CAA-NRC: मज़हबी उन्माद के दौर में चंपारण के 'देवराज' का प्रदर्शन क्यों ख़ास है- ग्राउंड रिपोर्ट

  • 14 फरवरी 2020
चंपारण के देवराज का प्रदर्शन इमेज कॉपीरइट Neeraj Priyadarshy/BBC

आप दुनिया के किसी भी कोने में हों, इस वक़्त के भारत की ख़बरों में पढ़ रहे होंगे, देख रहे होंगे और सुन रहे होंगे कि पूरे देश में सैकड़ों जगहों पर दिल्ली के शाहीन बाग़ की तर्ज़ पर नागरिकता संशोधन क़ानून 2019 (CAA), नेशनल रजिस्टर फॉर सिटिजन्स (NRC) और नेशनल पोपुलेशन रजिस्टर (NPR) के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं.

इस समय भारत के कई छोटे-बड़े शहर में इन क़ानूनों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन चल रहे हैं. लेकिन दिल्ली के शाहीन बाग़ का प्रदर्शन CAA-NRC की मुख़ालफ़त का प्रतीक बन गया है, क्योंकि वह देश की राजधानी नई दिल्ली में चल रहा है और नेशनल और इंटरनेशनल मीडिया का अटेंशन वहां ज़्यादा है.

वहां मज़हबी उन्माद में गोली चलने की घटना घट चुकी है. और हाल ही में ख़त्म हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान भी यहां का नाम लेकर हिन्दू-मुसलमान ध्रुवीकरण करने की पुरज़ोर कोशिशें हुईं.

लेकिन जिस प्रदर्शन के बारे में हम आपको यहां बताने जा रहे हैं वह इन सभी प्रदर्शनों से अलग और ख़ास है.

देश की राजधानी नई दिल्ली से क़रीब एक हज़ार किलोमीटर दूर बिहार के चंपारण ज़िले के एक गांव में पिछले 25 दिन से हज़ारों की तादाद में महिलाएं और पुरुष CAA और NRC के ख़िलाफ़ शाहीन बाग़ की तरह धरना प्रदर्शन कर रहे हैं.

अभी तक हमें CAA और NRC के विरोध में प्रदर्शन की जितनी भी ख़बरें सुर्खियों में पढ़ने को मिलीं, वो प्रायः शहरों में हो रहे हैं. लेकिन पश्चिमी चंपारण के ज़िला मुख्यालय बेतिया से तक़रीबन 40 किमी दूर चल रहा यह प्रदर्शन एक "ठेठ गांव" सबेया, देवराज में हो रहा है.

क्यों ख़ास है देवराज का विरोध प्रदर्शन?

प्रदर्शन स्थल के आस-पास गन्ने और गेहूं की खेती होती है और प्रदर्शन में शामिल लोगों का मुख्य पेशा खेती है. अधिकांश औरतें गृहणियां हैं. और गांव में कच्चे-पक्के छोटे-छोटे मकान हैं.

बेतिया-रामनगर रोड से जाने पर सड़क से गुज़रते हुए यहां का प्रदर्शन गांव में लगे एक मेले सा दिखता है. ट्रैक्टरों में भरकर लोग आ-जा रहे हैं. अस्थायी दुकानें लगी हैं, जलेबियां छन रही हैं, समोसे बन रहे हैं, मुंगफली बिक रही है, बच्चों के खिलौने भी हैं. झुंड बनाकर बच्चे, महिलाएं, पुरुष इधर-उधर घूम रहे थे.

सड़क के किनारे शामियाना लगाकर एक छोटा सा मंच बनाया गया है. अंदर तिरंगे लहराते दिखते हैं. पोस्टरों पर लिखा है - "NO CAA- NO NRC" "CAA वापस लो, NRC नहीं चलेगा".

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शामियाने के नीचे पुआल बिछाकर हज़ारों की संख्या में महिलाएं और पुरुष बैठे हैं. कुछ महिलाओं के चेहरे पर बुर्क़ा है तो कुछ साड़ी और शॉल ओढ़कर माथे पर चटख़ सिंदूर लगाए बैठी हैं.

पुरुषों का पहनावा भी गांव के आम लोगों की तरह है. ज्यादातर लुंगी और धोती में हैं. वहां बैठे लोगों के कपड़े और चेहरे देखकर तो ये क़तई नहीं कहा जा सकता कि केवल मुसलमान ही विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.

प्रदर्शन के आयोजकों से हमारा पहला सवाल यही था कि इस तरह गांव में प्रदर्शन करने का कैसे ख़याल आया? क्या उन्हें ये नहीं लगा कि गांव में मीडिया का उतना अटेंशन नहीं मिल पाएगा जितना कि शहरों को मिल रहा है? क्या गांव से वे उस स्तर पर अपना विरोध दर्ज करा सकेंगे कि दिल्ली में बैठी सरकार उन्हें सुनेगी?

मुख्य आयजकों में से एक तेलपुर पंचायत के मुखिया जावेद कहते हैं, "जब हम प्रदर्शन की परमिशन लेने के लिए यहां के डीएम के पास अर्जी लेकर गए थे तो उन्होंने भी ऐसे ही सवाल पूछे थे. हमने उन्हें जवाब दिया कि क्या ये ज़रूरी है कि गांव के लोग विरोध करने के लिए शहर जाएं."

वो कहते हैं, "यहां से बेतिया शहर में जाने का भाड़ा पहले 20 रुपया था अब 50 रुपया से कम कोई गाड़ी वाला नहीं लेता. गांव के किसान-मज़दूर लोगों के बस में रोज़ यह करना संभव नहीं है. हमनें डीएम साहब को यह भी बोला कि जिस तरह शहरों के विरोध प्रदर्शन में सड़क जाम और सुरक्षा संबंधी दूसरी समस्याएं आ रही हैं, हमारे यहां वो सब भी नहीं होगा. आप भी देख सकते हैं कि यहा किसी तरह का कोई पुलिस प्रशासन नहीं है. दरअसल हमें ज़रूरत ही नहीं है."

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प्रदर्शन के आयोजकों में प्रमुख रूप से वही लोग शामिल हैं जो अपने गांव की पंचायतों के प्रतिनिधि हैं.

सबेया गांव जहां प्रदर्शन हो रहा है वह तेलपुर पंचायत के अंतगर्त पड़ता है. इस गांव की आबादी मुसलमान बहुल है. लेकिन प्रदर्शन स्थल के दूसरे किनारे पर बग़ल का गांव हरदिया है जहां 90 फीसदी हिंदुओं की आबादी रहती है.

तेलपुर के ही एक निजी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षक धनेशर साह जो आयोजकों में भी हैं, वहां की डेमोग्राफी के बारे में बताते हैं कि देवराज इलाक़ा 22 गांवों का एक समूह है. आबादी मिश्रित हैं. किसी गांव में मुसलमानों की बहुलता है. किसी में हिंदुओं की. रहने वाले अधिकांश लोग खेती और मज़दूरी पर निर्भर हैं. गन्ना यहां की मुख्य फसल है.

धनेशर साह आगे देवराज की विशेषता के बारे में कहते हैं, "पुराणों में लिखा है कि देवराज के गांव देवताओं के गांव थे. इसलिए इलाक़े का नाम भी पड़ा. हम अपने बुजुर्गों से सुनते हैं कि आज से 300-400 साल पहले इस इलाक़े में बहुत से ऋषि-मुनी रहते है. यहां के हिंदू हों या मुस्लिम सब समझते हैं कि देवराज के लोगों में एक ही ख़ून है. इसलिए लोगों में भाईचारा है. यहां कभी कोई सांप्रदायिक तनाव नहीं हुआ है. इसी से समझिए कि जिस गांव में आप खड़े हैं उसमें एक ही कंपाउंड के अंदर छठ के घाट, क़ब्रिस्तान, श्मशान और मंदिर हैं. और उस कंपाउंड की ज़िम्मेदारी यहां रहने वाले मुसलमानों की है."

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देवराज के लोगों में बंधुत्व और सौहार्द की बात हमारे ड्राइवर शमीम कुछ इस तरह बताते हैं, "यहां जब कोई प्रयोजन होता है, चाहे वह किसी की शादी हो, कोई घार्मिक आयोजन हो या फिर कोई पर्व-त्यौहार हो, अगर हिंदुओं का है तो वो तब तक सफल नहीं माना जाता जब तक उसमें मुसलमान लोग नहीं शामिल होते और अगर मुसलमानों का है तो उसमें हम लोग हिंदू भाई लोग को घर से बुला-बुलाकर लाते हैं."

"यक़ीन नहीं करिएगा, लेकिन यहां के मुसलमान अपने हिंदू भाई लोगों को कुर्बानी का मीट भी खिलाते हैं और वे बड़े आराम से खाते हैं."

क्या गांववालों को CAA, NRC के बारे में पता है?

प्रदर्शन स्थल पर पुरुषों से अधिक संख्या में महिलाएं बैठी हैं. गांव की महिलाएं जो अधिकांश समय घर में बिताती हैं. वहां पुआल पर नीचे बैठकर मुठ्ठियां भींचे इन्क़लाब ज़िंदाबाद और मोदी सरकार मुर्दाबाद के नारे लगा लगा रही हैं. शाम के सात बजने वाले हैं और अंधेरा हो चुका है.

धरने पर बैठी महिलाओं से हमने जानने की कोशिश की कि CAA और NRC के बारे में वे कितना जानती हैं?

एक बुजुर्ग महिला कहती हैं, "हमें सब पता है कि ये सरकार क्या चाहती है. सबसे दुख इस बात का है कि मोदी क्या-क्या निकाल रहे हैं देश से. बाबा-दादा का ठिकाना पूछ रहे हैं. यहां हमारा खेत है, घर है, दुआर है, यहां की मिट्टी में हमारे पुर्वजों का अंश है. आख़िर हमें निकाल कर ये किसका मुल्क बनाना चाहते हैं."

वे कहती हैं, "इतने दिनों तक जवाहरलाल रह गए पर किसी को निकाले नहीं. सबको क़ायम किए. और ये हैं कि निकालने पर अड़े हैं. तो हमलोग क्या करें. बाहर निकालकर बैठना ही न पड़ेगा."

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वहां बैठी महिलाओं से बातचीत से लगा कि सबमें इस बात का डर है कि CAA और NRC लाकर सरकार उन्हें देश से बाहर निकाल देगी.

वे कहती हैं कि "जब बाहर ही निकल जाएंगे तो रह क्या जाएगा. इज्जत-आबरू, धन-संपदा, कुछ भी तो नहीं बचेगा. इसलिए हम अभी से घरों से बाहर निकलकर बैठे है ताकि सरकार हमारी सुने और जब तक CAA कानून वापस नहीं लिया जाएगा तब तक हम यहां बैठे रहेंगे."

हमने पूछा कि क्या उन महिलाओं को लगता है कि गांव में हो रहे उनके विरोध को सरकार देख रही है, उनकी बात सरकार सुनेगी?

रामनगर के एक प्राइवेट स्कूल में चौथी कक्षा में पढ़ने वाली बच्ची इरम जावेद हमारे सवालों को सुनकर कहती है, "क्यों नहीं सुनेगी सरकार. उसको सुनना पड़ेगा. नहीं तो हम झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की तरह बन जाएंगे. कन्हैया सर जिस आज़ादी की बात करते हैं हमें वो आज़ादी चाहिए. CAA और NRC से तो आज़ादी चाहिए ही चाहिए साथ ही हमें फ़ातिमा वाली आज़ादी चाहिए, अशफ़ाक़ वाली आज़ादी चाहिए. हमें दिल्ली से जैसे स्कूल चाहिए. अच्छी सड़कें चाहिए."

10 साल की इरम कहती हैं, "ये सरकार हमें दे तो कुछ नहीं रही है, उल्टा सब बेच रही है. एलआईसी बेच रही है, रेलवे, एयरपोर्ट सब बेच रही है, अगर इसी तरह चलता रहा है तो ये लोग देश भी बेच देंगे. तब क्या हम ख़ुद को इंडियन कह पाएंगे!"

हिन्दू पुरुष ही नहीं, महिलाएं भी हैं प्रदर्शन में शामिल

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CAA और NRC के ख़िलाफ़ देश में जहां भी विरोध प्रदर्शन चल रहे हैं उनके बारे में पढ़ने को मिलता है कि प्रदर्शन में मुसलमान अधिक संख्या में शामिल होते हैं. लेकिन देवराज का प्रदर्शन इस मामले में अलग है.

छह किलोमीटर दूर से अपने बच्चे के साथ प्रोटेस्ट में शामिल होने आयीं मुंगराहा गांव की सुनीता देवी इस बात को खारिज़ करती हैं कि प्रदर्शन में केवल मुसलमान ही शामिल हो रहे हैं.

सुनीता देवी कहती हैं, "ये ग़लत बोला जा रहा है कि केवल मुसलमान प्रदर्शन कर रहे हैं. यहां देखिए तो गांव के सब धर्म-जाति के लोग हैं. में ख़ुद एक दलित हूं. और सरकार का यह क़ानून केवल मुसलमानों के लिए ख़राब नहीं है, बल्कि हिंदू ग़रीबों और दलितों के लिए भी एक ज़ुल्म है."

"हम भूमिहीन लोग हैं और आप ही बताइए कैसे हम अपने बाप-दादा का पता बताएंगे. हमारे पास तो ज़मीन का भी काग़ज़ नहीं है. ये सरकार हिन्दुस्तान-पाकिस्तान और हिंदू-मुस्लिम करके हम ग़रीबों का शोषण कर रही है."

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रात हो चली है. गांव-देहात का इलाक़ा है इसलिए प्रदर्शन स्थल के आस-पास अंधेरा ही अंधेरा दिखाई देता है. लेकिन जहां तक लाइट का इंतज़ाम है वहां तक लोग अब भी दिख रहे हैं. भीड़ अब भी हज़ारों की संख्या में है.

गांव के इस प्रदर्शन में भीड़ जुटाने को लेकर एक वोलेंटियर वसीम मंज़र कहते हैं, "हमें भीड़ नहीं जुटानी पड़ती. उसे केवल कंट्रोल करना पड़ता है. देवराज में 22 गांव हैं और रोज़ाना एक गांव या दो गांव के लोग स्लॉट बुक कराकर प्रदर्शन करने आते हैं. इसके लिए वहां के मुखिया सरपंच पहले से बुकिंग कराते हैं."

वसीम के मुताबिक़ जिन लोगों का घर दूर रहता है वे रात तक वापस चले जाते हैं. लेकिन जिनका घर नज़दीक है वे रात भर यहीं टिकते हैं. यहां भोजन का भी इंतज़ाम है जो चंदे से हुआ है.

लाउड स्पीकर लगा है. आस-पास के गांवों के ही पंचायत प्रतिनिधियों और बुद्धीजीवियों को मंच पर बुलाया जाता है. वे अपनी बात रखते हैं. CAA और NRC के बारे में बताते हैं. सरकार विरोधी नारे लगाते हैं. वहीं नीचे बैठे लोग नारे को दोहराते हैं, वक्ताओं की बातें सुनकर तालियां बजाते हैं.

फौज की पोशाक में एक बच्चा मंच से कन्हैया कुमार की तरह आज़ादी का नारा लगाता है, पीछे तिरंगे के परिधान में सजे दूसरे बच्चे उसे दोहराते हैं. प्रदर्शन में शामिल हर आदमी और औरत की मुट्ठियां हवा में लहराने लगती हैं.

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देवराज के इस प्रदर्शन में जहां तक राजनेताओं के पहुंचने की बात है तो विपक्ष का कोई भी बड़ा नेता यहां नहीं पहुंचा है सिवाय पप्पू यादव के.

आयोजक बताते हैं कि कन्हैया कुमार ने CAA और NRC को लेकर जिस दिन चंपारण से अपनी यात्रा की शुरुआत किए थे उस दिन वो उस प्रदर्शन में भी आने वाले थे. लेकिन पुलिस ने उन्हें वहां से 14 किमी दूर स्थित भितिहरवा के बापूधाम से आगे नहीं बढ़ने दिया इसलिए वे भी नहीं आ सके.

हालांकि आगे जीतन राम मांझी, उपेंद्र कुशवाहा और दूसरे विपक्षी नेताओं ने आयोजकों से आने का वादा किया है. इसलिए वे उम्मीद से भरे दिखते हैं कि उनके प्रदर्शन पर सरकार की नज़र जाएगी.

देवराज से लौटते हुए हम यही सोच रहे थे कि जब देश भर में हो रहे भारी विरोध प्रदर्शनों को देखकर भी सरकार एक इंच पीछे हटने को तैयार नहीं है, तो वैसे में गांव के लोगों के इस विरोध को कोई मुक़ाम मिल भी पाएगा.

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बेतिया बस पड़ाव पर लौरिया के रहने वाले नवीन राय से हमारी बातचीत चंपारण के गन्ना किसानों के ख़स्ताहाल के ऊपर हो रही थी.

वे बता रहे थे किस तरह मिल मालिकों की मनमानी और सरकार के उदासीपन के कारण गन्ना किसान क़र्ज़ के बोझ में डूबते चले जा रहे रहे हैं. उन्हें गन्ना ख़रीदने वाला नहीं मिल रहा है जबकि उगाने के लिए मिल मालिक अधिक क़ीमतों पर बीज बेच रहे हैं. जिसका गन्ना बिक रहा है वो भी औने-पौने दाम पर बिक रहा है. तीन सालों से बिक्री का रेट बढ़ा नहीं. जबकि कई सालों के पैसे बाक़ी हैं.

नवीन कहते हैं, "आप एक बताइए कि सब नेता लोग चंपारण से ही अपना आंदोलन या यात्रा क्यों शुरू करते हैं? क्योंकि ये चंपारण की धरती है. यहां के लोग आख़िरी हद तक सहते हैं. लेकिन जब प्रतिकार करते हैं तो बड़ी से बड़ी सत्ता घुटने टेक देती है."

"इतिहास गवाह है. इसने मोहनदास करमचंद गांधी को यहां से बापू बनाकर भेजा, इसने नीतीश कुमार को कुर्सी कुमार बना दिया. और यक़ीन मानिए, आज के दौर में जो चंपारण के लोगों के साथ खड़ा होगा वो दुनिया के फ़लक पर छा जाएगा."

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