कर्नाटक: वो वन मंत्री जिन पर वन क़ानून के उल्लंघन के हैं कई मामले

  • 14 फरवरी 2020
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Image caption बीजेपी नेता बीएस येदियुरप्पा के साथ आनंद सिंह

राजनेता का ख़ुद पर लगे गंभीर आरोपों को आसानी से ख़ारिज कर देना एक कला है.

इसका ताज़ा उदाहरण है कर्नाटक में बीजेपी सरकार में शामिल नए मंत्री जिन्होंने ख़ुद पर लगे चोरी, आपराधिक साज़िश, धोखाधड़ी और भरोसा तोड़ने के अपराध को मात्र 'यातायात नियमों का उल्लंघन' बताया है.

कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने राज्य सरकार में आनंद सिंह को वन, पर्यावरण और पारिस्थितिकी मंत्री बनाया है. नवंबर में हुए विधानसभा उपचुनाव के लिए आनंद सिंह ने जो चुनावी हलफ़नामा दायर किया था उसमें उनके ख़िलाफ़ कुल 26 मामलों का ज़िक्र है.

इनमें से कम से कम 16 मामले ऐसे हैं जो कर्नाटक वन क़ानून, खान और खनिज (विकास और विनियमन) क़ानून और भारतीय दंड संहिता का उल्लंघन हैं.

लेकिन वन और पर्यावरण मंत्री बनाए जाने को लेकर हो रही आलोचना से चौथी बार विधायक चुने गए आनंद सिंह को कोई फ़र्क़ पड़ता नहीं दिखता.

वो कहते हैं अगर किसी के पास गाड़ी है तो ये लाज़मी है कि उसके ख़िलाफ़ 'यातायात नियमों का उल्लंघन' के मामले भी होंगे. ठीक उसी तरह चूंकि उनका परिवार लंबे वक़्त से खनन व्यवसाय में है ये 'प्राकृतिक' है कि उनके ख़िलाफ़ वन क़ानून के उल्लंघन के मामले तो होंगे ही.

सवाल पूछ रहे अपने आलोचकों से आनंद सिंह कहते हैं कि वो मुख्यमंत्री से सवाल करें क्योंकि उन्होंने कभी पोर्टफ़ोलियो की मांग नहीं रखी, उन्हें ये दिया गया है.

कौन हैं आनंद सिंह?

53 साल के आनंद सिंह उन अभियुक्तों में से एक हैं जिनका नाम साल 2008-2013 में बीजेपी सरकार को हिलाकर रख देने वाले अवैध आयरन और माइनिंग (लौह अयस्क खनन) घोटाले में सामने आया था. वो इस घोटाले में गली जनार्दन रेड्डी के साथ अभियुक्तों की सूची में शामिल थे. इस मामले में तत्कालीन मुख्यमंत्री येदियुरप्पा को भी जेल तक जाना पड़ा था.

इस घोटाले के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक और गोवा में खनन पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दिया था. इसका असर 2011-12 में देश के सकल घरेलू उत्पाद पर पड़ा था और उसमें दो फ़ीसदी की गिरावट दर्ज की गई थी.

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Image caption आनंद सिंह

भ्रष्टाचार निरोधी कर्नाटक राष्ट्र समिति के प्रतिनिधि पा.या. गणेश ने बीबीसी को बताया, "जनार्दन रेड्डी से अलग आनंद सिंह ऐसे परिवार से आते हैं जो खनन उद्योग में है. लेकिन, उन दिनों खनन के लिए अधिक आयरन नहीं था. वो उस वक़्त अपने चाचा सत्यनारायण सिंह की निजी बस कंपनी के प्रबंधन का काम कर रहे थे. उनके चाचा एक राजनीतिक हस्ती थे."

वो बताते हैं, "वो मैनेजर ज़रूर थे लेकिन वो बसों की भी सफ़ाई का काम भी करते थे. बाद में वो खानों के प्रबंधन का काम करने लगे. वो लोगों की मदद करते थे और जब ज़रूरी होता था ग़रीबों की आर्थिक सहायता भी करते थे."

जी. जनार्दन रेड्डी के अपराध के साथी

सामाजिक कार्यकर्ता और खनन का काम करने वाले तापल गणेश याद करते हैं, "साल 2000 की शुरुआत में आयरन ओर निर्यात करने के बाज़ार में ज़बर्दस्त उछाल आया. चीन को अधिक ओर निर्यात होने लगा. वो उस वक़्त पूरी तरह रेड्डी बंधुओं के साथ काम करने लगे. उन्होंने एक तरह का गिरोह बना लिया था. वो एक खदान से आयरन ओर निकालने का अनुबंध हाथ में लेते थे लेकिन असल में वो ज़मीन के नीचे से निकट के दूसरे खदानों से लौह अयस्क निकालने लगे थे."

सुप्रीम कोर्ट में इस संबंध में याचिका डालने वालों में से एक समाज परिवर्तन समुदाय के एसआर हीरेमठ बताते हैं, "उन्होंने वन भूमि का अतिक्रमण किया और वहां ज़मीन के नीचे से आयरन ओर चुराने लगे. उन्होंने संदूर की पहाड़ियों की वन भूमि को राजस्व भूमि के रूप में दिखाया और वहां से पेड़ों का सफ़ाया कर दिया. सर्वोच्च न्यायालय के शब्दों में उन्होंने पर्यावरण को 'लापरवाह और अपूर्णीय क्षति' पहुंचाई. आनंद सिंह गंभीर रूप से जनार्दन रेड्डी के साथ उनके अपराधों में भागीदार बन गए."

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लोकायुक्त, जस्टिस संतोष हेगड़े की रिपोर्ट में यह कहा गया था कि अवैध रूप से निकाले गए 70 लाख मीट्रिक टन आयरन ओर का निर्यात किया गया था.

उनकी इस रिपोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय जाँच ब्यूरो यानी सीबीआई को मामले की जाँच का आदेश दिया. 50,000 टन से अधिक लौह अयस्क के अवैध उत्खनन के मामलों की जाँच सीबीआई ने की जबकि 50,000 टन से कम के उत्खनन के मामलों की जाँच विशेष जाँच दल ने की.

हीरेमठ बताते हैं, "उत्खनन किया गया अधिकांश लौह अयस्क (एक अनुमान के मुताबिक़ इसकी क़ीमत 35,000 करोड़ रुपये थी) का निर्यात कृष्णमपेट बंदरगाह, चेन्नई बंदरगाह और उत्तर कन्नड़ ज़िले के बेलेकेरे बंदरगाह से किया गया था. उत्तर कन्नड़ ज़िले में बंदरगाह में रखे गए अवैध लौह अयस्क की चोरी कर उसका निर्यात किया गया था, इस कारण वहां एक अलग जाँच के आदेश दिए गए थे. बेलेकेरे बंदरगाह के अलावा दूसरी जगहों में भी चोरी के गंभीर आरोप लगाए गए थे."

साल 2013 में जब आनंद सिंह सिंगापुर से लौटे उन्हें सीबीआई ने पहली बार गिरफ्तार किया. 18 महीने तक वो जेल में रहे जिसके बाद विशेष जाँच दल ने लगभग एक सप्ताह के लिए उन्हें कस्टडी में लिया.

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Image caption सीबीआई की गिरफ्त में आनंद सिंह

चोर को चोर ही पकड़ सकता है?

जस्टिस हेगड़े ने बीबीसी से कहा, "अगर आपको चोर को पकड़ना है तो आपको चोर बनना पड़ेगा. शायद इस मामले में हमें यही बात दिखती है. लेकिन, जिस तरह से आनंद सिंह के राजनीतिक सहयोगी उनका समर्थन करते हैं वो देखने लायक़ है."

उप-मुख्यमंत्री लक्ष्मण सावदी समेत आनंद सिंह के कैबिनेट सहयोगियों का कहना है कि उन पर केवल आरोप हैं, दोषी साबित होने तक वो निर्दोष हैं. लक्ष्मण सावदी उस वक़्त चर्चा में आए थे जब वो विधानसभा में पोर्न देखते हुए पकड़े गए थे.

लेकिन जस्टिस हेगड़े कहते हैं, "क्या कोई निजी कंपनी या सरकारी संगठन किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करेगा जिसके ख़िलाफ़ कोई आपराधिक मामला लंबित है? ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि अलग-अलग उद्देश्यों के लिए विभिन्न मानक अपनाए जाते हैं."

कुछ मायनों में उनका कहना ग़लत नहीं है. 2013 में जब आनंद सिंह ने भाजपा छोड़ कांग्रेस का दामन थामा तब कांग्रेस ने उन्हें ख़ुशी से अपना लिया. तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने होसपेट में विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान एक सार्वजनिक सभा को संबोधित किया जहां उन्होंने आनंद सिंह को पार्टी में शामिल करने का ऐलान किया.

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Image caption कांग्रेस नेता सिद्धारमैय्या के साथ आनंद सिंह

मई 2018 में जब बीजेपी के बीएस येदियुरप्पा को विधानसभा के पटल पर अपना बहुमत साबित करना था तो आनंद सिंह उन पहले विधायकों में से थे जिनसे बीजेपी ने संपर्क किया. उस वक़्त तीन दिन तक लगातार सार्वजनिक जगहों से ग़ायब रहे आनंद सिंह को कांग्रेस नेता डीके शिवकुमार सदन में लेकर आए थे.

जुलाई 2019 में बीजेपी में शामिल होने के लिए कई कांग्रेस नेताओं ने इस्तीफ़ा दिया था. कांग्रेस के उन 13 पूर्व नेताओं में से एक आनंद सिंह थे. उस समय राज्य में जनता दल सेक्युलर और कांग्रेस की गठबंधन सरकार गिर गई थी. दिसंबर 2019 में हुए उप-चुनावों में एक बार फिर आनंद सिंह जीतकर विधायक बन गए.

और जब उनके समर्थन के लिए येदियुरप्पा ने उन्हें पुरस्कृत कर वन मंत्रालय का कार्यभार सौंपा, कांग्रेस के सभी आला नेता लगभग ख़ामोश रहे.

केवल पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने बयान दिया कि "मंत्रियों को पोर्टफोलियो देने का फ़ैसला येदियुरप्पा को सोच विचार कर लेना चाहिए था. वन क़ानून के उल्लंघन से जुड़े मामलों का सामना कर रहे आनंद सिंह को वन मंत्रालय देना सही नहीं है."

जस्टिस हेगड़े कहते हैं, "मैं उन मतदाताओं से सवाल करना चाहता हूं जो सोचते हैं कि चोरी एक छोटी सी बात है. हम कैसे हो गए हैं जो हम ऐसे नेताओं को फिर से चुन लेते हैं?"

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