कानपुर: हिंसा रोकने को प्रशासन की न तो तैयारी थी और न फ़ोर्स- ग्राउंड रिपोर्ट

  • 24 दिसंबर 2019
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नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध में 19 दिसंबर यानी गुरुवार को देश भर में प्रदर्शन हुए. यूपी की राजधानी लखनऊ समेत कई शहरों में प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई, कई लोग मारे गए लेकिन कानपुर शहर उस दिन शांत रहा.

शुक्रवार दोपहर हज़ारों लोगों की भीड़ कई रास्तों से होते हुए एक ही जगह इकट्ठा हुई, फिर भी माहौल शांतिपूर्ण रहा लेकिन कुछ ही देर बाद दूसरे इलाक़े में हिंसा भड़क उठी और फिर ऐसी भड़की कि पुलिस और प्रशासन के लिए इसे सँभालना मुश्किल हो गया.

शहर के अलग-अलग इलाकों में लगातार दो दिन तक हिंसा होती रही, तीन लोगों की मौत हो गई, कई पुलिसकर्मियों समेत बारह प्रदर्शनकारी भी घायल हुए, इंटरनेट सेवाएं चार दिन तक बंद रहीं, बाज़ार और स्कूल-कॉलेज बंद कर दिए गए, दर्जनों गिरफ़्तारियां हुईं, स्थानीय विधायक तक हिरासत में ले लिए गए, बावजूद इसके पूरी तरह माहौल को सामान्य बनाने में प्रशासन अभी भी एड़ी-चोटी एक किए हुए है.

उत्तर प्रदेश के दूसरे शहरों की तरह कानपुर में भी पिछले नौ नवंबर से धारा 144 लागू थी, फिर भी इतनी बड़ी संख्या में लोगों के जुट जाने का रहस्य यहां भी वैसे ही बना हुआ है जैसे कि राज्य के अन्य हिस्सों में.

हालांकि कानपुर ज़ोन के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक प्रेम प्रकाश इसकी वजह ये बताते हैं, "धारा 144 भले ही लागू थी लेकिन धार्मिक स्थलों पर और धार्मिक वजहों से जुटने पर हमने सख़्ती नहीं की. शुक्रवार को मस्जिदों में नमाज़ के लिए लोग इकट्ठा होते हैं इसलिए उन्हें वहां जाने से नहीं रोका गया. उसके बाद लोगों ने बाहर निकलकर प्रदर्शन किया, फिर भी प्रशासन सख़्त नहीं हुआ लेकिन जब पत्थरबाज़ी और आगज़नी शुरू हो गई तो मजबूरन पुलिस को सख़्त होना पड़ा."

लेकिन ऐसा नहीं है कि भीड़ सिर्फ़ मस्जिदों से निकल कर बाहर आई और उसमें स्थानीय लोग ही शामिल थे. इस बात को पुलिस भी मान रही है कि न सिर्फ़ भीड़ को बढ़ाने में बल्कि भीड़ को उकसाने में भी बाहरी तत्वों का हाथ था, लेकिन सवाल ये उठता है कि इतनी बड़ी संख्या में यदि इतने बाहरी तत्व आ रहे थे तो पुलिस, प्रशासन और उनका ख़ुफ़िया तंत्र क्या कर रहा था?

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यही नहीं, शुक्रवार को दोपहर क़रीब ढाई-तीन बजे के आस-पास कानपुर के व्यस्ततम और वीआईपी इलाक़ा माने जाने वाले परेड चौराहे पर यतीमख़ाना, बेकनगंज, लकड़मंडी और ग्वालटोली की ओर से भीड़ इकट्ठा हुई. भीड़ की संख्या को स्थानीय लोग हज़ारों से लेकर एक लाख के ऊपर तक बता रहे हैं लेकिन क़रीब दो किमी तक इस चौड़ी सड़क पर सिर्फ़ भीड़ ही भीड़ दिख रही थी, यह सही है.

कानपुर में कैसे भड़की हिंसा?

भीड़ आगे जाना चाह रही थी, जिसे शांतिपूर्वक वापस लौटाने में प्रशासन सफल रहा, लेकिन आश्चर्यजनक बात ये है कि ठीक उसी समय शहर के दक्षिणी इलाक़े यानी बाबूपुरवा में नमाज़ के बाद मस्जिद से निकल कर प्रदर्शन कर रहे लोगों को जब आगे बढ़ने से रोका गया तो हिंसा शुरू हो गई. इसके अलावा रेल बाज़ार, कैंट और बिरहाना रोड के आस-पास भी कुछ हिंसा हुई.

एक पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बीबीसी को बताया, "शहर की ज़्यादातर फ़ोर्स परेड इलाक़े में ही लगी थी क्योंकि वहां भीड़ बहुत थी और एक दिन पहले कई शहरों में जो हालात बने थे उन्हें देखते हुए हिंसा की आशंका भी वहीं थी. लेकिन जब यहां अचानक हिंसा हुई तो फ़ोर्स को इधर डाइवर्ट करना पड़ा. ये तो अच्छा हुआ कि परेड में हंगामा नहीं हुआ, अन्यथा कानपुर में इतनी फ़ोर्स ही नहीं थी कि उससे निपट सकती."

ठीक यही स्थिति अगले दिन यानी शनिवार को हुई. ज़िले की सारी फ़ोर्स बाबूपुरवा इलाक़े में लगी थी और इधर यतीमख़ाना में अचानक हिंसा भड़क गई. बाद में पुलिस बल और अर्धसैनिक बलों को इधर केंद्रित करना पड़ा. पुलिस बलों की कमी की बात परोक्ष रूप से ही सही लेकिन एडीजी प्रेम प्रकाश भी स्वीकार करते हैं.

बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "पिछले शुक्रवार को सिर्फ़ दो प्लाटून पीएसी हमें अलग से मिली थी जो एसएसपी के साथ लगी थी. लेकिन अब फ़ोर्स की कोई कमी नहीं है. आरएएफ़, आईटीबीपी और पीएसी के जवानों के अलावा थानों के लिए भी अतिरिक्त जवान मिल गए हैं."

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पुलिस बलों की कमी की ये स्थिति न सिर्फ़ कानपुर बल्कि राजधानी लखनऊ समेत दूसरे शहरों में भी देखने को मिली. लखनऊ में गुरुवार को प्रदर्शन स्थल यानी परिवर्तन चौक पर तो पुलिस और अर्धसैनिक बलों का जमावड़ा दिख रहा था लेकिन पूरा शहर इस तरह दिख रहा था जैसे कि उसकी सुरक्षा के लिए पुलिस वालों की ज़रूरत ही नहीं है. परिवर्तन चौक पर डीजीपी, एडीजी, डीएम, एसएसपी जैसे आला अधिकारियों की मौजूदगी के बावजूद पुलिस हिंसा नहीं रोक पाई.

लेकिन इन सबसे अहम बात ये कि सरकार अब कह रही है कि इन घटनाओं के पीछे पॉपुलर फ़्रंट ऑफ़ इंडिया यानी पीएफ़ए जैसे संगठन और कुछ पुराने प्रतिबंधित संगठनों के स्लीपर सेल का सुनियोजित षड्यंत्र है, तो सरकार के पास ये सूचनाएं पहले क्यों नहीं पहुंचीं?

पुलिस बल की कमी?

कानपुर में पत्रकार प्रवीण मोहता बताते हैं, "भीड़ जुटाने और लोगों को भड़काने के लिए पिछले 15-20 दिन से काम चल रहा था. सिमी जैसे संगठनों के स्लीपर सेल चमनगंज, बेकनगंज, यतीमख़ाना, बाबूपुरवा, बगाड़ी, ग्वालटोली जैसे इलाक़ों में खाने-पीने की दुकानों पर कम उम्र के लड़कों और बच्चों को भड़का रहे थे. इनका भरोसा जीतने के लिए सोशल मीडिया पर भ्रामक पोस्ट के प्रिंट की फ़ोटोकॉपी बांटी जा रही थी. दोनों दिन हुए प्रदर्शनों में ज़्यादातर युवकों के पास छपे हुए प्लेकार्ड और पोस्टर्स थे. तमाम पत्रकारों के पास ये सूचना थी, पता नहीं पुलिस इस बात से कैसे अनभिज्ञ रही? अपने सूचना तंत्र से भले ही पुलिस को ये सारी जानकारियां न मिली हों लेकिन पत्रकारों से तो ज़रूर मिली होगी."

यह सही है कि इतने दिनों से चल रही गतिविधियों से पुलिस और प्रशासन अनजान नहीं रहा होगा लेकिन जानने के बावजूद यदि कोई एहतियाती क़दम नहीं उठाए जा सके तो निश्चित तौर पर इसके पीछे या तो समन्वय की कमी रही होगी या फिर संसाधनों की कमी.

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इसके अलावा, आम मुसलमानों में न सिर्फ़ नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर अनिश्चितताएं थीं बल्कि इससे पहले की कुछ घटनाओं का भी लोग आपस में इस तरह ज़िक्र कर रहे थे जैसे ये सब उन्हें नीचा दिखाने, धमकाने या फिर उन्हें बाहर करने के लिए किया जा रहा है. प्रशासन ऐसे लोगों का भ्रम दूर करने में भी नाकाम रहा.

कुछ स्थानीय नागरिकों की मानें तो शुक्रवार को जब बाबूपुरवा में हिंसा भड़की, उससे ठीक पहले नमाज़ के बाद मस्जिद से कुछ भड़काऊ बयान दिए गए लेकिन पुलिस तक उसकी सूचना नहीं थी. प्रवीण मोहता बताते हैं कि मस्जिदों से ऐसे बयान एक हफ़्ते पहले भी दिए गए थे.

बाबूपुरवा के पास बेगमपुरवा के रहने वाले अनवर हाशिम कहते हैं कि उस दिन जुलूस को पुलिस वाले यदि चौराहे तक जाने की इजाज़त दे देते तो शायद यह भीड़ वैसे ही नारेबाज़ी करके वापस हो गई होती जैसे परेड इलाक़े में हो गई थी.

पुलिस के रवैये पर सवाल

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अनवर हाशिम के मुताबिक, "बाबूपुरवा में प्रशासन अपनी ज़िद पर अड़ गया जिसकी वजह से कुछ युवा लड़के और हो सकता है कि उसमें कुछ बाहरी भी शामिल हों, भड़क गए और पत्थर फेंकने लगे. बड़े-बुज़ुर्गों की तो छोड़िए, काज़ी और इमाम जैसे लोगों की बात सुनने को भी ये युवक तैयार नहीं थे."

उत्तर प्रदेश में वरिष्ठ पदों पर रह चुके आईपीएस अधिकारी डॉक्टर विभूति नारायण राय कहते हैं कि जिन संगठनों को पुलिस मुख्य षडयंत्रकारी की भूमिका में देख रही है, हो सकता है कि उसे पहले इनके बारे में न पता रहा हो.

उनके मुताबिक, "सूचना तंत्र की विफलता तो है ही, लेकिन ये भी हो सकता है कि पुलिस को ये सब बातें बाद की पड़ताल में पता चली हों. तमाम कॉल रिकॉर्ड्स, वीडियो फ़ुटेज को खँगालने के बाद ये सब बातें सामने आई हों. लेकिन यदि इतना बड़ा षडयंत्र रचा जा रहा था, तो इस बात की जानकारी ज़रूर होनी चाहिए थी और उसके हिसाब से तैयारी रखनी चाहिए थी."

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डॉक्टर राय कहते हैं कि कभी-कभी तात्कालिक परिस्थितियों की वजह से भी हिंसा हो जाती है जब कुछ उपद्रवी तत्व भीड़ में शामिल हो जाते हैं और उसका फ़ायदा उठाते हैं लेकिन ऐसा कुछेक जगहों पर ही हो सकता है, पूरे राज्य में एक साथ ऐसा होना प्रशासनिक तंत्र की कुशलता पर सवाल खड़ा करता है.

हालांकि कुछ स्थानीय लोगों, जानकारों और यहां तक कि प्रशासन और पुलिस के बड़े अधिकारियों तक का कहना है कि स्थिति की गंभीरता को पहले नहीं भांपा जा सका और जितना पता भी चला, उसके हिसाब से पुलिस बल और संसाधन भी अपर्याप्त थे. लखनऊ में एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी कहते हैं कि यह तो अच्छा हुआ कि शुक्रवार के बाद हुआ उपद्रव सिर्फ़ कानपुर शहर तक सीमित रहा. यदि आस-पास के ज़िलों में भी ऐसी घटना हो गई होती तो फ़ोर्स बिखर जाती और स्थिति ख़तरनाक हो सकती थी.

पहले से हो रही थी तैयारी?

यही नहीं, हिंसा के बाद पुलिस का जो रवैया रहा, उसने भी अगले दिन की हिंसा में 'आग में घी' का काम किया. शुक्रवार की रात बाबूपुरवा, बेगमपुरवा और आस-पास के इलाक़ों में जिस तरह से धर-पकड़ की गई, उसने आम मुसलमानों में ग़ुस्सा पैदा कर दिया. स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि पुलिस ने घरों में घुसकर लोगों को मारा-पीटा, गाड़ियों और घरों के शीशे-दरवाज़े तोड़ दिए गए और लोगों को ज़बरन उठा ले गए. कई परिवार तो डर के मारे दूसरी जगहों पर चले गए और महिलाएं मस्जिदों में चली गईं.

पुलिस के आला अधिकारी ऐसी घटनाओं से इनकार कर रहे हैं लेकिन इन इलाक़ों पुलिस की इस कार्रवाई को साफ़तौर पर देखा जा सकता है. शुक्रवार को बाबूपुरवा से पुलिस ने 39 लोगों को हिरासत में लिया जिनमें से 34 लोगों को अगले दिन ही ये कहकर छोड़ दिया कि इनके ख़िलाफ़ कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं. ऐसे में पुलिस की इस कार्रवाई पर खुद ही सवाल उठते हैं.

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यतीमख़ाना चौराहे पर एक युवक का कहना था, "जितना बाहरी लोग आकर मुसलमानों, ख़ासकर युवकों को भड़का रहे हैं उससे ज़्यादा तो पुलिस और सरकार भड़का रही है. जिस तरह से पुलिस वाले हिंसाग्रस्त इलाक़ों में लोगों के साथ ज़्यादती कर रहे हैं, उससे माहौल और बिगड़ेगा ही. आप ही बताइए, जब हमारे मुख्यमंत्री यह कहते हैं कि हम हिंसा करने वालों से बदला लेंगे, तो उनकी इस भाषा से आप आम मुसलमानों का विश्वास कैसे जीत पाएंगे."

कानपुर में आर्यनगर विधानसभा सीट से समाजवादी पार्टी के विधायक अमिताभ वाजपेयी कहते हैं कि शुक्रवार को परेड में भीड़ को नियंत्रित करने में पुलिस और प्रशासन ने समझदारी ज़रूर दिखाई लेकिन उसके बात अधिकारियों में समन्वय का अभाव और कार्यकुशलता की कमी दोनों दिखी.

वाजपेयी को भी शनिवार की रात गिरफ़्तार कर लिया गया था लेकिन अगले दिन छोड़ दिया गया. बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "पुलिस के कुछ बड़े अधिकारी उपद्रवी तत्वों पर नज़र रखने और उन्हें पकड़ने की बजाय निर्दोष आम लोगों और विरोधी दलों के नेताओं से अपनी खुन्नस निकालने में लगे रहे. हम लोगों ने लगातार स्थिति सुधारने में प्रशासन की पूरी मदद की, शांति बैठकों में गए और लोगों को समझाया, लोग मान भी गए लेकिन यतीमख़ाना चौकी के पास एक बड़े अधिकारी ने ये कहते हुए मुझे हिरासत में ले लिया कि मैंने सीट बेल्ट नहीं लगा रखी थी."

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