रंगा-बिल्ला जिनको फांसी पर लटकाने का सबको था इंतज़ार: विवेचना

  • 1 दिसंबर 2019
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31 जनवरी, 1982 को तिहाड़ जेल में दो ख़ूँख़ार हत्यारों रंगा और बिल्ला को फाँसी देने की तैयारी पूरी हो चुकी थी.

जब वो सुबह 5 बजे उठे तो दोनों को चाय का एक-एक प्याला दिया गया.

उनसे आख़िरी बार पूछा गया कि क्या वो मजिस्ट्रेट के सामने अपनी वसीयत रिकॉर्ड कराना चाहते हैं ?

दोनों ने इससे इंकार किया. दोनों के हाथ में हथकड़ियाँ और पैरों में बेड़ियाँ पहनाई गईं और ब्लैक वॉरंट में फाँसी के दिए गए समय से 10 मिनट पहले उस प्लेटफ़ॉर्म की तरफ़ बढ़ने के लिए कहा गया जहाँ फाँसी का फंदा लगा हुआ था.

'ब्लैक वॉरंट कनफ़ेशंस ऑफ़ अ तिहाड़ जेलर' के लेखक सुनील गुप्ता बताते हैं, "रंगा बहुत जॉली किस्म का इंसान था. उसका क़द था करीब 5 फ़िट 10 इंच. वो हमेशा ख़ुश रहता था. उसको इस बात की चिंता नहीं थी कि उसे फाँसी होनी है. उन दिनों बॉलीवुड की एक फ़िल्म आई थी 'रंगाख़ुश.' वो कहा करता था कि उसका डायलॉग उसने बोला है."

"बिल्ला पेशे से टैक्सी चलाता था. उसका क़द था क़रीब साढ़े 5 फ़ीट. वो हमेशा सीरियस रहता था और रोता रहता था कि रंगा ने मुझे फंसवा दिया जबकि रंगा कहता था कि बिल्ला ने उसे फंसवा दिया. उनकी हमेशा आपस में तकरार होती रहती थी."

जेल में खेलते थे बैडमिंटन और फ़ुटबॉल

सुनील गुप्ता आगे बताते हैं, "जेल का क़ानून है कि आप किसी फाँसी के सज़ा पाए व्यक्ति को तब तक साधारण अभियुक्त समझेंगे जब तक उसकी दया की याचिका राष्ट्रपति ने अस्वीकार न कर दी हो. इसके बाद ही उसे काल कोठरी में ले जाकर बेड़ियाँ पहना दी जाती हैं."

"जब मैं उस जेल में गया तो इनकी क़ानूनी प्रक्रिया चल रही थी. मैं देखता था कि ये दोनों कभी बैडमिंटन खेलते देखे जाते थे तो कभी फ़ुटबॉल."

उस ज़माने का सबसे वीभत्स अपराध

आख़िर उन दोनों ने ऐसा कौन सा अपराध किया था कि पूरा देश उन्हें फाँसी के फंदे पर लटकते हुए देखना चाहता था.

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'ब्लैक वॉरंट' पुस्तक की सह लेखिका और हिंदुस्तान टाइम्स की राजनीतिक संपादक सुनेत्रा चौधरी बताती हैं, "हम लोगों की पीढ़ी में जैसे एक रिपोर्टर के लिए सबसे बड़ा अपराध निर्भया काँड था, उसी तरह हम लोगों से पहले की पीढ़ी के लिए सबसे बड़ा अपराध बिल्ला और रंगा वाला केस था."

" साल 1978 में दो किशोर 16 साल की गीता चोपड़ा और उनके 14 साल के भाई संजय चोपड़ा एक कार में लिफ़्ट लेकर ऑल इंडिया रेडियो जाते हैं, जहाँ युववाणी कार्यक्रम में उनका एक शो था. दुर्भाग्य से उन्हें लिफ़्ट दो गुंडों ने दी जो बंबई से दिल्ली आए थे. वो छोटे मोटे अपराधी थे. उनकी योजना थी कि वो किसी का अपहरण कर उसके घरवालों से फ़िरौती वसूल करेंगे. उन्होंने इन बच्चों को ये सोचकर 'किडनैप' किया कि उनके माँ बाप के पास बहुत सारा पैसा होगा. लेकिन ये पूरा मामला पहले रेप और फिर हत्या में बदल गया."

आकाशवाणी में शो करने जा रहे थे दोनों बच्चे

दो किशोर बच्चों की हत्या और लड़की गीता चोपड़ा के साथ बलात्कार ने पूरे भारत को हिला कर रख दिया.

Image caption रेहान फ़ज़ल के साथ 'ब्लैक वॉरंट' पुस्तक के लेखक सुनील गुप्ता और सह लेखिका सुनेत्रा चौधरी

मशहूर पत्रिका इंडिया टुडे के 30 सितंबर, 1978 के अंक में दिलीप बॉब ने लिखा, "गीता और संजय चोपड़ा के पिता कैप्टेन एमएम चोपड़ा ने बताया कि उनके दोनों बच्चे धौला कुआँ ऑफ़िसर्स क्वार्टर्स से शनिवार शाम सवा 6 बजे निकले थे. गीता जीज़स एंड मैरी कालेज में कॉमर्स द्वितीय वर्ष की छात्रा थी और उन्हें उस शाम संसद मार्ग स्थित आकाशवाणी स्टूडियो में युववाणी के 'इन द ग्रूव' कार्यक्रम में भाग लेना था."

"5 फ़ीट 10 इंच लंबा उनका भाई संजय दसवीं कक्षा का छात्र था. बाहर बादल छाए हुए थे और सुबह से ही रह रहकर बारिश हो रही थी. तय ये हुआ था कि शो के बाद कैप्टेन चोपड़ा अपने बच्चों को आकाशवाणी भवन के गेट से ले लेंगे."

"जब वो 9 बजे वहाँ पहुंचे तो वहाँ बच्चों का कोई पता नहीं था. जब उन्होंने अंदर पूछताछ की तो उन्हें बताया गया कि गीता और संजय चोपड़ा वहाँ रिकार्डिंग के लिए पहुंचे ही नहीं."

तेज़ रफ़्तार कार में चाकू से वार

इन बच्चों को ढ़ूंढने के लिए दिल्ली और कई राज्यों की पुलिस ने अपनी पूरी ताक़त लगा दी.

एक प्रत्यक्षदर्शी भगवान दास ने पुलिस को बताया, "क़रीब साढ़े 6 बजे लोहिया अस्पताल के पास एक तेज़ रफ़्तार फ़िएट मेरे स्कूटर के बग़ल से निकली. मुझे एक लड़की की दबी हुई चीख़ सुनाई दी. मैं अपने स्कूटर को भगाता हुआ कार के नज़दीक ले गया. आगे की सीट पर दो लोग बैठे हुए थे. पीछे की सीट पर एक लड़का और एक लड़की थे."

"लाल बत्ती के पास जब कार धीमी हुई तो मैंने चिल्लाकर कहा, 'क्यों भाई क्या हो रहा है?' लड़के ने शीशे से अपना मुंह सटा कर अपनी टी शर्ट की तरफ़ इशारा किया जो ख़ून से सनी हुई थी. लड़की पीछे से ड्राइवर के बाल खींच रही थी."

"ड्राइवर एक हाथ से गाड़ी चला रहा था और दूसरे हाथ से लड़की पर लगातार वार कर रहा था मंदिर मार्ग और पार्क स्ट्रीट की क्रॉसिंग पर कार ने रफ़्तार पकड़ ली और लाल बत्ती जंप कर आगे निकल गई. लड़के की शक्ल विदेशी जैसी थी और मस्टर्ड रंग की कार का नंबर था HRK 8930."

पहले संजय की हत्या और फिर गीता के साथ बलात्कार

रंगा और बिल्ला इन दोनों को बुद्धा गार्डेन की तरफ़ रिज इलाक़े में ले गए. वहाँ उन्होंने एक सुनसान इलाक़े में कार रोककर पहले संजय चोपड़ा की हत्या की और गीता के साथ बलात्कार किया.

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बाद में रंगा ने अपने इक़बालिया बयान में कहा, "मैं लड़की को उस तरफ़ ले जा रहा था जहाँ उसके भाई की लाश पड़ी हुई थी. मैं उसके दाहिनी तरफ़ चल रहा था. बिल्ला ने मुझे इशारा किया और मैं थोड़ा आगे चलने लगा. बिल्ला ने पूरी ताक़त से लड़की की गर्दन पर तलवार से वार किया. इस वार के तुरंत बाद उसकी मौत हो गई. हमने उसकी लाश उठाकर झाड़ी में फेंक दी."

मोरारजी देसाई चोपड़ा दंपत्ति के घर संवेदना जताने पहुंचे

घटना की ख़बर फैलते ही लोगों का ग़ुस्सा भड़क गया. बोट क्लब पर जीज़स एंड मैरी कॉलेज की लड़कियों ने प्रदर्शन किया. जब उस समय के विदेश मंत्री उनसे बात करने वहाँ पहुंचे तो छात्रों ने पत्थरबाज़ी शुरू कर दी.

एक पत्थर वाजपेई के सिर में लगा और उनके सिर से ख़ून बहने लगा. सुनील गुप्ता बताते हैं, "मुझे अभी भी याद है कि उस समय के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई अपना शोक प्रकट करने इनके घर गए थे. ऐसा बहुत कम देखने में मिलता है कि प्रधानमंत्री इस तरह किसी अपराध के शिकार परिवार के प्रति संवेदना प्रकट करने गए हों."

पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट से साफ़ हुआ कि गीता चोपड़ा के शरीर पर पाँच घाव थे. संजय के शरीर पर कुल 21 घाव थे. गीता की पैंट की जेब में उसका आईडेंटिटी कार्ड सही सलामत था. उनके पास से एक बटुआ भी बरामद हुआ जिसमें 17 रुपए रखे हुए थे.

कालका मेल से दिल्ली आते हुए सैनिकों ने पकड़ा

वारदात के बाद बिल्ला और रंगा दिल्ली से भागकर पहले मुंबई गए और फिर वहाँ से आगरा.

ये उनका दुर्भाग्य था कि आगरा से दिल्ली आते हुए वो कालका मेल में ग़लती से सैनिकों के डिब्बे में चढ़ गए और उन्होंने उन्हें पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया.

सुनेत्रा चौधरी बताती हैं, "इस घटना के तुरंत बाद वो डर गए और दूसरे शहरों की तरफ़ भागने लगे. वो एक ऐसी ट्रेन की बोगी में चढ़े जिसमें सेना के जवान सवार थे. उनसे उनका झगड़ा हुआ और उन्होंने इनसे इनका पहचान पत्र माँगा. रंगा ने बिल्ला से कहा कि उन्हें 'भरा हुआ आई कार्ड' दे दो. तभी सैनिकों को अंदाज़ा हो गया कि दाल में कुछ काला है. उन्होंने उन्हें बाँध दिया और जब दिल्ली स्टेशन आया तो उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया."

फाँसी के लिए फ़कीरा और कालू जल्लाद को बुलाया गया

बिल्ला और रंगा को अदालत ने फाँसी की सज़ा सुनाई जिसे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने बरक़रार रखा.

राष्ट्रपति नीलम संजीव रेड्डी ने उनकी दया की याचिका अस्वीकार कर दी. फाँसी से एक हफ़्ते पहले इन्हें जेल नंबर 3 की फाँसी कोठी में ले जाया गया. वहाँ उन्हें पूरी तरह से एकाँतवास में रखा गया और वो 24 घंटे तमिलनाडु स्पेशल पुलिस के जवानों की निगरानी में रहे.

दोनों को फाँसी देने के लिए फ़रीदकोट से फ़कीरा और मेरठ से कालू जल्लाद को बुलाया गया. सुनेत्रा चौधरी बताती हैं, "ये दोनों लोग कालू और फ़कीरा दोनों 'लीजेंडरी' थे. एक प्रथा सी बन गई थी कि फाँसी से पहले उनको 'ओल्ड मंक' शराब पीने के लिए दी गई थी, क्योंकि माना जाता था कि कोई भी व्यक्ति चाहे वो जल्लाद ही क्यों न हो अपने होशोहवास में किसी की जान नहीं ले सकता. जेल मैनुअल में किसी की जान लेने के लिए जल्लाद को सिर्फ़ 150 रुपए देने का ज़िक्र है जो कि बहुत कम है."

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फाँसी के लिए ख़ास रस्सी

इन दोनों को फाँसी देने के लिए बिहार की बक्सर जेल से रस्सी मंगाई गई.

सुनील गुप्ता बताते हैं, "ये रस्सी बाज़ार से ख़रीदी नहीं जाती बल्कि बिहार की बक्सर जेल में ख़ासतौर से बनाई जाती है. इसको लचीला बनाने के लिए इस पर मोम या मक्खन का लेप किया जाता है. कुछ जल्लाद इसके लिए पके हुए केले को मसलकर रस्सी पर लगाते हैं. इस रस्सी की लंबाई 1.8 मीटर से 2.4 मीटर के बीच होती है."

"इनमें से एक जल्लाद फ़कीरा बिल्कुल काला था. वो अपने आप को यमराज के रूप में दिखाने की कोशिश करता था. कालू की तोंद बाहर निकली हुई थी जैसी कि आमतौर से हलवाइयों की होती है. दोनों जानबूझ कर भयानक दिखने की कोशिश करते थे."

पत्रकारों से बिल्ला की मुलाक़ात

फाँसी से एक दिन पहले दिल्ली के पाँच पत्रकारों ने रंगा और बिल्ला से मिलने की इच्छा प्रकट की. उनमें से एक थे उस समय नेशनल हैरल्ड में काम करने वाले प्रकाश पात्रा.

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प्रकाश याद करते हैं, "रंगा ने तो हमसे मिलने से इंकार कर दिया लेकिन बिल्ला हमसे क़रीब 20 मिनट तक मिला. जब वो हमसे बातें कर रहा था तो उसका पूरा शरीर काँप रहा था. वो आख़िर तक कहता रहा कि रब जानता है कि उसने ये अपराध नहीं किया है और उसे फंसाया गया है. लेकिन हम उसकी बॉडी लैंग्वेज से देख सकते थे कि वो झूठ बोल रहा है."

फाँसी से पहले चेहरे को काले कपड़े की थैली से ढका गया

फाँसी की रात रंगा ने अपना खाना खाया और सामान्य ढंग से सोया. बिल्ला ने न तो खाना खाया और न ही वो एक मिनट के लिए भी सोया.

वो पूरी रात अपनी कोठरी के चक्कर लगाते हुए बड़बड़ाता रहा.

31 जनवरी, 1982 की सुबह बिल्ला और रंगा की गर्दन में फाँसी का फंदा पहनाया गया और उनके चेहरे को काले कपड़े से ढक दिया गया.

सुनील गुप्ता याद करते हैं, "हमने इन्हें 5 बजे जगाकर कहा कि नहा लो. रंगा तो नहाया था लेकिन बिल्ला ने नहाने से मना कर दिया. फाँसी से पहले दोनों के चेहरे काले कपड़े की एक तरह की थैली से ढके गए ताकि वो देख न सकें कि बाहर क्या हो रहा है. फाँसी के समय बिल्ला सिसक रहा था जबकि रंगा आख़िर तक बहुत जोश में था, फाँसी से पहले उसने ज़ोर से नारा लगाया, 'जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल."

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"फाँसी से कुछ सेकेंड पहले मैंने नोट किया कि दोनों के चेहरों के रंग बदल गए. ऐसा लगा जैसे डर से उनका चेहरा काला पड़ गया हो."

पैर खीं कर साँस निकाली गई

निर्धारित समय पर जेल के सुपरिंटेंडेंट आर्य भूषण शुक्ल ने लाल रुमाल हिलाया और कालू ने फ़कीरा की मदद से लीवर खींच दिया.

बाद में कई सालों तक शुक्ला अपने दोस्तों को वो लाल रुमाल दिखाते रहे जिससे उन्होंने बिल्ला और रंगा को फाँसी दिए जाने का आदेश दिया था.

दो घंटे बाद जब डाक्टरों ने उनकी जाँच की तो बिल्ला तो मृत पाया गया लेकिन रंगा की नाड़ी अभी तक चल रही थी.

फाँसी के प्रत्यक्षदर्शी सुनील गुप्ता बताते हैं, "ये निर्भर करता है अपराधी के वज़न पर. हमें बताया गया कि चूँकि वो लंबा था और उसने फाँसी के समय अपनी साँस रोक ली थी, इसलिए उसकी जान तुरंत नहीं निकली. तब जेल के एक कर्मचारी को कुएं में उतारा गया. उसने उसके पैर खींचे. तब जाकर उसके प्राण पखेरू उड़े. ये तो भला हुआ कि उस समय तक फाँसी के बाद पोस्टमॉर्टम का प्रचलन नहीं था, वर्ना ये ख़बर बाहर आ जाती कि रंगा को 'बाहरी मदद' से मारा गया. 32 साल बाद शत्रुधन चौहान के फ़ैसले के बाद फाँसी दिए गए व्यक्ति का पोस्टमॉर्टम करना आवश्यक हो गया है."

"फाँसी के इतिहास में ऐसा भी हुआ है कि लीवर इतनी ज़ोर से खींचा गया कि शरीर के दो टुकड़े हो गए और गर्दन ऊपर रह गई और नीचे का शरीर टूटकर कुएं में गिर गया. फाँसी के बाद अक्सर व्यक्ति का चेहरा वीभत्स हो जता है. कभी कभी उसकी जीभ और आँखें भी बाहर निकल आती हैं. जेल की भाषा में इसे 'गर्दन का लंबा होना' कहा जाता है. बहरहाल न तो उस समय किसी बाहरी व्यक्ति को इसका पता चला और न ही किसी ने इसकी फ़िक्र की."

बिल्ला और रंगा किसी के भी रिश्तेदारों ने उनके शवों को स्वीकार नहीं किया और जेल की तरफ़ से ही उनकी अंतयेष्ठि की गई.

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