अयोध्या: सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से पहले कैसा है शहर का मूड-ग्राउंड रिपोर्ट

  • 8 नवंबर 2019
Image caption राम जन्मभूमि के पुजारी सत्येंद्र दास के यहाँ अन्नकूट भोज की एक पंगत में बाबरी मस्जिद के पैरोकार इक़बाल अंसारी

राम जन्मभूमि के पुजारी सत्येंद्र दास के यहाँ राम के वनवास से वापसी की ख़ुशी में आयोजित होने वाले अन्नकूट भोज की एक पंगत में बाबरी मस्जिद के पैरोकार इक़बाल अंसारी भी 56 भोग का आनंद लेते दिखे. सिर्फ़ इतना ही नहीं, सत्येंद्र दास ने इक़बाल अंसारी को 100 रुपये की त्यौहारी भी दी.

साथ-साथ रखे गए आसन पर बैठकर सत्येंद्र दास और इक़बाल अंसारी ने मीडिया से न्यौता भेजे जाने, मिलने और अयोध्या में हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की बात की.

हालांकि, सत्येंद्र दास बाबरी मस्जिद को 'ढांचा' बुलाते हैं, वो सवाल करते हैं कि "अगर वहां वाक़ई मस्जिद थी तो सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने अदालत में अपना दावा 1961 में क्यों पेश किया."

Image caption राम जन्मभूमि के पुजारी सत्येंद्र दास

"राम लला पिछले 26 साल से टाट में बैठे हैं और अब लगता है भव्य मंदिर का समय आ गया है."

सत्येंद्र दास अपने निवास स्थान के पहले माले के एक कमरे में चौकी पर बैठे हैं, पीठ मसनद पर टिकी है, तीर-धनुष वाला राम का एक बड़ा सा पोस्टर पीछे की दीवार पर नज़र आता है.

पुराने विवाद में संत परिवार

संत कबीर नगर से ताअलुक़ रखने वाले आचार्य सत्येंद्र दास की नियुक्ति बाबरी मस्जिद विध्वंस के कुछ माह पहले ही हुई थी, उनकी नियुक्ति जन्मभूमि के पुराने पुजारी और आरएसएस, वीएचपी और बजरंग दल के कठोर आलोचक रहे लाल दास को हटाये जाने के बाद हुई थी.

मस्जिद ढहाए जाने के 11 महीने बाद 1993 में उनकी हत्या कर दी गई थी.

Image caption राम जन्मभूमि न्यास के नृत्य गोपाल दास

ये वो दौर था जब राम जन्मभूमि मामले में पैरोकार स्थानीय हिंदू संगठनों जैसे निर्मोही अखाड़े को धीरे-धीरे पीछे धकेलकर हिंदुत्वादी उस पर अपनी गिरफ़्त मज़बूत कर रहे थे.

अयोध्या के संतों और धर्माचार्यों को जीत साफ़ दिखाई दे रही है जबकि ये फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट को करना है. यहां हो रही चर्चा में मोदी और योगी का नाम बार-बार आ रहा है.

राम जन्मभूमि न्यास के नृत्य गोपाल दास कहते हैं, "केंद्र में मोदी और यहाँ योगी के शासनकाल में राम लला जहां विराजमान हैं, एक भव्य मंदिर का निर्माण होगा."

Image caption राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण न्यास के जन्मेजय शरण

राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण न्यास के जन्मेजय शरण कहते हैं, "फ़ैसला तो राम मन्दिर के पक्ष में ही आएगा,"

जन्मभूमि निर्माण संगठन का स्वरूप

राम के नाम पर बन गए इन संगठनों में से कोई भी जन्मभूमि की अदालती कार्रवाई का हिस्सा नहीं है लेकिन नृत्यगोपाल दास सरकार के क़रीबी माने जाते हैं और एक चर्चा है कि मंदिर के पक्ष में फ़ैसला आने पर निर्माण का काम उनके संगठन को मिल सकता है.

कुछ लोग सोमनाथ की तर्ज़ पर बोर्ड बनाने की बात भी कर रहे हैं.

निर्मोही अखाड़ा और हिंदू महासभा जैसे संगठन जिन्होंने आधी सदी से भी अधिक से जन्मभूमि की अदालती लड़ाई लड़ी, संघ परिवार की राम मंदिर की राजनीति का हिस्सा न बन पाने के कारण अब हाशिए पर हैं.

निर्मोही अखाड़ा की जर्जर हो रही चारदीवारी के भीतर अशोक के पेड़ के नीचे बैठे दीनेंद्र दास कहते हैं, "निर्मोही अखाड़े ने अपने काम का प्रचार नहीं किया, उन्होंने किया, राम के नाम का प्रचार तो कोई भी कर सकता है."

हालांकि वो कहते हैं कि सभी हिंदू पक्ष मिलकर फ़ैसला करेंगे कि आगे क्या करना है.

कार्यशाला के नज़ारे

राम जन्मभूमि के लिए जिस कार्यशाला में निर्माण सामग्री बनकर तैयार होती रही है वहां शांति है. पास के मंदिर से लाउडस्पीकर पर भजन की आवाज़ आ रही है और पर्यटकों का तांता लगा हुआ है.

गाइड श्रद्धालुओं को परिसर में ही मौजूद प्रदर्शनी दिखा रहे हैं जिसमें राम मंदिर आंदोलन के दौरान मारे गए कार सेवकों को दिखाया गया है. हालांकि ऐसे कोई ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं हैं लेकिन चित्रों में वो दृश्य भी दिखाया गया है जिसमें बाबर राम मंदिर को ध्वस्त करने की इजाज़त दे रहा है.

इस सवाल पर कि क्या अयोध्या में गाइड भी मिल जाते हैं, स्थानीय पत्रकार महेंद्र त्रिपाठी हंसते हुए कहते हैं, "राम के नाम पर बहुत सारे लोगों की दुकान चल रही है."

कारसेवक पुरम के सुपरवाइज़र अन्नू भाई सोनपूरा कहते हैं कि पिछले दिनों आख़िरी कारीगर की मौत हो गई जिसके बाद से काम बंद है.

एक समय यहां 150 कारीगर काम करते थे, लेकिन लाल पत्थर के जो खंभे और नक़्क़ाशियां तैयार धरी पड़ी हैं वो काली पड़ रही हैं और अन्नू भाई सोनपूरा के मुताबिक़ इस्तेमाल के पहले उनकी जमकर घिसाई करवानी होगी.

कारसेवक पुरम के बिल्कुल बाहर चाय-पान की दुकान चलाने वाली संतोष चौरसिया राम मंदिर न बनने से बेहद ख़फ़ा हैं और चंद दिनों पहले हुए दीपोत्सव पर सवाल उठाते हुए कहती हैं, "इ पांच लाख दियवा जलाव के का हुआ, लोग आगरा ताजमहल देखने जाते हैं अयोध्या में राम लला का मंदिर बन जाता तो लोग ओका देखने आते."

फिर ख़ुद से आगे कहने लगती हैं, "नहीं न बनने देंगे इनका कमाई न ख़त्म हो जाएगा, इनका वोट कट जाएगा."

कारसेवक पुरम पर अयोध्या शहर लगभग ख़त्म हो जाता है लेकिन वहाँ भी दूसरे कई इलाक़ों की तरह सुरक्षाबलों की एक टुकड़ी मौजूद है.

पुलिस बंदोबस्त की आदी हो चुके अयोध्या वासी ज़िंदगी की मशक़्क़तों में मशग़ूल हैं.

हनुमान मंदिर की गली में हमेशा की तरह खुरचन से लेकर केसरिया पेड़ा और नारियल के लड्डू बिक रहे हैं और श्रद्धालु गाड़ियों और मोटरसाइकिल में सवार होकर दर्शन को पहुंच रहे हैं.

मुजीबुर अहमद कहते हैं कि अयोध्या में अब भी समुदायों में वही चचा-भतीजा, छोटे भाई-बड़े भाई का संबंध है 'जो कुछ गड़बड़ दिख रहा है वो चैनल वाले ही दिखा रहे हैं.'

रोहित सिंह का विचार है कि चाहे कुछ भी हो जाए मंदिर का निर्माण 2022 यानी आम चुनाव से पहले नहीं शुरू होगा तो अतीक़ुर रहमान अंसारी सवाल करते हैं कि इस बात की क्या गारंटी है कि अगर फ़ैसला मुस्लिमों के पक्ष में आया तो हिंदू उसको मान लेंगे या अगर फ़ैसला हिंदुओं के हक़ में हुआ तो मुसलमान मान लेगें?

ख़ालिक़ अहमद ख़ान, बाबरी पक्ष के रहनुमा कहते हैं कि अदालत का फ़ैसला अगर क़ानूनी तौर पर दुरुस्त होगा तो मुस्लिम पक्ष उसे मानने को तैयार है वरना आगे की कार्रवाई की सोचेगा, और ज़रूरत पड़ी तो फिर से अदालत में अपील कर सकता है.

Image caption बाबरी पक्ष के ख़ालिक़ अहमद ख़ान

ख़ालिक़ अहमद ख़ान हाल में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बनी समझौता समिति से भी मिले थे और दावा करते हैं कि मुसलमानों पर बाबरी मस्जिद वाली ज़मीन पर दावा छोड़ने का दबाव बनाया जा रहा था.

बाबरी मस्जिद पक्ष का कहना है कि तमाम पुराने दावों को उसने वापस ले लिया है और जो 120X40 फ़ुट की ज़मीन पर वो दावा क़ायम रख रहे हैं उसकी वजह है मस्जिद की वक़्फ़ की ज़मीन में किसी तरह का बदलाव भारतीय वक़्फ़ क़ानून के ख़िलाफ़ है.

ख़ालिक़ कहते हैं, "हम तो इसके लिए भी तैयार हैं कि वो इस ज़मीन को छोड़कर बाक़ी पर मंदिर निर्माण शुरू कर दें, हम तो मस्जिद की फिर से मांग भी नहीं कर रहे लेकिन कुछ लोग मंदिर बनाने से ज़्यादा इसे हिंदू-मुसलमान के मसले के तौर पर पेश करने में ज़्यादा दिलचस्पी रखते हैं."

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