नागरिकता संशोधन बिल क्या है, जिस पर बीजेपी है अड़ी

  • 4 दिसंबर 2019
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जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को समाप्त किए जाने और उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने के बाद भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार अब विवादास्पद नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) पर अपनी मुहर लगाकर पूर्वोत्तर भारत की जनता का सामना करने को तैयार हो गई है.

केंद्रीय कैबिनेट में इस विधेयक को मंज़ूरी मिल गई है और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ इसे अगले हफ़्ते सदन में पेश किए जाने की संभावना है.

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इस विधेयक में पड़ोसी देशों से शरण के लिए भारत आए हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है.

हालांकि इस बिल को लेकर विपक्ष बेहद कड़ा रुख़ अख़्तियार कर रहा है और इसे संविधान की भावना के विपरीत बता रहा है वहीं केंद्र की तरफ से इसे शीर्ष प्राथमिकता देते हुए इसे सदन में रखे जाने के दौरान सभी सांसदों को उपस्थित रहने को कहा गया है.

नागरिकता संशोधन विधेयक में क्या है ख़ास?

भारत के पूर्वोत्तर में इस नागरिकता संशोधन विधेयक का व्यापक रूप से विरोध होता रहा है जिसका उद्देश्य पड़ोसी देशों पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से ग़ैर-मुसलमान अवैध प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्रदान करने के लिए नियमों में ढील देने का प्रावधान है.

दरअसल सदन में इसे पारित करवाने का यह सरकार का दूसरा प्रयास है. इससे पहले भी मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान इसी वर्ष 8 जनवरी को यह लोकसभा में पारित हो चुका है.

लेकिन इसके बाद पूर्वोत्तर में इसका हिंसक विरोध शुरू हो गया, जिसके बाद सरकार ने इसे राज्यसभा में पेश नहीं किया. सरकार का कार्यकाल पूरा होने के साथ ही यह विधेयक स्वतः ख़त्म हो गया.

मई में नरेंद्र मोदी की सरकार का दूसरा कार्यकाल शुरू हुआ. इस दौरान अनुच्छेद 370 समेत कई बड़े फ़ैसले किए गए और अब नागरिकता संशोधन विधेयक को कैबिनेट की मंजूरी के साथ एक बार फिर इसे संसद में पेश किया जाएगा.

संसद में इसे पेश करने से पहले ही पूर्वोत्तर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं.

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पूर्वोत्तर में नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध क्यों?

वैसे तो नागरिकता संशोधन विधेयक पूरे देश में लागू किया जाना है लेकिन इसका विरोध पूर्वोत्तर राज्यों, असम, मेघालय, मणिपुर, मिज़ोरम, त्रिपुरा, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश में हो रहा है क्योंकि ये राज्य बांग्लादेश की सीमा के बेहद क़रीब हैं.

इन राज्यों में इसका विरोध इस बात को लेकर हो रहा है कि यहां कथित तौर पर पड़ोसी राज्य बांग्लादेश से मुसलमान और हिंदू दोनों ही बड़ी संख्या में अवैध तरीक़े से आ कर बस जा रहे हैं.

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विरोध इस बात का है कि वर्तमान सरकार हिंदू मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की फिराक में प्रवासी हिंदुओं के लिए भारत की नागरिकता लेकर यहां बसना आसान बनाना चाहती है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, संसद के एजेंडे में इसे सूचीबद्ध करने के साथ ही पूर्वोत्तर में स्थानीय समूहों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. हालांकि, अब तक हिंसा की कोई ख़बर नहीं है लेकिन असमिया भाषा के एक स्थानीय अख़बार 'असमिया ख़बर' ने अपने संपादकीय में चेतावनी दी है कि इस विधेयक पर आगे बढ़ने की स्थिति में 'सत्तारूढ़ बीजेपी को स्थानीय जनता के ग़ुस्से का सामना करना पड़ेगा.'

इसमें लिखा गया है, "इतिहास गवाह है कि ऐसी सरकारों का क्या होता है जो जनता के ख़िलाफ़ जाती हैं."

अग्रेज़ी भाषी की 'द पायनियर' में असम में इसे लेकर विरोध और 18 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पुतला जलाए जाने की ख़बर छापी गई.

'असमिया प्रतिदिन' की रिपोर्ट के मुताबिक़, इस क्षेत्र में आठ प्रभावशाली छात्रों के समूह, नॉर्थइस्ट स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन (एनईएसओ) ने सभी सात राज्यों में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू किया.

इस रिपोर्ट में एनईएसओ कार्यकर्ताओं का हवाला देते हुए कहा कि इस विधेयक को "किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जाएगा".

पूर्वोत्तर के सबसे बड़े राज्य असम में इसके विरोध में उतरे अन्य समूहों में कृषक मुक्ति संग्राम समिति, युवा संगठन असम जतियाबाड़ी युवा छात्र परिषद और वामपंथी राजनीतिक गठबंधन समूह वाम-डेमोक्रेटिक मंच शामिल हैं.

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एनआरसी से बहुत से हिंदू बाहर

सीएबी और एनआरसी में क्या है अंतर?

सरकार की तरफ से जिस विधेयक को सदन में पेश किया जाना है वह दो अहम चीज़ों पर आधारित है- पहला, ग़ैर-मुसलमान प्रवासियों को भारतीय नागरिकता देना और दूसरा, अवैध विदेशियों की पहचान कर उन्हें वापस भेजना, जिनमें ज़्यादातर मुसलमान हैं.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक़, गृह मंत्री अमित शाह ने 20 नवंबर को सदन को बताया कि उनकी सरकार दो अलग-अलग नागरिकता संबंधित पहलुओं को लागू करने जा रही है, एक सीएबी और दूसरा पूरे देश में नागरिकों की गिनती जिसे राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर या एनआरसी के नाम से जाना जाता है.

अमित शाह ने बताया कि 'सीएबी' में धार्मिक उत्पीड़न की वजह से बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान से 31 दिसंबर 2014 से पहले भारत में आने वाले हिंदु, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाइयों को नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान है.

उन्होंने बताया कि एनआरसी के जरिए 19 जुलाई 1948 के बाद भारत में प्रवेश करने वाले अवैध निवासियों की पहचान कर उन्हें देश से बाहर करने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी.

मूल रूप से एनआरसी को सुप्रीम कोर्ट की तरफ से असम के लिए लागू किया गया था. इसके तहत अगस्त के महीने में यहां के नागरिकों का एक रजिस्टर जारी किया गया. प्रकाशित रजिस्टर में क़रीब 19 लाख लोगों को बाहर रखा गया था. जिन्हें इस सूची से बाहर रखा गया उन्हें वैध प्रमाण पत्र के साथ अपनी नागरिकता साबित करनी थी.

हालांकि, अमित शाह ने कहा कि नई राष्ट्रव्यापी एनआरसी प्रक्रिया में असम फिर से शामिल होगा.

न्यूज़ वेबसाइट स्क्रॉल के मुताबिक़ असम में एनआरसी की जो प्रक्रिया अपनाई गई थी उसमें कट ऑफ तारीख़ 24 मार्च 1971 थी जबकि नए प्रस्तावित देशव्यापी एनआरसी में यह तारीख़ 19 जुलाई 1948 है.

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आख़िर बीजेपी जनसाधारण के ख़िलाफ़ क्यों जाना चाहती है?

पूर्वोत्तर में व्यापक विरोध प्रदर्शन के बावजूद नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर आगे बढ़ रही बीजेपी का विश्वास मुख्य रूप से इस पूरे क्षेत्र में पार्टी को मिली चुनावी सफलता से उपजा है.

जब केंद्र सरकार अपने पहले कार्यकाल के दौरान इस विधेयक को पास करवाने की कोशिश में लगी थी तब पूर्वोत्तर में कई समूहों ने बीजेपी का विरोध किया था.

लेकिन, जब 2019 के चुनाव परिणाम आए तो पूर्वोत्तर में बीजेपी और इसकी सहयोगी पार्टियों ने अच्छा प्रदर्शन किया.

प्रमुख अंग्रेज़ी अख़बार द हिंदू के मुताबिक़, समूचे पूर्वोत्तर की 25 संसदीय सीटों में से बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टियों को 18 पर जीत मिली.

व्यापक विरोध के बावजूद, बीजेपी के असम प्रदेश अध्यक्ष रंजीत दास ने असमिया प्रतिदिन अख़बार को बताया कि इस क्षेत्र के लोग नागरिकता के मुद्दे पर उनकी पार्टी का समर्थन कर रहे हैं.

दास ने कहा, "नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर असम के लोगों में डर कम हो गया है. बीते संसदीय और निकाय चुनाव में बीजेपी को वोट देकर असम के लोगों ने स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर कोई चिंता नहीं है."

इसके साथ ही बीजेपी को इस बात की भी उम्मीद है कि हिंदुओं और ग़ैर-मुसलमान प्रवासियों को आसानी से नागरिकता देने की वजह से उसे बहुत बड़ी संख्या में हिंदुओं का समर्थन मिलेगा.

न्यूज़ वेबसाइट 'द वायर' के मुताबिक़, नागरिकता संशोधन विधेयक के पारित हो जाने से 'बीजेपी को बहुसंख्यकों की पार्टी होने की छवि और मज़बूत करने में मदद मिलेगी.'

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