पुलवामा हमला: मारे गए जवान के परिवार से सरकारी बेरुख़ी

  • 14 फरवरी 2020
रोहिताश की पत्नी इमेज कॉपीरइट NarayanBareth/BBC

कोई साल भर पहले ही पुलवामा के चरमपंथी हमले में मारे गए जवानों के शव जब राजस्थान पहुंचे, तो हर आंख नम थी.

उस ग़मज़दा माहौल में ही सरकारों ने पीड़ित परिवारों को ढांढस बंधाते हुए कुछ वादे किए थे. वो वादे जो अब भी अधूरे हैं. कभी केंद्र सरकार की अनदेखी तो कभी राज्य सरकार की उपेक्षा.

पुलवामा हमले में राजस्थान के पाँच जवान चरमपंथी हमले का शिकार हुए थे. इनमे जयपुर ज़िले के गोविंदपुर बासड़ी के रोहिताश लाम्बा और भरतपुर ज़िले में सुंदरवाली के जीतराम गुर्जर का नाम भी शामिल था.

इन दोनों जवानों के परिजनों ने बीबीसी से कहा, "राज्य सरकार ने घर के एक सदस्य को नौकरी देने का वादा किया था. लेकिन यह वादा, वादा ही रह गया.''

जीतराम गुर्जर के छोटे भाई विक्रम कहते हैं कि राज्य सरकार उस वक़्त किए गए वादों में से कुछ ही पूरा कर सकी है. उन्होंने कहा, ''सरकार ने उस वक़्त घोषित पैकेज में से प्रति परिवार को पचास लाख रुपए देने का वादा पूरा कर दिया. मगर शहीद के नाम पर किसी शिक्षण संस्थान के नामकरण का काम अब तक नहीं किया गया है."

जयपुर ज़िले में गुल-ओ-गुलज़ार राष्ट्रीय मार्ग से जुदा होकर एक सड़क खेत खलिहानों से गुजरती हुई जब गोविंदपुर बासड़ी पहुंचती है तो आगंतुकों को एक ऐसे गांव से रूबरू कराती है जहां ज्यादातर लोग खेती करते हैं.

हरे भरे खेत मनोहारी तस्वीर प्रस्तुत करते हैं. इन्ही के बीच एक भूखंड पर शहीद स्मारक बनाने का आधा-अधूरा काम दिखाई देता है.

Image caption रोहिताश का परिवार

गाँव के बाहरी हिस्से में रोहिताश लाम्बा का मकान है. लाम्बा के छोटे भाई जितेंद्र सरकार के रुख़ से बहुत निराश हैं. वे कहते हैं, "उस वक़्त सबने घर के एक सदस्य को नौकरी देने का वादा किया था. चूँकि शहीद की विधवा मंजू पढ़ी-लिखी नहीं हैं इसलिए नौकरी के लिए मेरे नाम पर सहमति बनी. मगर तब से हम मंत्रियों के चक्कर लगा रहे है. यह बहुत तक़लीफ़ देने वाली बात है.''

परिवार को सरकार से तो शिकायत है ही, समाज से भी है. रोहिताश लाम्बा की पत्नी मंजू बात करते-करते रोने लगती हैं.

कहने लगीं, "कोई नहीं पूछता. वो डेढ़ माह के बच्चे को छोड़ कर गए थे. उनकी उम्र महज 22 साल थी. ज़िंदगी काटेंगे तो हम काटेंगे ,सरकार को थोड़े ही पता है. जहां वो काम करते थे, वहां से किसी ने भी आकर नहीं पूछा कि तुम कैसी हो. हाँ, अजमेर से अधिकारी आते हैं और सुख दुख पूछते रहते हैं."

मंजू कहती हैं, "हमारी शादी को डेढ़ साल ही हुआ था. फिर वे शहीद हो गए. उस वक़्त हौसला बढ़ाने सब आए थे. अब कोई भी हमारा सुख दुःख नहीं पूछता. मैं चाहती हूं मेरे देवर जितेंद्र को सरकारी नौकरी मिल जाए. इसके लिए कई बार कागज़ पर दस्तख़त कर दिए. मैं कोई बीस बार जयपुर के चक्कर लगा चुकी हूँ. मगर कोई सुनवाई नहीं हुई. क्या करें?''

रोहिताश के पिता बाबूलाल खेती करते हैं. मगर ज़मीन बहुत छोटी है और पानी भी नहीं है. वे कहते हैं हमारे परिवार में वही एक मज़बूत सहारा था. यह कितना बड़ा दुःख है कि एक पिता को अपने बेटे को कंधा देने पड़े. बाबूलाल कहते हैं उस वक़्त तो सबने कहा हम आपके साथ हैं मगर अब कोई नहीं पूछता."

परिवार के मुताबिक़, सीआरपीएफ़ में वर्ष 2011 में रोहिताश लाम्बा का चयन हुआ और 2013 में उन्होंने ड्यूटी ज्वाइन की. जब मां घीसी देवी ने अपने बेटे को वर्दी में देखा था तो बहुत ख़ुश हुई थीं. मगर अब वो अपने बेटे को याद कर फफक पड़ती हैं.

घीसी देवी कहती हैं, "शाहदत के वक्त हर कोई कह रहा था हम आपके साथ हैं. लेकिन अब कोई नहीं पूछता. बेशक उसके संगठन के अधिकारी ज़रूर उनका हाल पूछने आते रहते हैं और सांत्वना देते हैं. क्या किसी नेता या सरकार ने सुध ली? कोई नहीं आता. कभी कभी अधिकारी ज़रूर आते हैं."

अब घर की ज़िम्मेदारी रोहिताश लाम्बा के छोटे भाई जितेंद्र के कंधों पर आ गई है. जितेंद्र केंद्र और राज्य सरकार दोनों के रवैये से बहुत दुखी हैं.

Image caption जितेंद्र

जितेंद्र ने बीबीसी से कहा, "उस वक़्त केंद्र और राज्य दोनों के मंत्री यहाँ आए थे. मगर अब एक साल हो गया. उनमें से किसी ने सुध नहीं ली. उस वक़्त हमारे परिवार ने कहा था कि घर चलाने के लिए मुझे नौकरी का अवसर दिया जाना चाहिए. तब सरकार ने हामी भरी थी. पर अब हम नेताओं के चक्कर लगा रहे हैं. कोई सुनवाई नहीं हो रही है. हम इतने परेशान हैं कि 14 फ़रवरी को बरसी के दिन सरकार ने जो दिया है उसे वापस लौटा देंगे."

राज्य के सैनिक कल्याण मंत्री प्रताप सिंह खाचरियावास उन नेताओ में शुमार थे जो लाम्बा के घर सांत्वना देने पहुंचे थे. खाचरियावास ने बीबीसी से कहा, "राजस्थान ने शहीद परिवारों के लिए बाक़ी राज्यों से अच्छा पैकेज दिया था. लाम्बा के पारिवार के एक सदस्य को नौकरी देने में कुछ प्रक्रियागत बाधा है क्योंकि अब तक नियमों में शहीद की विधवा पत्नी या संतान को ही नौकरी देने का प्रावधान है. इसलिए जितेंद्र को नौकरी देने के लिए नियम में बदलाव की प्रक्रिया शुरू गई है. वे कहते हैं सरकार अपने वचन को पूरा करेगी."

Image caption जीतराम गुर्जर की मां

भरतपुर ज़िले के सुंदरवाली गांव के जीतराम गुर्जर इन्हीं दिनों कोई एक साल पहले चरमपंथी हमले का शिकार हो गए थे.

उनके पिता राधेश्याम खेती करते हैं मगर ज़मीन की जोत बहुत छोटी है. फिर उसके लिए पानी की भी किल्लत है. जीतराम के बाद उनके छोटे भाई विक्रम ही सब कुछ संभालते हैं.

विक्रम ने बीबीसी से कहा, "सरकार ने बहुत से वादे पूरे कर दिए. मगर मेरी नौकरी का काम अब भी बाक़ी है. विक्रम और उनका परिवार अपने दम पर जीतराम का शहीद स्मारक बनवा रहे हैं.'' विक्रम कहते हैं, "उस वक़्त बहुत लोग आए थे. तब भरतपुर से बीजेपी सांसद बहादुर सिंह कोली ने स्मारक के लिए दस लाख रूपए का एलान किया था. लेकिन अब तक उन्हें यह रक़म मिली नहीं है. विक्रम नहीं जानते कि इसके लिए किससे गुहार करें."

जीतराम की दो बेटियां है. बड़ी बेटी सुमन अब चार साल की हैं जबकि छोटी इच्छा उस वक्त चार माह की थीं.

Image caption जीतराम की विधवा पत्नी सुंदरी

जीतराम की विधवा पत्नी सुंदरी ने बीबीसी से कहा "मेरे पति की शहादत के वक़्त सभी लोग आए थे. हमें खेत के लिए कृषि कनेक्शन देने का वादा किया गया था. पर यह काम अब तक नहीं हुआ है."

विक्रम कहते हैं "सरकार ने स्कूल या किसी शिक्षण संस्थान के नामकरण का वादा भी पूरा नहीं किया."

बेटे जीतराम के बारे में पूछने पर माँ गोपा की आंखें भर आती हैं. सीआरपीएफ़ के जवान जीतराम बीते साल 14 फ़रवरी के चरमपंथी हमले में मारे गए थे.

परिजनों के मुताबिक़ घटना के बाद लोगों ने काफ़ी हिम्मत दी थी और अब भी सांत्वना देते रहते हैं. छान छप्पर और कुछ पक्के कमरों से बने घर के बाहर लगी जीतराम की पोस्टरनुमा तस्वीर बताती है कि इस घर से कोई सैनिक चरमपंथी हमले में मारा गया है.

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