पुलवामा हमला: "देश के लिए मेरा भाई शहीद है लेकिन हमारे लिए वो जा चुका है"

  • 13 फरवरी 2020
सुखजिंदर सिंह की तस्वीर लिए उनके माता-पिता इमेज कॉपीरइट Ravinder Singh Robin/BBC
Image caption सुखजिंदर सिंह की तस्वीर लिए उनके माता-पिता

"देश के लिए मेरा भाई शहीद है लेकिन हमारे लिए वो मर चुका है, हमेशा के लिए जा चुका है. मैं साफ़ शब्दों में कहता हूं कि सरकार हमारे जवानों को मरवा रही है."

ये शब्द सुखजिंदर सिंह के बड़े भाई गुरजंट सिंह के हैं. सुखजिंदर सिंह उन 40 सीआरपीएफ़ जवानों में से एक हैं जो पिछले साल 14 फ़रवरी को पुलवामा में हुए हमले में मारे गए थे.

आज सुखजिंदर की मौत के एक साल बाद भी उनका परिवार उस मुआवज़े के लिए सरकारी दफ़्तरों के चक्कर काट रहा है, जिसका हमला पुलवामा हमले के बाद हुआ था.

सुखजिंदर के भाई गुरजंट सिंह ने बीबीसी से बातचीत में सरकार से कई कड़े सवाल पूछे.

उन्होंने पूछा कि पुलवामा हमले के पीछे कौन था. उन्होंने पूछा कि वो हमला किसने करवाया जिसमें उन्होंने अपने भाई को खो दिया.

गुरजंट सिंह बताते हैं कि उनके परिवार का संघर्ष उसी दिन शुरू हो गया था जब उन्हें ब्लास्ट में सुखजिंदर की मौत की ख़बर मिली थी.

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Image caption सुखजिंदर सिंह के भाई गुरजंट सिंह

सुखजिंदर सिंह का परिवार पंजाब के तरन तारन ज़िले में स्थित गंडीविंड धताल गांव में रहता है. उनके परिजनों के पास तीन एकड़ के लगभग ज़मीन है.

परिवार का दावा है कि राज्य सरकार ने उनसे 12 लाख रुपये और एक सरकारी नौकरी का वादा किया था लेकिन अब तक उन्हें सिर्फ़ पांच लाख रुपये मिले हैं.

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पिछले साल एलान किया था कि वो पुलवामा हमले में मारे गए जवानों के परिवार को 12 लाख रुपये और परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी दिलाएंगे.

सुखजिंदर की पत्नी सरबजीत कौर पहले ज़्यादातर अपने मायके में रहती थीं लेकिन अब वो हफ़्ते के आख़िर में अपने ससुराल ज़रूर आती हैं.

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Image caption सुखजिंदर सिंह की शादी की तस्वीर

सरबजीत कहती हैं, "सरकार ने वादा किया था कि वो आर्थिक मदद के अलावा मुझे नौकरी भी देगी. अभी मेरा बेटा सिर्फ़ डेढ़ साल का है और उन्होंने मुझे चपरासी की नौकरी का प्रस्ताव दिया है जबकि मैंने उनसे किसी अच्छी नौकरी की गुज़ारिश की थी."

सरबजीत कहती हैं कि उन्हें हर रोज़ जवानों के मौत की ख़बर सुनने को मिलती है.

सुखजिंदर के भाई गुरजंट सिंह पूछते हैं, "ऐसा कब तक चलेगा?" वो कहते हैं कि सरकार के ज़रिए कोई हल ढूंढने की कोशिश करनी चाहिए.

सुखजिंदर की मां हर रोज़ अपने बेटे की तस्वीर लेकर आंगन में बैठती हैं. सुखजिंदर के पिता गुरमेज सिंह खेती के अलावा गांव में दूध बेचने का काम करते हैं.

वो बताते हैं, "हमारे पास बहुत कम ज़मीन है, जिससे हमारा थोड़ा-बहुत काम चल जाता है लेकिन पूरे घर का खर्च चलाने में सुखजिंदर हमारी बहुत मदद करता था."

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गुरमेज सिंह दुखी स्वर में बताते हैं, "अब भी मेरे ऊपर ढाई लाख रुपये का बैंक लोन है और कुछ साहूकारों के पैसे भी उधार हैं. मैंने उनसे खेती के लिए कुछ कर्ज़ लिया था. मुझे उम्मीद थी कि सरकार मेरा बैंक कर्ज़ माफ़ कर देगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं."

सुखजिंदर के परिजनों के आरोपों के बारे में पूछे जाने पर तरन तारन के डिप्टी कमिश्नर प्रदीप सबरवाल ने कहा, "उन्हें पांच लाख रुपये पहले ही दिए जा चुके हैं. बाकी के सात लाख रुपये भी जल्दी दे दिए जाएंगे और इस बारे में सम्बन्धित विभाग से पहले ही सिफ़ारिश की जा चुकी है."

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