'नागरिकता क़ानून का विरोध यथार्थ से परे है'- नज़रिया

  • 25 दिसंबर 2019
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नागरिकता संशोधन क़ानून ने भारत में उपासना की स्वतंत्रता की प्राचीन परंपरा को पुनःस्थापित किया है. वर्तमान में हो रहे विरोध की दो कमियाँ हैं, पहली बात ये है कि यह संसदीय जनतंत्र की अवमानना करता है.

जब यह बिल संसद में छह घंटे की बहस के उपरांत क़ानून बना तो इस तरह के विरोध का कोई औचित्य नहीं है. गैर-भाजपा पार्टियों ने चार घंटे बहस की, यह 1976 में हुए उस संशोधन की तरह नहीं है जिसमे मिनटों में संविधान में दो शब्द जोड़ दिए गए थे.

दूसरा, यह विरोध विपक्ष की घोर अवसरवादिता का प्रदर्शन है, 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने संसद में इस बात को माना था कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होते हैं. 23 मई 2012 को प्रकाश करात ने पत्र लिखकर मनमोहन सिंह को अपने उस भाषण पर अमल करने को कहा था. सीपीएम ने भी कहा कि ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण पाकिस्तान और बांग्लादेश में रह रहे अल्पसंख्यकों को प्रताड़ना झेलनी पड़ती है और कहा कि आर्थिक कारणों से आए शरणार्थी और उत्पीड़ित शरणार्थियों में अंतर है, लेकिन आज विपक्षी पार्टियों ने विपरीत रास्ता अपनाया.

यही वजह है कि सीएए और एनआरसी को तथ्यों और संविधान के आईने में देखने की आवश्यकता है.

एनआरसी का इतिहास क्या है?

अगर बहस एनआरसी पर करनी है तो हमें उस दौर में जाना होगा जब असम के राजस्व को बढ़ाने के लिए अंग्रेजों ने भारी संख्या में पड़ोसी राज्य (वर्तमान बांग्लादेश) से मुसलमानों को यहाँ किसानी करने के लिए बुलाया था लेकिन खेत जोतकर खाने की सुविधा को बांग्लादेशी मुसलमानों ने अपना अधिकार समझकर भूमि का कब्ज़ा कर लिया.

1931 के जनगणना अधिकारी सीएस म्युलर ने कहा कि इतनी भारी संख्या में अप्रवासियों का आना असम की विशेषताओं को स्थायी तौर पर परिवर्तित कर देगा और उसकी सभ्यता के ढाँचे को नष्ट कर देगा.

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इस स्थिति का लाभ मुस्लिम लीग को 1936 के असेम्बली चुनाव में मिला, इसके बाद घुसपैठियों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हुई.

स्वतंत्रता के उपरांत बोरदोलोई की राज्य सरकार के दबाव में केंद्र सरकार ने अपने गृह मंत्रालय के माध्यम से 1951 के जनगणना में एनआरसी की बात की, चूँकि तब फॉरेनर्स एक्ट 1946 संशोधित नहीं हुआ था तो पाकिस्तानियों को विदेशी घोषित करने का कोई प्रावधान नहीं था, इस कारण एनआरसी जमीन पर नहीं आ पाई.

बोरदोलोई की मृत्यु के उपरांत कांग्रेस ने भी तुष्टीकरण की राजनीति में पड़कर एनआरसी को ठंडे बस्ते में डाल दिया. अवैध घुसपैठियों का चुनावी लाभ सीपीआई और टीएमसी दोनों पार्टियों ने लिया लेकिन 1978 के मंगल्दोई के उपचुनाव ने अवैध घुसपैठियों का मुद्दा फिर से देश के सामने ले आया. ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन आसू ने इस चुनाव को रद्द कर नए सिरे से वोटर लिस्ट तैयार करके चुनाव कराने की माँग की.

इस आंदोलन ने 1979 में हिंसक रूप ले लिया और इसमें 885 लोगों की जान गई, इस आंदोलन को पूर्णविराम 15 अगस्त 1985 के असम एकॉर्ड ने दिया जिसमें इस बात पर तीनों पक्षों, आसू, असम गण परिषद और सरकार में यह सहमति बनी कि एक निश्चित समय-सीमा के तहत अवैध घुसपैठियों को चिन्हित किया जाएगा, 1966-1971 (युद्ध काल) के बीच आए लोगों को 10 साल के लिए मतदान का अधिकार नहीं होगा और 1971 के बाद आए घुसपैठियों को वापस बांग्लादेश भेजा जाएगा.

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कांग्रेस का असम करार

इस करार के क्रियान्वयन के लिए केंद्र सरकार ने आइएमडीटी एक्ट (1983) के तहत लोगों को चिन्हित करना सुनिश्चित किया, इस एक्ट के तहत पुलिस पर ये दारोमदार था कि वे लोगों को अवैध घुसपैठिया साबित करें जबकि देश में पहले से फॉरेनर्स एक्ट (1946) के तहत विदेशियों को चिन्हित करने का प्रावधान था जिसमें घुसपैठिए पर स्वयं को नागरिक साबित करने की ज़िम्मेदारी थी.

आइएमडीटी एक्ट एक विफल एक्ट साबित हुआ, सर्वोच्च न्यायालय ने इस अधिनियम की निंदा करते हुए सर्बानंद सोनोवाल बनाम केंद्र सरकार के केस में 12 जुलाई 2005 को इसे असंवैधानिक करार दिया और तत्काल प्रभाव से इसके तहत चल रहे सभी न्यायाधिकरण को बंद करने का आदेश दिया.

इसके साथ ही यह भी आदेश दिया कि अवैध घुसपैठियों को फॉरेनर्स एक्ट (1946) के तहत ही चिन्हित किया जाए.

असम एकॉर्ड के उपरांत कांग्रेस की सरकारों के साथ 1990 से 2010 तक कुल 17 त्रिपक्षीय बैठकें हुईं और सभी में एनआरसी के प्रति प्रतिबद्धता दिखाई गई परंतु वे क्या परिस्थितियां थी कि 2013 तक भी सरकार इस पर अमल नहीं कर सकी, इसका कोई स्पष्टीकरण नही है. अंत में सर्वोच्च न्यायालय ने 2013 में हस्तक्षेप कर समय-सीमा के तहत 2018 तक एनआरसी की प्रक्रिया को पूरा करने का आदेश केंद्र सरकार को दिया.

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असम एकॉर्ड के अनुसार नागरिकता अधिनियम में संशोधन कर 1985 में धारा 6A जोड़ी गई, इसमें असम के लोगों की नागरिकता के अलग नियम बनाए गए जबकि देश के अन्य भागों की नागरिकता के नियम धारा 3,4,5,6 के तहत निर्धारित होते हैं.

1956 की नागरिकता नियमावली की धारा 17 पूरे देश में एनआरसी की बात करती है और नियमावली 19 केवल असम की एनआरसी की बात करता है. 3 नवंबर 2004 को धारा 14A का निर्माण कर राष्ट्रीय प्रमाणपत्र की बात कही गई जो कि पूरे देश पर लागू होगी.

असम और देशभर में हुआ एनआरसी अलग

इस प्रकार असम की व्यवस्था और शेष देश की व्यवस्था में कानूनी अंतर है क्योंकि दोनों की पृष्ठभूमि में बुनियादी भिन्नता है. असम की एनआरसी आवेदन पर आधारित है, यानी नागरिक को फॉर्म-18 में सभी बिंदुओं को भरकर आवेदन देना होता है पर शेष देश में एनआरसी गणना आधारित है यानी सरकार आपके परिवार में जाकर ज़रूरी जानकारी इकट्ठा करेगी. असम में एनआरसी में नाम नहीं होने पर आप पर फॉरेनर्स एक्ट (1946) के तहत कार्रवाई होगी लेकिन बाकी देश में एनआरसी में नाम नहीं होने पर क्या होगा इसकी कोई चर्चा किसी अधिनियम या नियमावली में उल्लिखित नहीं है.

जहाँ तक बात नागरिकता संशोधन कानून 2019 की है तो भारत भूमि ने सर्वप्रथम यहूदियों को अपने यहाँ पूजा करने के लिए शरण दी, जब भारत का विभाजन हुआ तो नेहरू और लियाक़त ने दोनों देशों में रह रहे अल्पसंख्यकों को धर्म की आज़ादी का आश्वासन दिया.

भारत का विभाजन

भारत ने अपनी चिरकालीन परंपरा का परिचय देते हुए अपने यहाँ अल्पसंख्यकों को पूरी आजादी दी और आगे बढ़ने के अवसर भी सामान रूप से दिए, लेकिन पाकिस्तान ऐसा नहीं कर पाया और अल्पसंख्यक वहाँ से विलुप्त होते चले गए.

अगर ये समझौता न होता तो संभवतः अल्पसंख्यक पाकिस्तान में नहीं रुकते और उनकी यह दशा नहीं होती, ऐसे में उनको अपना देश चुनने की आज़ादी होनी चाहिए जो कि उनको बँटवारे के समय थी, इस पर आपत्ति करना अपने दायित्व से पीछे हटना है, भारत ने पुनः 'राइट-टू-वरशिप' की अपनी पुरातन संस्कृति को स्थापित किया है.

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'अल्पसंख्यक' शब्द हमारे संविधान और देश के लिए नया नहीं है, अल्पसंख्यकों के संरक्षण और उन्हें आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त अवसर दिए जाने की बात संविधान में कही गई है.

इसी आधार पर हम उपासना का अधिकार दे रहे हैं तो यहां के अल्पसंख्यकों को बुरा नहीं लगना चाहिए. क्या हमारे मुसलमान भाइयों को यह बात नहीं कुरेदती है कि उन्हीं के धर्म के नाम पर पड़ोसी मुल्क उनके ग़ैर-मुसलमान भाइयों पर अत्याचार करता है?

तिब्बतियों को क्यों नहीं किया गया शामिल

अहमदियों की बात करें तो लोगों को यह बात पता होनी चाहिए कि पाकिस्तान की सरकार ने 1970 में उन्हें अल्पसंख्यक घोषित किया है और वे स्वयं को इस्लाम धर्म के अनुयायी मानते हैं. रोहिंग्या एक ऐसी जमात है जिसने दूसरे देशों में घुसपैठ किया और उनका अपना देश म्यांमार धर्म के आधार पर चलने वाला देश नहीं है. इसी आधार पर हम तिब्बत, बर्मा, श्रीलंका तथा नेपाल के शरणार्थियों को नागरिकता नहीं दे सकते क्योंकि इनके प्रति हमारी किसी नेहरू-लियाकत समझौते की बाध्यता नहीं है.

इनके लिए भारत सरकार को विशेष शरणार्थी कानून बनाने की आवश्यकता है, लोगों में भ्रम फैलाया गया कि सीएए के बाद एनआरसी होने पर हिंदुओ को नागरिता मिल जाएगी और मुसलमानों को नहीं, पर वास्तविकता यह है कि असम में भी जिन लोगों का नाम एनआरसी में नहीं आया उन्हें 10 साल के लिए मतदान करने से वंचित किया गया और अन्य सारी सुविधाएं पूर्ववत रखी गईं और 1971 के बाद ही आने वालों को विदेशी कहा गया जिन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया की जा रही है.

लेकिन देश के एनआरसी की प्रक्रिया अभी पूरी तरह बनाई ही नहीं गई है जब हम नागरिकता नियमावली (2003) जिसके तहत पूरे देश का एनआरसी होना है, पढ़ते हैं तो उसमें कहीं भी फॉरेनर्स एक्ट का उल्लेख नहीं मिलता, इसीलिए असम एनआरसी के आधार पर पूरे देश का आकलन करना गलत है. इसकी प्रक्रिया कहीं घोषित नहीं है, कट ऑफ तिथि क्या होगी, नाम नहीं आने वालों का क्या होगा, सरकार घर आकर क्या जानकारी मांगेगी, क्या कागजात चाहिए, चाहिए भी या नही, ऐसी किन्हीं बातों पर अभी विचार नही हुआ है.

कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों का यह कह देना की हिंदुओं को नागरिता मिल जाएगी और मुसलमानों को नहीं, यह स्पष्ट तौर पर मुसलमानों को गुमराह करने के इरादे से किया गया कृत्य है, जिन तीन पड़ोसी इस्लामिक देशों के अल्पसंख्यक शरणार्थी यहाँ रह रहे हैं उन्हें 5 साल में और अन्यों को 11 साल में नेचुरलाइजेशन के तहत नागरिता देने का यह संशोधन है.

अल्पसंख्यको को जल्दी देने की आवश्यकता इसलिए है क्योंकि उनके देश में उन्हें धर्म के नाम पर प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है. एक मुसलमान के लिए यहाँ की नागरिता एक बेहतर विकल्प हो सकता है, धार्मिक उत्पीड़न के आधार पर नहीं. तो क्या एक बेहतर विकल्प, एकमात्र विकल्प के लिए 6 साल अधिक इंतज़ार नहीं कर सकता?

(इस लेख में व्यक्त विचार आरएसएस की महिला इकाई राष्ट्रीय सेविका समिति से जुड़ी अपर्णा सिंह के निजी हैं. इसमें शामिल तथ्य और विचार बीबीसी के नहीं हैं और बीबीसी इसकी कोई ज़िम्मेदारी या जवाबदेही नहीं लेती है)

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