भारतीय राजनीति में बरकरार है क्षेत्रीय दलों का दबदबा - नज़रिया

  • 20 जनवरी 2020
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भारतीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का वजूद हमेशा ही रहा है- आजादी से पहले राष्ट्रीय आंदोलन के दौर में भी और आजादी के बाद भी लंबे समय तक. लेकिन उनकी भूमिका सिर्फ उनसे संबंधित राज्यों तक ही सीमित रही.

यह स्थिति लगभग 1980 के दशक की शुरुआत से तब तक बनी रही जब तक कि राष्ट्रीय आंदोलन की कोख से जन्मी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस तमाम तरह की क्षेत्रीय आकांक्षाओं, अस्मिताओं और संवेदनाओं से अपने को जोड़े रही और उनका पर्याप्त आदर करती रही. लेकिन 1980 के दशक के मध्य तक तेलुगू देशम पार्टी और असम गण परिषद जैसे नए क्षेत्रीय दलों का धमाकेदार उदय हुआ. उसी दशक के खत्म होते-होते देश में गठबंधन राजनीति का दौर शुरू हो गया और उसी के साथ शुरू हुआ राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय दलों का दखल और दबदबा.

1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की अगुवाई में वामपंथी दलों और भारतीय जनता पार्टी के बाहरी समर्थन से बनी राष्ट्रीय मोर्चा सरकार से लेकर मई 2014 तक डॉ. मनमोहन सिंह की अगुवाई में चली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार तक लगभग हर सरकार में क्षेत्रीय दलों की अहमियत बनी रही.

लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने जिस तरह अपनी जीत का डंका बजाया था और फिर राज्यों के विधानसभा चुनावों में उसने अपनी जीत का सिलसिला शुरू किया, उससे कई राजनीतिक विश्लेषकों ने यह मान लिया था कि अब देश की राजनीति में क्षेत्रीय दलों के दिन लद गए हैं.

उनकी इस धारणा को 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने भी और ज़्यादा पुष्ट किया. लेकिन उस आम चुनाव के बाद महाराष्ट्र, हरियाणा और पिछले महीने दिसंबर में झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजों ने उस धारणा का खंडन करते हुए साबित किया कि क्षेत्रीय दलों का वजूद अभी ख़त्म नहीं हुआ है और वे राष्ट्रीय राजनीति में अपना दखल बनाए रखते हुए राष्ट्रीय दलों की मजबूरी बने रहेंगे.

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कई राज्यों में सीधी टक्कर

देश में इस समय मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, छत्तीसगढ, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, असम और त्रिपुरा ही ऐसे राज्य हैं जहां किसी भी चुनाव में राष्ट्रीय पार्टियों के बीच सीधा मुकाबला होता है.

हालांकि इनमें से कर्नाटक, उत्तराखंड, असम और त्रिपुरा में तो राष्ट्रीय दलों के साथ ही क्षेत्रीय दल भी वजूद में हैं और कई मौकों पर वे सत्ता समीकरणों को प्रभावित भी करते रहते हैं. कुल मिलाकर देश के दो तिहाई से ज़्यादा राज्य ऐसे हैं, जहां क्षेत्रीय दल न सिर्फ़ पूरे दमखम के साथ वजूद में हैं, बल्कि कई राज्यों में तो अपने अकेले के बूते सत्ता पर काबिज़ हैं तो कई राज्यों में राष्ट्रीय दलों के साथ सत्ता में साझेदार बने हुए हैं.

हाल के समय में हुए विधानसभा चुनावों की बात करें तो महाराष्ट्र में दो गठबंधनों के बीच मुकाबला था और दोनों गठबंधनों की अगुवाई राष्ट्रीय दल भाजपा और कांग्रेस कर रहे थे. दोनों गठबंधन में एक-एक क्षेत्रीय पार्टी शामिल थी.

भाजपा के साथ शिव सेना और कांग्रेस के साथ राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी). चुनाव नतीजे आए तो दोनों क्षेत्रीय पार्टियां राष्ट्रीय पार्टियों पर भारी पडी. शिव सेना ने तो सबसे बड़े दल के रूप में उभरी भाजपा से नाता तोड़ कर उसका सरकार बनाने का सारा खेल ही बिगाड दिया. दूसरी ओर एनसीपी ने भी कांग्रेस से बेहतर प्रदर्शन कर अपने पर उसकी निर्भरता को और बढा दिया.

हरियाणा में भी हालांकि भाजपा ने बहुमत से दूर रहने के बावजूद सरकार बना ली लेकिन इसके लिए उसे राज्य के नवजात क्षेत्रीय दल जननायक जनता पार्टी (जेजेपी) को न सिर्फ सत्ता में साझेदार बनाना पडा बल्कि उसकी शर्तों के आगे समर्पण भी करना पडा.

झारखंड में भी एक क्षेत्रीय दल झारखंड मुक्ति मोर्चा, कांग्रेस और भाजपा से आगे रहा. गठबंधन में कांग्रेस को उसका नेतृत्व कबूल करना पडा. पिछली बार भाजपा ने भी इस राज्य में एक अन्य क्षेत्रीय दल ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) के साथ मिलकर चुनाव लडा था और उसके सहयोग से ही सरकार बनाई थी. लेकिन इस बार उसने अकेले चुनाव लड़ा जिसका खामियाजा भी उसे सत्ता गंवाने के रूप में भुगतना पडा.

उधर आजसू को पिछली बार की तुलना में इस बार एक सीट का नुकसान हुआ लेकिन वह अपना वोट प्रतिशत बढाने में कामयाब रहा.

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बिहार में जेडीयू के साथ बीजेपी

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के विधानसभा के चुनाव भी अगले महीने होने जा रहे हैं और यहां भी आम आदमी पार्टी, भाजपा और कांग्रेस के लिए मजबूत चुनौती बनी हुई है. उसके मुकाबले दोनों राष्ट्रीय पार्टियों का रास्ता इस बार भी विधानसभा चुनाव में आसान नहीं रहेगा.

इसी साल के आखिरी में बिहार विधानसभा के भी चुनाव होना है और वहां भी भाजपा और कांग्रेस अपने अकेले के बूते जीतने की स्थिति में नहीं है. दोनों के लिए सूबे की क्षेत्रीय पार्टियों पर निर्भर रहना मजबूरी ही होगी. भाजपा जहां जनता दल (यू) और लोक जनशक्ति पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लडेगी, वहीं कांग्रेस राष्ट्रीय जनता दल की अगुवाई वाले महागठबंधन में रहकर मैदान में उतरेगी.

बिहार विधानसभा के चुनाव के बाद अगले साल मई में पश्चिम बंगाल, असम, केरल और केंद्र शासित पुदुचेरी में भी विधानसभा चुनाव होना है. इन चारों ही राज्यों में राष्ट्रीय दलों के साथ क्षेत्रीय दलों का भी खासा असर है.

पश्चिम बंगाल में तो इस समय क्षेत्रीय पार्टी तृणमूल कांग्रेस ही सत्तारुढ़ है और आगामी चुनाव में उसका भाजपा, कांग्रेस और वाम मोर्चा से मुकाबला होगा. पश्चिम बंगाल से सटे असम में फिलहाल भाजपा की सरकार है. आगामी चुनाव में उसके मुकाबले कांग्रेस के अलावा असम गण परिषद और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट जैसी प्रभावी क्षेत्रीय पार्टियां भी मैदान में होंगी.

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कांग्रेस ने कई राज्यों से गंवाई सत्ता

केरल में वैसे तो राजनीति की धुरी कांग्रेस और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) ही है लेकिन इन दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों को क्षेत्रीय दलों के समर्थन की दरकार रहती है. वहां इस समय माकपा के नेतृत्व वाले वामपंथी लोकतांत्रिक मोर्चा की सरकार है. दक्षिण भारत के सबसे छोटे राज्य पुदुचेरी में अभी कांग्रेस की सरकार है लेकिन वहां तमिलनाडु की दोनों प्रमुख द्रमुक पार्टियों का भी ख़ासा असर है और वे कई बार वहां सत्ता में आ चुकी हैं.

वैसे पिछले साल लोकसभा चुनाव के साथ ही जिन छह राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए थे, उनमें भी आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, ओडिशा और सिक्किम में क्षेत्रीय दलों का ही बोलबाला रहा था. इन राज्यों में कहीं तो भाजपा और कांग्रेस को क्षेत्रीय दलों के मुकाबले अपमानजनक हार का सामना करना पडा तो कहीं पर वे क्षेत्रीय दलों के छतरी के नीचे रहकर ही अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकीं.

आंध्र प्रदेश में तो मुख्य मुकाबला ही दो क्षेत्रीय पार्टियों वाईएसआर कांग्रेस और तेलुगू देशम पार्टी के बीच था, जिसमें वाईएसआर कांग्रेस ने न सिर्फ तेलुगू देशम पार्टी को करारी शिकस्त देकर सत्ता से बाहर कर दिया बल्कि कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी का सफाया कर दिया और भाजपा को तो पैर रखने तक की जगह नहीं दी.

तेलंगाना में वहां की क्षेत्रीय पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति दोनों राष्ट्रीय पार्टियों और तेलुगू देशम को हराकर अपनी सत्ता बरकरार रखने में कामयाब रही. तमिलनाडु में भी द्रविड आंदोलन से निकली दो क्षेत्रीय पार्टियां- द्रविड मुनैत्र कडगम (डीएमके) और ऑल इंडिया अन्ना द्रविड मुनैत्र कडगम (एआईएडीएमके) ही लंबे समय से बारी-बारी से राज कर रही हैं और राष्ट्रीय पार्टियां उनकी सहयोगी की भूमिका में रहकर अपना वजूद बनाने की कोशिश करती हैं. यह सिलसिला अभी भी कायम है.

पूर्वी भारत में तटीय राज्य ओडिशा में लंबे समय तक कांग्रेस का शासन रहा. हालांकि तीन बार वहां गैर कांग्रेसी राष्ट्रीय दल के रूप में स्वतंत्र पार्टी, जनता पार्टी और जनता दल की सरकार भी रही, लेकिन पिछले दो दशक से लगातार वहां बीजू जनता दल के रूप में क्षेत्रीय पार्टी शासन कर रही है.

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Image caption नवीन पटनायक

पंजाब में भी यूपी जैसी स्थिति?

पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्य सिक्किम में भी लंबे समय से क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा रहा हैं और इस बार भी वहां यह सिलसिला बना रहा. पिछले 25 सालों से सत्ता पर काबिज सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट सत्ता से बाहर हुआ और उसकी जगह सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा सत्ता पर काबिज हो गया.

अरुणाचल प्रदेश जरूर अपवाद रहा, जहां भाजपा पहली बार बहुमत हासिल कर सरकार बनाने में कामयाब तो रही लेकिन इस कामयाबी के लिए उसे भी वहां की क्षेत्रीय पार्टियों दामन थामना पडा. असम, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम के अलावा पूर्वोत्तर के बाकी राज्यों मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, त्रिपुरा और नगालैंड में भी क्षेत्रीय दलों का ही दबदबा कायम है.

इन सभी प्रदेशों के अलावा सबसे अधिक लोकसभा और विधानसभा सीटों वाला उत्तर प्रदेश किसी समय कांग्रेस का मजबूत किला माना जाता था लेकिन 1990 से लेकर 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले तक वहां भी दो क्षेत्रीय दलों समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का ही दबदबा बना रहा. भारतीय जनता पार्टी ने तो पहले राम मंदिर आंदोलन और बाद में मोदी लहर के सहारे वहां अपने पैर जमा लिए और अब वह सत्ता पर भी काबिज है लेकिन कांग्रेस अभी भी वहां हाशिए पर ही है. विपक्ष के रूप में वहां अभी दोनों क्षेत्रीय पार्टियां ही भाजपा को चुनौती देने की स्थिति में हैं.

पंजाब की स्थिति भी उत्तर प्रदेश जैसी ही है. वहां भी राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टी अकाली दल के बीच ही हमेशा मुकाबला होता है और भाजपा अकाली दल की सहयोगी की भूमिका में रहती है.

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हाल ही में पूर्ण राज्य से केंद्र शासित राज्य में तब्दील कर दिए गए जम्मू-कश्मीर में भी भाजपा और कांग्रेस की असरदार मौजूदगी के बावजूद राजनीति की धुरी वहां की क्षेत्रीय पार्टियां नेशनल कांफ्रेंस और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ही रहती हैं.

महाराष्ट्र और कर्नाटक से सटे छोटे से तटीय राज्य गोवा में हालांकि मुख्य मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच रहता है, लेकिन कई छोटी-छोटी क्षेत्रीय पार्टियां दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के बीच सत्ता समीकरण को प्रभावित करती हैं.

भारत जैसे बड़े लोकतंत्र और विविधता से भरे देश में इतनी अधिक क्षेत्रीय पार्टियों का होना कोई अचरज की बात नहीं है, मगर अफसोस की बात यही है कि ज़्यादातर क्षेत्रीय पार्टियां व्यक्ति आधारित हैं और एक व्यक्ति या उसके परिवार से संचालित हो रही हैं. यह स्थिति लोकतंत्र को कमजोर करने वाली है.

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