महाराष्ट्र: पीछे हटी बीजेपी, क्या अब शिव सेना बना पाएगी सरकार?

  • 11 नवंबर 2019
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महाराष्ट्र में सरकार बनाने को लेकर कई दिनों से चल रहा सियासी ड्रामा अब और दिलचस्प मोड़ पर आ गया है. रविवार देर शाम बीजेपी ने स्पष्ट कर दिया कि वो सरकार नहीं बना रही है.

राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते बीजेपी को बहुमत सिद्ध करने के लिए सोमवार तक का वक्त दिया था. लेकिन उससे पहले ही बीजेपी ने अपने कदम पीछे खींच लिए.

इसके बाद राज्यपाल से राज्य की दूसरी बड़ी पार्टी के तौर पर शिव सेना को सरकार बनाने के न्योता दिया है.

बीजेपी और शिव सेना ने गठबंधन में चुनाव लड़ा था. नतीजे आने के बाद शिव सेना ने बीजेपी से कहा कि मतदान से पहले किए वायदे के अनुसार ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद उनकी पार्टी को मिलना चाहिए.

लेकिन बीजेपी के इससे मुकरने के बाद शिव सेना ने बीजेपी को समर्थन देने से इनकार कर दिया.

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अब आगे की राह क्या हो सकती है?

पत्रकार राधिका रामासेशन ने बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी को बताया, "बीजेपी पर कुछ दवाब पहले से ही था. लेकिन लग रहा था कि शिव सेना ने बीजेपी पर और अधिक दवाब बनाया है."

महाराष्ट्र चुनावों के नतीजे 24 अक्तूबर को आए थे. लेकिन दो पार्टियां जो चुनाव पूर्व गठबंधन में थीं और उन्हें जिन्हें मिल कर सरकार बनानी चाहिए थी वो मुख्यमंत्री की सीट को लेकर आपस में बुरी तरह भिड़ गई हैं.

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288 सीटों वाली विधानसभा के लिए चुनावों में बीजेपी को 105, शिवसेना को 56, एनसीपी को 54 और कांग्रेस को 44 सीटों पर जीत मिली थी.

वो कहती हैं, "मुझे लगता है कि दोनों में बीजेपी अधिक चतुराई से अपना कार्ड खेल रही है. राज्यपाल ने बीजेपी को सरकार बनाने का न्योता दिया था तो बीजेपी से साफ़ कह दिया कि हमारे पास संख्याबल नहीं है और हम सरकार नहीं बना पाएंगे."

"इसके बाद बीजेपी ने एक टिप्पणी देने की तरह कहा कि अब शिव सेना सरकार बना सकती है चाहेवो एनसीपी और कांग्रेस के साथ हो. ऐसा कर के बीजेपी ने गेंद शिव सेना के पाले में फेंक दी है. अब देखना है कि शिव सेना क्या कहती है."

शिव सेना ने रविवार सवेरे इस तरह के संकेत दिए थे कि वो हिंदुत्व के नाम पर बीजेपी के साथ समझौता कर सरकार बना लेगी. लेकिन दोपहर तक शिव सेना ने अपना रुख़ बदलते हुए कहा कि उन्हें कांग्रेस के साथ जाने में कोई आपत्ति नहीं है.

इधर कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा था कि जनता से कांग्रेस और एनसीपी को विपक्ष में बैठने का मैन्डेट किया है और वो उसका सम्मान करेंगे. हालांकि उन्होंने ये भी कहा इस बारे में आख़िरी फ़ैसला कांग्रेस आला कमान का होगा.

महाराष्ट्र के कांग्रेस नेता संजय निरुपम ने भी कहा है कि कांग्रेस एनसीपी के मिल कर सरकार बनाने के ख़याल मात्र एक कल्पना है.

उन्होंने कहा, "इसके लिए हमें शिव सेना का समर्थन चाहिए होगा और ऐसा करना कांग्रेस के लिए घातक होगा."

राधिका रामासेशन कहती हैं, "कुछ दिन पहले कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा था शिव सेना के साथ उन्हें कोई संबंध नहीं रखना है. उनके नज़रिए से देखा जाए तो उनका बयान ठीक ही है."

अब सारी निगाहें शिव सेना पर हैं. देखना ये है कि बीजेपी के अपने पत्ते खोलने के बाद अब शिव सेना क्या करती है?

लेकिन अगर शिव सेना ऐसा करने में नाकाम रही तो निर्णायक फ़ैसला लेने का मौक़ा कांग्रेस और एनसीपी के पाले में आ सकता है.

अगर ऐसा कुछ संभव हुआ तो बीजेपी को सरकार बनाने से रोकने के लिए कांग्रेस और एनसीपी का आगे आना ग़लत नहीं होगा.

कांग्रेस नेता अशोक चव्हाण ने पहले ही कह दिया है कि पार्टी महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन का समर्थन नहीं करती है.

क्या एनसीपी देगी शिव सेना को समर्थन?

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Image caption फाइल तस्वीर

पहले विपक्ष में बैठने की बात कर चुकी एनसीपी ने अब कहा है कि वो शिव सेना का समर्थन देने के लिए तैयार है बशर्ते वो केंद्र में बीजेपी को समर्थन देना बंद करे यानी एनडीए से बाहर निकले.

एनसीपी नेता नवाब मलिक ने कहा है कि शिव सेना को बीजेपी के साथ अपने रिश्ते ख़त्म करने होंगे और उसके सभी नेताओं को केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा देना होगा. सोमवार को इसे लेकर एनसीपी की एक बैठक भी होने वाली है.

इधर कांग्रेस जयपुर में विधायकों के साथ सरकार गठन और आगे की रणनीति पर बैठक कर रही है.

राधिका रामासेशन कहती हैं कि "हो सकता है कि एनसीपी सरकार का हिस्सा हो और कांग्रेस बाहर से उसे समर्थन दे. ऐसे में शिव सेना को मुख्यमंत्री पद देते हुए शिवसेना और एनसीपी मिल कर सरकार बना सकती हैं."

हालांकि वो मानती हैं कि इस संभावना में भी कई सवाल हैं. वो कहती हैं, "एनसीपी के वरिष्ठ नेता शरद पवार क्या इतनी आसानी से मान लेंगे कि आदित्य ठाकरे या एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री की कुर्सी पर हों."

वो कहती हैं कि "अब बात विचारधारा की नहीं केवल ताकत के बंटवारे की है- कौन और किसे क्या पद मिलता है."

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आख़िरी रास्ता

शिवाजी विश्वविद्यालय में राजनीतिक शास्त्र विभाग के प्रमुख रह चुके डॉ अशोक चौसालकर ने बीबीसी संवाददाता नामदेव अंजना को बताया कि अगर वक्त रहते सरकार नहीं बनी तो विधानसभा अस्थायी रूप से निलंबित हो जाएगी और ये फ़ैसला राज्यपाल लेंगे.

वो बताते हैं कि, "राज्यपाल पहले पूरी स्थिति का अवलोकन करेंगे जिसके बाद वो राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेजेंगे. ये रिपोर्ट राष्ट्रपति केंद्रीय मंत्रीमंडल के सामने रखेंगे. इसके बाद ही केंद्रीय मंत्रीमंडल इस मुददे पर सलाह मशविरा करने के बाद कोई फ़ैसला लिया जा सकता है."

डॉ चौसालकर कहते हैं कि इन सबके बाद ही केंद्रीय मंत्रिमंडल की सिफारिश पर राष्ट्रपति शासन लगाने के संबंध में राष्ट्रपति कोई फ़ैसला लेंगे.

वो कहते हैं "राष्ट्रपति शासन दो महीने के लिए लगाया जा सकता है और फिर इसे बढ़ा कर तीन महीने और फिर तीन साल तक किया जा सकता है, हालांकि इसकी मियाद बढ़ाने के लिए संसद से मंज़ूरी लेना आवश्यक है."

वो कहते हैं कि आख़िरी उपाय के यही है कि इस बीच भी अगर सरकार बनाने पर कोई सहमति नहीं बन पाई (या फिर कोई एक पार्टी या गठबंधन सत्ता का दावा नहीं करती) तो फिर से चुनावों का रुख़ करना पड़ेगा.

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