अयोध्या फ़ैसला, कश्मीर की चुनौती और महाराष्ट्र का सियासी ड्रामा: 2019 में भारतीय न्यायपालिका

  • 30 दिसंबर 2019
भारतीय न्यायपालिका के लिए कैसा रहा साल 2019 इमेज कॉपीरइट Getty Images

भारतीय न्यायपालिका के लिए साल 2019 एक बेहद ख़ास साल रहा. बरसों से लंबित ऐतिहासिक क़ानूनी मामलों की सुनवाई के साथ-साथ फ़ैसले सुनाए गए.

भारतीय न्यायपालिका ने इन मसलों को निबटाते हुए उन जटिलताओं और अराजकताओं को चिह्नित किया जो कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के साथ-साथ चलते हैं.

इन क़ानूनी मसलों में बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि मामला, सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मसला, महाराष्ट्र विधानसभा में फ़्लोर टेस्ट, कश्मीर में अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाए जाने का फ़ैसला, रफ़ाल डील, मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय को आरटीआई के अंतर्गत लाया जाना और बाग़ी विधायकों को चुनाव लड़ने की इजाज़त दिए जाने जैसे मामले शामिल थे.

इसके साथ ही इस साल लाखों लोगों को मुफ़्त क़ानूनी सहायता भी हासिल हुई.

हममें से कई लोगों को लगा कि इन मामलों से ठीक से निपटा गया है.हालांकि अदालत के फ़ैसलों के कुछ समय बाद ही पुनर्विचार याचिकाएं सामने आईं जिनसे लगा कि आने वाले समय में भी इन मुद्दों पर राजनीतिक और सामाजिक विचार-विमर्श जटिलताओं से घिरा रहेगा.

एक नज़र डालते हैं सुप्रीम कोर्ट के उन फ़ैसलों पर जिनकी साल 2019 में सबसे ज़्यादा चर्चा हुई:

अयोध्या: राम जन्मभूमि मामला

सुप्रीम कोर्ट ने साल 2019 में बाबरी मस्जिद-राम जन्मभूमि विवाद जैसे मसले का फ़ैसला दिया जो बरसों से लंबित था.

कोर्ट ने विवादित ज़मीन राम मंदिर न्यास को देने का फ़ैसला सुनाया ताकि उस पर राम मंदिर का निर्माण किया जा सके. ये वही ज़मीन थी जिस पर 1528 में बाबरी मस्जिद का निर्माण किया गया था.

साल 1992 की छह दिसंबर को हिंदुत्व का झंडा उठाने वालों ने इस मस्जिद को तोड़ दिया था. कोर्ट ने अपने फ़ैसले में सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को मस्जिद बनाने के लिए पाँच एकड़ ज़मीन देने का आदेश भी दिया है.

ये एक काफ़ी अहम मामला था क्योंकि ये केस बीते 164 सालों से चल रहा था. इस मुद्दे की वजह से सांप्रदायिक दंगे हुए जिनमें दो हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हुई. कई लोग घायल हुए और कई बच्चे अनाथ हो गए.

इस मामले ने समाज में एक ऐसी दरार पैदा की जिससे ग़ुस्सा, कड़वाहट और राजनीतिक खाई पैदा हुई. इस घटना के बाद दोनों पक्षों को जो नुक़सान हुआ वो आज भी जारी है.

कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए मंदिर के देवता को एक न्यायिक व्यक्ति माना और कहा कि 2.77 एकड़ की ज़मीन पर उनका अधिकार है. ये स्पष्ट है कि ये मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आने वाले मामलों में से सबसे ज़्यादा अजीबोग़रीब था.

90 के दशक की शुरुआत में बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी ने पूरे देश में रथयात्रा करके कहा कि जिस ज़मीन पर मस्जिद बनी हुई है वो राम लला का जन्म स्थान है और वहां पर स्थित एक मंदिर को तोड़कर बाबरी मस्जिद बनाई गई है.

आडवाणी की इस रथयात्रा ने राम मंदिर मुद्दे को हवा दी. ये एक ऐसा आंदोलन था जिसने हिंदू समाज में धार्मिक उन्माद पैदा किया जिसका परिणाम बीजेपी के उभार के रूप में सामने आया.

सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद ये स्पष्ट हो गया कि ये मुद्दा ज़हनी तौर पर इतनी जल्दी ख़त्म होने वाला नहीं है. फ़ैसले के बाद सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड ने कहा कि हिंदू पक्ष को मस्जिद की ज़मीन दिए जाने के निर्णय से संतुष्ट नहीं है.

पर्सनल लॉ बोर्ड से जुड़े कमाल फ़ारुक़ी ने कहा कि इंसाफ नहीं मिला है.

वहीं, दक्षिण पंथी संगठन अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने कोर्ट द्वारा मस्जिद बनाने के लिए अलग से ज़मीन दिए जाने पर ऐतराज़ जताते हुए कहा है कि इसकी कोई ज़रूरत नहीं थी.

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कश्मीर के युवा किस बात से नाराज़ हैं?

कश्मीर: अनुच्छेद 370 का ख़ात्मा

केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाने के बाद जम्मू-कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश बनाने का ऐलान कर दिया.

इसके साथ ही लद्दाख़ को एक राज्य में तब्दील कर दिया गया. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में सरकार के इस फ़ैसले को चुनौती देने के लिए कई याचिकाएं दाखिल कई गईं.

सु्प्रीम कोर्ट फ़िलहाल इन याचिकाओं की सुनवाई कर रही है और अगले साल की शुरुआत में इन मामलों को सात जजों की एक बेंच को भेजा जा सकता है.

इन याचिकाओं में आवाजाही पर प्रतिबंध, इंटरनेट पर पाबंदी और प्रेस स्वतंत्रता एवं जम्मू-कश्मीर में संचार सुविधाओं पर रोक जैसे मुद्दे शामिल हैं.

सरकार के मुताबिक़, उसने ये सभी कदम इस क्षेत्र के विकास और विवादित मुद्दे को सुलझाने की नीयत से उठाए हैं.

कश्मीर, भारत और पाकिस्तान के बीच आज़ादी के बाद से अब तक आपसी शत्रुता के केंद्र में रहा है.

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सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा

सुप्रीम कोर्ट ने सबीरमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे पर भी एक बड़ा फ़ैसला सुनाया है. कोर्ट ने अपने फ़ैसले में महिलाओं सबरीमला में स्थित अयप्पन मंदिर में महिलाओं को प्रवेश करने का अधिकार दिया.

इस मंदिर में उन महिलाओं को प्रवेश की अनुमति नहीं थी जो मासिक धर्म से गुज़रती हैं.

कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद बीजेपी ने केरल में इस मुद्दे का राजनीतिक लाभ उठाने के लिए कहा कि ये एक बहुत पुरानी परंपरा है और इसके साथ किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जानी चाहिए.

केरल के आम समाज का भी इस मुद्दे पर यही रुख था और बीजेपी ने इसी रुख का समर्थन करते हुए अपने लिए समर्थन जुटाने की कोशिश की. लेकिन इसके बाद हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी को इसका कोई फायदा नहीं मिला.

चुनाव के बाद लोगों ने इस पर बात करनी भी बंद कर दी और अब भी महिलाओं को इस मंदिर में प्रवेश करने की इजाज़त नहीं है.

पूर्व मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने जब इस मुद्दे पर फ़ैसला दिया तो इससे केरल में एक हलचल पैदा हुई.

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इस बेंच ने एकमत से परंपरा के ख़िलाफ़ फ़ैसला दिया था लेकिन सिर्फ एक जज इंदू मल्होत्रा ने अपना विरोध जताते हुए कहा कि कोर्ट अपने मूल्यों को आस्था के विषयों पर नहीं थोप सकती.

इसके बाद इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ 48 पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं.

दीपक मिश्रा के बाद सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस बनने वाले मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने केरल सरकार को आदेश दिया है कि सबरीमला मंदिर के प्रबंधन के लिए साल 2020 के अंत तक एक नया क़ानून बनाया जाए.

ये मामला अब सात जजों की बेंच को भेज दिया गया है. ये बेंच फ़ैसले के बाद सामने आने वाले धार्मिक मुद्दों की पुन: जांच करेगी. बेंच एक व्यापक तस्वीर को देखने की कोशिश करेगी क्योंकि इस जैसे ही तमाम दूसरे मामले कोर्ट में लंबित हैं.

इनमें मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, गैर पारसी पुरुषों से विवाह करने वाली पारसी महिलाओं के पारसी धर्म के पवित्र अग्नि स्थल अग्यारी में प्रवेश और मुस्लिम महिलाओं के खतने जैसे मामले शामिल हैं.

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महाराष्ट्र की नाटकीयता

साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट के सामने महाराष्ट्र सरकार के गठन का राजनीतिक नाटकीयता से भरा हुआ मामला भी आया.

इस चुनाव में सभी राजनीतिक दल बिना बहुमत के सरकार बनाने के लिए तमाम तरह के हथकंडे अपनाते हुए दिख रहे थे. बीजेपी और शिवसेना ने एक साथ मिलकर ये चुनाव लड़ा था लेकिन चुनाव के बाद शिवसेना ने ढाई साल के लिए मुख्यमंत्री पद दिए जाने की मांग की. जबकि, बीजेपी के पास ज़्यादा सीटें थी.

ऐसे में बीजेपी इसके लिए तैयार नहीं हुई. लेकिन बीजेपी के पास इतने विधायक नहीं थे कि वह महाराष्ट्र में सरकार बनाने का दावा कर सके. ऐसी स्थिति में महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाया गया.

इसके बाद शिव सेना, एनसीपी और कांग्रेस के बीच सरकार बनाने को लेकर एकमत बनने के संकेत मिलना शुरू हुए लेकिन इन तीनों दलों को सरकार बनाने का दावा करने देने से पहले ही एक दिन अचानक सुबह राष्ट्रपति शासन हटा लिया गया और बीजेपी को एनसीपी के कुछ विधायकों के साथ मिलकर सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया गया.

राष्ट्रपति शासन हटाने के लिए कैबिनेट की सहमति के बिना एक ऐसे क़ानून का सहारा लिया गया जिसकी मदद से प्रधानमंत्री आपातकालीन स्थितियों में राष्ट्रपति शासन को हटा सकता है.

ऐसे में एक सवाल खड़ा हुआ कि क्या ये एक ऐसी स्थिति थी कि आपातकालीन उपायों का सहारा लेकर बीजेपी सरकार बनाई जाए.

ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और कोर्ट ने आदेश दिया कि विधानसभा में एक फ़्लोर टेस्ट होना चाहिए और इसमें गुप्त मतदान की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए.

कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद देवेंद्र फडणवीस और उनके साथ उप मुख्यमंत्री की शपथ लेने वाले अजित पवार ने इस्तीफ़ा दिया.अगर कोर्ट ने फ़्लोर टेस्ट के लिए ज़्यादा समय दिया होता तो ये निश्चित था कि विधायकों की खरीद फरोख़्त होती जैसा कि कर्नाटक में देखने को मिला था.

कर्नाटक में जेडीएस और कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल होने वाले विधायकों को बीजेपी सरकार में ऊंचे पद और दूसरी सुविधाएं मिली हैं जबकि वे हाल ही में पार्टी में शामिल हुए हैं.

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सुप्रीम कोर्ट के कदम की वजह से शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस की बहुमत वाली गठबंधन सरकार को आखिरकार दावा पेश करने और सरकार बनाने में मदद मिली.

कोर्ट ने राज्यपाल का वो आदेश दिखाने के लिए कहा, जिसमें फडणवीस को न्योता दिया गया था और विधायकों के समर्थन की वो चिट्ठी भी मांगी, जिससे ये साबित होता हो कि उनके पास बहुमत है.

शिवसेना ने कोर्ट में कहा कि चुनाव बाद बने उनके गठबंधन के पास बहुमत है, लेकिन राज्यपाल बीजेपी के निर्देशों पर काम कर रहे हैं.

कानूनी रूप से ये ज़रूरी था कि राज्यपाल शासन हटाने के लिए केंद्रीय कैबिनेट की बैठक हो और फिर प्रस्ताव को राष्ट्रपति के पास भेजा जाए.

लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सरकारी कामकाज के नियम संख्या-12 का इस्तेमाल किया, जिससे उन्हें आपातकाल की स्थिति में कैबिनेट की ओर से फैसले लेने की शक्ति मिल जाती है.

अगर आपातकालीन स्थिति थी भी तो भी राष्ट्रपति इसका अध्ययन कर सकते थे और ये सुनिश्चित कर सकते थे कि ये सही कदम है. लेकिन जिस तरह से रातो-रात ये सब किया गया, उसने संदेह पैदा किया.

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कर्नाटक: बागियों को उपचुनाव लड़ने की इजाज़त

कर्नाटक की कुमारस्वामी सरकार उस वक्त गिर गई थी, जब उनके जेडीएस और कांग्रेस गठबंधन के 17 विधायकों ने इस्तीफा दे दिया था.

स्पीकर ने दलबदल विरोधी कानून के तहत उन्हें अयोग्य करार दे दिया और ये भी कहा कि ये 2023 में विधान सभा का टर्म खत्म होने तक अयोग्य रहेंगे. इसका मतलब ये था कि वो तब तक चुनाव भी नहीं लड़ सकते.

इन विधायकों ने इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. शीर्ष अदालत ने पूर्व कर्नाटक स्पीकर के विधायकों को अयोग्य ठहराने के आदेश को तो बनाए रखा लेकिन अयोग्यता की अवधि को खत्म कर दिया.

कोर्ट ने कहा कि स्पीकर के पास किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने से रोकने की अवधि तय करने की शक्ति नहीं है. इस फ़ैसले ने बाग़ी विधायकों को उपचुनाव लड़ने का मौका दिया क्योंकि उनकी सीटें स्पीकर के फ़ैसले के बाद खाली हो गई थीं.

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सुप्रीम कोर्ट के तीन बड़े फ़ैसले

रफाल समीक्षा याचिका

मोदी सरकार ने जब फ्रांस की दसॉं एविएशन से 36 रफ़ाल लड़ाकू विमान खरीदने का सौदा फ़ाइनल किया तो इस बात को लेकर राजनीति तेज़ हो गई कि सही प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है. सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे.

जब सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिकाएं लगाई गई कि प्रधानमंत्री कार्यालय, विमान की खरीद में हस्तक्षेप कर रहा है और अपने प्रभाव का ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल कर रहा है. इस पर कोर्ट ने कहा कि वो मामले में हस्तक्षेप नहीं करेगा.

उसने रक्षा खरीद में हस्तक्षेप के आरोपों को भी ख़ारिज कर दिया और कहा कि सरकार इसकी हर स्तर पर स्क्रूटनी करती है और अगर कुछ ग़लत हुआ है तो कोर्ट को इसके सबूत चाहिए.

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विमान की कीमतों, एयरक्राफ़्ट प्रोडक्शन में कोई अनुभव ना रखने वाले रिलायंस समूह के अनिल अंबानी की भूमिका और जिस तरह से कांट्रैक्ट साइन किया गया, इन सभी बातों को लेकर सवाल पूछे गए.

समीक्षा याचिका में उन दस्तावेज़ों का भी हवाला दिया गया, जिन्हें रक्षा मंत्रालय से लीक बताया जा रहा था. इन दस्तावेज़ों के मुताबिक प्रधानमंत्री कार्यालय ने सौदेबाज़ी के दौरान रक्षा मंत्रालय को बातचीत में शामिल नहीं किया.

चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली तीन जजों की बेंच ने कहा कि सौदे को लेकर किसी जांच की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि समीक्षा याचिका में कोई दम नहीं है.

कांग्रेस का कहना था कि ये सौदा एक घोटाला है और संयुक्त संसदीय समिति को इसका संज्ञान लेना चाहिए.

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मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय RTI में

क्या भारत के मुख्य न्यायाधीश का कार्यालय भी सूचना के अधिकार कानून के दायरे में आना चाहिए? ये सवाल लंबे वक्त तक शीर्ष अदालत को परेशान करता रहा, क्योंकि उसपर पारदर्शी तरीके से काम ना करने के आरोप लगे.

आख़िरकार शीर्ष अदालत ने माना कि न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक जवाबदेही साथ-साथ चलती है और जनहित की सूचनाओं को बताने से बचना शीर्ष अदालत की साख़ को नुकसान पहुंचाएगा.

एक संवैधानिक पीठ ने संविधान के अनुच्छेद-124 के हवाले से कहा कि सुप्रीम कोर्ट एक लोक प्राधिकरण है और इसलिए इसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश और जज भी शामिल हैं.

2010 में दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा था कि भारत के चीफ जस्टिस का कार्यालय और सुप्रीम कोर्ट 'लोक प्राधिकरण' हैं और इसलिए ये आरटीआई कानून के दायरे में आएंगे.

सुप्रीम कोर्ट के सेकेट्ररी जनरल ने इस फ़ैसले को ये कहते हुए चुनौती दी थी कि अगर जजों की नियुक्ति समेत सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक फैसले आरटीआई के दायरे में आएंगे तो इससे परेशानी पैदा होगी.

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले को सही ठहराया. चीफ़ जस्टिस गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने ये ऐतिहासिक निर्णय दिया. पीठ में शामिल जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि ये बताया जनहित में है कि कौन किस योग्यता के आधार पर जज बनाया जा रहा है.

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CJI के ख़िलाफ़ यौन उत्पीड़न का मामला

पहली बार मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के खिलाफ़ कोई यौन उत्पीड़न का मामला सामने आया, जिसने न्यायतंत्र को हिला दिया.

ये मामला तब विवादित हो गया जब उन्होंने मामले में ख़ुद का बचाव किया, जबकि अगर किसी जज का नाम किसी मामले में है तो वो फैसला देने के लिए उस पीठ में शामिल नहीं हो सकता.

उन्होंने जस्टिस एसए बोबडे की अध्यक्षता में एक कमिटी बनाई और उस कमिटी को अदालत की ही एक पूर्व कर्मचारी के आरोपों को देखने का काम सौंपा.

जस्टिस बोबडे ने आरोपों को खारिज कर दिया. हालांकि उन्होंने नहीं बताया कि किस आधार पर आरोप ख़ारिज किए गए. उन्होंने कहा कि इसकी ज़रूरत नहीं है. जस्टिस बोबडे भारत के मौजूदा मुख्य न्यायाधीश हैं.

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मुफ़्त क़ानूनी सहायता

हज़ारों ज़रूरतमंद और आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों के लिए 2019 एक अच्छी ख़बर लेकर आया था क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि अब ऐसे लोगों को सुप्रीम कोर्ट में मुफ्त कानूनी सहायता मिलेगी.

भारत के मुख्य न्यायाधीश के मशविरे पर बनाए गए एक नए नियम के मुताबिक पांच लाख रुपए सालाना से कम आय वाले लोगों को मुफ्त कानूनी सेवाएं मिलेंगी.

यह एक महत्वपूर्ण फैसला था, क्योंकि इससे पहले तक 1.25 लाख रुपए से कम आय वाले लोगों को ही मुफ़्त कानूनी सहायता मिलती थी.

लिव-इन रिश्तों में बलात्कार का आरोप

एक महत्वपूर्ण फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर लिव-इन पार्टनर्स के बीच समति से शारीरिक सम्बन्ध बनते हैं तो उसे सिर्फ़ इसलिए बलात्कार नहीं कहा जा सकता कि पुरुष किसी वजह से महिला से शादी नहीं कर पाया.

ये फैसला महाराष्ट्र की एक नर्स की ओर से दायर किए गए मुकदमे में आया था, जिसमें उन्होंने अपने लिव-इन पार्टनर पर बलात्कार का आरोप लगाया था.

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सेक्स सिलेक्शन की इजाज़त नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने 'प्रोहिबिशन ऑफ सेक्स सिलेक्शन एक्ट 1994' की संवैधानिकता को बरक़रार रखा और डॉक्टरों की एक संस्था की उस याचिका को ख़ारिज कर दिया.

याचिका में कहा गया था कि इस कानून को ठीक से लागू नहीं किया जा रहा है और लिखा-पढ़ी से जुड़ी छोटी-मोटी गलतियों की वजह से उन्हें सज़ा दी जा रही है.

याचिकाकर्ता 'भारत के प्रसूति और स्त्री रोग संबंधी संघ' ने प्री-कॉन्सेप्शन और प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्स (प्रोहिबिशन ऑफ सेक्स सिलेक्शन एक्ट) की धारा 23(1) और 23 (2) की संवैधानिकता को चुनौती दी थी. सेक्शन 23(2), स्टेट मेडिकल काउंसिल को ये शक्ति देता है कि वो लिंग निर्धारण परीक्षण करते पाए जाने वाले डॉक्टर का रेजिस्ट्रेशन रद्द कर सकती है.

ये क़ानून कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए बनाया गया था क्योंकि डॉक्टर अपनी अल्ट्रासाउंड मशीनों का इस्तेमाल कर मां-बाप को बच्चे का लिंग बता देते हैं.

सरकार का तर्क था कि कानून का मकसद जन्म से पहले भ्रूण की लिंग जांच को रोकना था क्योंकि इसकी वजह से कन्या भ्रूण हत्या हो रही है.

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल पिंकी आनंद ने कहा कि देश के कई ज़िलों में 1,000 लड़कों के मुकाबले 8,00 से भी कम लड़कियां हैं. बेंच ने कहा कि महिला अनुपात में कमी ना सिर्फ भारत के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए चिंता का विषय है.

मामले की सुनवाई कर रही जस्टिस अरुण मिश्रा और विनीत सरन की बेंच ने कहा कि कन्या भ्रूण हत्या की इजाज़त देने से बड़ा पाप, अनैतिक और असामाजिक काम कोई और नहीं हो सकता.

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जेल जाने से बचे अनिल अंबानी

2019 की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि अरबपति कारोबारी अनिल अंबानी (जो उस वक्त के रिलाइंस कम्युनिकेशन के चेयरमैन भी थे) वो अदालत की अवमानना के दोषी हैं क्योंकि उन्होंने एरिक्सन इंडिया को 5.5 अरब रुपए लौटाने का कोर्ट से किया वादा नहीं निभाया.

कोर्ट ने दोनों के बीच के विवाद को सुलझाने के लिए ये वादा लिया था और अंबानी को निर्देश किया था कि वो मार्च 2019 तक 4.53 अरब रुपए दे या तीन महीने के लिए जेल जाए.

हालांकि ये हुआ नहीं क्योंकि उनके भाई और भारत में सबसे अमीर कारोबारी मुकेश अंबान ने उन्हें बचा लिया.

2019 भारत में न्यायपालिका के लिए एक व्यस्त और महत्वपूर्ण वर्ष था.

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