नागरिकता क़ानून की आंच में सुलगता अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय- ग्राउंड रिपोर्ट

  • 17 दिसंबर 2019

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में रविवार शाम को फैला अफ़रा-तफ़री का माहौल वहां स्थित जवाहरलाल नेहरु मेडिकल कॉलेज में मंगवालार सुबह तक पसरा रहा.

यहां के पलस्टिक सर्जरी वार्ड के तीन नंबर बिस्तर पर असहज कर देनी वाली नीरवता से लेटे मोहम्मद तारिक़ की पहचान दो दिन पहले तक विश्वविद्याल के एक प्रतिभाशाली छात्र के रूप में ही थी.

नेट और जेआरएफ़ की परीक्षा पास कर फ़ेलोशिप पर एएमयू की केमिस्ट्री विभाग से पीएचडी कर रहे तारिक़ की अब पहचान 'रविवार की पुलिस झड़प में अपना हाथ खो देने वाले छात्र' के तौर पर होने लगी है.

मित्रों, डॉक्टरों और अपने विभागीय शिक्षकों से घिरे तारिक़, सिर्फ़ उदास सूनी आँखों से वार्ड की छत को टकटकी बांधे देखते रहते हैं. बोलते कुछ नहीं.

उनकी पलकों के कोर गीले हैं और छाती पर ऑपरेशन के बाद बचा आधा हाथ पट्टियों में लिपटा पड़ा है. मैं उनसे कोई सवाल नहीं करती. पास बैठे उनके बड़े भाई बताते हैं कि घर में अभी सबसे तारिक़ के हाथ का हाल छिपा के रखा गया है.

"तारिक़ नहीं चाहता कि हम अम्मी को अभी कुछ भी बताएँ. वो बीमार रहती हैं और अगर उन्हें बेटे के हाथ के हुए इस हादसे के बारे में पता चला तो उन्हें गहरा सदम लगेगा."

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तारिक़ नहीं जानते कि अपनी माँ से यह ख़बर कब तक छिपा पाएँगे. पास ही खड़े तारिक़ के मित्र और उनके केमिस्ट्री प्रोफ़ेसर नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताते हैं, "रविवार की शाम जब एएमयू में पुलिस घुसी और हो-हल्ला मचा, तब तारिक़ मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी में थे. शोर सुनकर वो बाहर निकले और जान बचाने के लिए भागे. इतने में उनके हाथ में एक टीयर शेल लग गई."

पास ही खड़े डॉक्टर मोहम्मद काशिफ़ अस्पताल में सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर होने के साथ साथ रेजिडेंट डॉक्टर एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी भी हैं. तारिक़ की हालत के बारे में बताते हुए वह जोड़ते हैं, "मरीज़ अभी में गहरे ट्रॉमा में है. हाथ में इतनी गहरी चोट आई थी कि घाव फैलने से पहले ज़ख़्मी हिस्सा अलग करना पड़ा."

लाठी चार्ज की रात

नए नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ दिल्ली के जामिया मिल्लिया इस्लामिया में जारी विरोध प्रदर्शनों की चिनगारी तुरंत एएमयू तक पहुँच गई.

विश्वविद्यालय छात्र संगठन के पूर्व अध्यक्ष फ़ैज़ुल हसन बताते हैं, "रविवार शाम जैसे ही जामिया में लाठी चार्ज होने के बाद वहां हुए किसी छात्र की मौत की अपुष्ट ख़बर सोशल मीडिया पर वायरल होने लगी, वैसे ही एएमयू कैम्पस में भी हलचल शुरू हो गई. यहां लड़के परेशान थे. तुरंत जामिया के छात्रों के समर्थन में और नए नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ प्रोटेस्ट कॉल किया गया. विरोध प्रदर्शन करते हुए लड़के एएमयू के मुख्य द्वार तक आए."

इस बिंदु के बाद के घटनाक्रम को लेकर पुलिस और छात्रों एक अलग-अलग ब्योरे हैं.

Image caption मोरिसन हॉस्टल का कमरा नंबर 46

छात्रों का पक्ष

यूनिवर्सिटी के मुख्य गेट से कुछ ही दूरी पर मौजूद मॉरिसन हॉस्टल के कमरा नंबर 46 में रहने वाले ज़ामिन मेहंदी के भाई सैयद मोहम्मद मेहंदी रविवार शाम से ही ग़ायब हैं.

अपने टूटे फूटे और टीयर गैस से जल चुके कमरे को दिखाते हुए ज़ामिन कहते हैं, "मैं एएमयू में लंबे समय से पढ़ रहा हूँ. बाराबंकी का रहने वाला हूँ. फ़िलहाल बीए सेकंड इयर में हूँ. रविवार की रात जब पुलिस कैम्पस में घुसी तब यहां हम सब घबराए हुए थे. फिर वो लोग हमारे होस्टल में घुसे और सारी खिड़कियाँ तोड़ कर देखा कि किस कमरे में लड़के मौजूद हैं. हमारे कमरे में मेरे भाई और हमारे दो और साथी मौजूद थे. उन्होंने खिड़की तोड़ी और फिर कमरे के अंदर टीयर गैस शेल फेंक दी. इस वजह से सबको साँस लेने में तकलीफ़ होने लगी और घुटन की वजह से वो कमरे से बाहर निकले. बाहर निकलते ही पुलिस वालों ने उन्हें बहुत पीटा और फिर ले गए. मेरे भाई एमए सेकंड इयर के छात्र हैं. हम सालों से यहीं पढ़ते रहे हैं. लेकिन हमने ऐसा कभी नहीं देखा कि पुलिस कैम्पस में घुस कर होस्टल से लड़कों को निकाले और इस तरह पीट-पीट कर बंद कर दे."

छात्रों का कहना है कि मॉरिसन कोर्ट के साथ साथ आफ़ताब हॉल और नॉर्थ हॉल में भी पुलिस ने छात्रों पर कार्रवाई की.

Image caption मोरिसन हॉस्टल के छात्र

नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़

एएमयू से पीचडी कर रहे शोध छात्र इश्तेयाक अहमद रब्बानी कहते हैं कि छात्रों का शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन जायज़ था

उन्होंने कहा, "कोई हमें इस देश का नागरिक मानता ही नहीं है तो अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए लड़ने के सिवा हमारे पास क्या चारा बचा? आज सरकार कह रही है कि मुसलमानों को नए नागरिकता क़ानून से डरने की ज़रूरत नहीं. लेकिन हमें पता है कि कल को अगर हमारे नाम में एक अक्षर की भी ग़लती हो गयी तो हमें देश द्रोही घोषित करके स्टेटलेस कर दिया जाएगा. यानी बिना राज्य के नागरिक! तब हम क्या करेंगे!"

छात्रों का कहना है कि पुलिस ने मॉरिसन होस्टल के बूढ़े गार्ड को भी मारा और छात्रों की पिटाई करते वक़्त 'तुम मुल्लों को तो मारना ही चाहिए' जैसे धार्मिक उन्माद भड़काने वाली फब्तियाँ भी कसीं.

शिक्षकों में भी रोष

सोमवार को जारी नए मौखिक आदेश के अनुसार विश्विद्यालय प्रशासन ने छात्रों को होस्टल ख़ाली कर कैम्पस से अपने-अपने घर जाने का फ़रमान जारी कर दिया है.

इस पूरे घटनाक्रम को लेकर छात्रों के साथ-साथ शिक्षकों में भी रोष है. एएमयू टीचरस असोसिएशन के अध्यक्ष प्रोफ़ेसर हामिद अली ने कहा, "हमसे 1947 में कहा गया था कि चाहो तो वहां (पाकिस्तान) चले जाओ. तब भी हमने अपने देश हिंदुस्तान को चुना था. अब भी हमसे ही सर्टिफ़िकेट माँगे जाते हैं! अरे इस यूनिवर्सिटी के बच्चे बहुत ही सुकून पसंद हैं...शांतिप्रिय हैं. वो बेचारे शांतिपूर्ण ढंग से प्रोटेस्ट कर रहे थे इस बँटवारा करने वाले नए नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़. लेकिन पुलिस तो इस तरह से घुसी और ऐसे तहस नहस किया हमारे कैम्पस को जैसे यहां बच्चे नहीं, कोई अपराधी पढ़ते हों. बच्चों को बहुत मारा पीटा गया...कुछ तो अपने हाथ पैर भी गंवा बैठे. मैं तीन दशक से यहां हूँ लेकिन मैंने ऐसा मंज़र पहले कभी नहीं देखा."

अंगेज़ी विभाग में पढ़ाने वाले शिक्षक दानिश इक़बाल ने भी छात्रों की स्थिति के बारे में चिंता व्यक्त करते हुए कहा, "कुछ घायल छात्र विश्वविद्यालय के अस्पतालों में भर्ती हैं तो कुछ अस्पताल के बाहर. जब से हॉस्टल ख़ाली कर छात्रों को घर भेजने की बात सामने आई है तब से कैम्पस में काफ़ी अफ़रा तफ़री का माहौल है. क्योंकि यहां पढ़ने वाले कई छात्र उत्तर पूर्व, पश्चिम बंगाल और कश्मीर से हैं. ऐसे वक़्त में जब उत्तर-पूर्व और बंगाल की सारी ट्रेनें रद्द हो रही हैं और कश्मीर में भी तनाव के साथ-साथ बर्फ़ गिर रही है, तो बच्चे घर कैसे जाएँगे? हॉस्टल मेस बंद करने की बात भी कही गई है"

Image caption जवाहरलाल नेहरु मेडिकल कॉलेज के रेजिडेंट डॉक्टर

एएमयू के डॉक्टरों की आँखों देखी

तारिक़ के अलवा जवाहरलाल नेहरु मेडिकल कॉलेज में मेरी मुलाक़ात कम से कम ऐसे तीन और छात्रों से हुई जो गंभीर रूप से घायल थे.

किसी की खोपड़ी (सक्ल बोन) में टीयर गैस शेल के लगने से चोट आई थी, तो किसी के पेट में गहरी चोट.

झड़प की रात घायल विद्यार्थियों के देखभाल करने वाले डॉक्टरों में से एक डॉक्टर मोहम्मद काशिफ़ बताते हैं, "तक़रीबन 70 से 80 घायल विद्यार्थी उस रोज़ हमारे अस्पताल आए. एम्बुलेंस हमारे पास कम थीं लेकिन किसी तरह जब हमने और एम्बुलेंसों का इंतज़ाम किया तो पुलिस ने हमारी एम्बुलेंस को आगे जाने नहीं दिया. उल्टा एक एम्बुलेंस का ड्राइवर इस झड़प में घायल भी हो गया. यह जिनेवा कनवेंशन के नियमों के ख़िलाफ़ है. एम्बुलेंस को तो युद्ध के समय भी नहीं रोका जा सकता."

जवाहरलाल नेहरु मेडिकल कॉलेज में कार्यरत डॉक्टर शाहनवाज़ इक़बाल जोड़ते हैं, "छात्रों पर जिस तरह की इंजरी हम लोगों ने उस रात इमरजेंसी में मनैज की हैं. उससे साफ़ महसूस होता था कि यह हमले सिर्फ़ भीड़ को तितर बितर करने के लिए नहीं थे बल्कि छात्रों को एक सबक़ सिखाने की दृष्टि से किया गया हमला था. उस शाम पाँच-छह घंटे तक हमारे पास लगतार घायल छात्र आते रहे. साफ़ नज़र आ रहा था कि पुलिस ने अतिरेक में ताक़त का इस्तेमाल किया है".

डॉक्टर मोहम्मद हम्ज़ा मलिक छात्रों की चिंता से सहमति जताते हुए कहते हैं, "अगर सरकार इस नए नागरिकता क़ानून के ज़रिए घुसपैठियों को रोकना चाहती है तो ठीक है..लेकिन इस प्रक्रिया में धार्मिक आधार पर यह भेदभाव क्यों हो? हमें यह साफ़ तौर पर महसूस होता है कि यह क़ानून मुसलमानों से उनकी गरिमा छीनने और उन्हें दोयम दर्जे का नागरिक बानाने की साज़िश है."

पुलिस का पक्ष

अलीगढ़ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक आकाश कुलहारी ने छात्रों पर हुए ताक़त के अत्यधिक इस्तेमाल के सभी आरोपों को ख़ारिज करते हुए कहा, "उल्टा हमने बहुत संयम बरता. छात्र पुलिस पर पथराव कर रहे थे. हमें उन्हें रोकने के लिए फ़ोर्स का इस्तेमाल किया जिसमें हमारे 16 जवान घायल हुए. क्या उनके कोई मानव अधिकार नहीं हैं?"

मॉरिसन होस्टल में पढ़ते बच्चों के कमरों में टीयर गैस शेल छोड़ने के आरोप पर उन्होंने बीबीसी से कहा, 'हम कोई शार्प शूटर हैं नहीं. जो भी हुआ क़ानून व्यवस्था नियंत्रण में लाने की कोशिश में हमें हरसंभव प्रयास करने पड़ते हैं."

प्रशासन का पक्ष

एएमयू के प्रॉक्टर अफ़ीफुल्लाह ख़ान ने बीबीसी से बातचीत में पुलिस कार्रवाई को सही ठहराते हुए कहा कि कुछ 'अराजक तत्वों' के प्रोटेस्ट मार्च में शामिल होने की वजह से पुलिस फ़ोर्स का इस्तेमाल ज़रूरी हो गया था. इस झड़प में अपना हाथ खोने वाले छात्र का हवाला देने पर भी उन्होंने कहा, "पुलिस ने नरमी बरती..और संयम रखा. वरना अगर कुछ अराजक तत्व प्रोटेस्ट की भीड़ में शामिल होकर यूनिवर्सिटी में ग़दर मचाते तो क़ानून व्यवथा हम कैसे संभालते?"

छात्रों को अचानक हॉस्टल ख़ाली करने के फ़रमान पर सफ़ाई जोड़ते हुए उन्होंने कहा, "हम छात्रों को, ख़ास तौर से महिला छात्रों को सही सलामत उनके घर पहुँचने के पुख़्ता इंतज़ाम कर रहे हैं. हम इस मामले को लेकर सजग और संवेदनशील हैं."

हालाँकि अस्पताल में घायल पड़े और यूनिवर्सिटी की सड़कों पर अपना सामान उठाए परेशान फिरते छात्रों को देखकर प्रशासन के 'संवेदनशील' होने का दावा खोखला ही नज़र आता है.

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