कर्नाटक: CAA पर बच्चों के नाटक और राष्ट्रद्रोह की पूरी कहानी - ग्राउंड रिपोर्ट

  • 13 फरवरी 2020
बीदर स्कूल का नाटक का मामला

26 साल की नज़्बुन्निसा कहती हैं, "मुझे नहीं पता कि मैं यहाँ कैसे पहुंच गई."

नज़्बुन्निसा सिंगल मदर हैं जो दूसरों के घरों में काम कर गुज़ारा करती हैं. उन्होंने हमें अपना पूरा नाम नहीं बताया.

नज़्बुन्निसा और फ़रीदा बेगम को 30 जनवरी को गिरफ़्तार किया गया था. फ़रीदा उस स्कूल में टीचर हैं जहां उनकी बेटी पढ़ाई करती है. दोनों महिलाओं पर राष्ट्रद्रोह का आरोप लगाया गया है जिससे दोनों इनकार करती रही हैं.

कर्नाटक के उत्तर में बसे बीदर ज़िले की जेल में मेरी उनसे मुलाक़ात हुई. जेल अधिकारी के कमरे में हुई मुलाक़ात में उन्होंने कहा कि वो मज़बूत बने रहने की बहुत कोशिश कर रही हैं लेकिन अचानक से उनकी ज़िंदगी में उथल-पुथल मच गई है.

स्कूल में खेले गए एक नाटक के बाद इन दोनों महिलाओं की गिरफ़्तारी हुई. दोनों पर राष्ट्रद्रोह के आरोप लगाए गए हैं.

बीदर के शाहीन स्कूल में एक कार्यक्रम का आयोजन हुआ था जिसमें बच्चों ने नागरिकता संशोधन क़ानून और राष्ट्रीय नागरिकता पंजीकरण (एनआरसी) के विषय पर नाटक पेश किया. इस कार्यक्रम में 9 से 12 साल की उम्र के बच्चे शामिल थे.

एक बच्चे के अभिभावक ने इस नाटक को सोशल मीडिया पर लाइव स्ट्रीम किया.

नाटक में एक बूढ़ी महिला कहती है कि वो अपनी नागरिकता साबित करने के लिए अपने दस्तावेज़ नहीं दिखाएंगी और चप्पलों से 'मोदी' को मारेंगी.

इस नाटक के बारे में नीलेश रक्षाल नाम के एक व्यक्ति ने शिकायत की जो ख़ुद को सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं. उनका कहना है कि उन्होंने 'प्रधानमंत्री के साथ दुर्व्यवहार करने और स्कूल में नफ़रत फैलाने के लिए स्कूली बच्चों के इस्तेमाल पर स्कूल के ख़िलाफ' शिकायत दर्ज कराई है.

इस मामले में स्कूल मैनेजमेंट और नाटक का लाइव स्ट्रीम करने वाले अभिभावक के ख़िलाफ़ भी शिकायत दर्ज की गई है.

पुलिस के पास जो एफ़आईआर दर्ज है उसमें नज़्बुन्निसा और फ़रीदा बेगम का ज़िक्र नहीं है लेकिन पुलिस की रिमान्ड रिपोर्ट में इन पर 'मुसलमान समुदाय में नागरिकता संशोधन क़ानून और एनआरसी के ख़िलाफ़ ग़लत जानकरी फैलाने और अपने नाबालिग़ बच्चों को प्रधानमंत्री को चप्पल से मारने की बात सिखाने का आरोप लगाया गया है.'

क्यों हुई महिलाओं की गिरफ़्तारी?

21 जनवरी को शाहीन स्कूल का वार्षिकोत्सव था. स्कूल के ऑडिटोरियम में दिनभर कई कार्यक्रम आयोजित किए गए.

शाहीन एजुकेशन फ़ाउंडेशन के सीईओ तौसीफ़ मेडीकेरी के अनुसार शाहीन स्कूल एक अल्पसंख्यक स्कूल है जिसकी 9 राज्यों में 43 शाखाएं हैं. उनका कहना है कि बीदर स्कूल में क़रीब 50 फ़ीसदी ग़ैर-मुसलमान छात्र पढ़ते हैं.

वो बताते हैं कि अब तक पांच बार बच्चों से पूछताछ की गई है. इस घटना का सबूत तीन मिनट की एक वीडियो क्लिप है जिसे लाइव स्ट्रीम किया गया था. ये वीडियो क्लिप फ़िलहाल हटा दी गई है.

यह वीडियो क्लिप मोहम्मद यूसुफ़ रहीम के सोशल मीडिया अकाउंट से लाइव स्ट्रीम की गई थी. यूसुफ़ इस मामले में तीसरे आरोपी हैं. हमने उनसे संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उनसे बात नहीं हो पाई.

25 जनवरी को नीलेश रक्षाल ने सोशल मीडिया में इस नाटक का वीडियो देखा.

वो कहते हैं कि वो इसी दिन देर शाम अपने दो दोस्तों और एक वकील के साथ स्कूल के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज करने के लिए पुलिस स्टेशन गए. अपनी शिकायत में उन्होंने कहा कि शाहीन स्कूल प्रबंधन ने एक नाटक में प्रधानमंत्री के ख़िलाफ़ अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया है और समुदायों के बीच घृणा फैलाई है. शिकायत में यह भी कहा गया कि राष्ट्रद्रोही गतिविधियां हो रही हैं जिस पर पुलिस को क़दम उठाना चाहिए.

26 जनवरी को इस मामले में स्कूल के प्रेसिडेंट, स्कूल प्रबंधन और मोहम्मद यूसुफ रहीम के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की गई. भारतीय दंड संहिता के तहत धर्म के आधार पर नफ़रत फैलाने के लिए जानबूझ कर अपमानजनक शब्दों के प्रयोग, ग़लत प्रचार और देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया.

27 जनवरी को पुलिस ने स्कूल परिसर का दौरा किया और सीसीटीवी फ़ुटेज लिया.

28 जनवरी को पुलिस एक बार फिर स्कूल पहुंची और उन बच्चों से पूछताछ की जो नाटक में शामिल थे. हालांकि, स्कूल के सीओओ तौसीफ़ मेडीकेरी का आरोप है कि पुलिस ने प्रक्रिया का पालन नहीं किया. उनका कहना है कि बच्चों से पूछताछ करते वक़्त एक पुलिस अधिकारी वर्दी में अपने हथियार के साथ थे. पुलिस अधीक्षक नागेश डी एल ने उनके आरोपों से इनकार किया है.

Image caption नीलेश रक्षाल

मेडीकेरी बताते हैं कि पूछताछ के दौरान 12 साल की एक बच्ची (जिसने नाटक में बूढ़ी महिला का किरदार निभाया था) ने पुलिस को बताया कि उसकी मां ने संवाद लिखने और सीखने में मदद की थी. इसके बाद ही से बच्ची की मां पर सवाल उठने शुरू हुए.

30 जनवरी को पुलिस ने बच्ची की 26 साल की मां और 52 साल की स्कूल टीचर को हिरासत में लिया. उन्हें कस्टडी में लेकर ज़िला अदालत में पेश किया गया और दोनों महिलाएं अब बीदर ज़िला जेल में हैं.

31 जनवरी को पुलिस बच्चों से पूछताछ करने के लिए फिर एक बार स्कूल पहुंची. इस बार वो बाल कल्याण विभाग के सदस्यों के साथ थे. स्कूल के अधिकारी बताते हैं कि बच्चों से 3 घंटे से अधिक समय तक पूछताछ की गई.

1 फ़रवरी और 4 फ़रवरी को पुलिस फिर स्कूल गई और बच्चों से पूछताछ की. स्कूल अधिकारियों का कहना है कि हर बार लगभग 3 घंटे तक पूछताछ चली. 9 से 12 साल की उम्र के क़रीब 70 बच्चों का कहना है कि लगभग 8 बच्चों से कई बार पूछताछ की गई थी.

हालांकि, एसपी नागेश डी एल का कहना है कि यह जांच का हिस्सा था. उन्होंने कहा, "जांच अधिकारी को कई बार स्कूल का दौरा करना पड़ा क्योंकि सभी बच्चे एक बार में स्कूल में नहीं मिले. स्कूल से सीसीटीवी फ़ुटेज हमने बरामद किया, लेकिन हमें पता चला कि घटना के दिन का फ़ुटेज मिटा दिया गया है. इसे अब फॉरेंसिक के लिए भेजा गया है. इस मामले पर हमने क़ानूनी राय मांगी है और जल्द ही एक रिपोर्ट दायर करेंगे."

घटना के बाद से स्कूल प्रबंधन के कुछ सदस्य और स्कूल के प्रेसिडेंट फ़रार हैं. कितने लोग फ़रार हैं इसकी सही-सही जानकारी नहीं मिल पाई है.

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कौन हैं ये महिलाएं?

जेल अधिकारियों से आवश्यक अनुमति लेने के बाद बाद बीदर ज़िला जेल में हमने इन महिलाओं से मुलाक़ात की. दोनों 30 जनवरी से जेल में हैं. 6 फ़रवरी को जब हम उनसे मिले तो उन्होंने हमसे कहा कि वो मज़बूत रहने की कोशिश कर रही हैं.

26 साल की नज़्बुन्निसा बीदर में किराए के एक घर में अपनी 12 साल की बेटी के साथ रहती हैं. वो मूल रूप से बीदर के नज़दीक एक गांव से हैं लेकिन बच्ची की पढ़ाई के लिए शहर आई हैं.

वो कहती हैं, "मुझे नहीं पता कि मैं यहां कैसे पहुंची. मेरी बेटी घर पर नाटक के लिए अभ्यास कर रही थी. न तो मुझे सीएए के बारे में कोई जानकारी है और न ही एनआरसी के विवाद के बारे में कुछ पता है. मैं तो उसका नाटक देखने भी नहीं गई थी."

"मुझे नहीं पता मेरी बेटी कैसे दिन गुज़ार रही है. वो मुझसे मिलने आई थी. मैंने कुछ मिनट के लिए उसे खिड़की से देखा लेकिन मैं उसके सामने रोई नहीं. मैं नहीं चाहती कि मेरी बेटी डर जाए."

बच्ची फ़िलहाल अपने पड़ोसी, मोहम्मद हफ़ीज़ुद्दीन के साथ रह रही है. हफ़ीज़ुद्दीन बताते हैं, "उसे बहला-फुसला कर सोने के लिए कहते हैं तब जाकर वो सोती है. रात को वो चौंक कर उठ जाती है और अपनी मां के लिए रोती है. वो बार-बार कहती रहती है कि उसकी ग़लती के लिए उसकी मां को सज़ा मत दो."

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52 साल की फ़रीदा बेगम की दो बेटियां हैं. उनकी एक बेटी की शादी हो चुकी है और दूसरी कॉलेज में है.

उनका कहना है कि उन्हें ये नहीं पता कि उनके साथ क्या हो रहा है. वो कहती हैं कि वो स्कूल का प्रशासनिक कार्य देखती हैं, "मैं हाई ब्लड प्रेशर की मरीज़ हूं. जेल के भीतर ज़्यादा कुछ नहीं कर सकती. मैं मज़बूत रहने की कोशिश कर रही हूं. मुझे अपने भविष्य की चिंता है."

फ़रीदा बेगम के पति मिर्ज़ा बेग पेशे से गेराज मैकेनिक हैं. वो अपनी पत्नी से मुलाक़ात करने जेल पहुंचे थे. कुछ मिनट मुलाक़ात करने के बाद उन्होंने हमसे कहा, "जो हो रहा है वो सही नहीं है. हमारी एक बेटी है जिसकी शादी होनी बाकी है. भविष्य में क्या होगा? अब वो आगे पढ़ाई के लिए जाएगी तो उसे मुश्किल हो सकती है."

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क्या कहता हैस्कूल प्रबंधन?

स्कूल का आरोप है कि मुसलमान अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान होने के कारण उन्हें निशाना बनाया जा रहा है.

फ़ाउंडेशन के तौसीफ़ मेडीकरी बताते हैं कि एक छोटे से मामले को देशद्रोही गतिविधि बना दिया गया है.

वो कहते हैं, "यह बच्चों का एक नाटक था. हमें नहीं पता कि किस कारण से, स्कूल पर देशद्रोह के आरोप लगाए गए हैं. ये सब कल्पना से परे है. क़ानूनी कार्रवाई चल रही है और हम लड़ेंगे. बच्चों से पांच बार पूछताछ की गई है. बच्चों के लिए ये मानसिक उत्पीड़न के समान है और लंबे समय में इसका असर पड़ सकता है. हमने पुलिस से अनुरोध किया है कि ऐसे छोटे से मामले के लिए स्कूल में न आएं. देश के राजनीतिक माहौल के कारण ऐसा हो रहा है."

एक बच्चे के अभिभावक से कथित तौर पर दो बार पूछताछ की गई है. उनका कहना है कि उन्हें नहीं पता कि नाटक में क्या ग़लत था.

वो कहते हैं, "मेरे बच्चे को बार-बार पूछताछ के बाद डर लगने लगा है. वह स्कूल नहीं जाना चाहती क्योंकि वो पुलिस से डरती है. उसने मुझे बताया कि पुलिस बार-बार उसे डायलॉग सिखाने वाले शिक्षकों और दूसरे लोगों की पहचान करने के लिए कह रही है. बच्चे देख रहे हैं कि देशभर में क्या हो रहा है. हर जगह हो रहे विरोध का ये प्रतिनिधित्व था. बच्चों को मौक़ा दिया जाना चाहिए कि उनकी आवाज़ सुनी जाए लेकिन उन्हें परेशान किया जा रहा है."

कर्नाटक बाल अधिकार आयोग ने स्कूल का दौरा किया है और पुलिस को स्कूल नहीं आने का निर्देश दिया है.

Image caption फ़रीदा बेगम के पति मिर्ज़ा बेग

धर्म के आधार पर पक्षपात?

बीदर में सीएए के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहे सेक्युलर सिटिज़न फ़ोरम का कहना है कि स्कूल में जो कुछ हो रहा है वह पूरी तरह से धर्म पर आधारित है.

फ़ोरम के संयोजक बाबू राव ने आरोप लगाया कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रचार किया जा रहा है.

वो कहते हैं, "राष्ट्रद्रोह का क़ानून ब्रिटिश काल का है. ब्रिटिश साम्राज्य में इसका इस्तेमाल स्वतंत्रता सेनानियों के ख़िलाफ़ किया जाता था. अब मोदी सरकार विरोध करने वालों की आवाज़ दबाने के लिए इसका इस्तेमाल कर रही है. वो नागरिक अधिकारों को कम करना चाहते हैं. यह धर्म के आधार पर भेदभाव है."

वो कहते हैं कि एक ही राज्य सरकार ने कैसे दो अलग-अलग मामलों से निपटा है वो इसका उदाहरण है. वो बताते हैं कि 15 दिसंबर को श्री राम विद्या केंद्र नाम के एक स्कूल ने बाबरी मस्जिद विध्वंस से जुड़ा एक नाटक किया था. सोशल मीडिया पर एक वीडियो में देखा गया कि बच्चों का एक समूह जय श्री राम के नारों के साथ बाबरी मस्जिद का ढांचा गिरा रहा है. इस कार्यक्रम में पुदुचेरी की गवर्नर किरण बेदी भी थीं और उन्होंने बाद में इस बारे में ट्वीट भी किया था.

उस मामले में स्कूल के प्रबंधन के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज की गई. आरएसएस के वरिष्ठ पदाधिकारी और विवेकानंद विद्यार्थी संगम के अध्यक्ष कल्लडका प्रभाकर भट ये स्कूल चलाते हैं.

प्रभाकर भट का कहना है कि उन्हें समझ में नहीं आता है कि इसमें क्या ग़लत था. उन्होंने कहा, "बाबरी विध्वंस एक ऐतिहासिक घटना है. गांधी जी की हत्या, इंदिरा गांधी हत्याकांड पर भी नाटक किए गए हैं. अगर वो सही हैं तो बाबरी विध्वंस पर नाटक करने पर समस्या नहीं होनी चाहिए."

जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्हें लगता है कि बीदर में हुई घटना से अलग तरीक़े से निपटा जा रहा है, तो उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं है कि बीदर में क्या हुआ है.

एफ़आईआर दर्ज किए जाने के एक महीने बाद भी दक्षिण कन्नड़ में पुलिस ने कहा है कि जांच अभी जारी है. पुलिस का कहना है कि बच्चों से पूछताछ की गई है. वहीं, प्रभाकर भट का कहना है कि उनसे अभी तक पूछताछ नहीं की गई है.

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नागरिकता कानून और मुस्लिमों के विरोध पर क्या बोले मौलाना मदनी?

पते की बात ये है कि बीदर मामले में शिकायतकर्ता नीलेश रक्षाल का कहना है कि उन्हें दक्षिण कन्नड़ ज़िले की घटना के बारे में कोई जानकारी नहीं है.

सामाजिक कार्यकर्ता सवाल कर रहे हैं कि पुलिस ने देशद्रोह के आरोपों के तहत मामला दर्ज करने में अपनी पूरी ताक़त क्यों झोंक दी और गिरफ्तारी में भी तेज़ी दिखाई जबकि दक्षिण कन्नड़ मामले में वो पीछे हटते नज़र आई.

सामाजिक कार्यकर्ता लक्ष्मी बावगी कहती हैं, "बाबरी विध्वंस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि मस्जिद का विध्वंस 'क़ानून के शासन का अहंकारी उल्लंघन' था. फिर उस पर नाटक करने पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई. क्या देश एक ऐसी स्थिति में पहुंच गया है जहां हम देश और संविधान के ख़िलाफ़ बोल सकते हैं लेकिन देश के प्रधानमंत्री से सवाल नहीं कर सकते जो जनता के प्रतिनिधि हैं?"

इस मामले पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री कार्यालय ने हमारे सवालों का जवाब नहीं दिया.

हालांकि, मीडिया से बात करते हुए, कर्नाटक के गृहमंत्री बसवराज बोम्मई ने कहा था कि बीदर में जो कुछ भी हो रहा है वो क़ानून के अनुसार है.

उन्होंने कहा, "स्कूल का नाटक प्रधानमंत्री के साथ दुर्व्यवहार जैसा था, जो ग़लत है. मामला दायर किया गया है और जो कार्रवाई की गई है वो क़ानून के अनुसार है."

महिलाओं के वकील, नारायण गणेश का कहना है कि देशद्रोह के आरोप लगाना उचित नहीं है और इस क़ानून का दुरुपयोग किया जा रहा है. वो कहते हैं "हम इसके ख़िलाफ़ अदालत में लड़ेंगे."

वहीं शिकायतकर्ता के वक़ील अनिल कुमार क़ानून का दुरुपयोग होने की बात को सिरे से ख़ारिज करते हैं.

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