CAA: क्या असम के उबाल से निकलेगी नई सियासी पार्टी?

  • 22 दिसंबर 2019
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पहले नागरिकता संशोधन विधेयक (CAB) और अब नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ असम में चल रहा आंदोलन किस परिणाम पर पहुंचेगा? क्या यहां के लोग नए राजनीतिक विकल्प की तलाश में हैं? क्या इस पर गंभीरता से विचार हो रहा है कि असम में एक नए राजनीतिक दल का गठन किया जाए? या फिर पूर्वोत्तर भारत का ये राज्य आज फिर से एक ऐसे मुहाने पर खड़ा है, जहां से कभी असम गण परिषद (एजीपी) का गठन हुआ था? उसके बाद एजीपी ने यहां सरकार भी बनाई थी.

अगर आपके मन में भी ऐसे सवाल हैं, तो ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (आसू) के महासचिव लुरिन ज्योति गोगोई इसका जवाब हां में देते हैं.

गोगोई ने बीबीसी को बताया कि लोगों की राय है यहां एक नई पार्टी बनाई जाए लेकिन अभी यह शुरुआती (प्रीलिमनरी) स्टेज में ही है.

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Image caption ज़ुबीन गर्ग

गोगोई कहते हैं, "कैब के ख़िलाफ़ जारी आंदोलन के दौरान से ही इस पर सलाह-मशविरा और विचार चल रहा है. क्योंकि, सबको एक वैकल्पिक राजनीतिक मंच चाहिए. अभी तक सबने विश्वासघात (बीट्रे) किया है. पहले तो एजीपी बना आसू से ही, उसने भी बीट्रे किया."

"पिछले चुनाव में बीजेपी ने जो वादा किया था, उसे उन्होंने नहीं निभाया. यू टर्न ले लिया. कांग्रेस तो पहले से ही विदेशी लोगों को प्रोटेक्ट करने की राजनीति करती है. कम्यूनल वोट बैंक एजेंडा पर वह पुराने दिनों से है. नागरिकता संशोधन क़ानून (क़ा) के साथ ही अब बीजेपी भी सांप्रदायिक वोट बैंक के एजेंडा पर है."

उन्होंने यह भी कहा, "अब जनता के उत्साह और हमारे इश्यू को राजनीतिक तौर पर आगे बढ़ाने के लिए एक राजनीतिक मंच चाहिए. इसलिए हम लोग समाज के हर वर्ग से बातचीत कर रहे हैं और इस पर विचार कर रहे हैं. यह पक्का है. हां, आसू खुद ग़ैर राजनीतिक ही रहेगा. हम लोग असम के सभी लोगों को साथ लेकर निकट भविष्य में एक राजनीतिक दल बनाएंगे. हम लोग क्वालिटी पालिटिक्स की बात करेंगे."

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क्या विधानसभा चुनाव से पहले बन जाएगी पार्टी?

गोगोई कहते हैं, "अभी इस पर कुछ नहीं कह सकते. इसलके लिए कोई टाइमफ्रेम नहीं है. यह इमोशन का मामला नहीं है. हमें संस्थागत तरीके से चीज़ें आगे बढ़ानी है. इसमें समय लग सकता है."

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कैसे हुई शुरुआत?

नया पार्टी बनाने के विचार की शुरुआत तब हुई जब असम के मशहूर गायक ज़ुबीन गर्ग ने गुवाहाटी के चांदमारी ग्राउंड में चल रहे विरोध प्रदर्शन के दौरान मंच से ऐसा कहा.

ज़ुबीन गर्ग ने कहा, "हमें मेनस्ट्रीम की राजनीतिक पार्टियों से लाभ नहीं होने वाला. हम अपनी पार्टी बनाएंगे और असम को अपनी तरह चलाएंगे. इसमें असमिया स्वाभिमान और हमारी ज़रूरतों की बात होगी. हमें और धोखा नहीं खाना है. हम लोग अपने अधिकार, संस्कृति, भाषा और स्वाभिमान की लड़ाई लड़ रहे हैं और हमारा राज्य ऐसे ही चलेगा."

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कितनी गंभीरता है इस पहल में?

असम के वरिष्ठ पत्रकार समुद्रगुप्त कश्यप का मानना है कि यह सब अचानक नहीं हो सकेगा. वो कहते हैं, "संभव है कि आसू का मौजूदा नेतृत्व असम गण परिषद (एजीपी) को ही अपने कब्ज़े में लेकर नई राजनीतिक पहल करे. और उन नेताओं को पार्टी से निकाल दें, जो नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के समर्थन में बोल रहे हैं."

कश्यप ने असम आंदोलन के दौरान रिपोर्टिंग की थी. ये वो वक्त था जब भाषाई पहचान को लेकर आंदोलन चला था और फिर एजीपी बनी थी. उस दौरान साल 1983 में संवैधानिक संकट की स्थिति थी. तब चुनाव का सामूहिक बायकॉट हुआ था. कांग्रेस और सीपीआई को छोड़कर किसी भी पार्टी ने कैंडिडेट तक नहीं उतारे. एक-दो जगहों पर छोड़कर कहीं किसी ने वोट नहीं डाले.

समुद्रगुप्त कश्यप ने बीबीसी से कहा, "असम में आंदोलनों के लंबे और शांतिपूर्ण तरीके से चलने का इतिहास रहा है. यह शायद अकेला वैसा राज्य है जहां, गीत गाकर, पेंटिंग बनाकर और चुप रहकर भी विरोध किया जाता है. यहां के लोग राजनीतिक तौर पर संवेदनशील हैं. अगर मौजूदा आंदोलन लंबा चला, तो इससे एक नए राजनीतिक विकल्प की बात आगे बढ़ सकती है."

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तो कितना लंबा चलेगा आंदोलन?

असम में हिंदी अख़बार दैनिक पूर्वोदय के संपादक रविशंकर रवि कहते हैं कि इस आंदोलन के लंबा चलने की पूरी गुंजाइश है. लेकिन, वो मानते हैं कि आंदोलन के दौरान राजनीतिक पार्टी नहीं बनाई जा सकेगी. यह आंदोलन सिर्फ उसके लिए ज़रूरी माहौल और ज़मीन तैयार करेगा.

रविशंकर रवि कहते हैं, "राजनीतिक विकल्प पर लोगों ने सोचना शुरू कर दिया है. एजीपी के अभी के स्टैंड से लोगों में गुस्सा है, क्षोभ है. कांग्रेस भी सत्ता में रह चुकी है. पिछले चुनाव में लोगों ने बड़े विश्वास से बीजेपी को वोट दिया था लेकिन उन्हें धोखा मिला, ऐसा अब लोग मानने लगे हैं. अब लोगों में इन मुद्दों को लेकर चिंता तो है. यह राजनीतिक दल के तौर पर सामने आ जाए, तो किसी को आश्चर्य नहीं होगा."

बकौल रवि, "ज़ुबीन गर्ग की बातों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए. वे जोश में बहुत सारी बातें कहते हैं. लेकिन, इस बार उन्होंने कुछ सोचा होगा, तभी राजनीतिक पार्टी की बात कही है. यह संभव भी है. बशर्ते आसू इसको लेकर गंभीर बना रहे और उसे लोगों का साथ मिले."

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क्या यह नई पार्टी बनाने का वक्त है?

गुवाहाटी यूनिवर्सिटी में एमफ़िल की स्कॉलर प्रतिष्ठा पाराशर कहती हैं कि अभी यह वक्त सही नहीं है. वो कहती हैं, "अभी हमें नागरिकता क़ानून में संशोधन का विरोध करना है. इसके बाद ही पार्टी पर सोचना चाहिए."

प्रतिष्ठा पाराशर ने कहा, "राजनीतिक दलों पर हमारा विश्वास नहीं रहा. असम के लोगों को सभी ने धोखा दिया है. अभी हम लोग नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में आंदोलन कर रहे हैं. इसलिए यह प्लेटफॉर्म राजनीतिक दल के गठन के लिए उचित नहीं होगा. क्योंकि, आंदोलनों के बाद यहां पहले भी राजनीतिक पार्टियां बनी हैं."

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वो कहती हैं, "मूवमेंट होता है तो कोई नेता बन कर उभर जाता है. बाद में वह भी अपना रंग दिखाता है. इसलिए पहले हमें केंद्र सरकार से यह क़ानून वापस कराना है."

"इसके बाद निश्चित तौर पर एक नई पार्टी बने ताकि हम असमिया लोग अपनी बातें आगे रख सकें."

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इसी विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहे सुरती सोरतिया कहते हैं कि अभी की पार्टियों पर उन्हें विश्वास नहीं रहा.

वो कहते हैं, "बीजेपी ने चुनाव से पहले कहा था कि वह विदेशी नागरिकों को असम से निकालेगी. देखिए,अब वे क़ानून लाकर और बाहरी लोगों को यहां लाने जा रही है. इसलिए नई पार्टी बननी चाहिए."

"हमें नया चेहरा चाहिए. अगर पुराने लोग ही नई पार्टी बनाएंगे, तो उसमें नया क्या होगा? हम लोग आसू और प्रफुल कुमार महंत को देख चुके हैं. अब हमें बिल्कुल फ्रेश नेतृत्व की ज़रूरत है."

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आसू का अभी का मुद्दा क्या है?

आसू के प्रमुख सलाहकार समुज्जल भट्टाचार्य ने बीबीसी से कहा कि अभी हमारा सिर्फ़ एक टारगेट है, वो है इस क़ानून को वापिस कराना.

वो कहते हैं, " 'NO CAA'. हमें 'CAA' नहीं चाहिए."

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Image caption समुज्जल भट्टाचार्य

वो कहते हैं, "हमें असम समझौते के तहत हमारी हिस्सेदारी और वजूद चाहिए. इसकी लड़ाई हम लड़ते रहेंगे."

"बची बात राजनीतिक दल की, तो लोगों ने इसकी पहल की है. वे इस पर विचार कर रहे हैं."

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