नागरिकता संशोधन विधेयक पर पूर्वोत्तर भारत में भरोसे का संकट

  • 20 नवंबर 2019
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केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने हाल ही में अपने पूर्वोत्तर दौरे के वक्त कहा था कि नागरिकता संशोधन विधेयक को फिर से संसद में पेश किया जाएगा.

लिहाज़ा भाजपा संसद के शीतकालीन सत्र में नागरिकता संशोधन बिल को पेश करने की पूरी तैयारी में दिख रही है.

लेकिन इस बीच असम तथा पूर्वोत्तर के करीब सभी राज्यों में विरोध शुरू हो गया है.

विरोध करने वाले संगठनों तथा कुछ राजनीतिक दलों का ये आरोप है कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने इस बिल को पेश करने से पहले बैठक कर सभी को भरोसे में लेने का वादा किया था.

लेकिन अब तक नागरिकता संशोधन बिल को लेकर भाजापा के किसी वरिष्ठ केंद्रीय नेता ने कोई बैठक नहीं की है.

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असम गण परिषद का पक्ष

असम की भाजपा सरकार के साथ गठबंधन में शामिल असम गण परिषद (एजीपी) के प्रवक्ता मनोज सैकिया ने बीबीसी से कहा, "नागरिकता संशोधन बिल को लेकर हमारी पार्टी का पहले जो स्टैंड था अभी भी वही है. पिछली बार जब भाजपा के नेताओं से इस बिल को लाने को लेकर हमारी जो बात हुई थी उसमें हमें भरोसा दिया गया था कि इस बिल को संसद में लाने से पहले दोबारा बात की जाएगी. संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हो गया है लेकिन अभी तक बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से इस विषय पर कोई बैठक नहीं हुई है. हमें उम्मीद है कि जल्द से जल्द बीजेपी नेता हमारी पार्टी से बात करेंगे."

क्या भाजपा के लोग नागरिकता संशोधन बिल को लेकर विरोध कर रहे लोगों की बात सुनेंगे?

इस सवाल का जवाब देते हुए एजीपी नेता सैकिया ने कहा, "हमें भरोसा है कि भाजपा के नेता असम के लोगों की बात को आगे रखकर ही इस बिल पर कोई निर्णय लेंगे. हमने केंद्र सरकार से साफ कहा है कि असम समझौते के आधार पर ही इस समस्या का समाधान निकाला जाए. हम चाहते है कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व हमारे नेताओं के साथ बैठक करके यह निर्णय ले कि इस बिल को कैसे लाना है. फिलहाल हमारी पार्टी इस विधेयक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने की बात नहीं सोच रही है. लेकिन हम चाहते हैं कि बिल को पेश करने से पहले हमारे नेताओं से बात की जाए."

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Image caption असम में नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ प्रदर्शन करते लोग

राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर

असम में दो बार सत्ता में आई क्षेत्रीय पार्टी एजीपी का जन्म ही घुसपैठियों के खिलाफ आंदोलन करके हुआ है.

दरअसल, असम में बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा दशकों पुराना है.

इसके खिलाफ साल 1979 से छह साल तक चले हिंसक आंदोलन के बाद 1985 में आंदोलनकारी छात्र नेताओं और केंद्र सरकार के बीच एक समझौता हुआ जिसके नतीजे के आधार पर इस साल राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर यानी एनआरसी तैयार की गई है.

असम आंदोलन करने वाले छात्र नेताओं ने 1985 में क्षेत्रीय दल एजीपी का गठन कर असम की सत्ता पर काबिज़ हुए थे.

असम में घुसपैठ का मुद्दा यहां के मूल निवासियों के लिए हमेशा से काफी संवेदनशील रहा है.

लिहाज़ा असम में इसी साल नागरिकता संशोधन बिल को लेकर हुए ज़ोरदार विरोध के बाद एजीपी ने एनडीए के साथ अपना गठबंधन तोड़ लिया था.

सर्वानंद सोनोवाल की सरकार में शामिल एजीपी के तीन मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया था.

लेकिन बाद में जब ये विधेयक राज्यसभा में नही आया तो इन तीनों एजीपी नेताओं ने फिर से मंत्री पद ले लिया.

एजीपी नेता अब भी इस विधेयक को असमिया जाति और यहां की संस्कृति के लिए ख़तरा बता रहे हैं लेकिन फिलहाल क्षेत्रीय पार्टी के नेता किसी भी तरह के विरोध में शामिल नहीं हुए हैं.

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नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायंस

असम में पहली बार सरकार गठन करने के बाद 2016 में भाजपा ने पूर्वोत्तर के आठ राज्यों में विभन्न क्षेत्रीय दलों के साथ राजनीतिक गठबंधन करते हुए नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक एलायंस (नेडा) बनाया था.

लेकिन नागरिकता संशोधन इस विधेयक को लेकर भाजपा के कई सहयोगी दलों ने अपना विरोध जताया है.

मेघालय में सत्तारूढ़ नेशनल पीपल्स पार्टी के नेता तथा उपमुख्यमंत्री प्रेस्टन टायनसोंग का कहना है, "हम भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से इस विधेयक को लेकर विचार-विमर्श करने का इंतजार कर रहे हैं. पिछली दफा जब हम नागरिकता संशोधन विधेयक के मुद्दे पर उनसे मिले थे, तो उन्होंने वादा किया था कि वह सभी संबंधित पक्षों से बात करेंगे."

मिजोरम के गृह मंत्री लालचम्लियाना ने कहा, "हमारी सरकार पूरी तरह से इस विधेयक के विरोध में है. हम इसके ख़िलाफ़ लड़ेंगे. अमित शाह ने हमें कहा था कि वे इस मुद्दे पर सभी संबंधित पक्षों के साथ परामर्श करने के लिए एक बैठक करेंगे. फिलहाल हम उसी का इंतजार कर रहें है."

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विधेयक के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन

इस बीच असम के प्रभावी छात्र संगठन ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) और नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (नेसो) के सदस्य सोमवार से पूर्वोत्तर के अलग-अलग राज्यों में इस विधेयक के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहें है.

इस प्रस्तावित विधेयक में धर्म के आधार पर अवैध प्रवासियों को नागरिकता देने का प्रावधान है जिसे आसू के महासचिव लुरिन ज्योति गोगोई भारतीय संविधान के सभी को बराबरी देने वाले अनुच्छेद 14 का उल्लंघन मानते हैं.

वो कहते है, "केंद्र सरकार असम और पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों के साथ बहुत दिनों से अन्याय करती आ रही है. असम पहले से अवैध नागरिकों का बोझ उठाते आ रहा है. अब हम घुसपैठियों का बोझ और नहीं उठाएंगे. जब तक सरकार इस विधेयक को वापस नहीं ले लेती आसू और नेसो इसके खिलाफ अपना आंदोलन जारी रखेगा."

"भाजपा के शीर्ष नेताओं ने इस विधेयक को लाने से पहले असम तथा पूर्वोत्तर के लोगों के साथ बातचीत करने का वादा किया था लेकिन अभी तक किसी तरह की बैठक नहीं हुई है."

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Image caption आसू के महासचिव लुरिन ज्योति गोगोई

राजनीतक स्तर पर समर्थन की कोशिश

इस विधेयक के खिलाफ राजनीतिक स्तर पर मिलने वाले समर्थन के बारे में आसू नेता ने कहा, "हमने पूर्वोत्तर राज्यों में विभिन्न दलों के साथ संपर्क किया है. मेघालय, नगालैंड और मिज़ोरम के मुख्यमंत्रियों से हमने बात की है लेकिन भाजपा के लोग पूर्वोत्तर के लोगों के बीच जो एकता है उसे तोड़ने की भी साजिश रच रहें है. इसके साथ ही हमने राष्ट्रीय स्तर पर जेडीयू के नेता नीतीश कुमार से, शिवसेना के नेताओं से समर्थन मांगा है. देश के संविधान में जो धर्म निरपेक्ष की बात कही गई है उन मूल्यों को बचाने के लिए हम लगातार प्रयास कर रहें है. धर्म के आधार पर नागरिकता देने के फैसले को हम कभी नहीं मानेगें."

इस विधेयक के विरोध में उतरे संगठनों का आरोप है कि भाजपा इस बिल के ज़रिए अपने हिंदू वोट बैंक को सुनिश्चित करना चाहती है.

इन आरोपों में कहा जा रहा है कि बांग्लादेश, पाकिस्तान या अफ़ग़ानिस्तान से भले ही आगे कोई आए या ना आए, असली बात ये है कि एनआरसी में रिजेक्ट हिंदुओं को नागरिकता देने के लिए भाजपा यह विधेयक लाना चाहती है.

दरअसल. इस साल जारी की गई एनआरसी की फाइनल सूची में 19 लाख से अधिक लोगों के नाम काट दिए गए थे जिनमें 12 लाख बंगाली हिंदूओं के नाम शामिल है.

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Image caption आरटीआई कार्यकर्ता अखिल गोगोई

क्या कहती है भाजपा

इस बिल के विरोध में उतरे असम के किसान नेता तथा आरटीआई कार्यकर्ता अखिल गोगोई ने बीबीसी से कहा, "भारत का संविधान हमारे सांसदों को भारतीय नागरिकों के हक में काम करने का पावर दिया है लेकिन मौजूदा सरकार बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान जैसे देशों के नागरिकों को यहां लाकर बसाने के लिए यह बिल लेकर आई है. भले ही इस बिल से असम के लोगों का जीवन खतरे में क्यों न पड़ जाए. यह बिल पूरी तरह से असंवैधानिक है और हम इसका विरोध करते है."

वो कहते हैं, "वहीं भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 में लिखा हुआ है कि धर्म के आधार पर किसी को नागरिकता नहीं दी जा सकती. भाजपा इस विधेयक के ज़रिए हिंदूत्व का एजेंडा मज़बूत करना चाहती है. हिंदू राष्ट्र बनाने की कोशिश हो रही है. बीजेपी को असम की स्थिति समझने की ज़रूरत है. बांग्लादेश से हजारों की संख्या में आए लोगों ने हमारी ज़मीन पर कब्जा कर लिया है. हम इसके खिलाफ लगातार आंदोलन करेंगे."

हालांकि असम प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता विजय गुप्ता इन तमाम आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहते हैं, "लोकतांत्रिक देश में संसद से बड़ा और क्या हो सकता है. हमारे पार्टी के नेताओं ने इस मूद्दे पर सभी घटक दलों के साथ बात की है. इस बातचीत का ही नतीजा है कि इस बिल का पहले जो प्रारूप था और अब जो प्रारूप आएगा उसमें अंतर होगा. हम पहले से सार्वजनिक तौर पर कहते आ रहे है कि धार्मिक उत्पीड़न के तहत पड़ोशी देशों से आने वाले शरणार्थियों को भारत की नागरिकता दी जाएगी. ये साफ है कि संसद के शीतकालीन सत्र में यह बिल आएगा और अब जो भी होगा वो संसद के पटल पर ही होगा."

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Image caption असम प्रदेश भाजपा के वरिष्ठ नेता विजय गुप्ता

विधेयक का विरोध कितना प्रभावी

राज्य के वरिष्ठ पत्रकार नवो ठाकुरिया असम तथा पूर्वोत्तर राज्यों में इस विधेयक के खिलाफ शुरू हुए विरोध ज्यादा प्रभावी नहीं मानते.

वो कहते हैं, "अगर ये विधेयक सही में असंवैधानिक है तो विरोध कर रहे संगठनों को सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल करनी चाहिए. अगर असंवैधानिक हुआ तो सुप्रीम कोर्ट इसे खारिज कर देगा. इस विधेयक को लेकर लगातार आंदोलन हुआ है लेकिन बीजेपी तो पहले से इस विधेयक को लाने की बात कहती आ रही है. जबकि इतने विरोध के बाद भी लोकसभा चुनाव और स्थानीय चुनावों में लोगों ने बीजेपी को वोट दिया है."

वो कहते हैं, "विरोध कर रहें लोग सरकार से ऐसा कह सकते है कि आप इस विधेयक को लाओ लेकिन पूर्वोत्तर राज्यों में कोई नया नागरिक बसाया नहीं जाएगा. इस विधेयक को लेकर आंदोलन हो रहा है लेकिन वो केवल मीडिया में दिखता है. ज़मीनी स्तर पर ऐसे आंदोलन का कोई असर नहीं दिख रहा है."

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