RTI के दायरे में होगा चीफ़ जस्टिस का ऑफ़िस: सुप्रीम कोर्ट

  • 13 नवंबर 2019
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भारतीय सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (CJI) का दफ़्तर अब आरटीआई के दायरे में होगा.

शीर्ष अदालत की संवैधानिक पीठ ने बुधवार को यह फ़ैसला दिया.

दिल्ली हाईकोर्ट के फ़ैसले को बरक़रार रखते हुए अदालत ने कहा है कि पारदर्शिता से न्यायिक आज़ादी प्रभावित नहीं होती.

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली इस संवैधानिक बेंच में जस्टिस एनवी रामन्ना, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस संजीव खन्ना शामिल हैं. संवैधानिक पीठ ने चार अप्रैल को इस मामले में फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था.

अदालत ने कहा कि निजता और गोपनीयता का अधिकार एक अहम चीज़ है और चीफ़ जस्टिस के दफ़्तर से सूचना देते वक़्त वह संतुलित होनी चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट के सामने यह मामला तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट के महासचिव ने जनवरी 2010 में दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश के ख़िलाफ़ अपील की, जिसमें सीजेआई के दफ़्तर को आरटीआई के तहत माना गया.

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में सीजेआई के ऑफिस को आरटीआई क़ानून की धारा 2(एच) के तहत 'पब्लिक अथॉरिटी' बतया था.

इस पूरे मामले की शुरुआत तब हुई जब आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल ने चीफ़ जस्टिस के कार्यालय को आरटीआई के दायरे में लाने के लिए याचिका दायर की थी.

फ़ैसले का स्वागत करते हुए सुभाष चंद्र अगवाल ने बीबीसी हिंदी से बातचीत में कहा, "न्यायिक व्यवस्था के दो हिस्से हैं, एक न्यायपालिका और दूसरा प्रशासन. न्यायपालिका पहले भी आरटीआई में नहीं था और न अब होगा. यह प्रशासनिक अमले में लागू होगा. आज ये बात साफ़ हो गई कि सीजेआई का कार्यालय भी प्रशासनिक मक़सद से आरटीआई के अधीन है."

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सुभाष चंद्र अग्रवाल का पक्ष रखने वाले वकील प्रशांत भूषण ने कहा था कि अदालत में सही लोगों की नियुक्ति के लिए जानकारियां सार्वजनिक करना सबसे अच्छा तरीक़ा है.

प्रशांत भूषण ने कहा, "सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति और ट्रांसफ़र की प्रक्रिया रहस्यमय होती है. इसके बारे सिर्फ़ मुट्ठी भर लोगों को ही पता होता है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फ़ैसलों में पारदर्शिता की ज़रूरत पर ज़ोर दिया है लेकिन जब अपने यहां पारदर्शिता की बात आती है तो अदालत का रवैया बहुत सकारात्मक नहीं रहता."

प्रशांत भूषण ने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति से लेकर तबादले जैसे कई ऐसे मुद्दे हैं जिनमें पारदर्शिता की सख़्त ज़रूरत है और इसके लिए सीजेआई कार्यालय को आरटीआई एक्ट के दायरे में आना होगा.

क्या है ये पूरा मामला?

आरटीआई कार्यकर्ता, मजदूर किसान शक्ति संगठन राजस्थान के संस्थापक सदस्य और आम लोगों की अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली संस्था सूचना के जन अधिकार आंदोलन (एनसीपीआरआई) के सह-संयोजक निखिल डे इस पूरे मामले की जानकारी देते हुए कहते हैं कि आरटीआई के तहत यह पूछा गया था कि सुप्रीम कोर्ट के जजों ने अपनी संपत्ति की जानकारी सुप्रीम कोर्ट को दी थी या नहीं.

वो बताते हैं, "सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने यह जानकारी देने से मना कर दिया था. सूचना आयोग ने यह कहते हुए कि यह पब्लिक ऑफिस है लिहाजा आपको सूचना देनी ही होगी. अपील में यह मामला हाई कोर्ट में गया. विडंबना यह है कि सुप्रीम कोर्ट अपने अपील में हाई कोर्ट में गया. पहले हाई कोर्ट की एक बेंच ने कहा फिर फुल बेंच ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस का ऑफिस सूचना के अधिकार के तहत आएगा और ये सूचनाएं देनी पड़ेंगी और संपत्ति की घोषणा भी करनी पड़ेगी."

"इसके बाद सुप्रीम कोर्ट फिर अपने पास ही अपील में गई. जहां हाई कोर्ट के फ़ैसले पर रोक लगाते हुए मामले की सुनवाई हुई और अब ये फ़ैसला आ रहा है."

निखिल डे कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट पारदर्शिता और सूचना का अधिकार ख़ुद से शुरू करना चाहेगा. कोर्ट आरटीआई से पूरी तरह नहीं बच सकता. जजों की नियुक्ति का सवाल है. यहां कॉलेजियम बैठता है. चर्चा कर फ़ैसले को सरकार के पास भेजा जाता है. इसमें भी पारदर्शिता की बात उठती रही है. चीफ़ जस्टिस के दफ़्तर का सवाल है."

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आरटीआई के तहत कौन नहीं आता?

जब यह क़ानून बनाया गया तो इसमें लिखा गया कि 'कुछ अपवादों को छोड़कर' यह सब पर लागू होता है.

जिन अपवादों को छोड़कर की बात कि गई है वो भारतीय क़ानून की धारा 8 के तहत आते हैं.

राष्ट्रीय सुरक्षा, निजता या जहां किसी आपराधिक मामले की जांच जिससे प्रभावित हो सकती है, ऐसे कुछ अपवाद हैं. इसके अलावा सब कुछ सूचना के अधिकार के तहत आता है.

निखिल डे कहते हैं, "भारतीय क़ानून की धारा 24 के तहत कुछ इंटेलिजेंस और सिक्युरिटीज़ एजेंसी को छोड़कर और उनमें भी यह कहा गया है कि भ्रष्टाचार और मानवाधिकार के मामले में सूचना देनी ही पड़ेगी."

वे कहते हैं, "क़ानून बहुत व्यापक है. इसका दायरा बहुत व्यापक है. तो सुप्रीम कोर्ट का कोई दफ़्तर या सुप्रीम कोर्ट इससे बाहर हो, यह सवाल नहीं उठता."

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सूचना का अधिकार

सबसे पहले आरटीआई क़ानून स्वीडन में 1766 में लागू किया गया था. फ़्रांस ने 1978 में तो कनाडा ने इसे 1982 में अपने देश में लागू किया. वहीं भारत में यह क़ानून 2005 में लागू किया गया था.

स्वीडन में सूचना का अधिकार निःशुल्क और तत्काल देने का प्रावधान है जबकि भारत में आरटीआई के तहत आवेदन करने के बाद जवाब पाने के लिए एक महीने का वक्त निर्धारित है. हालांकि, स्वतंत्रता और जीवन के मामले में 48 घंटे का वक्त मुकर्रर है.

अगर फिर भी सूचना हासिल न हो या आप हासिल सूचना से संतुष्ट नहीं हैं, तो अगले 30 दिनों के भीतर उसी दफ़्तर में बहाल प्रथम अपीलीय अधिकारी के पास प्रथम अपील कर सकते हैं.

अगर यहां संतुष्ट नहीं हैं तो अगले 90 दिनों के भीतर कभी भी राज्य या केन्द्रीय सूचना आयोग में द्वितीय अपील या शिकायत कर सकते हैं.

नियम के अनुसार इन शिकायतों और अपीलों का निपटारा सूचना आयुक्त को 45 दिनों के भीतर कर देना होता है.

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