अयोध्या के लोग सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर क्या बोले- ग्राउंड रिपोर्ट

  • 10 नवंबर 2019
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शनिवार की शाम जब सरयू नदी के किनारे स्थित मंदिरों के गुंबदों के पीछे सूरज ढल रहा था तो अयोध्या शहर शांत था.

जॉगिंग के लिए निकले लोग उन पुजारियों में मिले जो श्रद्धालुओं के साथ जा रहे थे. नदी की ओर मंदिर परिसर में श्रद्धालु श्लोक पढ़ रहे थे. हर चीज़ यहां सामान्य दिखी.

कुछ घंटे पहले ही मंदिरों वाले इस शहर के लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले का जश्न मनाया था जिसमें राम मंदिर बनाने की इजाज़त दी गई थी. लेकिन शाम तक वो अपने रोज़मर्रा के कामों पर लौट गए.

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का वास्तव में अयोध्या के ज़्यादातर लोगों ने स्वागत किया.

लोगों में राहत भावना थी. स्थानीय निवासी और दुकानदार कार्तिक गुप्ता और उनके भाई राकेश गुप्ता ने कहा कि राम मंदिर बनने की ख़बर से वो काफ़ी ख़ुश हैं लेकिन उन्हें ये जानकर अधिक ख़ुशी हुई कि लोगों में दरार डालने वाला दशकों पुराना यह मुद्दा अब ख़त्म हो गया.

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कार्तिक ने कहा, "दो पीढ़ियों से मंदिर-मस्जिद विवाद में पूरा देश बँटा हुआ था लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट की ओर से इस मामले का अंत हो गया."

उनके भाई का भी यही विचार था, "ये फ़ैसला देश के लिए बढ़िया है. कम से कम अब हम आगे बढ़ सकते हैं."

अपने धार्मिक लिबास में पुजारियों का एक समूह इस बात से ख़ुश था कि अंततः विवादित ज़मीन पर राम मंदिर बनेगा लेकिन उनका कहना था वो इस मुद्दे का राजनीतिकरण करने वाले राजनेताओं से ऊब चुके हैं.

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इनमें से एक ने कहा, "ये धार्मिक मुद्दा था. लेकिन अलग-अलग राजनीतिक दलों ने इसे एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया. सुप्रीम कोर्ट ने अब उनका मुद्दा छीन लिया है."

आम तौर पर ये माना जाता है कि भारतीय जनता पार्टी राम जन्मभूमि आंदोलन के उभार का श्रेय ख़ुद लेती है, जिसे उसके अनुषांगिक संगठनों विश्व हिंदू परिषद और आएसएस ने शुरू किया था.

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Image caption 20 नवंबर 1990 को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर बैठे तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी

माना जाता है कि बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष लाल कृष्ण आडवाणी ने राम मंदिर के लिए जब अपनी रथ यात्रा निकाली तो उन्होंने बीजेपी को राष्ट्रीय स्तर की पार्टी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

और अंततः बाद के सालों में बाबरी मस्जिद ढहा दी गई. साल 1984 में हुए संसदीय चुनावों में बीजेपी ने केवल दो सीटें जीती थीं. उसी बीजेपी ने 1991 के आम चुनावों में 125 सीटों पर जीत दर्ज की.

स्थानीय लोगों की राय

मंदिरों के इस शहर में एक भी स्थानीय निवासी ढूंढ पाना मुश्किल है जो इस तथ्य पर ज़ोर न देता हो कि मंदिर-मस्जिद मुद्दे पर हिंदुओं और मुसलमानों के बीच उनके कस्बे में कोई बैर भाव नहीं है.

एक स्थानीय पुजारी राम चंद्र पांडे ने कहा कि अयोध्या में रह रहे बड़ी संख्या में मुसलमान बहुत पहले से दर्जनों मंदिरों से जुड़े हुए हैं.

वो कहते हैं, "हमारे पड़ोसी मुस्लिम हैं जिनकी आजीविका उन छोटे कारोबार से पैदा होती है जो श्रद्धालुओं और स्थानीय हिंदुओं से जुड़ा है."

शनिवार की सुबह हनुमानगढ़ी में विवादित स्थल की ओर जाने वाले रास्ते पर लगे पुलिस बैरिकेड के पास मैं खड़ा था.

हनुमानगढ़ी की सड़क के दोनों ओर दुकानदार, ग्राहक, श्रद्धालु और मंदिर के पुजारी अपने टीवी सेटों से चिपके हुए थे और समाचार चैनलों पर ख़बरें देख रहे थे.

जैसे ही उन्हें पता चला कि कोर्ट ने राम मंदिर के पक्ष में फ़ैसला सुनाया, उनमें ख़ुशी का शोर उठा जैसे क्रिकेट टीम जीत गई हो.

अयोध्या की तंग सड़कों पर जय श्रीराम के नारे गूंजने लगे. छोटे-छोटे समूहों में मौजूद लोगों की मुठ्ठियां ख़ुशी में हवा में लहरा गईं. सुबह की सूरज की रोशनी में उनके चेहरे चमक उठे.

लेकिन जश्न का कोई भोंड़ा प्रदर्शन नहीं हुआ जो कि अनियंत्रित भीड़ की एक ख़ासियत बन चुका है. वे अयोध्या के आम लोग थे और कोई ज़रूरी नहीं था कि वो किसी पार्टी से जुड़े हुए हों.

उन्होंने जश्न मनाया लेकिन बहुत संयमित होकर जैसे वो बताना चाहते हों कि वो अपने मुसलमान पड़ोसियों की भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचाना चाहते हों.

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पश्चिम बंगाल से आए एक अध्यापक राम चरन शुक्ला कोर्ट के फ़ैसले से बहुत ख़ुश थे. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि ये फ़ैसला देश के सभी नागरिको के लिए है.

उन्होंने कहा, "यहां तक कि मुसलमान भी मंदिर बनाने में सहयोग कर सकते हैं. आख़िरकार हम सभी अपने धार्मिक जगहों पर पूजा अर्चना करते हैं और हम दोनों एक दूसरे का सम्मान करना चाहते हैं."

इसके बाद उन्होंने मुसलमानों के प्रति अपने सम्मान को जताने के लिए मुझे क़ुरान की एक पंक्ति भी सुनाई.

अयोध्या के लोगों ने कोर्ट के फ़ैसले को शांति और भाईचारे के संदेश के रूप में समझा, जैसा वो ये जताना चाहते हों कि फ़ैसला हिंदू मुसलमान के भेद को ख़त्म कर देगा और देश को एक बार और हमेशा के लिए एक सूत्र में जोड़ देगा.

क्या बोले इक़बाल अंसारी

कई लोग बात करने को तैयार नहीं थे. ये साफ़ नहीं था कि वो डर के कारण बात नहीं कर रहे थे या वे इस जश्न के माहौल को ख़राब नहीं करना चाहते थे. लेकिन कुछ लोगों ने बोला और उन्होंने कहा कि उन्हें फ़ैसला स्वीकार है.

इस मुक़दमे में एक पक्षकार थे इक़बाल अंसारी, जिनको सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड का समर्थन हासिल था. उन्होंने मुझे बताया कि वो ख़ुश हैं कि ये मामला ख़त्म हो गया.

उन्होंने कहा, "सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले को मैं स्वीकार करता हूं. मैंने पहले भी कहा था कि मैं कोर्ट के फ़ैसले को स्वीकार करूंगा और अब भी मैं कह रहा हूं कि चूंकि कोर्ट का फ़ैसला आ चुका है मुझे अपना वादा पूरा करना है."

उन्होंने इस तथ्य पर भी ज़ोर दिया कि वो इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ कोई पुनर्विचार याचिका दायर नहीं करने जा रहे हैं.

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Image caption इक़बाल अंसारी (फ़ाइल फ़ोटो)

नाख़ुश है निर्मोही अखाड़ा

निर्मोही अखाड़ा इस मुक़दमे का एक और पक्षकार था, जिसके दावे के कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया.

निर्मोही अखाड़ा के धार्मिक गुरु ने मुझसे कहा कि वो इस फ़ैसले से ख़ुश नहीं हैं. लेकिन उन्होंने ये ज़रूर कहा कि आगे क्या कार्यवाही की जाएगी, इस पर संगठन निर्णय लेगा.

कोर्ट ने अपने फ़ैसले में आदेश दिया है कि केंद्र सरकार तीन महीने के अंदर एक ट्रस्ट बनाए जिसका काम राम मंदिर बनाना और उसकी देखभाल करना होगा.

स्थानीय लोगों की एक बड़ी संख्या ने इस फ़ैसले का स्वागत किया है. मुझसे बात करने वाले क़रीब-क़रीब सभी निवासियों ने कहा कि वो ख़ुश हैं कि ये आदेश उन संगठनों पर रोक लगा सकता है जो मंदिर निर्माण और उसके रख-रखाव के लिए एक दूसरे से होड़ कर रहे थे.

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