झारखंड विधानसभा चुनाव: अगर बीजेपी का मुख्यमंत्री कोई आदिवासी होता, तो...

  • 24 दिसंबर 2019
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जब बीजेपी 2014 में झारखंड में जीती थी, तो उम्मीद लगाई जा रही थी कि बीजेपी किसी आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाएगी. लेकिन सबको चौंकाते हुए बीजेपी ने एक गैर-आदिवासी यानी रघुबर दास को मुख्यमंत्री बना दिया. वहां ये पहली बार था जब किसी गैर-आदिवासी को मुख्यमंत्री बनाया गया था.

2019 की तरह ही 2014 में भी झारखंड से पहले महाराष्ट्र और हरियाणा के विधान सभा चुनाव हुए थे. वहां भी बीजेपी ने ऐसा ही किया. हरियाणा में जीतने के बाद एक गैर-जाट को मुख्यमंत्री बनाया और महाराष्ट्र में एक गैर-मराठा को.

इसके पांच साल बाद यानी अब, जब दोबारा इन राज्यों में चुनाव हुए तो बीजेपी के हाथ से इन तीनों ही राज्यों की सत्ता फिसलती हुई नज़र आई. हरियाणा में तो बीजेपी ने जैसे-तैसे सरकार बना ली, लेकिन महाराष्ट्र और झारखंड में कुर्सी नहीं बचा पाई.

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अब कहा जा रहा है कि मोदी-शाह की मुख्यमंत्री चुनने की ये रणनीति फ़ेल होती दिख रही है. क्या सच में ऐसी कोई रणनीति थी? अगर थी तो ऐसी रणनीति क्यों बनाई गई?

वरिष्ठ पत्रकार शेखर अय्यर कहते हैं कि इन राज्यों में बीजेपी ने एक नया प्रयोग किया. महाराष्ट्र में एक गैर-मराठा को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाकर, एक नया समीकरण बनाने की कोशिश की गई.

लेकिन, "ये समीकरण विफल हो गया, क्योंकि जहां भी रसूखदार जातियां हैं, वो इस नए प्रयोग को स्वीकार करने को तैयार नहीं है. झारखंड में बीजेपी ने पहली बार किसी गैर-आदिवासी को मुख्यमंत्री बना दिया. जहां भी इन्होंने नए समीकरण तैयार करने की कोशिश की, वहां इन्हें सफलता हाथ नहीं लगी."

वहीं, हरियाणा की राजनीति पर नज़र रखने वाले हितेंदर राव कहते हैं कि 2014 में बीजेपी ने हरियाणा विधानसभा में चुनाव जीतने के बाद मनोहर लाल खट्टर को मुख्यमंत्री बनाया था, चुनाव से पहले वो मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं थे.

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'राजनीति ध्रुवीकरण की कोशिश'

लेकिन इस बार के राज्य चुनाव में बीजेपी ने मनोहर लाल खट्टर को ही मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर शुरू से पेश किया. इसी तरह महाराष्ट्र में भी पिछले चुनाव से पहले देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री चेहरे के तौर पर लोगों के सामने नहीं रखा गया था.

वरिष्ठ पत्रकार हितेंदर राव के मुताबिक बीजेपी ने हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर को मुख्यमंत्री बनाकर राजनीतिक ध्रुवीकरण की कोशिश की थी.

उनके मुताबिक बीजेपी के इस राजनीतिक ध्रुवीकरण का नतीजा बाद में कई जगह नगर निगम चुनावों में देखने को मिला.

वो बताते हैं, "हरियाणा में हमेशा से जाट बनाम गैर-जाट का मसला रहा है. हरियाणा में जाट लगभग 25 प्रतिशत हैं. यहां ये सबसे बड़ी डॉमिनेंट कम्युनिटी है. वहीं गैर-जाट में अनुसूचित जाति, पिछड़ी जाति, ब्राह्मण, अहीर, राजपूत, वैश्य समुदाय, अग्रवाल समुदाय के लोग आ जाते हैं. इन समुदायों को ये लग रहा था कि 1996 से 2014 तक लगातार कोई ना कोई जाट नेतृत्व रहा है."

"इन समुदायों को लग रहा था कि हरियाणा में जाटों का राज कायम हो चुका है. लेकिन जब इन्होंने एक गैर-जाट को मुख्यमंत्री बना दिया तो जो गैर-जाट एक नेता ढूंढ़ रहे थे, उन्हें लगा कि बीजेपी ऐसी पार्टी है जो गैर-जाट नेतृत्व का समर्थन करती है, उसे बढ़ावा देती है. इस वजह से कई लोग बीजेपी और मनोहर लाल खट्टर के साथ जुड़ गए."

"लेकिन ये बात जाटों को रास नहीं आई. उनकी आबादी हरियाणा में लगभग 25 प्रतिशत है और राज्य का काफ़ी पावरफुल और प्रभावशाली समुदाय है. वो बीजेपी से धीरे-धीरे दूर होते गए और इसका नतीजा 2019 के विधान सभा चुनाव में देखने को मिला."

हितेंदर राव कहते हैं कि इस वजह से बीजेपी ने जो जाट नेता चुनाव में खड़े किए थे वो भी हार गए, जिनमें दो बड़े मंत्री भी थे. "जाट मतदाताओं ने बीजेपी के जाट उम्मीदवारों को भी एक तरह से सबक सिखाया. बीजेपी को इसका भारी खामियाज़ा चुकाना पड़ा."

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वहीं महाराष्ट्र की राजनीति पर नज़र रखने वाली सुजाता आनंदन कहती हैं:-

बीजेपी सब वर्गों को साथ लेकर नहीं चलती है, वो वर्गीकरण करती है, जो अब साफ ज़ाहिर हो रहा है. इनका तरीका है कि लोगों में फूट डालकर आगे बढ़ा जाए. ये सोचते हैं कि एक या दो वर्ग का समर्थन लेकर आगे बढ़ेंगे. ये बीजेपी को बहुत नुकसान पहुंचा रहा है.

महाराष्ट्र में 2014 के चुनाव में शरद पवार ने कहा था कि क्या आप लोग फिर से पेशवा को लाना चाहते हो?

पेशवा ब्राह्मण थे. हालांकि उनके राज्य को मराठा राज्य ही बोलते थे. लेकिन उन्होंने छत्रपति शिवाजी और उनके वंशजों को दरकिनार करके शासन किया.

लेकिन शिवाजी के नाम पर ही वो शासन करते थे, तभी उनकी चल पाती थी. इसलिए मराठा और ब्राह्मणों के बीच बहुत बैर था.

वो ब्राह्मणों के हाथ में सत्ता नहीं देना चाहते थे और महाराष्ट्र में वाई वी चव्हाण से लेकर बाक़ी मुख्यमंत्रियों ने यही किया, वो ब्राह्मणों को थोड़ा साइडलाइन करके रखते थे. वो उनका आदर ज़रूर करते थे, लेकिन सत्ता में भागीदार नहीं बनने देते थे.

लेकिन जब इन्होंने देवेंद्र फडणवीस को आगे किया, फडणवीस को ये बात समझ नहीं आई कि छत्रपति शिवाजी के वक्त से मराठा लोग राज करते आए हैं और स्वतंत्रता के बाद भी बहुत से मराठा मुख्यमंत्री हुए हैं. ऐसा नहीं है कि ब्राह्मण मुख्यमंत्री नए हुए थे या ओबीसी या दलित मुख्यमंत्री नहीं हुए थे, लेकिन वो लोग भी उस वक्त सबको साथ लेकर चले थे.

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शिवसेना के मुख्यमंत्री मनोहर जोशी भी ब्राह्मण थे, लेकिन वो भी सबको साथ लेकर चले थे. लेकिन मुख्यमंत्री रहते हुए फडणवीस ने नाराज़ मराठाओं और दलितों पर बहुत दिनों तक ध्यान नहीं दिया. फिर उन्हें भिड़ाने की कोशिश की. मराठाओं को दलितों के ख़िलाफ़ करने की कोशिश थी, लेकिन वो हुआ नहीं. इसके लिए भीमा कोरेगांव की घटना को याद करने की ज़रूरत है.

महाराष्ट्र में ख़ासकर शिवाजी के वक्त से एक समाजवादी तत्व रहा है, यानी शिवाजी भी सबको साथ लेकर चलते थे. महाराष्ट्र अभी भी उनके रास्ते पर चलता है.

बीजेपी के इतनी बड़ी पार्टी होने के बाद, इतना उभरकर आने के बाद, यहां तक कि एनसीपी को उन्होंने पूरी तरह से खाली कर दिया था. उनके बहुत-से नेता अपनी तरफ़ कर लिए थे. कांग्रेस के कई लोग भी अपनी तरफ़ ले लिए थे. इसके बावजूद कांग्रेस और एनसीपी की पहले से ज़्यादा सीटें आईं. ये कमाल लोगों का था, राजनीतिक पार्टियों का नहीं था.

चुनाव नतीजों से साफ़ हो गया कि महाराष्ट्र के लोगों को बीजेपी की ऐसी राजनीति पसंद नहीं आई.

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'मज़बूत नेताओं से डर'

हाल में महाराष्ट्र सरकार के गठन के वक्त कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पूरी तरह से महाराष्ट्र के स्थानीय नेता और एनसीपी प्रमुख शरद पवार पर निर्भर थीं.

जब कांग्रेस के नेताओं ने उनसे कहा कि आप शरद पवार को ज़्यादा भाव दे रही हैं तो पता चला था कि सोनिया गांधी ने उनसे पूछा, आप बताइए महाराष्ट्र में शरद पवार के क़द का कोई कांग्रेस नेता है?

अगर मान लिया जाए कि कांग्रेस के पास शरद पवार की बराबरी का कोई नेता नहीं है तो सवाल उठता है कि शरद पवार इतने बड़े नेता कैसे बने?

दअसल इसके लिए उन्हें कांग्रेस छोड़नी पड़ी थी. क्योंकि कांग्रेस ने उनकी तरक्की नहीं होने दी थी. इसलिए उन्होंने कांग्रेस एक बार नहीं दो बार छोड़ी थी, तब जाकर वो इतने बड़े नेता उभरकर आए थे.

शुरू से कांग्रेस इस तरह के क्षेत्रीय नेताओं को बर्दाश्त नहीं करती थी, इसलिए आज उनका ऐसा हाल है कि उन्हें दूसरों पर निर्भर होना पड़ रहा है.

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इसी तरह पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी भी कांग्रेस से आई हैं. तेलगु देशम के चंद्रबाबू नायडू भी कांग्रेस के ही नेता थे. उनकी भी तरक्की नहीं हुई तो वो अलग हो गए. जगन मोहन रेड्डी के साथ भी यही हुआ.

कांग्रेस का हर राज्य में हाल इसी लिए बुरा हुआ क्योंकि उन्होंने राज्य के नेता को बढ़ने नहीं दिया.

आज बीजेपी यही कर रही है. आज नरेंद्र मोदी का व्यक्तित्व विशाल हो गया है, लेकिन उनके साथ सिर्फ़ एक ही उनके जैसा नेता है - अमित शाह. और बाक़ी जगह वो दूसरे मज़बूत नेताओं को सहन करते नहीं हैं.

महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस ने ये सोचकर ग़लती कि वो बहुत बड़े नेता हैं. लेकिन अगर देवेंद्र फडणवीस को महाराष्ट्र में अकेले छोड़ दिया जाता तो पार्टी को 105 सीटें भी नहीं मिलतीं. इतनी सीटें भी नरेंद्र मोदी की बदौलत आईं.

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हरियाणा में भी ऐसी ही है. वहीं झारखंड में मुख्यमंत्री बनाए गए रघुबर दास का नाम कई लोगों को पता भी नहीं हुआ करता था.

और शिवराज सिंह चौहान जैसे जितने भी मज़बूत नेता थे, उन्हें बीजेपी के राष्ट्रीय नेता पसंद नहीं करते थे.

बीजेपी उसी लाइन पर जा रही है, जिसपर कांग्रेस इतने सालों से चलती आई है और बीजेपी के लिए भी ये ख़तरा पैदा हो रहा है कि उनके पास भी नरेंद्र मोदी को छोड़कर और कोई नेता नहीं है.

नरेंद्र मोदी हर वक्त चुनावी मोड में रहते हैं, जो नहीं होना चाहिए. चुनाव अभियान राज्य के नेताओं के हाथ में होना चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं है.

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