पीएफ़ घोटाला: 45,000 कर्मचारियों का पैसा निजी कंपनी के पास कैसे पहुंचा?

  • 7 नवंबर 2019
बिजली विभाग के कर्मचारियों के पीएफ़ के रुपये निजी कंपनी में निवेश करने के विरोध में प्रदर्शन करते कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता इमेज कॉपीरइट Getty Images
Image caption बिजली विभाग के कर्मचारियों के पीएफ़ के रुपये निजी कंपनी में निवेश करने के विरोध में प्रदर्शन करते कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता

उत्तर प्रदेश में बिजली कर्मचारियों के भविष्य निधि यानी पीएफ़ में हुए घोटाले के आरोप में गिरफ़्तार उत्तर प्रदेश पॉवर कॉर्पोरेशन के पूर्व एमडी एपी मिश्र और दो अन्य अधिकारियों को पुलिस ने रिमांड पर लेकर पूछताछ शुरू कर दी है. इस मामले में पॉवर सेक्टर एंप्लॉईज़ ट्रस्ट के सचिव रहे पीके गुप्ता और वित्त निदेशक रहे सुधांशु द्विवेदी को भी रिमांड पर लिया गया है.

बुधवार को पुलिस और आर्थिक अपराध शाखा यानी ईओडब्ल्यू ने इन तीनों को सीजेएम कोर्ट में पेश किया. कोर्ट ने तीनों को तीन दिन की पुलिस रिमांड पर पुलिस को सौंप दिया. बताया जा रहा है कि तीनों से आमने-सामने इस मामले में पूछताछ होगी.

इस मामले में यूपी पॉवर कॉर्पोरेशन की अध्यक्ष और ऊर्जा सचिव अपर्णा वी को पहले ही हटाया जा चुका है, जबकि कुछ और अधिकारियों पर भी गाज गिरने की संभावना जताई जा रही है.

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फंसे 2200 करोड़ से अधिक रुपये

उत्तर प्रदेश में बिजली विभाग के कर्मचारियों के भविष्य निधि खातों में जमा क़रीब 2200 करोड़ रुपये इसलिए फंस गए हैं क्योंकि उस राशि को जहां निवेश किया गया, वो कंपनी ही संदेह के घेरे में आ गई है और उसके लेन-देन पर रोक लगा दी गई है.

कर्मचारियों के पीएफ़ की राशि का निवेश पहले राष्ट्रीयकृत बैंकों में किया जाता था लेकिन साल 2017 में इसे दीवान हाउसिंग फ़ाइनेंस लिमिटेड कंपनी यानी डीएचएफ़एल में किया जाने लगा.

निवेश की शुरुआत तो बीजेपी के शासनकाल में हुई लेकिन इस प्रक्रिया का समय ऐसा था जो कि राज्य में समाजवादी पार्टी सरकार और बीजेपी सरकार का संधिकाल था. मामला संज्ञान में आते ही सरकार ने इसकी सीबीआई जांच के आदेश दे दिए.

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Image caption उत्तर प्रदेश सरकार में ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा

राज्य के ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा कहते हैं, "पीएफ़ का निवेश कहां करना है, ये ट्रस्ट तय करता है. इसमें मंत्री या विभाग की भूमिका नहीं होती है. विभाग किसी तरह की शिकायत मिलने पर कार्रवाई करता है और वो किया गया है. वैसे इस घोटाले की नींव समाजवादी पार्टी की सरकार के समय ही पड़ी थी."

जांच कर रही एजेंसी ईओडब्ल्यू के डीजीपी आरपी सिंह का कहना है कि अभिलेखों में छेड़छाड़ के सबूत भी मिले हैं.

दरअसल, पीएफ़ की धनराशि का निवेश दिसंबर 2016 तक राष्ट्रीयकृत बैंकों में एफ़डी के ज़रिए ही किया जा रहा था जबकि दिसंबर 2016 में पीएनबी हाउसिंग को फंड देने का प्रस्ताव तैयार किया गया जो कि नियम विरुद्ध था.

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राष्ट्रीयकृत बैंकों में जमा क्यों नहीं किए गए रुपये?

जानकारों के मुताबिक, पीएफ़ की धनराशि सिर्फ़ राष्ट्रीयकृत बैंकों में ही जमा की जा सकती थी, किसी अन्य लाभ वाली योजना या निजी एजेंसी में नहीं.

ईओडब्ल्यू के डीजीपी आरपी सिंह के मुताबिक, "16 मार्च 2017 को ट्रस्ट की बैठक में पीएफ़ की राशि को डीएचएफ़एल में निवेश का निर्णय लिया गया जिसका आदेश 17 मार्च को जारी किया गया. 17 मार्च को ही डीएचएफ़एल को 18 करोड़ रुपये आरटीजीएस किए गए. पॉवर कॉर्पोरेशन के एमडी एपी मिश्र 16 मार्च को ही इस्तीफ़ा दे चुके थे, बावजूद इसके बोर्ड ऑफ़ ट्रस्ट की 22 मार्च को बुलाई गई बैठक में भी वो पहुंचे जहां 16 मार्च को लिए गए निर्णय को वैधानिक रूप देने की कोशिश की गई."

पीएफ़ के पैसे को डीएचएफ़एल में निवेश पर फ़ैसले के लिए ट्रस्ट की जो बैठक हुई उसमें बतौर चेयरमैन संजय अग्रवाल, एमडी एपी मिश्रा, निदेशक वित्त सुधांशु द्विवेदी, निदेशक (कार्मिक प्रबंधन एवं प्रशासन) सत्य प्रकाश पांडेय और सचिव प्रवीण कुमार गुप्ता के हस्ताक्षर हैं.

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वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं, "इन लोगों ने इस बैठक में कर्मचारियों के प्रतिनिधि को बुलाया ही नहीं, और ये फ़ैसला ले लिया. यदि कर्मचारियों का प्रतिनिधि भी बैठक में आया होता तो ये मामला उसी दिन प्रकाश में आ जाता. उस प्रतिनिधि को न बुलाने के चलते ही सारा मामला गोपनीय रहा और एक सरकार के ग़लत फ़ैसले को दूसरी सरकार में अमलीजामा पहनाया जाता रहा."

बिजली विभाग के क़रीब 45,000 कर्मचारियों, इंजीनियरों और अधिकारियों के प्रॉविडेंट फ़ंड के क़रीब चार हज़ार करोड़ रुपये को पावर सेक्टर एंप्लॉईज ट्रस्ट ने मार्च 2017 में डीएचएफएल में निवेश किया.

एक साल पहले 1800 करोड़ रुपये मैच्योर होने पर वापस आ गए लेकिन क़रीब 2268 करोड़ की राशि इसलिए अधर में लटक गई है क्योंकि बॉम्बे हाई कोर्ट ने कई संदिग्ध कंपनियों और सौदों से जुड़ा होने की सूचना पर डीएचएफएल कंपनी के भुगतान पर रोक लगा दी है.

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Image caption अखिलेश यादव

अखिलेश का मौजूदा सरकार पर आरोप

इस मामले में पावर सेक्टर एंप्लॉइज ट्रस्ट के तत्कालीन सचिव प्रवीण कुमार गुप्ता और पूर्व वित्त निदेशक (वित्त) रहे सुधांशु द्विवेदी को पुलिस ने सरकार की ओर से कराई गई एफ़आईआर के बाद गिरफ़्तार कर लिया जबकि मंगलवार को लंबी पूछताछ के बाद पॉवर कॉर्पोरेशन के प्रबंध निदेशक रहे एपी मिश्रा को भी गिरफ़्तार कर लिया गया. सरकार ने मामले की सीबीआई जांच के निर्देश दिए हैं.

ऊर्जा मंत्री ने इस मामले में पिछली सरकार को घेरा है जबकि पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पूरा दोष मौजूदा सरकार को देते हैं.

अखिलेश यादव कहते हैं, "सपा सरकार के समय डीएचएफ़एल को कोई भी पैसा नहीं दिया गया. इस मामले में पूरी तरह सरकार घिर गई है और मुख्यमंत्री को सीधे तौर पर इस्तीफ़ा दे देना चाहिए."

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डीएचएफएल कंपनी पिछले दिनों इसलिए चर्चा में थी क्योंकि इसके कुछ प्रमोटरों से प्रवर्तन निदेशालय ने दाऊद इब्राहिम के एक पूर्व सहयोगी इकबाल मिर्ची की कंपनी के साथ संबंधों को लेकर पूछताछ की थी. बिजली विभाग के कर्मचारियों को सरकार ने भरोसा दिलाया है कि उनका पैसा डूबने नहीं पाएगा लेकिन कर्मचारी सरकार के आश्वासन से संतुष्ट नहीं हैं और राजधानी लखनऊ समेत कई जगह प्रदर्शन कर रहे हैं.

बीजेपी और समाजवादी पार्टी एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं लेकिन कांग्रेस पार्टी ने इस मामले में सीधे तौर पर ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा का इस्तीफ़ा मांगा है.

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय कुमार लल्लू ने सवाल किया है, "यदि पिछली सरकार में भी यह फ़ैसला हुआ था तो ब्लैक लिस्टेड कंपनी होने के बावजूद ढाई साल तक वहीं पैसा कैसे जमा होता रहा."

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बिजली विभाग के कर्मचारी करेंगे विरोध प्रदर्शन

वहीं, उत्तर प्रदेश के बिजली कर्मचारियों ने भविष्य निधि घोटाले के विरोध में मंगलवार को राजधानी लखनऊ समेत कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन किया और आगामी 18 नवंबर से दो दिवसीय कार्य बहिष्कार करने का फ़ैसला किया है.

इस मामले में गिरफ़्तार हुए पॉवर कॉर्पोरेशन के पूर्व एमडी एपी मिश्रा को पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का बेहद क़रीबी बताया जाता है.

साल 2012 में अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा सरकार बनते ही आमतौर पर आईएएस संवर्ग के व्यक्ति को दिया जाने वाला यह पद एपी मिश्रा को दे दिया गया. एपी मिश्रा को सेवानिवृत्ति के बाद तीन बार सेवा विस्तार भी मिला था.

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