झारखंड चुनाव नतीजे: शिबू सोरेन की विरासत के वारिस हैं हेमंत सोरेन

  • रवि प्रकाश
  • राँची से, बीबीसी हिन्दी के लिए
हेमंत सोरेन

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44 साल के हेमंत सोरेन को राजनीति विरासत में मिली है. शिबू सोरेन के दूसरे बेटे हेमंत सोरेन ने अपने बड़े भाई दुर्गा सोरेन की असामयिक मौत के बाद सियासत में क़दम रखा. वे राज्यसभा के सदस्य रहे. विधायक बने और फिर साल 2013 में वे झारखंड के पहली बार मुख्यमंत्री बने.

तब उनकी सरकार को कांग्रेस और आरजेडी ने समर्थन दिया था. झारखंड विधानसभा के मौजूदा चुनाव में भी उनकी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा का कांग्रेस और आरजेडी के साथ महागठबंधन है.

वे अपनी पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष हैं. महगठबंधन ने उन्हें अपना सीएम कैंडिडेट घोषित कर चुनाव लड़ा है. वे इस चुनाव में संथाल परगना की दुमका और बरहेट विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं.

झारखंड के पांचवें मुख्यमंत्री बनने से पहले वे साल 2010 में बनी अर्जुन मुंडा सरकार में उपमुख्यमंत्री रहे थे. तब भाजपा और जेएमएम ने आधी-आधी अवधि तक मुख्यमंत्री रहने के फ़ॉर्मूले के तहत सरकार बनाई थी.

सरकार

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बात बीच में ही बिगड़ गई और यह साझा सरकार दो साल चार महीने सात दिन के बाद ही गिर गई. तब राष्ट्रपति शासन लगाया गया. इसके बाद कांग्रेस और राजद ने समर्थन देकर जुलाई-2013 में हेमंत सोरन के नेतृत्व में सरकार बनवा दी.

यह सरकार एक साल पांच महीने पंद्रह दिनों तक चली. फिर विधानसभा के चुनाव हुए. साल 2014 में हुए चुनाव में जेएमएम ने हेमंत सोरेन के नेतृत्व में चुनाव लड़ा और उसे 19 सीटें मिलीं. तब सबसे पड़ी पार्टी के तौर पर उभरी भारतीय जनता पार्टी ने सरकार बनाई और रघुबर दास मुख्यमंत्री बने.

तब 19 विधायकों वाली पार्टी के नेता होने के करण हेमंत सोरेन को झारखंड विधानसभा में प्रतिपक्ष का नेता बनने का मौक़ा मिला. विपक्ष के नेता रहते हुए उन्होंने तब सत्ता पर काबिज भाजपा की रघुबर दास सरकार के ख़िलाफ़ कई मोर्चों पर लड़ाई लड़ी.

उन्हें झारखंड मुक्ति मोर्चा को नए ज़माने की पार्टी बनाने का श्रेय जाता है. हेमंत सोरेन ने तकनीकों का सहारा लेकर पार्टी को सोशल मीडिया पर सक्रिय कराया और जेएमएम की उस छवि को तोड़ने की कोशिश की, जिसके बारे में आम धारणा थी कि पार्टी मीडिया से दूरी बनाकर रखती है.

इस चुनाव में उन्होंने मीडिया से खूब बातचीत की और धुंआधार सभाएं कर अपनी पार्टी को मज़बूत स्थिति मे लाकर खड़ा कर दिया. मौजूदा विधानसभा में वे साहिबगंज ज़िले की बरहेट सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं. साल 2014 का चुनाव उन्होंने दुमका से भी लड़ा था लेकिन उन्हें वहां हार मिली थी.

लड़ाई

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वे अपनी पार्टी की तरफ़ से साल 2009-2010 में राज्यसभा के सदस्य भी रह चुके हैं. अपनी पत्नी कल्पना के साथ वे रांची के कांके रोड स्थित सरकारी आवास में रहते हैं. उनके दो बच्चे हैं. उनका जन्म रामगढ़ ज़िले के नेमरा में हुआ था.

उन्होंने पटना में अपनी शुरुआती पढ़ाई की. बाद में उन्होंने बीआइटी मेसरा में भी एडमिशन लिया था. तब उन्हें मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करनी थी लेकिन उन्होंने यह कोर्स पूरा नहीं किया.

मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने सरकारी नौकरियों में महिलाओं को 50 फ़ीसदी आरक्षण देने जैसे निर्णय लिए. इस चुनाव में उन्होंने पिछड़ी जातियों के लिए 27 फ़ीसदी आरक्षण का वादा किया है. वे आदिवासियों के ज़मीन संबंधी मुद्दों पर मुखर रहे हैं.

सीएनटी और एसपीटी एक्ट में संशोधन की रघुबर दास सरकार के निर्णय के ख़िलाफ़ लड़ाई के वे अगुवा रहे. उन्होंने भूमि अधिग्रहण क़ानून में संशोधन की रघुबर दास सरकार की कोशिशों का भी विरोध किया. उनकी पार्टी जल-जंगल-ज़मीन के मुद्दे के साथ चुनाव लड़ रही है.

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