निर्भया गैंगरेप: क्या है क्यूरेटिव पिटिशन, जिसका सहारा लेकर बचना चाहते हैं दोषी

  • 14 जनवरी 2020
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निर्भया गैंगरेप: 16 दिसंबर 2012

डेथ वॉरन्ट जारी करने की तारीख़: 7 जनवरी 2020

फांसी लगने की तारीख़: 22 जनवरी 2020

निर्भया गैंगरेप मामले के चारों दोषियों के ख़िलाफ़ दिल्ली की एक कोर्ट ने सात जनवरी 2020 को डेथ वॉरन्ट जारी किया. पटियाला हाउस कोर्ट ने फांसी के लिए 22 जनवरी, 2020 की तारीख़ सुबह सात बजे का समय तय किया है.

लेकिन फ़ैसले के बाद ही दोषी विनय के वकील एपी सिंह ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वे क्यूरेटिव पिटिशन दायर करेंगे. दोषी विनय कुमार ने सबसे पहले आठ जनवरी 2020 को क्यूरेटिव पिटिशन दायर की. हालांकि बाद में दोषी क़रार दिए गए चार में से एक मुकेश ने भी क्यूरेटिव पिटिशन दाख़िल कर दी.

इस क्यूरेटिव पिटिशन पर पाँच जजों की बेंच मंगलवार को अपना फ़ैसला सुना सकती है.

फ़ांसी की सज़ा सुनाए जाने के बाद सभी दोषियों के पास विकल्प था कि वे 14 दिनों के भीतर दया याचिका और क्यूरेटिव पिटिशन दायर कर सकते हैं. चार दोषियों में से दो दोषियों ने ही क्यूरेटिव पिटिशन दायर की है.

सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ वकील कमलेश जैन कहती हैं कि यह ज़रूरी नहीं है कि पहले क्यूरेटिव पिटिशन दाख़िल की जाए और उसके बाद दया याचिका. यह पूरी तरह उस पक्ष पर निर्भर करता है. वो चाहें तो बिना क्यूरेटिव पिटिशन दायर किये, सीधे दया याचिका दायर कर सकते हैं.

क्यूरेटिव पिटिशन एक ओर जहां अंतिम न्यायिक रास्ता है वहीं राष्ट्रपति के पास दया याचिका भेजना संवैधानिक अधिकार.

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क्या है क्यूरेटिव पिटिशन?

क्यूरेटिव पिटिशन को अंतिम न्यायिक रास्ता कहा जाता है. अदालत में किसी फ़ैसले के ख़िलाफ़ याचिका दायर करने का यह अंतिम न्यायिक चरण है.

कमलेश जैन बताती हैं कि क्यूरेटिव पिटिशन आम पुनर्विचार याचिका से कुछ अलग है. इसमें फ़ैसले की जगह पूरे केस के उन मुद्दों या विषयों को रेखांकित किया जाता है जिस पर याचिका दायर करने वाले को लगता है कि एकबार फिर विचार करने की ज़रूरत है.

वो कहती हैं कि हालांकि क्यूरेटिव पिटिशन के कुछ तय नियम भी हैं.

क्यूरेटिव पिटिशन दायर करने वाले पक्ष को कोर्ट को यह स्पष्ट करना होता है कि आख़िर वो किस आधार पर फ़ैसले को चुनौती दे रहा है. इसे दायर करने के लिए याचिका का वरिष्ठ वकील द्वारा सर्टिफाइड होना अनिवार्य है.

इस क्यूरेटिव पिटिशन को सुप्रीम कोर्ट के तीन वरिष्ठतम जजों और जिन जजों की कोर्ट से फ़ैसला सुनाया गया है, वहां भेजना भी ज़रूरी होता है.

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निर्भया केस में दोषियों की फांसी का दिन तय

क्यूरेटिव पिटिशन की शुरुआत

क्यूरेटिव पिटीशन की अवधारणा साल 2002 में रूपा अशोक हुरा बनाम अशोक हुरा और अन्य मामले की सुनवाई के दौरान हुई.

इस केस की सुनवाई के दौरान एक सवाल आया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दोषी ठहराए जाने के बाद भी क्या किसी को राहत मिल सकती है ? ऐसे में नियम के मुताबिक़ रिव्यू पिटिशन के प्रावधान का ज़िक्र किया गया. लेकिन अगर रिव्यू पिटिशन भी ख़ारिज हो जाए तो भी क्या कोई रास्ता है?

इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही द्वारा दिए गए फ़ैसले को ग़लत क्रियान्वयन से बचाने के लिए या फिर उसे दुरुस्त करने के लिए क्यूरेटिव पिटिशन की धारणा रखी.

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इस मामले में क्या है आधार

सबसे पहले क्यूरेटिव पिटिशन दायर करने वाले दोषी विनय कुमार के वकील एपी सिंह का कहना है कि कोर्ट ने घटना के वक़्त उनके युवा होने के पहलू को अस्वीकार कर दिया है. इसके अलावा विनय कुमार के परिवार की आर्थिक स्थिति और सामाजिक स्थिति का भी हवाला दिया गया है.

विनय कुमार की तरफ़ से यह भी कहा गया है कि उन्होंने जेल में रहने के दौरान अच्छे आचरण का परिचय दिया और उसमें सुधार की संभावनाओं पर विचार किया जाना चाहिए.

लेकिन अगर क्यूरेटिव पिटिशन ख़ारिज हो गई तो....?

इस सवाल के जवाब में एपी सिंह कहते हैं, "पहली बात तो मुझे न्याय प्रक्रिया पर पूरा भरोसा है और पूरी उम्मीद है कि कोर्ट उनकी याचिका पर ग़ौर करेगी लेकिन अगर याचिका ख़ारिज हो जाती है तो निश्चित तौर पर वो दया याचिका का रास्ता अपनाएंगे."

साल 2012 में हुए इस गैंगरेप में छह लोग पकड़े गए थे और अदालत ने उन्हें दोषी पाया है.

एक दोषी ने सज़ा काटने के दौरान जेल में आत्महत्या कर ली थी. जबकि एक नाबालिग़ था, तो उसे बाल-सुधार गृह भेज दिया गया था. जबकि बाक़ी चारों के ख़िलाफ़ डेथ वॉरेंट जारी किया जा चुका है.

राम सिंह को इस मामले में मुख्य संदिग्ध बताया गया था. मार्च 2013 में तिहाड़ जेल में राम सिंह की लाश मिली थी.

पुलिस के मुताबिक़ राम सिंह ने ख़ुद को फांसी लगाई थी लेकिन बचाव पक्ष के वकीलों और राम सिंह के परिवार का आरोप था कि राम सिंह की हत्या की गई थी. निर्भया गैंगरेप में सबसे पहले राम सिंह को ही गिरफ़्तार किया गया था.

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इस मामले से जुड़ी अहम तारीख़ें और फ़ैसले

16 दिसंबर 2012: 23 वर्षीय फ़िज़ियोथेरेपी छात्रा के साथ चलती बस में छह लोगों ने गैंगरेप किया. छात्रा के पुरुष मित्र को बुरी तरह पीटा गया और दोनों को सड़क किनारे फेंक दिया गया.

17 दिसंबर 2012: मुख्य अभियुक्त और बस ड्राइवर राम सिंह को गिरफ़्तार कर लिया गया. अगले कुछ दिनों में उनके भाई मुकेश सिंह, जिम इंस्ट्रक्टर विनय शर्मा, फल बेचने वाले पवन गुप्ता, बस के हेल्पर अक्षय कुमार सिंह और एक 17 वर्षीय नाबालिग़ को गिरफ़्तार किया गया.

29 दिसंबर: सिंगापुर के एक अस्पताल में पीड़िता की मौत. शव को वापस दिल्ली लाया गया.

11 मार्च 2013: अभियुक्त राम सिंह की तिहाड़ जेल में संदिग्ध हालत में मौत. पुलिस का कहना है कि उसने आत्महत्या की, लेकिन बचाव पक्ष के वकील और परिजनों ने हत्या के आरोप लगाए थे.

31 अगस्त 2013: जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने नाबालिग़ अभियुक्त को दोषी माना और तीन साल के लिए बाल सुधार गृह भेजा.

13 सितंबर 2013: ट्रायल कोर्ट ने चार बालिग़ अभियुक्तों को दोषी क़रार देते हुए फांसी की सज़ा सुनाई.

13 मार्च 2014: दिल्ली हाई कोर्ट ने फांसी की सज़ा को बरक़रार रखा.

मार्च-जून 2014: अभियुक्तों ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दायर की और सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला आने तक फांसी पर रोक लगा दी.

मई 2017: सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट की फांसी की सज़ा को बरक़रार रखा.

जुलाई 2018: सुप्रीम कोर्ट ने तीन दोषियों की पुनर्विचार याचिका को ख़ारिज किया.

6 दिसंबर 2019: केंद्र सरकार ने एक दोषी की दया याचिका राष्ट्रपति के पास भेजी और नामंज़ूर करने की सिफ़ारिश की.

12 दिसंबर 2019: तिहाड़ जेल प्रशासन ने उत्तर प्रदेश जेल प्रशासन को जल्लाद मुहैया कराने के लिए अनुरोध किया.

13 दिसंबर 2019 : निर्भया की मां की ओर से पटियाला हाउस कोर्ट में फांसी की तारीख़ तय करने को लेकर एक याचिका दायर की गई थी. जिसमें चारों दोषी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के द्वारा पटियाला हाउस कोर्ट में पेश हुए.

7 जनवरी 2019 : चारों दोषियों का डेथ वॉरेंट जारी, 22 जनवरी की तारीख़ तय

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क्या हुआ था निर्भया के साथ

साल 2012 में दिल्ली में एक चलती बस में 23 साल की छात्रा के साथ गैंगरेप किया गया था.

बुरी तरह घायल छात्रा को सड़क किनारे फेंक दिया गया था. कई दिनों तक चले इलाज के बाद छात्रा की मौत हो गई थी.

इस घटना के बाद राजधानी दिल्ली समेत देशभर में व्यापक प्रदर्शन हुए थे.

निर्भया मामले के सामने आने के बाद भारत सरकार ने जस्टिस वर्मा समिति का गठन कर महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा के क़ानूनों की समीक्षा की थी.

साल 2013 में क़ानूनों में संशोधन कर बलात्कार के जघन्य मामलों में मौत की सज़ा देने का प्रावधान जोड़ा गया था.

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