नरेंद्र मोदी और अमित शाह की नाकामी है झारखंड समेत पांच राज्यों में बीजेपी की हार?

  • टीम बीबीसी हिन्दी
  • दिल्ली
नरेंद्र मोदी

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बीते साल भर में बीजेपी को पांच राज्यों के चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा है.

हालांकि, इन राज्यों में बीजेपी की सीटों और वोट प्रतिशत में ख़ासी कमी नहीं आई हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि अमित शाह और नरेंद्र मोदी के करिश्माई नेतृत्व में बीजेपी इन पांच राज्यों में सरकार बनाने में सफल क्यों नहीं हुई?

राष्ट्रीय मुद्दों में छिपी स्थानीय मांगे?

झारखंड चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी नेताओं ने खुलकर अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का ज़िक्र किया.

भव्य राम मंदिर बनाने की बात कहकर झारखंड के मतदाताओं का मन मोहने की कोशिश की गई.

वहीं, झारखंड मुक्ति मोर्चा और कांग्रेस स्थानीय मुद्दों की बात करती दिख रही थी.

लेकिन चुनाव नतीजे सामने आने के बाद बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा.

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ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बीजेपी की ओर से स्थानीय मुद्दों को तरजीह न दिया जाना इस हार के लिए ज़िम्मेदार है?

बीजेपी की राजनीति को क़रीब से समझने वाली वरिष्ठ पत्रकार स्मिता गुप्ता इस वजह को बीजेपी की हार के लिए ज़िम्मेदार मानती हैं.

स्मिता गुप्ता बताती हैं, "बीजेपी के नेताओं ने चुनाव प्रचार के दौरान आर्थिक मंदी जैसे मुद्दों पर जनता की समस्याओं को समझने की जगह राम मंदिर जैसे मुद्दों पर लोगों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की. कहा गया कि जल्द ही भव्य राम मंदिर बनाया जाएगा. अब सोचिए कि जिस व्यक्ति का कारोबार नोटबंदी और जीएसटी के चलते बंद होने की कगार पर हो, वह भव्य राम मंदिर के मुद्दे पर कैसे मतदान करेगा?"

"इसके साथ ही झारखंड में कल्याणकारी योजनाएं भी ग़रीबों के ख़िलाफ़ काम करती हुई दिख रही हैं. लेकिन प्रदेश सरकार की ओर से ऐसे मुद्दों को पूरी तवज्जो नहीं दी गई."

आपसी कलह

झारखंड से लेकर महाराष्ट्र, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव में बीजेपी के प्रदेश स्तर के संगठन पर सवाल उठते रहे हैं.

अलग-अलग मौक़ों पर बीजेपी नेताओं की ओर से बाग़ी तेवर भी दिखते रहे हैं.

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नरेंद्र मोदी के साथ रघुबर दास

वरिष्ठ पत्रकार शेखर अय्यर इन पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में बीजेपी की हार के लिए आपसी कलह को काफ़ी हद तक ज़िम्मेदार मानते हैं.

अय्यर कहते हैं, "राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व की वजह से कितने भी वोट हासिल कर ले. लेकिन स्थानीय स्तर पर पार्टी का संगठन कमज़ोर होता हुआ दिख रहा है. बीते कुछ समय में हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी में प्रदेश स्तर पर आपसी कलह खुलकर सामने आई."

"झारखंड की बात करें तो रघुबर दास के ख़िलाफ़ बीजेपी के नेता भी काम कर रहे थे. इस चुनाव में बीजेपी के ही बाग़ी सरयू राय ने पार्टी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ा. इससे लगता है कि राज्य के स्तर पर बीजेपी आपसी कलह का शिकार हो रही है और केंद्रीय नेतृत्व इसका निदान भी नहीं कर पा रहा है."

अय्यर मानते हैं, "विधानसभा चुनावों में काफ़ी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि राज्य स्तर पर पार्टी के शीर्ष नेता की छवि कैसी है. झारखंड बीजेपी में कई नेता रघुबर दास के ख़िलाफ़ थे. महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस और राजस्थान में वसुंधरा राजे को लेकर भी यही स्थिति थी. पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अगर अपने साथ काम करने वालों को साथ लेकर चलने में असमर्थ रहेगा तो कैसी स्थिति की कल्पना की जा सकती है?"

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कहाँ गया अमित शाह का जादू

बीते कई सालों से विधानसभा और लोकसभा में बीजेपी की जीत के लिए अमित शाह के कुशल नेतृत्व को श्रेय दिया जाता रहा है.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बीते पांच विधानसभा चुनावों में अमित शाह का नेतृत्व नाकाम रहा है.

शेखर अय्यर मानते हैं कि इन राज्यों में हार के लिए निश्चित तौर पर केंद्रीय नेतृत्व ज़िम्मेदार है.

वे कहते हैं, "बीजेपी केंद्रीय नेतृत्व की ओर से राज्यों में मुख्यमंत्री का पद संभाल रहे व्यक्तियों की सार्वजनिक छवि का सही आकलन नहीं किया जाना इन राज्यों में बीजेपी की हार की एक वजह है. उदाहरण के लिए, राजस्थान में बीजेपी के हल्कों में वसुंधरा के लिए पर्याप्त समर्थन नहीं था. आम जनता में भी एक तरह की नकारत्मकता थी. लेकिन इसके बावजूद केंद्रीय नेतृत्व ने कोई क़दम नहीं उठाया."

"केंद्रीय नेतृत्व के सामने एक चुनौती ये भी है कि लोकसभा चुनावों में तो बीजेपी नरेंद्र मोदी की भाषण शैली, उनके करिश्माई नेतृत्व की बदौलत ज़्यादा से ज़्यादा सीटें हासिल करने में सक्षम हो जाती है.

"लोकसभा चुनाव में आंतरिक सुरक्षा जैसे मुद्दे लोगों के लिए अहम होते हैं. लेकिन विधानसभा चुनाव में मुद्दे बदल जाते हैं. और बीजेपी स्थानीय मुद्दों और स्थानीय सरकार और मुख्यमंत्री के काम के आधार पर कमज़ोर हो जाती है."

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बीजेपी का घमंड

वहीं, स्मिता गुप्ता मानती हैं कि प्रदेश स्तर पर बीजेपी के नेताओं की शैली में एक तरह का घमंड देखा जाने लगा है.

वे कहती हैं, "जब सवाल स्थानीय राजनीति का आता है तो बीजेपी के स्थानीय नेता भी घमंड के भाव के साथ पेश आते हैं. वे आपसी असहमतियों को दूर करने की कोशिश नहीं करते हैं. वहीं, दूसरी ओर विपक्षी दल हर तरह से सामंजस्य बनाने की कोशिश करते हुए नज़र आते हैं."

"झारखंड में भी कांग्रेस ने झारखंड मुक्ति मोर्चा को ज़्यादा सीटें दीं और आपसी सहमति बनाने में सफलता हासिल की. वहीं, बीजेपी की ओर से अपने ही कैंप में उपजी चिंताओं और आक्रोश का निराकरण करने की पुरजोर कोशिशें नहीं की गईं."

आने वाले महीनों में दिल्ली समेत बिहार और पश्चिम बंगाल में चुनाव होने वाले हैं. ऐसे में ये तो वक़्त ही बताएगा कि बीजेपी इन राज्यों में हार की ग़लतियों से सबक लेती है या नहीं.

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