अयोध्या मामला: फ़ैसला जिससे हिंदुओं को मंदिर का हक़ मिला

  • 10 नवंबर 2019
अयोध्या इमेज कॉपीरइट REUTERS/Amit Dave

"22 और 23 दिसंबर, 1949 की दरमियानी रात 450 साल पुरानी एक मस्जिद में मुसलमानों को इबादत करने से ग़लत तरीक़े से रोका गया."

"6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में एक मस्जिद ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से गिराई गई."

ये दो बातें सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार को अयोध्या में मंदिर-मस्जिद विवाद पर जिस फ़ैसले में कही, उसी आदेश के तहत अब अयोध्या में हिंदू पक्ष को राम मंदिर निर्माण का हक़ मिल गया है.

पिछले कई दशकों से चले आ रहे इस विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के साथ ही विराम लगने की उम्मीद की जा रही है.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले से नाख़ुश पक्ष रिव्यू पिटीशन (पुनर्विचार याचिका) दाख़िल करने के विकल्प पर ग़ौर कर सकता है पर इसके लिए उन्हें क़ानूनी तौर पर ठोस आधार बताने होंगे.

जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पाँच जजों की संविधान पीठ ने 40 दिनों तक इस पर सुनवाई की और 1045 पन्नों का ये फ़ैसला सर्वसम्मति से सुनाया गया.

फ़ैसले में विवादित स्थल पर पूजा के अधिकार को मंज़ूरी और मस्जिद के लिए पांच एकड़ ज़मीन देने के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर निर्माण के लिए रास्ता तैयार कर दिया है.

आगे हम इस ऐतिहासिक फ़ैसले की अहम बातों को समझने की कोशिश करेंगे.

निर्मोही अखाड़ा

राम जन्मस्थान और मंदिर के प्रबंधन पर निर्मोही अखाड़े के दावे को सुप्रीम कोर्ट ने ये कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि उनकी तरफ़ से मुक़दमा दाख़िल करने में देरी की गई.

दरअसल, राम जन्मस्थान और मंदिर के प्रबंधन के लिए फ़ैज़ाबाद कोर्ट में पाँच जनवरी, 1950 को रिसीवर नियुक्त करने के दस साल बाद निर्मोही अखाड़े की तरफ़ से महंत जगत दास ने 17 दिसंबर, 1959 को ये केस फ़ाइल किया था.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने विवादित स्थल पर निर्मोही अखाड़े की ऐतिहासिक मौजूदगी और उनकी भूमिका को स्वीकार करते हुए ये ज़रूर कहा कि मंदिर निर्माण के लिए प्रस्तावित ट्रस्ट में केंद्र सरकार चाहे तो निर्मोही अखाड़े को वाजिब प्रतिनिधित्व दे सकती है.

सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के विवादित स्थल पर दावे को देरी के आधार पर ख़ारिज कर दिया था.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार के फ़ैसले में इलाहाबाद हाई कोर्ट के फ़ैसले को पलट दिया.

अयोध्या के नौ मुस्लिम शहरियों और सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड ने 18 दिसंबर, 1961 को फ़ैज़ाबाद के सिविल जज की अदालत में ये मुक़दमा दायर किया कि बाबरी मस्जिद की पूरी विवादित जगह से हिंदू मूर्तियों को हटाकर उसे एक सार्वजनिक मस्जिद घोषित की जाए.

सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार के फ़ैसले में सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड को मस्जिद के लिए पांच एकड़ उपयुक्त ज़मीन दिए जाने का आदेश दिया है.

अदालत ने कहा है कि सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड को दी जाने वाली ज़मीन 1993 के अयोध्या एक्ट के तहत अधिगृहीत की गई ज़मीन का हिस्सा हो सकती है या राज्य सरकार चाहे तो अयोध्या में किसी और उपयुक्त और प्रमुख भूखंड का चुनाव कर सकती है.

लेकिन विवादित स्थल पर सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के दावे को सुप्रीम कोर्ट ने ख़ारिज कर दिया.

भगवान बने मुक़दमे के पक्षकार

इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व जज देवकी नंदन अग्रवाल ने रामलला और रामजन्भूमि की तरफ़ से केस दायर करने के साथ ही अयोध्या विवाद में हिंदुओं के अराध्य भगवान राम एक पक्षकार बन गए.

इस मुक़दमे में विवादित स्थल पर मिल्कियत का दावा किया गया और दूसरी पार्टियों पर मंदिर निर्माण में बाधा पहुंचाने से रोक लगाने की मांग की गई.

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के अनुसार मंदिर निर्माण के लिए एक ट्रस्ट बनाया जाएगा और केंद्र सरकार तीन महीने के भीतर इसकी योजना पेश करेगी.

इस योजना में केंद्र सरकार ट्रस्ट के प्रबंधन, कामकाज और ट्रस्टियों के अधिकार, मंदिर निर्माण और सभी संबंधित पहलुओं की रूपरेखा रखेगी. विवादित स्थल केंद्र पर सरकार द्वारा गठित ट्रस्ट या निकाय का नियंत्रण होगा.

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अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फ़ैसले पर बीबीसी हिंदी की ख़ास कवरेज

पूजा का अधिकार

विवादित स्थल पर पूजा के अधिकार को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ये स्पष्ट रूप से कहा है कि शांति, क़ानून व्यवस्था और व्यस्थित तरीक़े से पूजा-अर्चना कराने के लिए प्रशासन के पास किसी भी तरह की रोकथाम करने का अधिकार होगा.

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सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर मुसलमान पक्ष के वकील नाख़ुश

क्या रामलला विवादित स्थल पर ही पैदा हुए थे?

इस सवाल के जवाब में पक्षकारों की दलीलों, हिंदुओं की मान्यता, पौराणिक ग्रंथों, ब्रितानी राज के दौरान जारी किए गए गजेटियर्स, ऐतिहासिक यात्रियों की यात्रा वृतांतों से लेकर आईन-ए-अकबरी तक का हवाला दिया गया है.

सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसले में कहा, "साक्ष्यों से ये पता चलता है कि उस स्थान पर मस्जिद के अस्तित्व के बावजूद भगवान राम का जन्मस्थान माने जाने वाली उस जगह पर हिंदुओं को पूजा करने से नहीं रोका गया. मस्जिद का ढांचा हिंदुओं के उस विश्वास को डगमगा नहीं पाया कि भगवान राम उसी विवादित स्थल पर पैदा हुए थे."

इसी सवाल पर अलग से फ़ैसला लिखने वाले न्यायमूर्ति के शब्दों में "मस्जिद के निर्माण से भी पहले से हिंदुओं की आस्था और मान्यता रही है कि भगवान राम का जन्मस्थान उसी जगह पर है जहां बाबरी मस्जिद का निर्माण किया गया था."

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जब मुसलमानों से नमाज़ का हक़ छीना गया

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में ये भी माना है कि मस्जिद के ढांचे वाली जगह पर नमाज़ पढ़ी जाती थी और इसके सबूत भी थे.

विवादित स्थल पर आख़िरी बार जुमे की नमाज़ 16 दिसंबर 1949 को पढ़ी गई थी.

22 और 23 दिसंबर, 1949 की दरमियानी रात को विवादित स्थल पर हिंदू देवी-देवताओं की मूर्ति रखने के बाद मुसलमान उस जगह पर इबादत करने से महरूम कर दिए गए.

सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ शब्दों में ये कहा कि मुसलमानों को उस जगह से बेदख़ल करना क़ानूनी तौर पर सही नहीं था. 450 साल पुरानी एक मस्जिद से मुसलमानों को इबादत करने से ग़लत तरीक़े से रोका गया.

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राम मंदिर के फ़ैसले पर क्या बोले ओवैसी?

बाबरी मस्जिद ढहाया जाना ग़ैर-क़ानूनी

सुप्रीम कोर्ट ने मुसलमानों को मस्जिद के लिए वैकल्पिक ज़मीन के आवंटन को ज़रूरी बताया.

कोर्ट ने कहा कि पूरे विवादित स्थल पर अधिकार के दावे पर सबूतों के मामले में मुसलमानों की तुलना में हिंदू बेहतर स्थिति में थे. 22 और 23 दिसंबर, 1949 की दरमियानी रात जिस मस्जिद की बेअदबी हुई थी, उसका आख़िरकार 6 दिसंबर, 1992 को विध्वंस कर दिया गया. अदालत की ये ज़िम्मेदारी बनती है कि जो ग़लती हुई, उसे ठीक किया जाए.

कोर्ट ने कहा, "मस्जिद को ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से तोड़े जाने के लिए मुस्लिम समुदाय को मुआवज़ा दिया जाना ज़रूरी है. मुसलमानों को जिस तरह की राहत दी जानी चाहिए, उस पर ग़ौर करते हुए हम सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड को पांच एकड़ ज़मीन के आवंटन का निर्देश देते हैं."

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