जामिया यूनिवर्सिटी में पुलिस ने प्रोटोकॉल का उल्लंघन किया: पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स की रिपोर्ट- पांच बड़ी ख़बरें

  • 27 दिसंबर 2019
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दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में पुलिस की कार्रवाई के लगभग दो हफ़्ते बाद, पीपल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स ने इस पर एक फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट जारी की है.

गुरुवार को रिलीज की गई इस रिपोर्ट का नाम 'द ब्लडी संडे 2019' रखा गया है. इसमें यह दावा किया गया है कि दिल्ली पुलिस ने छात्रों को 13 दिसंबर को संसद तक मार्च निकालने से रोका, और उनपर 'अत्यधिक और अंधाधुंध लाठीचार्ज' किया गया. इसमें यह भी लिखा गया है कि जो छात्र उस प्रदर्शन में शामिल नहीं थे, उनपर भी हमले किये गये.

इस हिंसा में कई छात्र गंभीर रूप से घायल हो गए थे, वहीं कुछ छात्रों को हिरासत में भी लिया गया था.

रिपोर्ट में यह भी लिखा गया है कि पुलिसकर्मियों का उद्देश्य केवल भीड़ मैनेज करना नहीं बल्कि 'छात्रों को चोट पहुंचाना' भी था.

फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट ने मथुरा रोड के पास पुलिस के एक्शन को बर्बरतापूर्ण बताया. इसमें कहा गया है कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिसमें यह साफ़ हो कि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रुकने के लिए कहा.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पुलिस बिना इजाज़त जामिया के कैंपस में घुसी और इसकी अग्रिम सूचना उसने कैंपस प्रशासन तक को नहीं दी.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि गेट के पास, कैंपस के अंदर, लाइब्रेरी और रीडिंग रूम में लगे सीसीटीवी कैमरों में पुलिस की तोड़फोड़ कैद हुई है जो उनके इरादों के पक्के सबूत हैं.

इसके साथ ही रिपोर्ट यह भी दावा करती है कि जिन्हें पुलिस ने हिरासत में लिया है उन्हें उनके परिजनों और वकीलों से नहीं मिलने दिया जा रहा है और न ही उन्हें मेडिकल सुविधा ही मुहैया कराई जा रही है.

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जुमे की नमाज़ को लेकर यूपी के कई ज़िलों में इंटरनेट पर रोक

नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर चल रहे विरोध के मद्देनजर पूरे उत्तर प्रदेश में हाई अलर्ट जारी किया गया है.

प्रदेश के नौ ज़िलों में जुमे की नमाज़ को देखते हुए इंटरनेट सेवा बंद करने का फ़ैसला लिया गया है. इस दौरान किसी भी तरह के प्रदर्शन, जुलूस और रैली पर पूरी तरह पाबंदी लगाई गई है.

ये ज़िले हैं कानपुर, गाज़ियाबाद, बुलंदशहर, मेरठ, मुज़फ़्फ़रनगर, बागपत, शामली, आगरा और फ़िरोज़ाबाद, जहां शुक्रवार को पुलिस की कड़ी निगरानी रहेगी.

शुक्रवार को नमाज़ के बाद के माहौल को शांत रखने के लिहाज से पीएसी और अर्द्धसैनिक बलों को लगाया गया है और ड्रोन कैमरे से भी निगरानी की जा रही है.

यूपी के कुछ ज़िलों में बीते शुक्रवार को जुमे की नमाज़ के बाद प्रदर्शनों के दौरान हिंसा हुई थी.

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CAA: येदियुरप्पा के यूटर्न के बाद ममता देंगी मंगलुरु के मृतकों के परिवार को पैसे

कर्नाटक के मंगलुरु में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ हुए प्रदर्शन में मारे गए दो प्रदर्शनकारियों के मामले में राजनीति बढ़ती जा रही है.

पहले कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने दोनों मृतकों के परिवार को 10 लाख रुपये मुआवजे की घोषणा की और फिर उसे वापस लेते हुए इस मामले में जांच के आदेश दे दिए.

अब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गुरुवार को यह घोषणा की कि उनकी तृणमूल कांग्रेस पार्टी कर्नाटक के मंगलुरु में नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन के दौरान मारे गए दो लोगों के परिवारों को पांच लाख रुपये देगी.

ममता ने कहा, "तृणमूल कांग्रेस, ग़रीब पार्टी होने के बावजूद, इन परिवारों की मदद के लिए मजदूर संघ के नेताओं का एक प्रतिनिधिमंडल कर्नाटक भेजेगी और हम प्रत्येक परिवार को पांच लाख रुपये देंगे."

कर्नाटक बीजेपी ने ममता की इस घोषणा पर प्रतिक्रिया दी है. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा, "रेलवे को 300 करोड़ का नुकसान हुआ लेकिन दोषियों के ख़िलाफ़ एफ़आईआर तक नहीं की गई. उन्होंने अपना जन समर्थन खो दिया है."

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Image caption प्रकाश करात

'और दस राज्य विरोध करें तो एनपीआर ख़त्म हो जाएगा'

मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी (सीपीएम) नेता प्रकाश करात ने गुरुवार को कहा कि केरल और पश्चिम बंगाल की तरह 10 और राज्यों के मुख्यमंत्री अपने वादे पर टिके रहे और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) का काम रोक दें, तो एनपीआर को लेकर केंद्र की योजना 'दफ़न' हो जाएगी.

चेन्नई में वामपंथ समर्थित संगठन की ओर से नागरिकता क़ानून में संशोधन के विरोध में आयोजित एक सेमिनार को करात संबोधित कर रहे थे.

न्यूज़ एजेंसी पीटीआई के मुताबिक करात ने कहा, "अब तक 12 राज्यों ने घोषणा की है कि वे एनपीआर नहीं होने देंगे. केरल और पश्चिम बंगाल ने जो किया है, 10 और मुख्यमंत्रियों को करना होगा."

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'विकिपीडिया पर रोक अभिव्यक्ति के अधिकार का उल्लंघन'

विकिपीडिया वेबसाइट चलाने वाली विकीमीडिया फ़ाउंडेशन ने तुर्की के एक कोर्ट के उस फ़ैसले का स्वागत किया है जिसमें कहा गया है कि उनकी वेबसाइट पर देशव्यापी प्रतिबंध असंवैधानिक है.

अदालत ने फ़ैसला सुनाते हुए कहा कि देशभर में वेबसाइट पर रोक लगाना अभिव्यक्ति के अधिकार का उल्लंघन है.

तुर्की सरकार ने साल 2017 में विकीपीडिया पर प्रतिबंध लगा दिया था.

ये प्रतिबंध वेबसाइट पर मौजूद उन जानकारियों को देखते हुए लगाया गया था जिनमें लिखा गया था कि तुर्की ने सीरिया में आतंकी संगठनों को समर्थन किया था.

विकीमीडिया फ़ाउंडेशन इस मामले को लेकर यूरोपीय मानवाधिकार कोर्ट में भी गई है.

कोर्ट में मौजूद फ़ाउडेंशन के मुख्य वक़ील शैन ने कहा, "विकीमीडिया इस फ़ैसले का स्वागत करता है. लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल भी नहीं है कि यूरोपीय मानवाधिकार कोर्ट से इसे वापस ले लिया जाएगा. हमें तुर्की के संवैधानिक कोर्ट के इस फ़ैसले को बारीकी से देखने के लिए वक़्त लेना होगा. हमें इसके सभी आयामों को देखना होगा."

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