें से आखिरी दो हत्याएं फ़रवरी 1952 में की गई थीं.

उसके बाद भारतीय पुलिस ने उसपर इतना दबाव बनाया कि वो अपने दो साथियों के साथ सीमा पार कर पाकिस्तान पहुंच गया.

वहाँ उसे गिरफ़्तार कर पाकिस्तान में ग़ैरक़ानूनी प्रवेश और हथियार रखने के आरोप में मुक़दमा चलाया गया और वहाँ की अदालत ने उसे एक साल की सज़ा सुनाई.

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क्लासिफ़ाइड फ़ाइल में भूपत का ज़िक्र

मशहूर किताब 'द पीपुल नेक्स्ड डोर- द क्यूरियस हिस्ट्री ऑफ़ इंडियाज़ रिलेशन विद पाकिस्तान' के लेखक और पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त रह चुके डाक्टर टीसीए राघवन बताते हैं, "इसके बारे में मैंने एक फ़ाइल देखी थी जो मेरे पास डि-क्लासिफ़ाई करने के लिए आई थी ताकि उसे नैशनल आर्काइव्स में भेजा जा सके. ये मामला इतना महत्वपूर्ण था कि इसपर दोनों देशों के बीच काफ़ी ऊँचे स्तर पर बात हुई थी. दिक्कत ये थी कि इस माँग को अमली जामा पहनाने के लिए भारत के पास कोई क़ानूनी ढांचा नहीं था क्योंकि दोनों देशों के बीच प्रत्यर्पण संधि पर दस्तख़त नहीं हुए थे."

Image caption पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त टीसीए राघवन बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ

वे कहते हैं, "जब भारत के तत्कालीन उच्चायुक्त के भूपत डाकू को भारत लाने के सारे प्रयास विफल हो गए तो उन्होंने पाकिस्तानी सरकार पर सीधा आरोप लगाया कि वो राजनीतिक रूप से इतनी कमज़ोर है कि वो जनमत की उपेक्षा कर भूपत को भारत को सौंपने की हिम्मत नहीं कर सकती."

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भारत-पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों ने की भूपत पर चर्चा

सौराष्ट्र के राजनेताओं के दबाव और भारतीय मीडिया में इस बारे में लगातार चर्चा की वजह से इस विषय पर जुलाई 1956 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मोहम्मद अली बोगरा के बीच भी बातचीत हुई.

इसके बाद नेहरू ने विदेश मंत्रालय की फ़ाइल पर लिखा, "पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने मेरे सामने भूपत का मामला उठाया. मेरे ख़याल से इस बारे में पहल उनकी तरफ़ से हुई. श्री बोगरा ने कहा कि वो पूरी तरह से इस बात पर सहमत हैं कि भूपत को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए. उसे भारत वापस भेजने के बारे में उन्होंने ये कह कर हाथ झाड़ लिए कि दोनों देशों के बीच प्रत्यर्पण संधि नहीं है. उन्होंने ये कहा कि उसे भारतीय प्रशासन को सूचित करने के बाद भारतीय सीमा पर छोड़े जाने की बात सोची जा सकती है."

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Image caption पाकिस्तान के तीसरे प्रधानमंत्री मोहम्मद अली बोगरा

ब्लिट्ज़ के मुख पृष्ठ पर भूपत की ख़बर

लेकिन किसी तरह यह प्रस्ताव भारतीय मीडिया में लीक हो गया और फिर पाकिस्तान इस प्रस्ताव से पीछे हट गया.

भारतीय मीडिया में उन दिनों भूपत से संबंधित ख़बरें छाई रहती थीं. ब्लिट्ज़ ने अपने अप्रैल, 1953 के अंक में सुर्ख़ी लगाई थी, "क्या भूपत पाकिस्तानी सेना के लिए भारतीय डाकुओं की भर्ती कर रहा है?"

इस रिपोर्ट में कहा गया था कि भूपत पाकिस्तानी सेना के ख़ुफ़िया विभाग के लिए भारतीय डकैतों की भर्ती कर रहा है और इस टॉप सीक्रेट मिशन के लिए भारत पाकिस्तान सीमा के नज़दीक घूम रहा है.

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भारत न भेजे जाने की कोशिश

टीसीए राघवन बताते हैं, "मीडिया अटकलों के बीच भूपत की रणनीति ये थी किसी तरह उसे भारत न भेजा जाए, जहाँ उसे फाँसी पर चढ़ाया जाना क़रीब क़रीब तय था. एक समय ऐसा आया कि उसके कुछ समर्थकों ने सड़कों पर नाटक करके उसके लिए चंदा जमा करना शुरू किया. उन्होंने कुल 1500 रुपये जमा किए, जो उस ज़माने में छोटी रकम नहीं थी. इस सबसे भूपत इतना उत्साहित हुआ कि उसे एक फ़िल्म बनाने की योजना बनाई जिसमें जूनागढ़ पर भारतीय सेना के कब्ज़े को दिखाया जाता. उसका तर्क था कि इस तरह की फ़िल्म से भारत के ख़िलाफ़ पाकिस्तान के प्रोपेगंडा को बढ़ावा मिलेगा."

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Image caption भूपत (बाएं से तीसरे)

खुद को घोषित किया स्वतंत्रता सेनानी

भूपत को ये अंदाज़ा हो गया कि भारत भेजे जाने से बचने के लिए सबसे अच्छा तरीका यही होगा कि वो अपने आप को स्वतंत्रता सेनानी घोषित कर दे. उसने यही तर्क दे कर सिंध की अदालत से अपनी रिहाई की माँग की.

ब्लिट्ज़ अख़बार ने भूपत की दलीलों को छापते हुए लिखा, "जब मेरी रियासत का पाकिस्तान में विलय हो गया तो भारत की सेना ने उस पर हमला कर दिया. हमने ताक़त का जवाब ताक़त से देने का फ़ैसला किया. हमने साढ़े तीन सालों तक भारतीय सेना का मुक़ाबला किया लेकिन अंतत: उनकी जीत हुई और मुझे भारत छोड़ने और पाकिस्तान में शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा. मैं पाकिस्तान के प्रति वफ़ादार हूँ, जिसने मुझे शरण दे कर मेरी ज़िंदगी बचाई है. पाकिस्तान की सुरक्षा के लिए मैं अपने शरीर की आख़िरी बूँद तक देने के लिए तैयार हूँ."

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पाकिस्तान में ही मौत

राघवन बताते हैं, "जूनागढ़ के स्वतंत्रता सेनानी होने की भूपत की दलील अंतत: रंग लाई और उसे पाकिस्तान में रहने दिया गया. वो 2006 तक अपनी मौत तक पाकिस्तान में ही रहा. उसने अपना धर्म परिवर्तन कर इस्लाम धर्म गृहण कर लिया और अपना नाम अमीन यूसुफ़ रख लिया. उसने वहाँ दोबारा शादी की और उसके बच्चे भी हुए."

वे कहते हैं, "मैं जब सौराष्ट्र गया तो वहाँ मुझे लोगों ने बताया कि स्थानीय लोगों को उसकी मौत के बारे में तब पता चला जब लोगों ने देखा कि भूपत के पुराने घर में रह रही उनकी पहली पत्नी ने अपनी माँग में सिंदूर लगाना बंद कर दिया. 1960 में भूपत पर एक फ़िल्म भी बनाई गई जिसमें बाद में तेलगू देशम पार्टी के नेता बने एन टी रामाराव ने काम किया था."

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Image caption वी जी कानिटकर

भूपत पर किताब

भूपत पर बाद में उसका पीछा करने वाले पुलिस अधिकारी 1933 बैच के आईपीएस अफ़सर वी जी कानिटकर ने मराठी में एक किताब लिखी.

उसमें उन्होंने बताया कि भूपत हर वारदात के बाद एक लिखित संदेश में पुलिस को चुनौती दे कर जाता था जिसे 'ज़ासा' कहा जाता था.

कानिटकर लिखते हैं कि वो उन्हें हमेशा 'डीकरा' कह कर संबोधित करता था, जबकि वो उम्र में उनसे 10 साल छोटा था. 'डीकरा' का अर्थ होता है बेटा.

कानिटकर ने भूपत को पकड़ने के लिए दो पागियों (पैरों के निशान पहचानने वालों) का सहारा लिया था.

एक पुलिस मुठभेड़ में उसके साथी देवायत की मौत के बाद भूपत ने अपने तीन साथियों के साथ पाकिस्तान भागने का फ़ैसला किया. उनमें से एक साथी अमरसिंग कुछ दिनों बाद वापस भारत लौट आया.

बाद में ख़बर आई कि भूपत ने जेल से छूटने के बाद दूध बेचने का धंधा शुरू कर दिया था. कानिटकर 1969 में सीआरपीएफ़ के महानिदेशक बन कर रिटायर हुए.

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