बिहार के इन लाखों नौजवानों की जवानी कौन लौटाएगा?

  • 2 दिसंबर 2019
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ग्रैजुएशन करने में कितना समय लगता है? और पोस्ट ग्रैजुएशन करने में?

आप कहेंगे कि तीन साल में बीए और बीएसएसी पूरी हो जाती है और पीजी करने में दो साल लगते हैं.

लेकिन 2015 में एमएससी (मैथ) के कोर्स में दाखिला लेने वाले मधेपुरा के अजीत कुमार आज भी अपनी डिग्री पूरा होने का इंतज़ार कर रहे हैं.

2015 में ही जेडी वीमेंस कॉलेज में बीबीए की पढ़ाई शुरू करने वाली स्वीटी के फ़ाइनल ईयर के इम्तेहान अभी तक चल रहे हैं.

2016-19 के बैच की इकॉनॉमिक्स ऑनर्स की स्टूडेंट मीसा भारती के चौथे सेमेस्टर की परीक्षा ख़त्म होने के 15 दिन बाद ही पांचवें सेमेस्टर की परीक्षा शुरू हो गई है.

अजीत, स्वीटी और मीसा के बीच जो बात कॉमन है, वो ये ही कि तीनों बच्चे बिहार से हैं और बिहार में ही पढ़ रहे हैं.

कहां, कितनी-कितनी देरी से चल रहे हैं सत्र

बिहार सरकार के सीधे नियंत्रण में कुल 12 यूनिवर्सिटी हैं.

पिछले दिनों जब नए कुलाधिपति सह राज्यपाल फागू चौहान ने पद संभाला था तब राजभवन में हुई समीक्षा बैठक में पाया गया था कि 12 में छह विश्वविद्यालय लेटलतीफ़ी के शिकार हैं.

परीक्षाएं तय समय से काफी पीछे चल रही हैं.

बीएन मंडल विश्वविद्यालय मधेपुरा में स्नातक की तीन और स्नातकोत्तर की सात परीक्षाएं लंबित हैं.

बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर बिहार यूनिवर्सिटी में स्नातक की चार और स्नातकोत्तर की एक परीक्षा बाकी है.

जय प्रकाश यूनिवर्सिटी छपरा में स्नातक की दो तथा स्नातकोत्तर की छह परीक्षाएं नहीं हुई हैं.

मगध यूनिवर्सिटी में भी हाल ऐसा ही है जहां अंडर ग्रैजुएट और पोस्ट ग्रैजुएट दोनों कोर्स की चार-चार परीक्षाएं समय से नहीं हुईं.

तिलकामांझी विश्वविद्यालय, भागलपुर में भी स्नातक और स्नातकोत्तर की कुल मिलाकर सात परीक्षाएं नहीं हुई हैं.

वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा की भी हालत एक जैसी है. यहां भी सात परीक्षाएं होनी बाकी है.

एक परीक्षा नहीं होने का मतलब एक समेस्टर सेशन लेट हो जाना यानी छह महीने की देरी. जहां पोस्ट ग्रैजुएट के पाठ्यक्रमों में सात-सात परीक्षाएं नहीं हुई हैं, वहां के छात्रों के स्थिति का अंदाज़ा लगाना मुश्किल है जो दो साल का कोर्स छठे साल भी पूरा नहीं कर सके हैं.

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जिनका समय लौटकर नहीं आएगा

बीएन मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा से पोस्ट ग्रैजुएट कोर्स कर रहे अजीत कुमार बताते हैं, "2015-17 के बैच में एडमिशन लिया था. शुरू में कोई पूछता तो तपाक से कह देता कि एमएससी (मैथेमेटिक्स) कर रहा हूं. अब लोग कहते हैं पांच साल से यही तो कर रहे हो. अगर कोई मास्टर इन मैथेमेटिक्स होना चाहता है तो ज़ाहिर है वह उसके आगे भी बहुत कुछ करना चाहता होगा. मैं तो अब ये भी नहीं कह सकता कि क्या करना चाहता हूं. जो करना चाहता था उसका समय निकल गया है. निकल रहा है. अब तो सिर्फ़ यही चाहता हूं कि किसी तरह डिग्री मिल जाए. फिर आगे का सोचा जाएगा."

अजीत जैसे बिहार के हज़ारों छात्र हैं जिनके करियर का महत्वपूर्ण समय विश्वविद्यालयों के सेशन की लेटलतीफी के कारण बर्बाद हो रहा है, हज़ारों का बर्बाद हो चुका है.

सेशन लेट केवल ग्रैजुएशन या पोस्ट ग्रैजुएशन के कोर पाठ्यक्रमों का ही नहीं है बल्कि वोकेशनल कोर्स का भी है.

मगध यूनवर्सिटी के अंतर्गत आने वाले जेडी वीमेंस कॉलेज में बैचलर इन बिजनेस मैनेजमेंट की छात्रा स्वीटी कहती हैं, "यहां जो भी एडमिशन लेता है वह पहले से ही जानता है कि मगध यूनिवर्सिटी होगा तो सेशन लेट होगा ही. हमारी अभी फाइनल इयर की परीक्षाएं चल रही हैं. जबकि इन्हें हो जाना चाहिए था एक साल पहले ही. अब इसके बाद रिजल्ट प्रकाशित होगा, फिर जाकर हमारी डिग्री मिलेगी. इस तरह हम डेढ़ साल लेट हो जाएंगे. मेरे पहले के भी जो सीनियर रहे हैं, उनके भी सेशन लेट थे. जो आने वाले हैं वो भी जानते हैं कि लेट होगा."

सेशन लेट के लिए ज़िम्मेदार कौन

आख़िर बिहार के विश्वविद्यालयों के सेशन लेट क्यों हो जाते हैं? छात्रों से पूछने पर वे जवाब देते हैं कि यह तो विश्वविद्यालय बताएगा कि वे परीक्षा क्यों नहीं समय से करा रहे हैं.

हमने यही सवाल पूछा वीर कुंवर सिंह यूनिवर्सिटी, आरा के वाइस चांसलर देवी प्रसाद तिवारी से.

वे कहते हैं, "इसमें गलती सबसे अधिक छात्रों की है. समय से परीक्षाएं तभी तो हो पाएंगी जब सही समय पर फॉर्म भरे जाएंगे. छात्र क्लास करने आएंगे. लेकिन पहले तो वे क्लास नहीं आएंगे और जब परीक्षा की बारी आएगी तो फॉर्म भरने की तारीख बढ़वाने के लिए हड़ताल करेंगे. आप ही सोचिए कि अगर कोई छात्र क्लास करने नहीं आता है तो परीक्षा क्या देगा?"

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वाइस चांसलर के जवाब से ये सवाल खड़ा हुआ कि सेशन में देरी की ज़िम्मेदारी छात्रों पर थोप देना किस हद तक सही है?

यूनिवर्सिटी के ही छात्र ओम प्रकाश पांडे कहते हैं, "अगर वीसी साहब ऐसा कहते हैं तो उनसे पूछिए कि पिछले एक साल के दौरान फॉर्म और परीक्षाओं को लेकर अगर कहीं छात्रों का विरोध प्रदर्शन या हड़ताल हुई है तो बताएं. किसी रिकॉर्ड में तो होगा. दरअसल वो ऐसा कहकर अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं. हमनें अगर कभी विरोध जताया भी है, हड़ताल हुई भी हैं तो विश्वविद्यालय की समस्याओं को लेकर, सेशन को सही समय पर कराने की मांग को लेकर किया है, पठन-पाठन का सुचारू बनाने के लिए किया है. वो कहते हैं कि छात्र क्लास नहीं आते, हम कहते हैं कि शिक्षक पढ़ाने नहीं आते."

पर वाइस चांसलर देवी प्रसाद तिवारी इसके जवाब में कहते हैं, "छात्रों की बातें अपनी जगह हैं. लेकिन उन्हें भी यह बात समझनी होगी कि सिस्टम सहयोग से चलता है. शिक्षकों की कमी है. इससे तो सभी वाकिफ़ हैं. मगर हमने गेस्ट फैकल्टी के माध्यम से शिक्षकों की कमी को एक हद तक पूरा कर लिया है. एक दिक्कत ये भी है अधिकांश शिक्षक पढ़ाने तो हमारे यहां आते हैं मगर उनका ठिकाना पटना है. पटना से आना-जाना समय पर ना कभी संभव हुआ और ना होगा. कई बार हमनें ये बात सीनेट की बैठकों में कही है. शिक्षक हमारी बात मानें तब तो!"

बिहार के विश्विविद्यालयों में शिक्षकों की भारी कमी है. यह बात नैक की रिपोर्ट में भी आ चुकी है. हाल ही में यूजीसी ने सभी कुलपतियों को पत्र लिखकर अपने-अपने यहां शिक्षकों के बहाली की प्रक्रिया को 10 नवंबर 2019 से पहले शुरू करने के लिए कहा था. लेकिन अभी तक किसी विश्विविद्यालय में इसकी शुरुआत नहीं हो सकी है.

सेशन सही कैसे होगा?

बिहार के विश्वविद्यालयों में सेशन लेट की बात अब पुरानी हो चली है. कई बार इसे सुधारने की कोशिशें की गईं.

वर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जब बिहार के राज्यपाल थे, तब उन्होंने भी सेशन को सही करने के लिए पूरी कोशिश की थी. उसके बाद आए लालजी टंडन ने भी लेट सेशन पर कुलपतियों से जवाब मांगा था. अब राज्यपाल फागू चौहान ने सभी कुलपितियों के लिए दिसंबर 2020 तक की डेडलाइन तय कर दी है.

सवाल आख़िर में यही है कि सेशन को दुरुस्त किया जाए भी तो कैसे?

अगर राज्यपाल की डेडलाइन के अनुसार परीक्षाएं होने लगेंगी तो उसमें भी नुकसान छात्रों का ही होगा. जल्दी-जल्दी परीक्षाएं करवा दी जाएंगी तो छात्रों को कोर्स कंप्लीट करने का भी समय नहीं मिल पाएगा. ऐसे में परीक्षा देकर भी क्या कर लेंगे?

मगध यूनिवर्सिटी से बीए इकॉनोमिक्स की पढ़ाई कर रही अनन्या कहती हैं, "हमारे साथ पिछली बार यही हुआ था. अभी हम सेकेंड इयर की परीक्षा दिए ही थे कि 15 दिनों के बाद थर्ड इयर की परीक्षा शुरू कर दी गई. इतने कम समय में क्या कोई तैयारी करेगा. प्रेशर बहुत हो जाता है हमलोगों पर. लेकिन इसमें हमारी तो कोई गलती नहीं है न!"

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इनसे सीख सकते हैं?

बीते सालों में पटना यूनिवर्सिटी और ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी ने अपने यहां के सेशन सही कर लिए हैं. यहां ऐसा क्या किया गया जो बाकी विश्वविद्यालयों में नहीं हो पा रहा है?

पटना यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर रासबिहारी सिंह कहते हैं, "जिनके सेशन लेट चल रहे हैं, उन्हें हमने सलाह दी थी कि एक साथ 15-15 दिनों के गैप पर दो वर्षों का परीक्षा कराइए. अगर अभी से शुरू होता है तो दिसंबर में एक परीक्षा होगी."

"फिर उसके अगले 15 दिन बाद जनवरी में दूसरे वर्ष के बच्चों की परीक्षा और उसके 15 दिन बाद तीसरे वर्ष के बच्चों की परीक्षा. अगर कहीं सिलेबस कवर नहीं हुआ है तो कंडेंस सिलेबस कर दिया जाए. उन टीचर्स को क्लास भेजा जाए को इसके पहले बच्चों को पढ़ा चुके हैं."

"सिलेबस से उन चैप्टर्स को हटा सकते हैं जो छात्र पिछली कक्षाओं में पढ़ चुके होते हैं. हर सिलेबस में ऐसे कई चैप्टर्स शामिल रहते हैं. और यह सब छात्रों को फॉर्म भरने के समय ही बताना होगा. छुट्टियों को कम करना होगा. जैसे अब क्रिसमस की छुट्टी होने वाली है 15-20 दिनों की."

"मुझे नहीं समझ में आ रहा है कि इतनी लंबी छुट्टी क्यों जब आपके सेशन इतने लेट चल रहे हैं. मैंने अपने विश्वविद्यालय में पिछली गर्मियों की छुट्टी कैंसिल कर दी थी. शिक्षकों का भरपूर सहयोग मिला था. ऐसे में छात्रों के उपर प्रेशर भी नहीं आएगा."

पटना यूनिवर्सिटी के अलावा दरभंगा की ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी भी है जिसका सेशन फिलहाल अप टू डेट है. नैक की मुल्यांकन रिपोर्ट में भी इस यूनिवर्सिटी ने बाकी सभी यूनिवर्सिटियों से बेहतर प्रदर्शन किया है.

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पिछले काफी समय से एलएनएमयू को कवर कर रहे मुज़फ़्फ़रपुर के पत्रकार प्रशांत कहते हैं, "आज से चार पहले यह विश्वविद्यालय बिहार के बेकार विश्विविद्यालयों में से एक था. दो-दो साल सेशन लेट चल रहे थे. पढ़ाई-लिखाई का भी हाल बेहाल था. उसके बाद एक वीसी आए थे साकेत कुशवाहा. उन्होंने यहां क्रांतिकारी काम किया. कई बड़े फैसले लिए. समय से परीक्षाएं आयोजित करवाई गईं. और अब नैक की जो इवैल्यूएशन रिपोर्ट आई है उसमें ये यूनिवर्सिटी सभी विश्विविद्यालयों से आगे है. सबसे अधिक नैक एक्रेडिटेड कॉलेज इसी यूनिवर्सिटी के पास हैं."

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बिहार की उच्च शिक्षा का सच

जहां तक बात नैक के एक्रिडेशन की है तो पांच नवंबर को जारी नैक की मुल्यांकन रिपोर्ट में बिहार के सभी 12 विश्विविद्यालयों के 259 कॉलेजों में से केवल 103 ही नैक से मान्यता प्राप्त हैं. बिहार की सबसे प्रतिष्ठित पटना यूनिवर्सिटी को 'बी प्लस' ग्रेड मिला है. जबकि इस यूनिवर्सिटी के सबसे पुराने (156 साल) पटना कॉलेज को 'सी ग्रेड' मिला है.

बिहार की कोई भी यूनिवर्सिटी 'बी प्लस' से आगे नहीं बढ़ सकी है.

यदि पटना यूनिवर्सिटी का हाल ऐसा है तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाकी विश्विविद्यालयों का नैक की मुल्यांकन रिपोर्ट में क्या प्रदर्शन होगा.

वीसी रासबिहारी सिंह पटना कॉलेज के छात्र और प्रिंसिपल दोनों रह चुके हैं. बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "मेरे लिए इससे अधिक शर्म की बात कुछ और नहीं हो सकती. आख़िर पटना कॉलेज का प्रदर्शन इतना खराब कैसे हो सकता है. दरअसल इस बार नैक की मुल्यांकन प्रक्रिया बदल गई है. नया सिस्टम पहली बार पटना यूनिवर्सिटी में ही लागू हुआ. अब नैक की पियर टीम के हाथ में केवल 30 पर्सेंट अंक है. बाकी 70 फीसदी अंक पिछले पांच सालों के प्रदर्शन के आधार पर होगा विश्वविद्यालय अपलोड करेगा. मैं पिछले पांच में से केवल एक साल वीसी रहा हूं. हमने अपने स्तर से भरसक कोशिश की. लेकिन ये बात भी सही है पिछले कई सालों से पटना यूनिवर्सिटी में शैक्षणिक स्तर में गिरावट आई है. यहां रिसर्च और इनोवेशन के नाम पर कोई काम नहीं हुआ है. ग्रेडिंग में सबसे अधिक यहीं मार खाए हम. हमारा अगला फोकस यही है."

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जेएनयू प्रकरण और बिहार

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में फीस वृद्धि का विरोध कर रहे छात्रों के विरोध प्रदर्शन पर बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी का एक ट्वीट पिछले दिनों सुर्खियों में रहा.

सुशील मोदी का ट्वीट कुछ यूं था, "जेएनयू में फीस वृद्धि कोई इतना बड़ा मुद्दा नहीं कि इसके लिए संसद मार्च निकाला जाए. हकीकत यह है कि जो शहरी नक्सली इस कैम्पस में बीफ पार्टी, पब्लिक किसिंग, महिषासुर मंडन, स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा का मानभंजन और देश के टुकड़े-टुकड़े करने के नारे लगाने जैसी गतिविधियों में संलिप्त रहे, वे अब ग़रीब परिवारों के छात्रों को गुमराह कर राजनीतिक रोटी सेंकना चाहते हैं."

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सुशील मोदी अपने ही ट्वीट पर खूब ट्रोल हुए. लोगों ने तंज कसे "कि खुद एक छात्र आंदोलन (जेपी मूवमेंट) से निकला राजनेता जो किसी प्रदेश के उपमुख्यमंत्री की ज़िम्मेदारी संभाल रहा हो वो जेएनयू के छात्रों के आंदोलन को लेकर ऐसी बात कैसे कह सकता है."

सुशील कुमार मोदी खुद पटना यूनिवर्सिटी से पढ़ कर निकले और छात्र संघ की राजनीति से होते हुए राज्य के उप मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे.

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Image caption बिहार के मुख्यमंत्री नितिश कुमार के साथ सुशील कुमार मोदी

पटना यूनिवर्सिटी स्टूडेंट यूनियन के ज्वॉइंट सेक्रेटरी राजा रवि कहते हैं, "सुशील मोदी जी केवल एक बार अपने पुराने कॉलेज आ जाते. यहां का हाल ऐसा है कि एडमिनिस्ट्रेटिव ब्लॉक में भी आपको पीने का पानी नहीं मिलेगा. बाकी डिपार्टमेंट्स की बात ही छोड़ दीजिए."

बिहार के छात्रों की समस्याओं और मुद्दों पर सुशील कुमार मोदी की प्रतिक्रिया लेने की कोशिशें नाकाम रहीं.

मोदी के हिसाब से जेएनयू के आंदोलन हकीकत जो भी है मगर बिहार में उच्च शिक्षा की असल हकीकत ये है कि इस दौरान बिहार के हजारों-लाखों युवाओं के करियर के दो से तीन साल बर्बाद हो गए. प्राय: विश्वविद्यालयों के सेशन लेट चल रहे हैं. कहीं एक साल, कहीं दो साल, कहीं तीन साल भी.

छात्रों के मुद्दे और छात्र संघ

1977 के जनता लहर की हवा जिस बिहार से उठी थी, वहां शिक्षा की इस दयनीय स्थिति पर इतनी ख़ामोशी क्यों है?

वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर कहते हैं, "यहां के छात्र संगठित और एकजुट नहीं रह गए हैं. इसका एक बड़ा कारण कई सालों तक स्टूडेंट यूनियन का चुनाव नहीं होना है. हालांकि इधर कुछ सालों से चुनाव तो हो रहे हैं पर वो भी किस तरह हो रहे हैं ये भी किसी से छुपा नहीं है."

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मगध यूनिवर्सिटी की छात्रा स्वीटी कहती हैं, "मैंने अपने कॉलेज के कई प्रोटेस्ट में हिस्सा लिया है. लेकिन हमें मिलता कुछ नहीं है. थक-हार कर शांत हो जाते हैं. सबलोग यूनाइट नहीं रह पाते. किसी को कुछ फर्क नहीं पड़ता. इसलिए अब हमें भी फर्क नहीं पड़ता. जिस स्टूडेंट यूनियन की आप बात कर रहे हैं वो भी विश्वविद्यालय के लिए काम करता है, छात्रों के लिए बस नाम का है."

जेएनयू से लेकर हॉन्ग कॉन्ग तक इस वक़्त दुनिया भर में कई जगहों पर छात्रों और युवाओं के विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं. न केवल शिक्षा और रोज़गार के मुद्दों पर बल्कि सामाजिक और राजनैतिक आंदोलनों में भी छात्रों और युवाओं की आवाज़ें गूंज रही हैं.

लेकिन बिहार में कॉलेज जाने वाले लाखों नौजवानों की जवानी इम्तेहान की तारीखों के इंतज़ार में गुज़र रही है.

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