राजस्थान: कोटा के अस्पताल में एक महीने में 77 बच्चों की मौत

  • 29 दिसंबर 2019
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राजस्थान के कोटा में जे.के. लोन मातृ एवं शिशु चिकित्सालय एवं न्यू मेडिकल कॉलेज नाम के एक सरकारी अस्पताल में 48 घंटों में 10 छोटे बच्चों की मौत के बाद सरकार ने अस्पताल के सुपरिटेंडेंट को हटा दिया है और जाँच के आदेश दिए हैं.

इस अस्पताल में एक माह में 77 बच्चों की मौत का आंकड़ा दर्ज किया गया है. इस घटना पर विपक्ष ने सरकार पर तीखे प्रहार किए हैं.

उधर, सरकार ने प्रतिपक्ष पर राजनीति करने का आरोप लगाया है. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कहते हैं कि पिछले छह सालों में इस तरह से जान जाने के मामलों में कमी आई है.

जनस्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है देश में प्राथमिक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा बहुत कमज़ोर है और यही बच्चों की अकाल मौत का कारण है.

इस मामले के तूल पकड़ने के बाद सरकार हरकत में आई और अस्पताल अधीक्षक एचएल मीणा को देखरेख में कमी बरतने के आरोप में पद से हटा दिया है.

उनकी जगह डॉक्टर सुरेश दुलरिया को नियुक्त किया गया है.

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Image caption जे.के. लोन अस्पताल

'नाज़ुक स्थिति में थे बच्चे'

डॉक्टर दुलरिया ने बीबीसी से कहा, "हॉस्पिटल में आधारभूत सुविधाओं में सुधार और बढ़ोतरी का काम हाथ में लिया गया है."

डॉक्टर दुलरिया कहते हैं, "जो मौतें हुई हैं, उनमें वे बच्चे शामिल हैं जो बहुत नाज़ुक स्थिति में हॉस्पिटल लाए गए थे. कुछ ऐसे थे जो जन्म के साथ ही कमज़ोर थे और किसी दूसरे हॉस्पिटल से सरकारी अस्पताल में लाए गए थे."

इस घटना के बाद विपक्ष के निशाने पर आई राज्य सरकार ने अधिकारियों की टीम कोटा भेजी और घटना की जाँच के आदेश दिए.

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मीडिया से बातचीत में कहा, "विगत छह सालों में इस वर्ष सबसे कम मौते हुईं हैं. पहले किसी साल 1500, कभी 1400 और कभी 1300 मौतें हुई हैं. मगर इस बार क़रीब 900 मौतें हुई हैं. लोगों की सेहत बेहतर रहे, इसके लिए सरकार ने निरोगी राजस्थान कार्यक्रम शुरू किया है. सरकार बनते ही स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करने के लिए कई क़दम उठाए गए हैं. एक भी बच्चे की जान जाना दुर्भाग्यपूर्ण है. मां और बच्चा सुरक्षित रहें, यही हमारी प्राथमिकता है."

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बीजेपी का सरकार पर हमला

उधर, राज्य बीजेपी के अध्यक्ष सतीश पूनिया ने कोटा अस्पताल का दौरा किया और हालात का जायज़ा लिया. पूनिया ने कहा, "इन मौतों के बाद भी सरकार का रवैया संवेदनहीन है."

कोटा से लौटने के बाद पूनिया ने बीबीसी से कहा, "मैंने ख़ुद मौक़े पर जाकर देखा है. तस्वीरें बहुत व्यथित करने वाली थीं. सरकार का रुख़ अमानवीय है. हम नज़र रखे हुए हैं. इसीलिए दो पूर्व चिकित्सा मंत्रियों राजेंद्र राठौड़ और कालीचरण सर्राफ़ की सदस्यता वाली एक कमेटी गठित कर मामले की तह तक पहुंचा जाएगा."

बीजेपी अध्यक्ष पूनिया ने कहा कि उनके लिए यह मुद्दा सियासत का नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना का है.

पूनिया ने अपनी पार्टी के पांच विधायकों से बात कर उनके कोष से दस-दस लाख रुपये हॉस्पिटल को देने का तय किया है. ताकि अस्पताल में ज़रूरी सुविधाओं की व्यवस्था की जा सके.

राज्य की पूर्व मुख्य मंत्री वसुंधरा राजे ने भी इस घटना के लिए कांग्रेस सरकार को आड़े हाथों लिया है.

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'मुफ़्त दवा स्कीम से सरकारों पर दबाव'

हॉस्पिटल के अधीक्षक डॉक्टर दुलारिया ने बीबीसी से कहा, "राज्य में मुफ़्त दवा स्कीम लागू किए जाने के बाद सरकारी अस्पतालों पर दबाव बढ़ा है. इस बढ़ते भार के अनुरूप हॉस्पिटल को तैयार किया जा रहा है."

इस घटना के बाद हॉस्पिटल में ऑक्सीजन लाइन को ठीक करने का काम शुरू किया गया है.

हॉस्पिटल में संबधित विभाग के प्रमुख डॉ. अमृत लाल बैरवा ने मीडिया से कहा, "हॉस्पिटल में पर्याप्त डॉक्टर नहीं हैं. इन सबके बीच हॉस्पिटल स्टाफ़ इलाज के लिए पहुंचते मरीज़ों की ठीक से देखभाल कर रहे हैं."

डॉक्टर बैरवा ने मीडिया से कहा, "हमारे प्रयासों से ऐसी मौतों में कमी आई है. अस्पतालों पर मुफ़्त जाँच और दवा योजना के बाद काफ़ी दबाव बढ़ा है. क्योंकि प्राइवेट अस्पतालों में इलाज काफ़ी महंगा है."

डॉक्टर बैरवा ने रिकॉर्ड का हवाला देकर बताया, "वर्ष 2014 में 15 हजार 719 मरीज दाखिल हुए, उसमें से 1198 की मौत हुई. 2015 में 17569 दाखिल हुए. जबकि 1260 की मृत्यु हुई. वर्ष 2016 में 17892 भर्ती हुए और 1193 की मृत्यु हुई. वर्ष 2017 में मरीजों की संख्या 17216 और मृत्यु 1027, वर्ष 2018 में 16436 के मुक़ाबले 1005 की मौत हुई. इस वर्ष ये संख्या 940 है."

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डॉक्टर बैरवा ने कहा अस्पताल में आने वालों की संख्या हर साल बढ़ रही है मगर अनुपात में ऐसी मौतों में संख्या में कमी आ रही है.

राज्य में जनस्वास्थ्य पर काम करने वाले डॉक्टर नरेंद्र गुप्ता ने बीबीसी से कहा, "प्राथमिक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा बहुत कमज़ोर है. पहले ऐसी मौतें घर पर ही हो जाती थीं, अब मरीज़ अस्पताल तक पहुंच रहे हैं. ऐसी मौतें तभी रुक सकती हैं जब ज़मीनी स्तर पर बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं हों. ये भी एक तथ्य है कि डॉक्टर देहाती क्षेत्र में जाना नहीं चाहते. जो बच्चे मर रहे हैं, उनमें काफ़ी कुपोषित होते हैं. प्रसव भी काफ़ी जटिल रहा होगा."

डॉक्टर गुप्ता कहते हैं, "अगर तहसील स्तर पर स्वास्थ्य सेवाएं ठीक हों तो काफ़ी सुधार हो सकता है क्योंकि ऐसे मरीज़ बड़े अस्पतालों तक देर में पहुंचते हैं. पहले वे स्थानीय स्तर पर कोशिश करते हैं."

डॉक्टर गुप्ता कहते हैं, "अस्पतालों पर काफ़ी भार होता है. प्राथमिक और मध्यम स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा न के बराबर है. तभी इन लोगों को कोटा जैसे बड़े शहरों का रुख़ करना पड़ता है."

इस बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने रविवार को कोटा में उस हॉस्पिटल का दौरा किया और हालात का जायज़ा लिया. बिरला कोटा से सांसद हैं.

उन्होंने अस्पताल में स्वास्थ्य उपकरणों की कमी की जानकारी ली और इस बारे में ज़रूरी हिदायत दी.

कोटा में हाड़ोती संभाग का मुख्यालय है. इसलिए यहां कोटा के अलावा बूंदी, बारां और झालावाड़ से भी लोग उपचार के लिए आते रहे हैं.

इसके अलावा वहां बड़ी संख्या में देशभर से आकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थी भी रहते हैं.

राजस्थान में ये घटना ऐसे समय सामने आई है जब कांग्रेस सरकार ने हाल में सत्ता में अपना एक साल पूरा होने पर निरोगी राजस्थान कार्यक्रम शुरू किया था.

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