आडवाणी का 92वां जन्मदिन, 'लौहपुरुष' की गिरफ़्तारी का क़िस्सा

  • 8 नवंबर 2019
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तारीख 22 अक्टूबर. साल 1990. दिन सोमवार

जगह - 1 अणे मार्ग, पटना

इस बंगले में तब बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव रहा करते थे. सुबह का वक्त था. बाहर बैठे सुरक्षाकर्मियों को इत्तला थी कि मुख्यमंत्री ने कुछ बड़े अफ़सरों को बुलाया है. तभी एक-एक करके कई सफे़द एंबेसेडर कारें वहां पहुंची.

कुछ देर बाद पटना के पुलिस मुख्यालय में तैनात डीआईजी (हेडक्वार्टर) रामेश्वर उरांव और वरिष्ठ आइएएस राजकुमार सिंह (तत्कालीन रजिस्ट्रार-कापरेटिव) भी तलब किए गए.

लालू यादव तब सिर्फ़ 42 साल के थे. सात महीने ही पहले उन्होंने बिहार की सत्ता संभाली थी. विश्वनाथ प्रताप सिंह भारत के प्रधानमंत्री थे. केंद्र में नेशनल फ्रंट की सरकार थी. उसे भारतीय जनता पार्टी का समर्थन हासिल था.

लालकृष्ण आडवाणी बीजेपी के अध्यक्ष थे और अटल बिहारी वाजपेयी लोकसभा में बीजेपी संसदीय दल के नेता. तब बीजेपी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या की रथयात्रा निकाली थी. 25 सितंबर से शुरू रथयात्रा 30 अक्टूबर को अयोध्या पहुंचनी थी.

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Image caption मसानजोर गेस्ट हाउस, जहां आडवाणी को गिरफ़्तार कर रखा गया था

लालू यादव ने इसी रथयात्रा को रोकने की योजना बनाई थी. इसके लिए उन्हें लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ़्तार करना था. पटना के मुख्यमंत्री आवास में इसी के मद्देनज़र हाई-लेवल मीटिंग चल रही थी. रामेश्वर उरांव और आरके सिंह इसी वजह से वहां तलब किए गए. अंदर अधिकारियों के साथ बैठे मुख्यमंत्री लालू यादव उनका इंतज़ार कर रहे थे.

रामेश्वर उरांव उस दृश्य को नहीं भूलते. उन्होंने बीबीसी हिंदी से वो पूरा वाक़या याद किया.

पढ़िए उन्होंने क्या क्या बताया..

मुख्यमंत्री ने मुझसे पूछा कि क्या आप लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ़्तार करेंगे. मैंने तत्काल हामी भरी. तब लालू जी ने चुटकी ली और कहां उरांव साहब, लोग ढेला (पत्थर का टुकड़ा) चलाएगा (मारेगा). कर पाइएगा. मैंने कहा कि जिस दिन पुलिस की वर्दी पहनी, तभी समझ गए थे कि फूल नहीं, पत्थर मिलेगा. मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी. मैं यह करने के लिए तैयार हूं. गिरफ़्तारी को अंजाम देने के लिए मजिस्ट्रेट की भी ज़रुरत थी. मुख्यमंत्री के प्रिंसिपल सेक्रेटरी मुकुंद बाबू ने आरके सिंह साहब को यह ज़िम्मेदारी सौंपी.

हमें सारी योजना बताई गई और कहा गया कि बगैर किसी हिंसा के इस काम को पूरा करना है. हमें बताया गया कि आडवाणी जी को समस्तीपुर में गिरफ़्तार करने के बाद दुमका ले जाना है और वहां से मसानजोर. यह योजना गोपनीय रखी गई थी.

इसकी जानकारी सिर्फ़ उन्हीं अफ़सरों को दी गई, जिन्हें इस आपरेशन के लिए चुना गया था.

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शाम होने के बाद हमें समस्तीपुर निकलना था. चीफ़ पायलट अविनाश बाबू को लालू जी ने खुद अपने विश्वास में लिया था. पटना एयरपोर्ट पर रात में उड़ान के लिए जरुरी लाइटिंग का इंतजाम किया गया क्योंकि वहां रात में उड़ान की व्यवस्था नहीं थी. देर शाम हमने (रामेश्वर उरांव और आरके सिंह) हेलिकाप्टर से उड़ान भरी. समस्तीपुर में सर्किट हाउस के बगल में स्थित पटेल मैदान में हेलिकाप्टर की लैंडिंग हुई. हम लोग समस्तीपुर के एसपी दफ़्तर गए.

वहां जोनल आइजी आरआर प्रसाद, कमिश्नर और वहां के डीएम भी थे. हम लोगों ने वहां बैठक की. टेलिफ़ोन एक्सजेंच को डाउन कराया गया ताकि कोई फ़ोन नहीं कर सके. यह सब आधी रात के वक्त हुआ. रात धीरे-धीरे बीत रही थी. हम लोग पूरी सतर्कता बरत रहे थे ताकि आपरेशन लीक नहीं हो. हम लोगों ने सर्किट हाउस मे संपर्क किया. पता चला कि आडवाणी जी रात ढाई बजे वहां आए थे. वे काफ़ी थके हुए थे. हमने उनके जगने का इंतज़ार किया.

23 अक्टूबर की सुबह पौने पांच बजे हम लोगों ने आडवाणी जी के कमरे का दरवाजा खटखटाया. उन्होंने खुद ही दरवाजा खोला. उन्होंने पूछा कि हमलोग कौन हैं. हमने उन्हें अपना परिचय देने के बाद उनकी गिरफ़्तारी के वारंट की बात बताई. कहा कि हमारे पास आपकी गिरफ़्तारी का आदेश है.

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Image caption रामेश्वर उरांव

आडवाणी जी ने हमसे पंद्रह मिनट का समय मांगा, ताकि वे तैयार हो सकें. हमने उनके फ्रेश होने का इंतज़ार किया. उनसे कहा कि अगर आप किसी को साथ ले चलना चाहें, तो ले चल सकते हैं. हमें सरकार से निर्देश मिला था कि आडवाणी जी को यह सुविधा देनी है. हमारे प्रस्ताव पर आडवाणी जी ने प्रमोद महाजन को साथ ले जाने की इच्छा ज़ाहिर की.

हम लोगों ने लालकृष्ण आडवाणी को तब विधिवत गिरफ़्तार किया. उन्होंने हमसे कुछ और मिनट मांगे. कागज़ मंगाया. उस पर राष्ट्रपति के नाम पत्र लिखा. उसमें लिखा था कि उनकी पार्टी विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार से समर्थन वापस ले रही है. उन्होंने हमसे वह पत्र पटना पहुंचाने का अनुरोध किया. वह पत्र पटना पहुंचाने की व्यवस्था कराई गई.

हम जान चुके थे कि तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गिरने वाली है, क्योंकि वह बीजेपी से समर्थन से चल रही थी.

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इसके बाद आडवाणी जी और प्रमोद महाजन को साथ लेकर हम लोग एक गाड़ी से पटेल मैदान पहुंचे. वहां हेलिकाप्टर हमारे इंतजार में था. हमने दुमका की उड़ान भरी. दुमका डीसी को हमारे पहुंचने की सूचना दी गई थी. करीब एक घंटे बाद हम लोग दुमका पहुंचे. वहां से आडवाणी जी को गाड़ी से मसानजोर गेस्ट हाउस ले गए. वहां तीन दिनों तक उनके साथ रहने के बाद मुझे इस ऑपरेशन से मुक्त किया गया. आरके सिंह साहब दो और दिन वहां रुके. उसके बाद की कहानी सर्वविदित है.

बड़ी चुनौती थी आडवाणी की गिरफ़्तारी

गिरफ़्तारी से पहले लालकृष्ण आडवाणी धनबाद, रांची, हजारीबाग, नवादा होते हुए पटना पहुंचे थे. गांधी मैदान में उन्हें सुनने के लिए करीब तीन लाख लोगों की भीड़ थी. लोग जय श्रीराम और सौगंध राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे जैसे नारे लगा रहे थे.

उस मीटिंग के बाद आडवाणी जी समस्तीपुर पहुंचे थे. वहां भी उन्होंने लोगों को संबोधित किया. जय श्रीराम के नारे लगे. उनके साथ करीब 50 हज़ार लोगों की भीड़ थी, जो समस्तीपुर में कहीं-कहीं रुकी थी.

ऐसे में उनकी गिरफ़्तार बड़ी चुनौती थी. हिंसा भड़कने का ख़तरा था लेकिन इस आपरेशन की गोपनीयता के कारण हम लोग बगैर किसी हिंसा उन्हें गिरफ़्तार कर पाए. यह इसलिए भी संभव हुआ क्योंकि मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के पास विश्वसनीय और कुशल अधिकारियों की टीम थी.

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तो ये थी रामेश्वर उरांव की कहानी.

वैसे हम आपको बता दें कि लालू यादव चारा घोटाले मे सज़ायाफ्ता होकर इन दिनों रांची के बिरसा मुंडा जेल में हैं. उनकी उम्र अब 71 साल की हो चुकी है और बीमारी के कारण जेल प्रशासन ने उन्हें रांची के राजेंद्र इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंसेज में भर्ती कराया है.

रामेश्वर उरांव रिटायर होने के बाद राजनीति में आए और कांग्रेस के टिकट पर सांसद बने. इन दिनों वे झारखंड के प्रदेश अध्यक्ष हैं, जबकि आरके सिंह मोदी सरकार में ऊर्जा राज्य मंत्री हैं, वे देश के गृह सचिव भी रह चुके हैं.

( ये आलेख रामेश्वर उरांव से रांची के स्थानीय पत्रकार रवि प्रकाश की बातचीत पर आधारित है)

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