अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाने में मोदी सरकार की मुश्किल

  • 29 दिसंबर 2019
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क़ानून की जिस लंबी लड़ाई के बाद राम मंदिर निर्माण का रास्ता निकला, उससे लगता था कि अब कोई मुश्किल नहीं होगी और निर्माण का काम तुरंत शुरू हो जाएगा.

सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर के लिए जिस ट्रस्ट को तीन महीने में बनाने की ज़िम्मेदारी सरकार को सौंपी थी, वो आधा से ज़्यादा वक्त निकलने के बावजूद अभी नामों को अंतिम रूप देने की लड़ाई में फंसा हुआ है.

सरकार के लिए यह काम आसान नहीं है कि वो ट्रस्ट का अध्यक्ष किसे बनाए, क्योंकि इस एक 'अनार' के लिए 'सौ दावेदार' बताए जा रहे हैं.

राम जन्मभूमि विवाद पर नौ नवम्बर को दिए अपने फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को तीन महीने में ट्रस्ट बनाने को कहा है. इस ट्रस्ट का काम मंदिर निर्माण और उसके बाद मंदिर की देखरेख होगा.

सर्वोच्च अदालत ने अपने फ़ैसले में भले ही निर्मोही अखाड़े को बाहर कर दिया था लेकिन उसने इस ट्रस्ट में निर्मोही अखाड़े को रखने के निर्देश भी दिए हैं.

फ़ैसले के बाद केंद्र सरकार ट्रस्ट के निर्माण की तैयारियों में लग गई है. ट्रस्ट के निर्माण तक सारे अधिकार केंद्र सरकार के पास रहेंगे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने इस सिलसिले में कई लोगों से चर्चा भी की है.

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'ट्रस्ट में बीजेपी की कोई हिस्सेदारी नहीं'

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी नवंबर के आख़िर में वाराणसी में संघ के सरकार्यवाह भैयाजी जोशी, सह-सरकार्यवाह डॉक्टर कृष्णगोपाल समेत संघ के प्रांतीय नेताओं से इस विषय पर विस्तार से चर्चा की है.

केंद्रीय गृह मंत्री और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ट्रस्ट में बीजेपी की हिस्सेदारी नहीं होगी यानी बीजेपी का कोई नेता इसमें शामिल नहीं होगा. इसके साथ ही आरएसएस ट्रस्ट में संगठन के तौर पर शामिल नहीं होगा. हालांकि संघ के प्रतिनिधि ट्रस्ट में शामिल हो सकते हैं.

बताया जा रहा है कि ट्रस्ट के सलाहकार मंडल के नाम तय हो गए हैं. इसमें प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृहमंत्री, उत्तर प्रदेश के राज्यपाल और मुख्यमंत्री रहेंगे. कार्यकारिणी के सदस्यों को लकर अभी अंतिम रूप नहीं दिया गया है.

ट्रस्ट में मंदिर निर्माण सेवा के लिए अलग समिति होगी. यह समिति ही मंदिर निर्माण के काम को देखेगी. इस समिति में उनमें से लोगों को शामिल किया जाएगा जो राम जन्मभूमि आंदोलन से किसी न किसी तरह जुड़े रहे हैं. इनमें साधु-संतों के अलावा बुद्धिजीवी, वकील और पूर्व प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी भी हो सकते हैं.

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ट्रस्ट के अध्यक्ष पद की लड़ाई

अयोध्या एक्ट 1993 के तहत चैप्टर-2 सेक्शन-6 में कहा गया है कि केंद्र सरकार चाहे तो अपनी शर्तों पर प्रबंधन की ज़िम्मेदारी किसी ट्रस्ट को दे सकती है. यह एक्ट कांग्रेस के नरसिम्हा राव सरकार के वक़्त बनाया गया था.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बनने वाला यह पहला बड़ा ट्रस्ट होगा जिसमें मंदिर निर्माण से पहले ट्रस्ट का गठन किया जाएगा. इससे पहले बने ट्रस्ट पहले से निर्मित मंदिरों की ज़िम्मेदारी के लिए गठित किए गए थे. केंद्र सरकार इस ट्रस्ट के लिए संसद में बिल ला सकती है.

ट्रस्ट में देरी की एक बड़ी वजह इसके अध्यक्ष पद के लिए नाम को लेकर है . ट्रस्ट के अध्यक्ष पद के लिए धर्माचार्यों, शंकराचार्यों, राजनेताओं और संघ के पदाधिकारियों की भी दावेदारी है.

फ़िलहाल राम जन्मभूमि ट्रस्ट के अध्यक्ष नृत्यगोपाल दास हैं. ट्रस्ट का काम मंदिर निर्माण, उसके लिए पैसे का इंतज़ाम करना, प्रशासन, पूजा और व्यवस्था देखना भी होगा.

ट्रस्ट में सदस्यों की संख्या, उनकी ज़िम्मेदारी और ट्रस्ट के अधिकारों को अंतिम रूप देने का काम केंद्र सरकार करेगी, उसे अंतिम रूप दिया जा रहा है.

माना जा रहा है कि इस ट्रस्ट का निर्माण देश की आज़ादी के बाद बने सोमनाथ मंदिर ट्रस्ट की तरह किया जा सकता है लेकिन इसमें सदस्यों की संख्या उससे ज़्यादा होगी. सोमनाथ मंदिर में आठ सदस्यों का ट्रस्टी बोर्ड है.

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ट्र्स्ट के काम में दख़ल नहीं दे सकती सरकार

इनमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, लालकृष्ण आडवाणी, केशूभाई पटेल हर्षवर्धन नेवतिया, पीके लहरी और जीडी परमार शामिल हैं. ये सभी लोग ट्रस्ट में व्यक्तिगत क्षमता में शामिल हैं यानी प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के पदेन तौर पर नहीं हैं.

ट्रस्ट में केंद्र और राज्य सरकार चार-चार सदस्यों को नॉमिनेट करती है. इस ट्रस्ट में एक अध्यक्ष और एक सचिव का पद होता है. सरकार भले ही इन सदस्यों को नॉमिनेट करती है लेकिन वो ट्रस्ट के काम में दख़ल नहीं दे सकती.

अध्यक्ष के लिए सभी सदस्य हर साल वोट करते हैं. फ़िलहाल केशूभाई पटेल ट्रस्ट के चेयरमैन हैं. ये सभी आजीवन सदस्य हैं, जब तक कि वे खुद इस्तीफ़ा ना दें या बोर्ड उन्हें हटा ना दे.

सोमनाथ ट्रस्ट मंदिर के लिए चंदा इकट्ठा करता है और उसकी आमदनी पर टैक्स नहीं चुकाना पड़ता. इस ट्रस्ट के पास 2,000 एकड़ ज़मीन और प्रभाष पाटन में मौजूद दूसरे 60 से ज़्यादा मंदिरों का मैनेजमेंट है.

माना जाता है कि सोमनाथ मंदिर को ख़ुद भगवान चन्द्रदेव ने बनवाया था. तब यह पूरी तरह से सोने से बना मंदिर था. साल 1026 में महमूद गजनी ने भारत आकर सोमनाथ मंदिर पर हमला किया और लूटपाट की.

इसके बाद मालवा के परमार राजा भोज और गुजरात के सोलंकी राजा भीम ने मंदिर का फिर से निर्माण करवाया. औरंगज़ेब ने भी सोमनाथ मंदिर पर ने 1706 में हमला किया था.

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जब गांधी ने कहा, मंदिर बनाने के लिए खर्च न हो सरकारी पैसा

देश में आज़ादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निमाण की बात शुरु हुई. आज़ादी से पहले सोमनाथ मंदिर जूनागढ़ रियासत में आता था. बंटवारे के बाद जब जूनागढ़ रियासत का भारत में विलय हो गया तब सोमनाथ मंदिर के फिर से निर्माण की बात हुई.

तब सरदार पटेल और केएम मुंशी महात्मा गांधी के पास गए और मंदिर के पुनर्निर्माण की बात उनसे की. उस वक़्त महात्मा गांधी ने कहा, "मंदिर को बनाने में सरकार का पैसा खर्च नहीं होना चाहिए. जनता चाहे तो वो इसके लिए पैसा इकट्ठा करके इसका पुनर्निमाण कर सकती है."

तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी सरकार को मंदिर निर्माण से अलग रखना चाहते थे. नेहरू का मानना था कि मंदिर निर्माण में सरकारी भूमिका से उसकी धर्मनिरपेक्ष छवि पर असर पड़ेगा. फिर सरदार पटेल ने तमाम सलाह मशविरों, विरोध और समर्थन के बाद नया मंदिर बनाने के बारे में फ़ैसला किया.

जामनगर में 23 जनवरी 1949 को हुए एक सम्मेलन में इसके लिए दो दानदाताओं, केंद्र सरकार के दो मंत्रियों, दो नामचीन व्यक्तियों और सौराष्ट्र सरकार के दो नुमाइंदों की सदस्यता वाले ट्रस्ट के गठन का फ़ैसला हुआ.

पटेल और गांधी के निधन के बाद केएम मुंशी ने मंदिर के पुनर्निर्माण की ज़िम्मेदारी उठाई. उन्होंने इसके लिए बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट ,1950 के तहत मंदिर की देखभाल के लिए नया ट्रस्ट बनाया ताकि सरकार उससे दूर रह सके.

इस तरह सोमनाथ मंदिर पुनर्निमाण का काम शुरु हुआ. मई, 1951 में जब मंदिर बन कर तैयार हुआ और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद को इसके उद्घाटन समारोह के लिए बुलाया गया तब वो नेहरू की नाराज़गी के बावजूद उस समारोह में शामिल हुए.

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सोमनाथ मंदिर की तर्ज़ पर अयोध्या मंदिर

सोमनाथ मंदिर की ही तरह अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए भी जनता से पैसा इकट्ठा किया जाएगा, सरकार इसमें एक भी पैसा नहीं खर्च करेगी.

फ़िलहाल 67 एकड़ ज़मीन पर मंदिर निर्माण किया जाना है लेकिन बहुत से लोग इसे और बढ़ाने के साथ मंदिर के पहले से बने मॉडल में बदलाव की बात कर रहे हैं. राम जन्मभूमि न्यास बरसों से मंदिर के लिए पत्थरों की कटाई छंटाई का काम कर रहा है और काफ़ी हद तक काम हो चुका है.

संघ और विश्व हिन्दू परिषद के कामकाज के तरीके को देखा जाए तो वह देश और दुनिया से ज़्यादा से ज़्यादा भागीदारी से मंदिर के निर्माण के काम को करेगा. इससे पहले रामशिलाओं को लाने के लिए भी पूरे देश से राम नाम की शिलाएं मंगवाई गईं थीं.

यहां तक कि जब 60 के दशक में नागपुर में डॉक्टर हेडगेवार स्मृति स्मारक बनाया जाने था तब विदर्भ और नागपुर प्रांत इसके लिए पूरा पैसा इकट्ठा करे की ज़िम्मेदारी उठाने को तैयार था, लेकिन तब सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर ने देशभर से 'एक स्वयंसेवक-एक रुपया' की तर्ज़ पर चंदा इकट्ठा करने का फ़ैसला किया.

हाल ही में गुजरात में सरदार पटेल की स्टेच्यू ऑफ़ यूनिटी के लिए भी नरेंद्र मोदी ने देश भर से लोहा इकट्ठा करने की अपील की थी. यानी साफ़ है कि मंदिर निर्माण के लिए पैसा इकट्ठा करने का एक नया आंदोलन और कार्यक्रम शुरू होगा.

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