कश्मीर: संघर्ष को दुनिया के सामने लाते कश्मीरी कलाकार

  • 17 नवंबर 2019
कश्मीर पेंटिंग
Image caption अनंतनाग की रहने वाली कलाकार ख़ैतुल अबायद के भाई क़ाज़ी शिबली को जुलाई के आख़िरी हफ़्ते में राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के तहत गिरफ़्तार कर के जेल में डाल दिया गया था

"मैंने चाबी लटकाने वाला एक हैंगर बनाया है, मैं उसकी तस्वीर तुम्हें भेजूंगा."

मलिक सज्जाद, कश्मीर के एक ग्राफ़िक उपन्यास लेखक हैं. वो ग्रेटर कश्मीर अख़बार में कार्टून बनाने का भी काम करते हैं. ये काम वो उस समय से कर रहे हैं, जब वो सिर्फ़ 15 बरस के थे.

पाँच अगस्त 2019 को जम्मू और कश्मीर से संविधान का अनुच्छेद 370 ख़त्म होने के बाद से कश्मीर पर तमाम तरह की पाबंदियां लगी हुई हैं.

इसकी वजह से ख़ाली समय में मलिक सज्जाद ने चाबी टाँगने वाला एक हैंगर बनाया है. अपनी भतीजियों के लिए काग़ज़ के खिलौने बनाए हैं.

एक दिन जब मलिक सज्जाद के भतीजे ने बटमालू में स्थित उनके घर के ऊपर एक ड्रोन देखा, तो अपने चचा से कहा कि वो उसी तरह का खिलौना चाहता है, जिसमें वो बैठ सके.

भतीजे की गुज़ारिश पर सज्जाद ने कार्डबोर्ड से अपने साढ़े तीन बरस के भतीजे के लिए एक हेलिकॉप्टर बनाया. इसमें उनके तीन दिन गुज़र गए.

सज्जाद कहते हैं कि पिछले तीन महीने से ज़्यादा के वक़्त में उन्होंने बस यही काम किए हैं.

कश्मीर में लंबे समय से चल रहे संघर्ष को लेकर सियासी चर्चा से इतर कलाकार अपने तरीक़े से इस संघर्ष को दुनिया के सामने पेश कर रहे हैं.

कश्मीर पेंटिंग
Image caption सैयद मुजतबा रिज़वी की कलाकृति

अभी और तकलीफ़ झेलनी है...

मलिक सज्जाद कहते हैं कि उनकी ये कुल जमा उपलब्धि कश्मीर के हालात और कलाकारों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी को इशारों में बयाँ कर देती है.

हालांकि, मलिक सज्जाद ने अपनी बनाई चाबी टाँगने वाली खूँटी की तस्वीर नहीं भेजी. वो भेज ही नहीं पाए. इसकी वजह ये है कि कश्मीर में पाँच अगस्त के बाद से ही इंटरनेट बंद है.

मलिक सज्जाद ने जून 2015 में मुन्नू के नाम से एक ग्राफ़िक नॉवेल लिखा था. जिसे 'फ़ोर्थ एस्टेट' नाम के प्रकाशक ने छापा था. मुन्नू की ये कहानी एक कश्मीरी लड़के की कहानी है, जो अपनी क़िस्मत का रास्ता ख़ुद ही बनाता है. वो अपने राज्य के हालात को कश्मीर के विलुप्त होते हिरणों की नस्ल, हाँगुल के माध्यम से बताता है, जो इंसान बन जाते हैं.

इस कहानी में हाँगुल ही कश्मीर के आम आदमी की नुमाइंदगी करते हैं. उपन्यास में मलिक सज्जाद ने हाँगुलों का प्रतीकात्मक इस्तेमाल करके इससे लोगों के मनोवैज्ञानिक हालात को बयाँ किया था. तबसे मलिक सज्जाद कश्मीर के बदले हालात का पूरी तरह से विश्लेषण नहीं कर पाए हैं.

कश्मीर में इस हालात की वजह से वो ज़हनी तकलीफ़ से गुज़र रहे हैं. इसी वजह से वो एक कलाकार के तौर पर इससे दूर नहीं हो सके हैं. सज्जाद कहते हैं कि उन्हें ऐसा लगता है कि अभी और तकलीफ़ झेलनी है. शायद अभी और भी बुरा वक़्त आने वाला है.

मलिक सज्जाद ने कश्मीर में तमाम पाबंदियों के बीच हुई एक शादी का क़िस्सा भी एक प्रकाशक के लिए लिखा था.

कश्मीर पेंटिंग
Image caption कश्मीरी कलाकार इंदर सलीम की कलाकृति

मौजूदा सियासी माहौल

दिल्ली के कलाकार इंदर सलीम मूल रूप से कश्मीर के रहने वाले हैं. वो कहते हैं कि कलाकार हमेशा दुष्प्रचार और संकुचित सोच का विरोध करते हैं.

सलीम कहते हैं, "मैं इसे कलाकार का ध्यान लगाना कहता हूं. कलाकारों के लिहाज़ से सीधी प्रक्रिया अधूरी होती है."

वो ये भी कहते हैं कि इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि भारत की कोई आर्ट गैलरी ऐसी कलाकृतियों की नुमाइश करती है या नहीं.

इंदर सलीम को अपनी उत्प्रेरक परफॉर्मेंस आर्ट के लिए जाना जाता है. उन्होंने पत्रकार सतीश जैकब के साथ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाख़िल की है.

इसके ज़रिए उन्होंने अनुच्छेद 370 ख़त्म करने और जम्मू और कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँटने के राष्ट्रपति के आदेश को चुनौती दी है.

सलीम कहते हैं, "मेरा असल काम ही मेरी अर्ज़ी है, जो सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. मौजूदा सियासी माहौल में कश्मीर के बारे में जो चर्चा हो रही है, उसे कलाकारों का समर्थन नहीं है. क्योंकि इसमें कलाकारों का ध्यान शामिल नहीं किया गया है."

कश्मीर के कलाकार कहते हैं कि ऐसे माहौल में उभरने वाली कलाएं मौजूदा माहौल का एक अलग तरह का दस्तावेज़ी सबूत बन सकती हैं.

कश्मीर पेंटिंग
Image caption कलाकार सैयद मुजतबा रिज़वी कहते हैं कि पिछले 40 बरस से कश्मीर घाटी के कलाकार अपने लिए एक जगह तलाशने की जद्दोजहद कर रहे हैं

जम्मू और कश्मीर की कला और संस्कृति

आज की तारीख़ में जम्मू-कश्मीर की कला, संस्कृति और भाषाओं की अकादमी पूरी तरह से निष्क्रिय हो गई है.

2016 में 14 जून को श्रीनगर बायेनल कला प्रदर्शनी का एलान किया गया था. लेकिन ये अब तक रुकी पड़ी है. 2014 में कश्मीर में एक आर्ट गैलरी खुली थी. लेकिन, बाद में उसे बंद कर दिया गया.

कलाकार सैयद मुजतबा रिज़वी कहते हैं कि पिछले 40 बरस से कश्मीर घाटी के कलाकार अपने लिए एक जगह तलाशने की जद्दोजहद कर रहे हैं. रिज़वी ने एक पुरानी सरकारी इमारत में गैलरी वन के नाम से एक आर्ट गैलरी खोली थी. लेकिन, उसे बाद में बंद कर दिया गया था.

हालांकि कश्मीर घाटी के कलाकार कहते हैं कि भले ही उनकी कला की नुमाइश हो या न हो, लेकिन, वो अपनी कलाकृतियों को गढ़ने में जुटे हुए हैं. फिर चाहे घाटी में कर्फ्यू लगे या पाबंदियां लगें. कई बार तो ये कलाकार अपनी कला को गढ़ने के लिए इस संघर्ष से ही प्रतीकों को लेते हैं. और इसे ही अपनी कला के माध्यम से बयाँ करते हैं.

इंदर सलीम ने पैलेट की मदद से कुछ गहने बनाए हैं, जिन्हें उन्होंने 'ऑर्नामेंट्स पैलेटेड' का नाम दिया है. वो कहते हैं, "कश्मीर में छिड़े युद्ध के अवशेष वहां के लोगों की ज़िंदगी का हिस्सा बन गए हैं. वो उनकी कला, संस्कृति और नृत्य के माध्यम से प्रकट होते हैं."

वो कहते हैं कि लोग गहने सजावट के लिए इस्तेमाल करते हैं. लेकिन कश्मीर के लोग पैलेट के ज़ख़्म अपने शरीर पर झेलते हैं.

इंदर सलीम
Image caption इंदर सलीम

सियासी-सांस्कृतिक संकट

कश्मीर में लोगों के ख़ाली कारतूस को तावीज़ बनाकर पहनने या फिर माला बनाकर गले में डालने की बातें नई नहीं हैं.

इंदर सलीम कहते हैं कि ये एक कलाकार के साधना की मिसाल है.

मलिक सज्जाद 1987 में श्रीनगर में पैदा हुए थे. वो आज़ादी के बाद से कश्मीर में चल रही उठापटक और सियासी-सांस्कृतिक संकट के गवाह रहे हैं.

वो कहते हैं, "एक कलाकार और लेखक के तौर पर मेरे लिए दुनिया की रफ़्तार बहुत तेज़ है. ऐसा लगता है कि एक ठहराव की कोई गुंजाइश ही नहीं है. ऐसे माहौल में कला आपके जज़्बात और तजुर्बों की नुमाइश है. इसी वजह से वो बेहद अहम हो जाती है."

लेकिन, इस बार लोगों के बीच अजीबोग़रीब क़िस्म का सन्नाटा है. उनके ज़हन में ख़ौफ़ और घबराहट है. कश्मीर के आसमान पर छाए काले बादलों जैसे हालात से मलिक सज्जाद अभी तक तालमेल नहीं बिठा पाए हैं.

वो कहते हैं, "मैं अपने भतीजे और भतीजियों के लिए कलाकृतियां गढ़ रहा हूं. मैं अपने दोस्तों और कश्मीर की आने वाली पीढ़ियों के लिए ये रचनाएं कर रहा हूं. मैं भारत की आर्ट गैलरी और शॉपिंग मॉल्स में जाता हूं, ताकि वहां एयर कंडीशनर की सर्द हवा को अपने अंदर खींच सकूं. मुझे इसकी ज़रूरत इसलिए होती है, क्योंकि जब मैं भारत के अन्य इलाक़ों में जाता हूं, तो मेरा सामना नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त गर्मी और धुंध से होता है. जहां तक सेंसरशिप का सवाल है, तो मैं अचंभित ज़रूर हूं, लेकिन मुझे कोई ख़ास उम्मीद नहीं है. इसके अलावा एक बात और है. दुनिया बहुत बड़ी है. ऐसे लोग भी हैं, जो ठहर कर आप की बात सुनते हैं, आपकी जज़्बात में साझीदार बनते हैं. ऐसे में पूरी तरह से नाउम्मीद होना, इन लोगों के अस्तित्व को नकारने जैसा होगा."

कश्मीर
Image caption आर्टिस्ट मसूद हुसैन अपनी कलाकृति के साथ

बंकर, कंटीले तारों से बंद है कश्मीर

आज पूरे कश्मीर में बंकर बिखरे हुए हैं. रास्तों को कंटीले तारों से बंद कर दिया गया है.

श्रीनगर में लंबा वक़्त गुज़ारने वाले कलाकार मसूद हुसैन कहते हैं कि कश्मीर की ये तस्वीर अपने आप में कलाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत है. उलझे हुए टेप में कश्मीर की आवाज़ क़ैद है. जिसमें इसकी तारीख़ बयाँ की गई है. इन टेपों के ज़रिए जो ग़ज़लें कभी सुनाई देती थीं वो लंबे वक़्त से ख़ामोश हैं.

इन मुड़ी-तुड़ी और विकृत संरचनाओं में पीड़ित और ज़ुल्म ढाने वाले, दोनों ही जगह की बंदिशों से आज़ाद हैं. उन्हें अब किसी संदर्भ की भी ज़रूरत नहीं रह गई है. ये वही जगह है जिसका लंबा माज़ी रहा है. और, जिसके हाल का सिलसिला भी बदस्तूर जारी है.

64 बरस के मसूद हुसैन ने कश्मीर की तारीख़ को अपनी कूचियों से प्रतीकात्मक रूप से बख़ूबी उकेरा है. एक कैनवस पर मसूद हुसैन ने पांडुलिपि की तस्वीर बनाई है.

मसूद कहते हैं कि ये आख़िरी छल के प्रति उनकी प्रतिक्रिया है. इसी तरह शेख़ अब्दुल्ला और जवाहर लाल नेहरू के बातचीत करते हुए एक स्याह-सफ़ेद तस्वीर भी उन्होंने उकेरी है, जिस में दोनों नेताओं को अनुच्छेद 370 पर चर्चा करते हुए दिखाया गया है.

अगले पन्ने पर उन्होंने वाटर कलर से भेड़ों का एक झुंड बनाया है. इसके अलावा उन्होंने कश्मीर में पाए गए पहली सदी के कुषाण युग के सिक्कों की एक पेंटिंग बनाई है.

इसके साथ ही उन्होंने मुग़लों के दौर के सिक्कों को भी उकेरा है, ताकि कश्मीर पर तमाम बादशाहों की फ़तह के क़िस्से बता सकें.

मसूद हुसैन की बनाई पेंटिंग के आख़िरी पन्ने में एक डूबी हुई नाव को नारंगी रंग के पर्दे से छुपा हुआ दिखाया गया है.

मसूद हुसैन ने श्रीनगर से फ़ोन पर बात की. उन्होंने कहा, "पहले मेरी पेंटिंग एक उम्मीद जगाती थीं. ऐसा पहली बार है, जब मैं ने इनका अंत एक उम्मीद भरी कृति से नहीं किया बल्कि बर्बादी को उकेरा है. हर दौर में कलाकारों का एक ख़ास रोल होता है. उन्हें समाज में एक किरदार निभाना होता है. भारत की आर्ट गैलरी, हमारी कला की नुमाइश नहीं करती हैं. पिछले तीस बरस से मैंने संघर्ष को कूची से उकेरा है."

कश्मीर पेंटिंग

कला की रिहाइशगाह

कश्मीर में पाँच अगस्त से लगी पाबंदी से पहले से ही मसूद हुसैन विस्तस्ता नाम की सिरीज़ से पेंटिंग बना रहे हैं. कश्मीर की झेलम नदी का संस्कृत में नाम विस्तस्ता ही है. हुसैन कहते हैं कि ये दरिया, कश्मीर की तकलीफ़ की ख़ामोश गवाह रही है.

हुसैन एक और मिशन पर भी काम कर रहे हैं. वो श्रीनगर से क़रीब 20 किलोमीटर दूर एक ऐसी जगह तैयार कर रहे हैं, जो आगे चल कर कला की रिहाइशगाह बनेगी.

वो कहते हैं, "मैं चाहता हूं कि सभी जगह के कलाकार यहां आकर काम करें. मैंने इस जगह की चारदीवारी का डिज़ाइन बनाया था. इसे बनाने में मैंने अपनी ज़िंदगी भर की बचत लगा दी थी. लेकिन, अब मुझे पता नहीं कि आगे क्या होगा."

मुंबई के जेजे स्कूल ऑफ़ आर्ट्स में पढ़ाई करने के बाद मसूद 1980 के दशक में कश्मीर लौटे थे. वो श्रीनगर के पुराने इलाक़े में रहा करते थे. वो कहते हैं कि उन दिनों पिकनिक हुआ करती थी. कलाकारों के कैम्प भी लगते थे. वो क़ुदरती ख़ूबसूरती को पेंटिंग्स में उकेरा करते थे.

हुसैन बताते हैं कि उस दौर में श्रीनगर में रिवर व्यू नाम का एक होटल हुआ करता था. इसमें कलाकारों के लिए हॉबी क्लासेज भी चलती थीं. लेकिन, 1960 के दशक में ये होटल जल कर ख़ाक हो गया था.

हुसैन पुराने दिनों को याद कर के कहते हैं कि 1980 के दशक के आख़िर में कश्मीर घाटी के हालात बदलने लगे थे. महीनों की प्रशासनिक कार्रवाई के चलते अक्सर हिंसा का डर बना रहता था.

हुसैन कहते हैं कि हिंसा के बीच भी कलाकारों की कूची तो रुकती नहीं. तो उन्होंने भी पेंटिंग करना जारी रखा. उन्हें उम्मीद थी कि कोई न कोई तो इसे देखेगा और ये समझेगा कि कश्मीर में रहना क्या होता है.

एक दौर था, जब सैयद मुजतबा रिज़वी श्रीनगर के अपने घर में ही बने स्टूडियो में दिन-रात गुज़ारते थे. इस बार चूंकि उन्हें सख़्त पाबंदी का अंदेशा था, तो रिज़वी ने अपनी कलाकृतियों के लिए कुछ सामान मंगवाया था, जैसे कि पेंट, कैनवस और दूसरी चीज़ें. लेकिन, पाँच अगस्त के बाद ऐसे हालात बने कि अब वो जब भी स्टूडियो जाते हैं, उनके ज़हन में एक अजीब सा ख़ालीपन महसूस होता है.

कश्मीर पेंटिंग
Image caption श्रीनगर की जामिया मस्जिद की एक मीनार की इस कलाकृति में सैयद सैयद मुजतबा रिज़वी कश्मीर के हालात को अपने तरीके से बयान करती है

कश्मीर के हालात

रिज़वी कहते हैं, "कश्मीर में पाबंदियां लगने के बाद के पहले 30 दिनों तक तो मैं ने कुछ भी नहीं बनाया. उसके बाद मुझे स्टूडियो जो कर कुछ काम करने के लिए ख़ुद को मजबूर करना पड़ा, ताकि मेरा दिमाग़ी संतुलन बना रहे. आख़िर में मैंने कैनवस पर दो छोटी पेंटिंग्स बनाईं और दो ड्रॉइंग काग़ज़ पर भी. इससे मेरी खीझ और बढ़ गई."

सैयद मुजतबा रिज़वी ने अपनी एक पेंटिंग का नाम दिया है, एक मस्जिद में अमन-चैन. इसका मक़सद भारत के मुख्यधारा के मीडिया के उस दुष्प्रचार की तरफ़ इशारा करना है, जो कश्मीर के हालात सामान्य होने का दावा करता है. असल में ये श्रीनगर की जामिया मस्जिद की एक मीनार है. जहां पर पिछले तीन महीने से नमाज़ पढ़ने पर पाबंदी लगी हुई है. वैसे, पाँच अगस्त 2019 से पहले भी यहां पर कई बार लोगों को नमाज़ पढ़ने से रोक दिया जाता था.

रिज़वी कहते हैं, "मैंने ये पेंटिंग बनाने के लिए एक्रिलिक पेंट का इस्तेमाल ज़्यादा किया. पहले कैनवास पर पेंट से परत दर परत बनाई. फिर सर्जरी वाले उपकरण से इसे सूखने से पहले ही काटता रहा. इससे तरह-तरह के टेक्सचर, घाव और उमड़-गुमड़ के दृश्य उकेरे. इसके माध्यम से मैं ने कश्मीर के बदन से लगातार रिसते ख़ून को सांकेतिक रूप से उकेरने की कोशिश की है."

सैयद मुजतबा रिज़वी की बनाई एक पेंटिंग में एक महिला को अपनी गोद में एक बच्चे का शव उठाए हुए दिखाया गया है. ये रिज़वी की बनाई 'रिडंडंट कन्वरसेशन्स' यानी बेकार हो चुके संवाद नाम की सिरीज़ की एक पेंटिंग है. रिज़वी ने ये सिरीज़ पिछले साल शुरू की थी.

सैयद मुजतबा रिज़वी कहते हैं कि जिस इलाक़े में संघर्ष छिड़ा होता है, वहां पर कला फलती-फूलती है.

वो कहते हैं, "लेकिन अगर हम कला तक आम लोगों की पहुंच की बात करें, तो हक़ीक़त ये है कि इस संदर्भ में कला मर जाती है. 2019 का साल कम-ओ-बेश ख़त्म होने वाला है. इस साल हम कश्मीर का दसवां सालाना कंटेंपररेरी आर्ट शो करने वाले थे. लेकिन, 2010 में जब से हम ने ये आर्ट शो शुरू किया, तब से ऐसा पहली बार हुआ है कि हम ये नुमाइश नहीं लगा पाएंगे. आज कोई भी कश्मीरी कलाकारों की कृतियों की प्रदर्शनी नहीं लगाना चाहता है. श्रीनगर बायनेल भी फ़िलहाल स्थगित ही है."

कश्मीर पेंटिंग
Image caption पंडित वीर मुंशी इन दिनों अपने बिछड़े वतन यानी कश्मीर पर एक लघु चित्र बना रहे हैं

कश्मीर की क़ुदरती ख़ूबसूरती

एक दौर ऐसा था, जब कश्मीरी कलाकार पंडित वीर मुंशी, डल झील के गहरे नीले पानी और कश्मीर की क़ुदरती ख़ूबसूरती के लैंडस्केप बनाया करते थे.

लेकिन, 1990 में पंडित वीर मुंशी को कश्मीर छोड़ना पड़ा था. तब से वो नई दिल्ली में रहते हैं. लेकिन, वो कश्मीर आते-जाते रहते हैं. पाँच अगस्त 2019 को जब जम्मू और कश्मीर से अनुच्छेद 370 ख़त्म करने का एलान किया गया, तो वीर मुंशी श्रीनगर से नई दिल्ली आने वाली उड़ान में सवार हो रहे थे.

पंडित वीर मुंशी इन दिनों अपने बिछड़े वतन यानी कश्मीर पर एक लघु चित्र बना रहे हैं. इस में आइनों वाले एक मैदान में बहुमंज़िला इमारतों के छोटे-छोटे मॉडल बनाए गए हैं.

इन इमारतों के बीच में सब्ज़ियों से लदी हुई नावों को तैरते हुए दिखाया गया है. इस शहरी बस्ती के अजीब से दिखने वाले आतंक भरे काल्पनिक राज में औरतें और मर्द फेरन पहले ऐसे टहल रहे हैं, जैसे वो कश्मीर के गुमशुदा लोग हों.

इसके माध्यम से वीर मुंशी ने अपनी मातृभूमि के हालात की कल्पना की है, जिससे वो बिछड़ गए हैं. हालांकि वो ये कहने से बचते हैं कि जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासियों को परिभाषित करने वाला अनुच्छेद 35ए को संविधान में शामिल किया जाना सही था, या ग़लत.

पंडित वीर मुंशी कहते हैं, "मैं राजनीतिक विश्लेषक भी नहीं हूं और सियासी वर्कर भी नहीं. जब मैं गुरुग्राम के अपने घर की खिड़की से बाहर देखता हूं, तो मुझे साइबर हब दिखाई देता है. मेरे लिये शायद यही तरक़्क़ी है. मैं अपनी डल झील में चप्पू से चलाई जाने वाली नावों की जगह मोटरबोट तैरते नहीं देखना चाहता हूं."

वीर मुंशी का कहना है, "कला असल में आप के किरदार का ही विस्तार है. और मेरे मामले में ये संघर्ष मेरे किरदार का ही एक और पहलू है. तकलीफ़ वही है. लेकिन, आख़िरकार जब मुझे अपनी पुश्तैनी ज़मीन पर लौटने का मौक़ा मिलेगा, तभी मैं वो वादा पूरा मानूंगा. मैं वहां पर ज़मीन ख़रीद कर अपना एक स्टूडियो बनाना चाहूंगा."

कश्मीर पेंटिंग
Image caption सैयद मुजतबा रिज़वी की कलाकृति

राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून

कश्मीर में पाँच अगस्त के बाद पाबंदियां लगने से कुछ दिनों पहले ख़ैतुल अबायद ने अपनी ड्रॉइंग, और पत्रिकाओं को लोहे के एक बक्से में बंद कर के, उसे कंबल में लपेट कर रख दिया.

अनंतनाग की रहने वाली कलाकार ख़ैतुल अबायद के भाई क़ाज़ी शिबली को जुलाई के आख़िरी हफ़्ते में राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के तहत गिरफ़्तार कर के जेल में डाल दिया गया था. क़ाज़ी शिबली ऑनलाइन पत्रिका कश्मीरियत के संपादक हैं.

भाई को जेल में डाले जाने के बाद से ही ख़ैतुल अपनी जान की ख़ैर मनाने लगी थीं. उन्हें डर लग रहा था कि अगर कोई उनका घर जला भी देगा, तो कम से कम वो बक्सा, जिस में उन्होंने अपनी पेंटिंग्स रखी हैं, वो बच जाएगा. और अगर वो बक्सा किसी के हाथ लग गया, तो उसे ये पता चलेगा कि एक कलाकार के तौर पर ख़ैतुल ने कश्मीर से अनुच्छेद 370 के ख़ात्मे के बाद के सियासी हालात को कलाकार की नज़र से दर्ज किया था.

ख़ैतुल अबायद ने कश्मीर यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन पूरा किया है. इसके अलावा उन्होंने लाहौर की बीकॉनहाउस नेशनल यूनिवर्सिटी में भी पढ़ चुकी हैं. वो ड्रॉइंग के अलावा ग्राफिक उपन्यास भी लिखती हैं. ख़ैतुल का मानना है कि ये तस्वीरों के माध्यम से संघर्ष को बयान करने का बेहद ताक़तवर मगर संतुलित माध्यम है.

ग्राफ़िक नॉवेल काफ़ी हद तक मरयान सत्रापियान के पर्सेपोलिस और जो सैक्को के फ़िलिस्तीन जैसा है, जिन के माध्यम से कलाकारों ने वीरान पड़े खंडहरों के ज़रिए तबाही और संघर्ष की दास्तानें बयां की हैं. फिलहाल, ख़ैतुल एक छोटी सी बच्ची की कहानी पर आधारित एक ड्रॉइंग बना रही हैं, जो इस संघर्ष के दौरान ही पैदा हुई और पली-बढ़ी है. ख़ैतुल ने इस कहानी को उल्फ़त नाम दिया है.

कश्मीर पेंटिंग
Image caption भाई को जेल में डाले जाने के बाद से ही ख़ैतुल अपनी जान की ख़ैर मनाने लगी थीं

पाबंदी लगने के बाद

ख़ैतुल अबायद कहती हैं, "जब हम हिंसक संघर्ष की बात करते हैं, तो हमारा ज़ोर आंकड़ों पर, संख्या पर होता है. लेकिन, मैं अपनी कला की नई सिरीज़ में इन आंकड़ों पर विस्तार से बात करते हुए, मैं इंसान के जज़्बातों पर हिंसा के असर पर ज़्यादा ज़ोर दे रही हूं."

वो आगे बताती हैं, "अपनी कृति में मैं संघर्ष को बयान करने के लिए मारे गए लोगों की संख्या बताने के साथ-साथ इस बात पर ज़्यादा ज़ोर दे रही हूं कि मरने के पहले वो क्या थे और अपने पीछे वो किसे इस दुनिया में छोड़ कर गए हैं. मैं एक पहेली में इन बातों को विस्तार से बताने की कोशिश को रही हूं. मैं किसी कलाकृति में टाइल्स लगाती जाती हूं और बड़ी तस्वीर अपने आप उभर कर सामने आ जाती है."

ख़ैतुल अबायद अभी न्यूयॉर्क में एक फेलोशिप कर रही हैं. वो इन दिनों जो स्केच बना रही हैं, उस में दिखाई गई महिलाएं, उनकी क़रीबी रिश्तेदार थीं, जिनकी पिछले कुछ बरसों में मौत हो गई.

वो बताती हैं, "मुझे नहीं लगता कि मेरी कला से कुछ ख़ास बदलाव आएगा. ख़ास तौर से उस दुनिया में और उस दौर में, जिस में हम रहते हैं. लेकिन, कला का जन्म किसी अपेक्षा से नहीं होता, ये तो बस उम्मीद जगाती है."

कश्मीर पेंटिंग
Image caption सैयद मुजतबा रिज़वी की बनाई एक पेंटिंग में एक महिला को अपनी गोद में एक बच्चे का शव उठाए हुए दिखाया गया है

पाबंदी लगने के बाद से ही ख़ैतुल ने इसका हिसाब किताब अपनी कला के तौर पर रखने का फ़ैसला किया था.

वो कहती हैं, "इस ख़ून-ओ-क़त्ल और उठा-पटक में भी हम बच गए. इसी से हमारे दिल में एक ख़्वाहिश जगी, जिस ने मुझे मजबूर किया कि मैं आर्ट की तरफ़ दोबारा रुख़ करूं. अगस्त से लेकर अब तक बनाई गई कई कलाकृतियों के माध्यम से मैं ने कश्मीर में रह रहे लोगों के जज़्बातों को बयां करने की कोशिश की है. इन्हें शायद कश्मीर में रह रहे लोग ही समझ सकें."

कश्मीरी कलाकारों की ये कृतियां शायद गुमनाम ही रहेंगी. क्योंकि इनके साथ हमेशा ही ऐसा हुआ है. इसकी वजह है ये कि ये उन ख़बरों के ठीक उलट हैं, जिनमें कश्मीर के हालात 'सामान्य' होने का दावा किया जाता है.

शायद जब इंटरनेट सेवा दोबारा बहाल हो, तो इन्हें सोशल मीडिया पर डाला जाए. लेकिन, अभी तो ये कृतियां कलाकारों के संग्रह का ही हिस्सा हैं.

आप इन्हें तबाही की फेरी लगाने वालों का सामूहिक कला संग्रह या मौजूदा हालात में कलाकारों की सामूहिक प्रतिक्रिया कह सकते हैं. या फिर जैसा कि सलीम कहते हैं, आप इन्हें, 'कलाकारों की साधना' भी कह सकते हैं.

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