धारा-144: कैसे होता है ‘अंग्रेज़ों के’ इस क़ानून का इस्तेमाल

  • टीम बीबीसी हिन्दी
  • नई दिल्ली
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भारत के कई राज्यों में नए नागरिकता क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ लोग सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं और इन प्रदर्शनों को रोकने के लिए राज्य सरकारें औपनिवेशिक युग के एक कठोर नियम का उपयोग कर रही हैं जिसका नाम है 'धारा 144 सीआरपीसी'.

शुक्रवार को देश की राजधानी दिल्ली के कुछ इलाक़ों में इस निषेधाज्ञा को लागू किया गया था जिसे तोड़ने पर दिल्ली पुलिस ने कई लोगों को हिरासत में ले लिया.

वहीं उत्तर प्रदेश के लगभग सभी ज़िलों और कर्नाटक के कुछ ज़िलों में भी धारा 144 की अवहेलना करने पर हज़ारों प्रदर्शनकारियों को पुलिस ने हिरासत में लिया.

'कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसीजर' यानी सीआरपीसी के धारा 144 के तहत ज़िले के बड़े अधिकारियों जैसे डीएम, एसडीएम या एग्ज़िक्यूटिव मजिस्ट्रेट को यह अधिकार मिलता है कि वो क़ानून व्यवस्था बिगड़ने पर राज्य सरकार की ओर से एक आदेश जारी कर अपने क्षेत्र में इस निषेधाज्ञा को लागू कर सकते हैं.

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इसके अनुसार चार या चार से ज़्यादा लोगों को एक स्थान पर एकत्र होने की इजाज़त नहीं होती. यानी कि आप एक क्षेत्र विशेष में प्रदर्शन नहीं कर सकते.

अधिकारी धारा 144 का प्रयोग क़ानूनों के उल्लंघन की आशंका होने पर भी कर सकते हैं. यानी प्रदर्शनस्थल पर भीड़ के जमा होने से पहले भी वहाँ धारा 144 का प्रयोग किया जा सकता है.

यह क़ानून राज्य सरकारों और स्थानीय पुलिस को कई विवेकाधीन अधिकार भी देता है.

जैसे लोगों की सुरक्षा, क़ानून-व्यवस्था, संभावित ख़तरों का हवाला देकर इस निषेधाज्ञा का उपयोग किसी एक व्यक्ति को प्रतिबंधित करने के लिए भी किया जा सकता है. और निषेधाज्ञा की अवहेलना करना क़ानूनन जुर्म है.

कई जगहों पर धारा 144 के तहत ही फ़ोन नेटवर्क, केबल सर्विस और इंटरनेट भी बंद करा दिए जाते हैं. यूपी और पश्चिम बंगाल में हाल ही में यह देखने को मिला. जबकि इसके लिए क़ानून ही अलग से बनाए गए हैं.

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नागरिक अधिकार और क़ानून व्यवस्था

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इन्हीं वजहों से कई लोगों का मानना है कि विरोध प्रदर्शनों को विफल करने के लिए इस क़ानून का दुरुपयोग किया जाता रहा है.

क़ानून विशेषज्ञ गौतम भाटिया ये सवाल करते हैं कि जब देश में लोगों को संवैधानिक तौर पर अभिव्यक्ति की आज़ादी प्राप्त है और अपनी माँगों के लिए एकत्र होने का अधिकार भी है, तो क्या धारा 144 जैसे क़ानून उन अधिकारों के महत्व को कम नहीं कर रहे?

भारत का संविधान सार्वजनिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए नागरिकों को मिले इन अधिकारों पर उचित प्रतिबंध लगाने की अनुमति देता है.

पर ये उचित प्रतिबंध क्या हैं? इस पर न्यायालयों ने लंबी बहसों के बाद हमेशा यही रुख बनाए रखा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सार्वजनिक अनुशासन के नाम पर केवल तभी प्रतिबंधित किया जा सकता है, जब हिंसा होने की बहुत अधिक संभावना हो या अव्यवस्था फैलने का डर हो.

जानकारों के अनुसार ब्रितानी शासन काल में (वर्ष 1939) इस क़ानून को पहली बार चुनौती दी गई थी. बाद में 1961, 1967 और 1970 में इस क़ानून को कोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है. लेकिन हमेशा ही इस तर्क को आगे रखा गया कि जिस समाज में पब्लिक ऑर्डर नहीं होगा, वहाँ लोकतंत्र की रखवाली कैसे की जाएगी.

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कैसे होना चाहिए इसका इस्तेमाल?

भाटिया कहते हैं कि धारा 144 लागू करने से पहले प्रशासन को अपने आदेश में बहुत ही स्पष्ट शब्दों में यह बताना होता है कि सार्वजनिक शांति और अनुशासन को क्या ख़तरा था? जिसकी वजह से निषेधाज्ञा लागू की गई. तभी वो लोगों पर प्रतिबंध लगा सकते हैं.

वो कहते हैं, "अगर प्रशासन को पक्की सूचना हो कि भीड़ जमा होने के बाद वहाँ भड़काऊ भाषण होंगे या लोगों को आगजनी के लिए भड़काया जाएगा, तो वो सुरक्षा की दृष्टि से लोगों के जमा होने पर रोक लगा सकते हैं. लेकिन प्रशासन को ये लगा कि कुछ हो सकता है और वो पहले ही लोगों के अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने लगे, तो अधिकारियों को दिए गए इस अधिकार के पीछे का पूरा उद्देश्य ही ख़त्म हो जाता है."

"जैसे यूपी के उन ज़िलों में भी धारा-144 लागू कर दी गई जहाँ कोई प्रदर्शन शुरु भी नहीं हुआ था."

भाटिया कहते हैं, "उदाहरण के लिए, गुरुवार को बंगलुरु में हुई घटना को लें तो वहाँ लोगों द्वारा हिंसक विरोध प्रदर्शन करने का कोई हालिया रिकॉर्ड नहीं है. ऐसी स्थिति में धारा 144 को क्यों लागू किया गया और क़ानून लागू करने की आवश्यक शर्तों क्यों पूरी नहीं की गईं, इस पर बात हो सकती है. ये सत्ता का दुरुपयोग है. मौलिक अधिकारों का अनुचित उल्लंघन है. इसे अदालतों में चुनौती भी दी जा सकती है."

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चीज़ें कैसे बदली हैं?

संघटित हिंसा से कैसे निपटा जाए? इस विषय पर तक्षशिला इंस्टीट्यूशन और विधी सेंटर फ़ॉर लीगल पॉलिसी के शोधकर्ताओं ने एक रिसर्च पेपर लिखा है.

शोधकर्ताओं के अनुसार, धारा-144 के साथ बड़ी समस्या ये है कि इसका प्रयोग मुख्य रूप से आपात स्थिति के दौरान ही होना था, लेकिन अब ऐसा नहीं रहा. असल स्थिति ये हो गई है कि इस निषेधाज्ञा को अत्यधिक व्यापक और भेदभावपूर्ण तरीक़े से लागू किया जा रहा है.

पिछले सरकारों ने भी विरोध प्रदर्शनों को विफल करने के लिए इस क़ानून का जमकर इस्तेमाल किया है.

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के अविनाश कुमार कहते हैं, "शांतिपूर्ण तरीक़े से होने वाले विरोध प्रदर्शनों को अनुमति ना देना 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' के अधिकार का तिरस्कार है. इससे समाज पर बुरा प्रभाव पड़ता है. लोगों में ये संदेश जाता है कि शांति से उनकी बात सुनने को कोई तैयार नहीं है. इसलिए भारत की सरकारों (चाहे केंद्र या राज्य) को चाहिए कि वो अपने यहाँ होने वाले प्रदर्शनों को ग़ैर-क़ानूनी घोषित करना और आपराधिक बनाना बंद करें."

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