नागरिकता संशोधन क़ानूनः प्रदर्शनकारी अब क्या करेंगे?

  • 1 जनवरी 2020
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नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ पूर्वोत्तर भारत में शुरू हुए प्रदर्शनों ने समूचे भारत को अपने दायरे में ले लिया और देश के अधिकतर हिस्सों में बड़ी तादाद में लोग सड़कों पर उतरे हैं.

इस दौरान दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया और अलीगढ़ की अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी प्रदर्शनों का केंद्र बनी रहीं. असम के छात्र संगठन भी सड़कों पर डटे रहे.

उत्तर प्रदेश के पश्चिम ज़िलों के अलावा लखनऊ, कानपुर और फ़िरोज़ाबाद में भी बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए और कई जगह हिंसा भी हुई. उत्तर प्रदेश पुलिस की ओर से किए दमन और उत्पीड़न की कहानियां भी सामने आई हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के रामलीला मैदान में अपनी रैली से और गृहमंत्री अमित शाह ने साक्षात्कार देकर नागरिकता संशोधन क़ानून, संभावित नागरिकता रजिस्टर और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर के बारे में 'ग़लतफ़हमियां' दूर करने की कोशिश की.

आशंकाओं के बीच शुक्रवार शांति से बीत गया. दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में भी प्रदर्शनों की रफ़्तार धीमी पड़ी. अब सवाल उठ रहा है कि क्या नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ जारी प्रदर्शन थम जाएंगे और सरकार इस मुद्दे पर बिना पीछे हटे ही आगे बढ़ जाएगी?

कांग्रेस पार्टी से जुड़े और कई प्रदर्शनों में शामिल रहे शायर इमरान प्रतापगढ़ी को लगता है कि अब नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन और अधिक व्यवस्थित तरीके से होंगे.

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बीबीसी से बातचीत में इमरान कहते हैं, "ये प्रोटेस्ट किसी राजनीतिक दल की ओर से बुलाया गया नहीं है. ये स्वतःस्फूर्त है. अपने आप जनता में एक आक्रोश पनपा था जिसके बाद जनता सड़क पर उतरी. छात्र, आम लोग, दलित, अल्पसंख्यक सब सड़क पर उतरे. इतने दिन बीतने के बाद भी सरकार झुकती हुई दिखाई नहीं दे रही है लेकिन सरकार डरी हुई है, इसमें कोई राय नहीं."

इमरान कहते हैं, "रामलीला मैदान में प्रधानमंत्री ने जो भाषण दिया उसमें उनका डर साफ़ दिखाई दिया. वो जान रहे हैं कि जनता के ये आक्रोश राजनीतिक नहीं है, आक्रोश जब राजनीतिक न होकर स्वतः हो तो सरकार डरती है. लेकिन सरकार दिखाना नहीं चाहती कि वो डरी हुई है. सरकार जिस वोट बैंक को साधने के लिए ये राजनीतिक षडयंत्र रच रही है या सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की कोशिश कर रही है, अगर उसे सरकार डरती हुई दिखी तो उसमें भी बिखराव आ जाएगा."

इमरान कहते हैं, "जनता भी अभी बैकफुट पर जाने के मूड में नहीं है. मुझे लगता है कि ये आंदोलन अभी और चलेगा. दिल्ली के शाहीन बाग़ में कड़ाके की ठंड के बावजूद महिलाएं डटी हुई हैं. वो पीछे नहीं हटेंगी."

उत्तर प्रदेश में पुलिस की सख़्त कार्रवाई के बाद बीता शुक्रवार शांति से बीत गया. प्रशासन ने प्रदर्शनों से निबटने के लिए तैयारिंया की थीं. 21 ज़िलों का इंटरनेट बंद कर दिया गया था. तनावग्रस्त इलाक़ों में भारी पुलिसबल तैनात किए गए थे. लेकिन जुमे की विशेष नमाज़ के बाद पूरे प्रदेश में कहीं भी प्रदर्शन नहीं हुए. उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे अपनी जीत के तौर पर पेश किया.

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तो क्या प्रशासन की ओर से की गई कार्रवाई के बाद मुसलमानों में डर बैठ गया है, इस सवाल पर इमरान कहते हैं, "योगी आदित्यनाथ को जब यूपी का मुख्यमंत्री बनाया गया था तब ही ये साफ़ हो गया था कि उन्हें जब भी मौका मिलेगा वो अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ बदले की भावना से कार्रवाई करेंगे. लेकिन शर्मनाक ये है कि यूपी के पुलिस अधिकारी योगी के इशारे पर काम कर रहे हैं. सीधे गोली चला रहे हैं. घरों में घुसकर तोड़फोड़ कर रहे हैं. ये राज्य प्रायोजित हिंसा थी. यूपी की जनता को अब अपने नेताओं, अपने सांसदों, अपने विधायकों पर दबाव बनाना चाहिए."

इमरान कहते हैं, "यूपी के लोगों को अब दिल्ली के शाहीन बाग़ की महिलाओं की तरह शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना होगा. महिलाओं को आगे करना होगा."

वहीं यूनाइटेड अगेंस्ट हेट से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता नदीम ख़ान का भी यही कहना है कि अब नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों को और व्यवस्थित तरीके से चलाने की तैयारियां की जा रही हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया कि मुंबई में इसे लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं की बैठक में आगे होने वाले प्रदर्शनों का खाका तैयार किया गया है. नदीम ख़ान कहते हैं, "प्रदर्शन कमज़ोर नहीं हुए हैं, मीडिया कम दिखा रही है, दो दिन पहले ही महाराष्ट्र के औरंगाबाद में लाखों लोग जुटे. कर्नाटक में बड़ी रैलियां हुई हैं. शाहीन बाग़ की औरतें डटी हैं. जामिया में रोज़ प्रोटेस्ट हो रहा है."

नदीम ख़ान कहते हैं, "ये लोगों के अपने प्रोटेस्ट हैं, नेताओं के आहवान पर बसों में भरकर लोग नहीं आ रहे हैं, जनता ही इन प्रदर्शनों की नेता है. और जनता का विरोध मुखर है. यूपी में सरकार की ओर से हिंसा की वजह से ज़रूर प्रोटेस्ट कम हुए हैं लेकिन देश के बाकी हिस्सों में ये प्रदर्शन जारी हैं और आगे भी जारी रहेंगे."

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मुंबई में हुई बैठक के बारे में नदीम ख़ान ने बताया, "मुंबई में देशभर से आए सामाजिक कार्यकर्ताओं की बैठक में तय किया गया है जब तक नागरिकता संशोधन क़ानून को पूरी तरह वापस नहीं लिया जाता तब तक ये प्रोटेस्ट चल रहेंगे. अगले कुछ दिनों में ही दिल्ली में बड़ा प्रोटेस्ट होगा."

कहा ये भी जा रहा है कि नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन में अधिकतर मुसलमान ही शामिल हैं और देश के बहुसंख्यक वर्ग ने इस क़ानून को स्वीकार कर लिया है. इस प्रश्न पर नदीम ख़ान कहते हैं, "जो लोग ये कह रहे हैं उन्होंने प्रदर्शन की तस्वीरें ही नहीं देखी हैं. प्रदर्शन में शामिल लोग इस देश के नागरिक हैं और अपने संवैधानिक अधिकार के तहत प्रोटेस्ट कर रहे हैं."

सरकार की ओर से ऐसा कोई संकेत नहीं है जिससे ये पता चलता हो कि सरकार नागरिकता संशोधन क़ानून पर पीछे हटने को तैयार हो. कब तक लोग अपने काम धंधे छोड़कर सड़कों पर उतरते रहेंगे? नदीम ख़ान कहते हैं, "प्रधानमंत्री का रामलीला मैदान से दिया गया बयान और उनके चेहरे पर झलका डर इन प्रदर्शनों की पहली जीत है. सरकार डरी हुई है और हम लंबी लड़ाई के लिए तैयार हैं. अभी तो हम बड़े शहरों में प्रदर्शन देख रहे हैं, लेकिन जल्द ही गांवों में भी प्रदर्शन होने लगेंगे."

इन प्रदर्शनों का कोई चेहरा भी नहीं है. ऐसे में कोई केंद्रीयकृत दिशानिर्देश भी नहीं है. ये इन प्रदर्शनों की ताक़त है या कमज़ोरी? नदीम ख़ान और इमरान प्रतापगढ़ी दोनों ही ये मानते हैं कि इन प्रदर्शनों का कोई चेहरा नहीं है और यही इनकी सबसे बड़ी ताक़त है. नदीम कहते हैं, "चेहरे भी इसी आंदोलन से निकलेंगे."

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वहीं असम में प्रदर्शन कर रही ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन से जुड़े दीपांकर नाथ ने बीबीसी को बताया कि जब तक सरकार नागरिकता संशोधन क़ानून को वापस नहीं लेगी तब तक उनका संगठन समूचे असम में प्रदर्शन करता रहेगा.

दीपांकर के मुताबिक उनके संगठन ने 17 जनवरी तक शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने के कार्यक्रम तय किए हैं. इसके बाद वो अपनी रणनीति में बदलाव भी कर सकते हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के बयानों को नकारते हुए वो कहते हैं कि उन्हें सरकार के बयानों पर भरोसा नहीं है और वो असम की संस्कृति और भाषा को बचाने की लड़ाई तब तक लड़ेंगे जब तक सरकार पूरी तरह से इस नए क़ानून को वापस नहीं ले लेती.

वहीं अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भी प्रदर्शनों की रणनीति तय करने के लिए एक समन्वय समिति बनाई गई है. इससे जुड़े छात्र मोहम्मद इमरान कहते हैं कि यूपी सरकार की ओर से छात्रों के ख़िलाफ़ पुलिस कार्रवाई करने और मुक़दमे दर्ज कराने के बावजूद भी छात्र पीछे नहीं हटेंगे.

इमरान ने बीबीसी से कहा, "ये सिर्फ़ हमारे ही नहीं बल्कि भारतीय मुसलमानों के भविष्य का सवाल है. ये मुद्दा हमारी पढ़ाई या हमारे अपने भविष्य से ज़्यादा अहम है. हम इस लड़ाई में अपना सबकुछ खोने के लिए तैयार हैं. अब हम पीछे नहीं हटेंगे."

इमरान ने कहा, "अलीगढ़ के छात्र जामिया और अन्य यूनिवर्सिटी के छात्रों के साथ मिलकर साझा रणनीति बनाने पर काम कर रहे हैं. जल्द ही प्रदर्शन और अधिक व्यवस्थित रूप में दिखेंगे."

जामिया के छात्र जो अब तक इन प्रदर्शनों में शामिल होते रहे हैं उनमें से भी कई का यही कहना है कि वो क्लास के बजाए सड़क पर जाना ज़्यादा पसंद करेंगे. जामिया के छात्र मोहम्मद अकरम ने बीबीसी से कहा, "जब तक क़ानून वापस नहीं लिया जाता, हम आंदोलन जारी रखेंगे."

एक ओर जहां छात्र और मानवाधिकार संगठन नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों को नई धार देने के लिए रणनीति बनाने में जुटे हैं वहीं सरकार की रणनीति अभी इन्हें नज़रअंदाज़ करने की ही दिख रही है. अब सवाल यही है कि सरकार कब तक इन प्रदर्शनों को नज़रअंदाज़ कर पाएगी? साल 2020 में भारत सरकार के लिए पहली बड़ी चुनौती नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ भड़के आक्रोश को शांत करना ही होगी.

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