असम में डिटेंशन सेंटर बनने की क्या है कहानी?

  • 28 दिसंबर 2019
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Image caption वरिष्ठ वकील हाफ़िज़ रशीद अहमद चौधरी

गुवाहाटी हाई कोर्ट के जस्टिस बिप्लब कुमार शर्मा की बेंच ने जुलाई 2008 में एक फ़ैसला सुनाते हुए कहा था, "अक्सर लोग विदेशी घोषित होने के बाद ग़ायब हो जाते हैं इसलिए उन्हें पकड़कर रखने के लिए राज्य सरकार डिटेंशन सेंटर की व्यवस्था करे ताकि उन्हें यहां से निर्वासित किया जा सके."

उस समय विदेशी घोषित हुए लोगों के लिए डिटेंशन सेंटर जैसी कोई अलग व्यवस्था नहीं थी. अदालत के आदेश के बाद असम सरकार ने केंद्र सरकार से परामर्श लेकर 17 जून, 2009 में राज्य में डिटेंशन सेंटर स्थापित करने के लिए एक अधिसूचना जारी की.

इस तरह पहला अस्थाई डिटेंशन सेंटर ग्वालपाड़ा जेल में स्थापित किया गया और बाद में तीन और खोले गए.

गुवाहाटी हाई कोर्ट में विदेशी नागरिकों के आधे से ज़्यादा मामले लड़ रहे वरिष्ठ वकील हाफ़िज़ रशीद अहमद चौधरी ने असम में डिटेंशन सेंटर स्थापित करने के बारे में बीबीसी से बात करते हुए ये जानाकरियां दीं.

उन्होंने कहा, "पहले विदेशी नागरिकों को जेल में आम अपराधियों के साथ ही क़ैद करके रखा जाता था जो मानवीय स्तर पर सही नहीं था. विदेशी घोषित की गईं महिलाएं अपने छोटे बच्चों के साथ जेल में आम अपराधियों के साथ ही बंद थीं. मानवाधिकार के लिए काम करने वाले लोगों ने इस मामले को काफ़ी उठाया. उसके बाद 2011 से जेल में ही विदेशी घोषित लोगों के लिए अलग सेल की व्यवस्था की गई. उसे ही डिटेंशन सेंटर या फिर हिरासत केंद्र कहा जाता है."

उस दौरान जस्टिस बिप्लब कुमार शर्मा ने 50 से अधिक बांग्लादेशी नागरिकों को निर्वासित करने का आदेश दिया था, जिन्होंने भारतीय नागरिकता "धोखाधड़ी" से हासिल की थी और यहां तक कि असम में मतदाता बन गए थे. 2008 में बीबीसी के संवाददाता रहे सुबीर भौमिक ने यह रिपोर्ट की थी.

डिटेंशन सेंटरों के अस्तित्व पर चर्चा

दरअसल असम के ग्वालपाड़ा ज़िले के माटिया गांव की 20 बीघा ज़मीन पर निर्माण हो रहे एक स्थाई डिटेंशन सेंटर के सच को लेकर बीजेपी और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बहस हो रही है. एक-दूसरे को झूठा-सच्चा साबित करने के लिए दोनों दलों के नेता अपनी-अपनी बातें रख रहे हैं.

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Image caption चंद्रधर दास को सिल्चर जेल में रखा गया है.

यह पूरी बहस बीते शनिवार को दिल्ली के रामलीला मैदान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस दावे के बाद शुरू हुई जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत में कोई डिटेंशन सेंटर नहीं है.

प्रधानमंत्री ने इसे अफ़वाह बताया था. जबकि असम में मौजूद डिटेंशन सेंटर का सच प्रधानमंत्री मोदी के दावे से बिलकुल अलग है.

असम में इस समय कुल छह डिटेंशन सेंटर हैं जो यहां के अलग-अलग केंद्रीय कारागारों में अस्थाई तौर पर चल रहे हैं. ये डिटेंशन सेंटर अर्थात हिरासत केंद्र उन लोगों के लिए खोले गए जिन्हें क़ानूनी प्रक्रिया के तहत अवैध नागरिक घोषित किया गया है.

ग्वालपाड़ा, कोकराझाड़, तेजपुर, जोरहाट, डिब्रूगढ़ और सिलचर जेल के अंदर बनाए गए इन डिटेंशन सेंटरों में विदेशी घोषित किए गए 1033 लोग रह रहे हैं. ये आंकडे़ इस साल 25 जून तक के हैं और यह जानकारी भारत सरकार की है.

दरअसल, केंद्रीय गृह राज्यमंत्री जीके रेड्डी ने संसद में इसी साल जुलाई में कांग्रेस सांसद शशि थरूर द्वारा पूछे गए एक सवाल के जवाब में यह जानकारी दी थी.

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Image caption सिलचर जेल जहां डिटेंशन सेन्टर है.

वरिष्ठ वकील हाफ़िज़ राशिद अहमद चौधरी कहते है,"अब भी डिटेंशन सेंटर में दो तरह के विदेशियों को रखा जा रहा है. एक वो विदेशी नागरिक हैं जो वैध काग़ज़ात जैसे कि पासपोर्ट और वीज़ा लेकर भारत आए थे लेकिन उनकी मियाद ख़त्म हो जाने के बाद भी वापस नहीं गए. ऐसे क़रीब 35 आईडेंटिफ़ाइड विदेशी नागरिक हैं, जिन्होंने स्वीकार किया है कि वे दूसरे देशों से आए हैं."

"दूसरी तरह के वे लोग हैं जिनकी नागरिकता संदिग्ध है और उन्हें विदेशी ट्रिब्यूनल ने अवैध नागरिक घोषित किया है. इन सभी को एक ही डिटेंशन कैंप में रखा जा रहा है. विदेशी ट्रिब्यूनल से घोषित किसी भी अवैध नागरिक ने अदालत के समक्ष यह नहीं स्वीकारा है कि वो बाहर से यहां आए हैं. इनमें हिंदू और मुसलमान बराबर की संख्या में हैं."

'अघोषित उम्रक़ैद'

जेलों में अस्थाई डिटेंशन सेंटर स्थापित करने से वहां के क़ैदियों को क्या फ़र्क़ पड़ा? इस सवाल का जवाब देते हुए वकील राशिद अहमद चौधरी कहते हैं कि इससे विदेशी घोषित हुए नागरिकों को केवल एक अलग सेल में रहने की सुविधा दी गई, बाक़ी कुछ भी फ़र्क़ नहीं पड़ा.

वो बताते हैं, "जघन्य अपराध करके आए क़ैदियों को जेल मैनुअल के हिसाब से कई सारी सुविधाएं मिलती हैं. सज़ा याफ़्ता क़ैदियों को परोल पर जेल से बाहर जाने की छुट्टी मिलती है लेकिन वो सबकुछ विदेशी घोषित हुए नागरिकों के लिए नहीं है."

"विदेशी घोषित हुए लोगों के लिए नोटिफ़िकेशन में इतना तक लिखा गया कि जब तक उन लोगों को उनके अपने देश में नहीं भेजा जाता, उन्हें डिटेंशन सेंटर में ही रखा जाएगा. चूंकि यह पूरा मुद्दा बांग्लादेशी घुसपैठ से जुड़ा है और बांग्लादेश इन्हें लेने के लिए तैयार नहीं है, ऐसे में यह एक उम्रक़ैद जैसी सज़ा बन गई थी."

हालांकि, इस साल की शुरुआत में भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट की एकल पीठ ने फ़ैसला सुनाया कि देश में रहने वाले विदेशियों को ज़मानत पर रिहा किया जा सकता है अगर उसने तीन साल हिरासत में यानी डिटेंशन सेंटर में बिताए हैं.

शर्त ये भी है कि उस व्यक्ति को एक सुरक्षित डेटाबेस के लिए बायोमीट्रिक विवरण के साथ ही गारंटी के रूप में दो भारतीय नागरिकों से 1 लाख रुपये के सुरक्षा बॉन्ड भरवाकर देने होंगे.

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Image caption ग्वालपाड़ा में स्थित विदेशी ट्रिब्यूनल

कांग्रेस सरकार में बने थे डिटेंशन सेंटर

साल 2009 में जब हाई कोर्ट के आदेश पर डिटेंशन सेंटर बनाए गए थे, उस समय असम में मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार थी.

घुसपैठ के मुद्दे पर 2009 में असम में कांग्रेस सरकार के राजस्व मंत्री रहे भूमिधर बर्मन ने असम विधानसभा को सूचित करते हुए कहा था कि 'ऐसे आप्रवासियों, जिनकी पहचान या राष्ट्रीयता स्थापित नहीं की गई है, उनके लिए राज्य सरकार मानकछार और महीसाशन में दो डिटेंशन कैंप बनाएगी.'

बीजेपी नेता संबित पात्रा ने प्रधानमंत्री मोदी के देश में एक भी डिटेंशन सेंटर नहीं होने के बयान का बचाव करते हुए शुक्रवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक दावा किया था. उन्होंने कहा था, ''13 दिसंबर 2011 को केंद्र सरकार के एक प्रेस रिलीज़ में कहा गया था कि 3 डिटेंशन कैंप असम में खोले गए हैं. साल 2011 में केंद्र में कांग्रेस सरकार थी.''

संबित पात्रा ने यह भी कहा कि 'अक्टूबर 2012 में असम सरकार ने विदेशियों के मुद्दे पर श्वेत पत्र जारी किया था और कहा था कि केंद्र ने हमें डिटेंशन सेंटर बनाने के निर्देश दिए हैं.'

भाजपा प्रवक्ता की इन्हीं बातों का जवाब देते हुए असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने बीबीसी से कहा, "2008 में गुवाहाटी हाई कोर्ट के जज बिप्लब कुमार शर्मा ने डिटेंशन सेंटर स्थापित करने के लिए हमें निर्देश दिए थे. लेकिन हमने असम में डिटेंशन सेंटर 2011 में बनवाए. डिटेंशन सेंटर स्थापित करने का यह पूरा आइडिया अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के समय का ही था."

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पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गोगोई ने दावा किया, "जब 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे, उस समय डिटेंशन सेंटर बनाने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिए गए थे. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बाक़ायदा सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को एक पत्र (No. 25019/3/97-F-III dated July 2, 1998) जारी किया, जिसमें सुझाव दिया गया कि निर्वासन का इंतज़ार कर रहे विदेशी नागरिकों के आवागमन को प्रतिबंधित करने के लिए इस तरह के डिटेंशन सेंटर खोले जाने चाहिए."

उन्होंने कहा, "साल 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने असम में एक स्थाई और बड़ा डिटेंशन सेंटर निर्माण करने के लिए 46 करोड़ रुपये की मंज़ूरी दी. उसी पैसे से ग्वालपाड़ा के माटिया में डिटेंशन सेंटर बन रहा है. प्रधानमंत्री को देश के लोगों से झूठ नहीं बोलना चाहिए.''

गोगोई कहते हैं, ''अब भाजपा के लोग कह रहे हैं कि ये डिटेंशन कैंप कांग्रेस के समय बनाया गया था तो फिर 2018 में 46 करोड़ रुपये को मोदी सरकार ने मंज़ूरी क्यों दी. असम में जो छह डिटेंशन कैंप चल रहे हैं, अगर पीएम मोदी देश में डिटेंशन कैंप नहीं होने की बात कह रहे हैं तो प्रदेश की भाजपा सरकार उसे लगातार जारी क्यों रखे हुए है? प्रधानमंत्री लगातार लोगों से झूठ बोल रहे हैं. असम में ही नहीं बल्कि कर्नाटक जैसे बीजेपी शासित राज्य में भी डिटेंशन सेंटर हैं."

क्या डिटेंशन सेंटर ज़रूरी हैं?

असम में मौजूद डिटेंशन सेंटर पर छिड़ी राजनीतिक बहस पर वरिष्ठ पत्रकार बैकुंठनाथ गोस्वामी कहते हैं, "भारत सरकार के साथ 1985 में हुए असम समझौते की शर्तों के अनुसार 24 मार्च 1971 के बाद असम में प्रवेश करने वाले अवैध नागरिकों की शिनाख़्त कर उन्हें बाहर निकालने की बात तय की गई थी. फिर चाहे वो हिंदू हों या मुसलमान. लेकिन भाजपा के सत्ता में आने के बाद यह स्थिति बदल गई है. नागरिकता संशोधन क़ानून के ज़रिये उन तमाम हिंदुओं को भारत की नागरिकता मिल जाएगी जो एनआरसी से बाहर हुए हैं या फिर फ़ॉरनर्स ट्रिब्यूनल से विदेशी घोषित किए गए हैं."

"एक तरफ़ प्रधानमंत्री मोदी देश में एक भी डिटेंशन सेंटर नहीं होने की बात सार्वजनिक रूप से कहते हैं, वहीं प्रदेश की भाजपा सरकार असम में चल रहे 100 फ़ॉरनर्स ट्रिब्यूनल की संख्या को एक हज़ार तक बढ़ाने की घोषणा कर चुकी है. अगर और अवैध नागरिक मिलते हैं तो उन्हें हिरासत केंद्रों में ही रखना होगा."

"असम में 24 मार्च 1971 के बाद आए कई अवैध नागरिकों की शिनाख़्त तो हुई लेकिन भारत सरकार की मजबूरी यह है कि उन्हें बांग्लादेश वापस नहीं भेजा जा सकता. इसका कारण यह है कि अब तक बांग्लादेश के साथ भारत का ऐसा कोई समझौता ही नहीं हुआ है. ऐसी स्थिति में इन अवैध नागरिकों को कहां रखा जाएगा? ऐसे भी कई मामले हुए कि विदेशी ट्रिब्यूनल ने जिन लोगों को विदेशी नागरिक घोषित किया, वो लापता हो गए. इस तरह के संकट को देखते हुए ही हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को डिटेंशन सेंटर बनाने का निर्देश दिया था."

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Image caption असम के सिल्चर जेल से एक बांग्लादेशी नागरिक को अपने देश भेजा गया. फ़ाइल फ़ोटो.

गुवाहाटी हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील कमल नयन चौधरी डिटेंशन व्यवस्था को ग़लत नहीं मानते लेकिन वो इन हिरासत केंद्रों में बंद लोगों के लिए न्यूनतम सुविधाओं की बात करते हैं.

वो कहते हैं, "क़ानूनी प्रक्रिया के ज़रिये जिन लोगों को विदेशी घोषित किया जाता है, उन्हें डिटेंशन सेंटर में रखना ही होगा क्योंकि ऐसे लोगों को खुला छोड़ना देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए सही नहीं होगा. डिटेंशन सेंटर वैध हैं लेकिन वहां बंद लोगों को न्यूनतम सुविधाएं नहीं मिलेंगी तो यह मानवाधिकार का उल्लंघन है. विदेशी होने का यह मतलब नहीं है कि वे अपने जीवन और स्वतंत्रता के हक़दार नहीं हैं."

कमल नयन चौधरी कहते हैं, "असम में सरकार चाहे जिसकी भी रही हो, सभी ने इन विषयों पर काम करने की जगह इसे राजनीतिक मुद्दा ही बनाया है."

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