नागरिकता संशोधन क़ानून: बीजेपी क्या इस तरह मुसलमानों का भरोसा जीत पाएगी?

  • 31 दिसंबर 2019
जेपी नड्डा बंगाल रैली इमेज कॉपीरइट Getty Images

नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ देशभर में हो रहे विरोध-प्रदर्शनों और हिंसा के बीच बीजेपी अब लोगों के बीच जाकर इस कानून की बारीकियां और फ़ायदे गिनाएगी.

बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने इस संबंध में एक बैठक बुलाई थी. कहा जा रहा है कि मीटिंग में इस बात की भी योजना बनी कि पार्टी की रैलियों अब शरणार्थियों को भी शामिल किया जाएगा जो अपनी दर्द भरी कहानी सुनाकर लोगों को बताएंगे कि अपना सबकुछ छोड़कर वो भारत क्यों आए और अपने देश में वो किस तरह प्रताड़ित थे.

इस मुहिम की शुरुआत बंगाल से हो चुकी है जहां बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने रोड शो और रैली की. बंगाल में हुई इस रैली में नड्डा ने कहा कि नागरिकता संशोधन क़ानून पर विपक्ष भ्रम फैला रहा है. नड्डा ने बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी निशाने पर लिया और कहा कि वो राज्य की जनता को गुमराह कर रही हैं.

लेकिन सवाल ये उठता है कि क्या बीजेपी अपने इस प्रोग्राम के ज़रिए लोगों का भरोसा जीत पाएगी?

इस पर बीजेपी से राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा कहते हैं, ''नागरिकता संशोधन कानून भारत के संविधान के आधार पर आया है. जैसे पहले हमने पारसी और यहूदियों को भारत की नागरिकता दी, अब दूसरे धर्मों के लोगों को दी जा रही है, लेकिन देश के कुछ विपक्षी दलों और कुछ बाहरी बैठे लोगों ने इस कानून को लेकर भ्रम फैलाया कि ये भारत के मुसलमानों के साथ एक भेदभाव पूर्ण कानून है और इतनी बार झूठ बोला कि उस समुदाय को लगने लगा कि उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है. यह कानून क्या है, कानून का वास्तविक मतलब क्या है और इसका लाभ-हानि देश की जनता को क्या होगा, इसे लोकतांत्रिक तरीके से देश की जनता तक पहुंचाना ही इस आउटरीच प्रोग्राम का उद्देश्य है.''

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क्या बीजेपी ने देर कर दी?

दरअसल नागरिकता संशोधन कानून को लेकर विपक्ष ने संसद में ही यह सवाल उठाया था कि इसके ज़रिए पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले मुसलमानों को नागरिकता दिए जाने की बात क्यों नहीं है. क्या ये क़ानून लाकर एनआरसी के जरिए भारत से मुसलमानों को बाहर निकालने की योजना चल रही है? गृहमंत्री अमित शाह ने भी यह कहा कि पहले नागरिकता संशोधन कानून आएगा, फिर एनआरसी को पूरे देश में लागू किया जाएगा और जो घुसपैठिए हैं उन्हें बाहर किया जाएगा.

नागरिकता संशोधन कानून के साथ एनआरसी का ज़िक्र आने पर देशभर में विरोध बढ़ा और लोग सड़कों पर उतर आए. देशभर में मुसलमान सड़कों पर उतरे और उनके समर्थन में दूसरे समुदायों के लोग भी आए. लेकिन लंबे वक़्त तक बीजेपी की ओर से सिर्फ़ ऐसे बयान सामने आते रहे जिससे काफ़ी भ्रम की स्थिति बनी. अब बीजेपी लोगों को इस कानून के बारे में जागरूक करने की कोशिश कर रही है, क्या उसे ये काम कानून लाने से पहले नहीं करना चाहिए था?

इस सवाल के जवाब में राकेश सिन्हा कहते हैं कि जब संसद में यह कानून पास हुआ तब तक विपक्ष ने ऐसी कोई मंशा नहीं जताई कि यह कानून ग़लत है और न ही इस पर बहस के दौरान ऐसी कोई चिंता व्यक्त की. लेकिन अचानक विपक्ष ने षड़यंत्र की तरह, संगठित रूप से इसका विरोध करना शुरू किया और भ्रम व हिंसा फैलाने का काम किया.

हालांकि वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी मानती हैं कि यहां बीजेपी से चूक हुई है. अगर वो पहले यही मुहिम चलाती तो शायद लोगों तक अपना संदेश पहुंचा सकती थी और दूसरे पक्ष को मना सकती थी और ये विरोध इस हद तक नहीं बढ़ता.

उन्होंने कहा, 'इतना बड़ा कदम अचानक उठा लेना और बिना लोगों को भरोसे में लिए, तो एक तरह से बीजेपी के लिए झटका ही है. डिप्लोमैटिक कम्युनिटी का भी कहना है कि इस मसले पर उनसे कोई बात नहीं की गई. जबकि ये तीन देशों का मसला है. पहले मंदिर पर और दूसरे मुद्दों पर भी उन्होंने बात की थी लेकिन इस बार जल्दी से इसे कर देना और इसकी इतनी तैयारी नहीं थी. इसलिए अब वो लोगों के बीच जाकर भरोसा जीतने की कोशिश में हैं.''

हालांकि वो यह भी कहती हैं कि विपक्ष को भी ये अंदाज़ा नहीं था कि देश का युवा और मुसलमान इस तरह सड़कों पर उतरकर विरोध करेगा. और सरकार भी इसे भांप नहीं पाई. क्योंकि इसके पहले तीन तलाक़ हो या 370 का मसला हो या मंदिर का मुद्दा, हर बार मुसलमान चुप ही रहे लेकिन इस बार मुसलमानों को लगा कि पानी सिर के ऊपर से गुजर रहा है और अगर अब विरोध नहीं किया तो उनकी नागरिकता छिन सकती है और वो सड़कों पर उतर आए. लेकिन कानून लाने और देश में उसके असर को लेकर सरकार से प्लानिंग में चूक हुई है.

इस बारे में वरिष्ठ पत्रकार राधिका रामासेशन का मानना है कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान मंत्रियों और बीजेपी प्रवक्ताओं की ओर से जैसे बयान आए हैं, उससे काफ़ी कन्फ्यूज़न हुआ और लोगों का गुस्सा भड़का. लेकिन अब शायद बीजेपी को इस बात का अहसास हुआ है जिस वजह से वो ये अभियान चला रही है लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है.

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एनआरसी की उलझन सुलझा पाएगी बीजेपी?

नागरिकता संशोधन कानून को लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच सरकार ने नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) की भी घोषणा कर दी जो जनगणना के साथ ही होगा. इसका भी विरोध हो रहा है. एक ओर जहां गृहमंत्री अमित शाह ने कहा कि एनपीआर का एनआरसी से कोई लेना-देना नहीं है, वहीं कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि एनपीआर से मिली कुछ जानकारियां एनआरसी में इस्तेमाल हो सकती हैं. इससे भी काफ़ी संशय की स्थिति पैदा हो गई. अब क्या बीजेपी अपने आउचरीट प्रोगाम में यह स्पष्ट कर पाएगी कि नागरिकता संशोधन कानून, एनआरसी और एनपीआर का आपस में कोई संबंध है या नहीं?

राकेश सिन्हा कहते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश के मुखिया हैं, जब उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि एनआरसी के संबंध में कैबिनेट में या संसद में चर्चा नहीं हुई तो इस पर बहस या सवाल उठाने की ज़रूरत ही नहीं है.

वो कहते हैं, ''जो लोग सदियों से यहां रह रहे हैं, जिनके पूर्वज यहां रहे हैं. जिनके पास आधार कार्ड, वोटर कार्ड है, जिन्हें सरकार की तमाम योजनाओं का लाभ मिल रहा है, उन्हें कैसे नागरिक नहीं माना जाएगा. सरकार ने किसी भी योजना का लाभ देने में धर्म, जाति या सम्प्रदाय के नाम पर भेदभाव नहीं किया. तो फिर क्यों ये सवाल उठ रहे हैं. एनआरसी एक लंबी प्रक्रिया है. ये रातोंरात नहीं हो जाएगा. पहले मामला कैबिनेट में आएगा, संसद में आएगा, उसके सारे स्टेकहोल्डर्स से बात की जाएगी. ऐसा नहीं है कि एक झटके में ये हो जाएगा. अभी इसकी कोई चर्चा ही नहीं है.''

राधिका रामासेशन कहती हैं कि सरकार को शुरुआत में ही यह स्पष्ट करना चाहिए था कि एनआरसी कब आएगा, क्या है, आएगा भी या नहीं. इससे कन्फ्यूज़न क्लियर होगा. सरकार को यह भी बताना चाहिए कि किसके डॉक्यूमेंट लगेंगे. ताकि अगर कभी एनआरसी आए भी तो लोग डॉक्यूमेंट खोज कर रखेंगे और एनपीआर का इससे क्या लेना देना होगा यह भी स्पष्ट करना पड़ेगा.

नीरजा चौधरी ने कहा,''बीजेपी के कई नेता एनआरसी को लेकर बयान दे रहे हैं. केंद्रीय मंत्रियों के बयानों में भी एकरूपता नहीं है. बीजेपी के अंदर से दो तरह की आवाज़ें आ रही हैं, जिससे कन्फ्यूजन बढ़ रहा है. इससे आपको फायदा होगा या नहीं यह स्पष्ट नहीं है लेकिन लोग सवाल तो करेंगे''.

वो कहती हैं, 'कुछ लोग कहेंगे कि सरकार का यह कानून सही है लेकिन जब आप नागरिकता संशोधन कानून को एनआरसी से जोड़ेंगे तो लोगों में डर तो बनेगा ही. जिन मुसलमानों की नागरिकता जाएगी, वो कहां जाएंगे, कोई देश उन्हें लेगा नहीं तो कहां रहेंगे? अगर बीजेपी इन सवालों के जवाब दे पाई और यह बता पाई कि एनआरसी कैसे लागू होगा या आएगा ही नहीं, तब शायद उन्हें इसका फायदा हो.'

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बीजेपी को कामयाबी मिलेगी?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रामलीला मैदान में एक रैली में कहा कि यह नागरिकता छीनने का नहीं नागरिकता देने वाला कानून है इससे किसी को डरने की ज़रूरत नहीं है. लेकिन लोग फिर भी सड़कों पर हैं और कानून वापस लेने की मांग कर रहे हैं. ऐसे में क्या बीजेपी का ये अभियान लोगों का भरोसा जीतने में मददगार होगा?

इस सवाल पर राकेश सिन्हा का कहना है कि ''इस कानून का देश के मुसलमानों की नागरिकता से कोई लेना देना नहीं है. इस अभियान के ज़रिए हम लोगों के पास जाएंगे और बताएंगे कि ये कानून क्या है और उन्हें तीनों देशों में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों की कहानी सुनाएंगे तो उन पर ज़रूर असर पड़ेगा. जिन्हें लगातार भ्रमित किया जा रहा है कि उनकी नागरिकता चली जाएगी, उन्हें समझाया जाएगा कि भारत कभी पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान या बांग्लादेश जैसा नहीं हो सकता है. जब हम किसी ईसाई या मुसलमान के घर जाकर उन्हें पाकिस्तान में हिंदू महिलाओं के साथ होने वाली ज्यादतियों के बारे में बताएंगे तो क्या भारत के मुसलमान में इतनी मानवीयता नहीं है कि वो इसका विरोध करे, बिल्कुल करेगा और विपक्ष इसमें बेनकाब होगा. विपक्ष के इस दुष्प्रचार की वजह से भारत की छवि दुनिया में ख़राब करने की कोशिश की जा रही है.''

राधिका रामासेशन कहती हैं कि बीजेपी अगर फैक्ट स्पष्ट करेगी तो उसे पूरा फायदा होगा और एक तरह से कुछ हद तक फायदा हो ही रहा है क्योंकि ये ध्रुवीकरण वाला मुद्दा है. इस बारे में निचले तबके के लोगों में भ्रम की स्थिति है कि क्या हो रहा है और आगे क्या होने वाला है. लेकिन एक बड़ा तबका ऐसा भी है जो इस सब से खुश है और सरकार की वाहवाही कर रहा है.

उनका मानना है कि झारखंड के चुनाव परिणामों में इस मुद्दे का ख़ास असर नहीं पड़ा. वहां बीजेपी की हार की वजहें कुछ और भी रही हैं. राजनीतिक तौर पर बीजेपी को इस मुद्दे का फ़ायदा मिल रहा है.

बीजेपी का यह आउटरीच प्रोग्राम कब तक चलेगा इस पर राकेश सिन्हा ने कहा कि इसके लिए तय समय सीमा नहीं है. जब जहां जरूरत पड़ेगी उसी हिसाब से अलग-अलग राज्यों में पार्टी अभियान चलाएगी. हालांकि वो इस बात पर ज़ोर देते हैं कि पार्टी को इसका फायदा ज़रूर मिलेगा.

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