शाहीन बाग़: आख़िर कब और कैसे ख़त्म होगा विरोध-प्रदर्शन?

  • 15 फरवरी 2020
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नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ दिल्ली के शाहीन बाग़ इलाके में 15 दिसंबर से विरोध प्रदर्शन चल रहा है. सड़क पर दो महीने से बैठे प्रदर्शनकारी इस क़ानून को वापस लेने की मांग कर रहे हैं.

दो महीने का वक़्त बीत जाने के बाद भी सरकार का कोई प्रतिनिधि इनसे मिलने शाहीन बाग़ नहीं पहुंचा.

वैंलेंटाइंस डे के मौके पर प्रदर्शनकारियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शाहीन बाग़ आने का न्योता दिया. इससे जुड़े पोस्टर और कार्ड भी लगाए. प्रदर्शनकारी मोदी के लिए तोहफ़ा भी लेकर बैठे थे.

इसके एक दिन पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने एक निजी चैनल के कार्यक्रम में शाहीन बाग़ में हो रहे विरोध-प्रदर्शन से जुड़े सवाल पर कहा कि सरकार हर किसी से बात करने को तैयार है. जिसके मन में भी नागरिकता संशोधन क़ानून तो लेकर किसी तरह का सवाल है वो आकर बात करे.

उन्होंने कहा, ''क़ानून में ऐसा कौन सा प्रावधान है जिससे लोग महसूस कर रहे हैं कि यह मुसलमानों के ख़िलाफ़ है, देश के ख़िलाफ़ है. अंदेशे में आंदोलन नहीं होते. अगर आपत्ति है तो बात करें. मैं तैयार हूं. संसद में मैंने हर सवाल का जवाब दिया. आपत्ति क्या है, बताइए. जिसे भी समस्या है वो मेरे ऑफ़िस से मिलने का वक़्त मांगे. मैं तीन दिन के अंदर मिलूंगा और चर्चा करूंगा. जो भी आना चाहे मैं सबसे मिलने को तैयार हूं लेकिन चर्चा किसी को करनी नहीं है. क्योंकि मेरिट पर चर्चा करनी पड़ेगी.''

इसके पहले केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने भी एक फरवरी को यह कहा था कि सरकार शाहीन बाग़ में प्रदर्शन कर रहे लोगों से नागरिकता संशोधन क़ानून पर बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन यह बातचीत व्यवस्थित तरीके से होनी चाहिए.

ये पहली बार था जब किसी केंद्रीय मंत्री ने शाहीन बाग़ के प्रदर्शनकारियों से बातचीत को लेकर सरकार की मंशा रखी थी.

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कैसे ख़त्म होगा विरोध प्रदर्शन?

केंद्र सरकार के दो मंत्रियों की ओर से बातचीत की पहल किए जाने के बाद क्या ऐसे आसार बनेंगे कि शाहीन बाग़ में दो महीने से चल रहा विरोध प्रदर्शन ख़त्म हो जाए? क्या इस प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए सरकार के पास कोई और रास्ता है?

इन सवालों पर वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह का कहना है कि शाहीन बाग़ में चल रहा विरोध प्रदर्शन ग़लत है. जिस क़ानून का विरोध किया जा रहा है वो न तो वापस होने वाला है और न ही उसमें ऐसा कोई प्रावधान है जिससे भारत के मुसलमानों को चिंता होनी चाहिए.

वो कहते हैं, ''जिस तरह रास्ता रोककर विरोध प्रदर्शन चल रहा है वो असंवैधानिक है. इस क़ानून में ऐसी कोई बात नहीं है जिससे मुसलमानों को डर हो. अब वो बात करते हैं कि एनपीआर आ जाएगा, फिर एनआरसी आ जाएगा, जिससे वो देश से बाहर हो सकते हैं, तो आशंका के आधार पर विरोध सही नहीं है. जब वो चीज़ें आएं तब उनका विरोध करें अभी तो यह सही नहीं है.''

दिल्ली में चुनाव हो चुके हैं, क्या केंद्र सरकार अब इस विरोध प्रदर्शन को ख़त्म करवा सकती है? इस सवाल पर प्रदीप सिंह कहते हैं कि सरकार चाहे तो ख़त्म करवा सकती है लेकिन मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में है. सुप्रीम कोर्ट में इसे लेकर सुनवाई होनी है. अगर सरकार कोई फ़ैसला लेती है तो सरकार से जवाब मांगा जा सकता है कि जब मामला कोर्ट में था तो उसने कोई एक्शन क्यों ले लिया. पहली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने भी यह कहा है कि आपको विरोध जताने का अधिकार है लेकिन तय जगह पर. ऐसे रास्ता रोक विरोध ठीक नहीं है.

उन्होंने कहा, ''सरकार पुलिस का सहारा लेकर प्रदर्शन ख़त्म करवा सकती है. लेकिन इसके परिणाम विपरीत हो सकते हैं. वहां छोटे-छोटे बच्चे और महिलाओं की तादाद ज़्यादा है. अगर किसी को कुछ होता है तो बात बिगड़ सकती है इसलिए सरकार पुलिस के जरिए विरोध ख़त्म नहीं कराना चाहती. लेकिन अब तो दो केंद्रीय मंत्रियों ने भी ये कह दिया है कि सरकार बात करने को तैयार है, तो शाहीन बाग़ के लोगों को जाना चाहिए. सरकार अभी कोई क़दम नहीं उठाएगी क्योंकि मामला सुप्रीम कोर्ट में है और अभी कोई एक्शन लेना उलटा पड़ सकता है. इसलिए कोर्ट के फ़ैसले के बाद ही सरकार कोई क़दम उठाएगी.''

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दिल्ली सरकार और अरविंद केजरीवाल की भूमिका को लेकर उनका मानना है कि विरोध प्रदर्शन ख़त्म कराने में दिल्ली सरकार की कोई ख़ास भूमिका नहीं हो सकती क्योंकि नागरिकता संशोधन क़ानून केंद्र सरकार ने बनाया है.

दिल्ली की पुलिस भी केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय के अधीन काम करती है. यह कानून व्यवस्था का मामला है और दिल्ली पुलिस गृह मंत्रालय के आदेश का इंतज़ार कर रही है.

हालांकि वो यह भी कहते हैं कि जिस तरह सीएए को वापस लेने की मांग की जा रही है वो ग़लत है. प्रदीप सिंह कहते हैं, ''आज कुछ लोग सीएए वापस लेने की मांग कर रहे हैं. केंद्र का अगर कोई प्रतिनिधि शाहीन बाग़ जाकर बात करे, या ख़ुद गृह मंत्री या प्रधानमंत्री वहां चले जाएं तो इससे भी एक ग़लत संदेश जाएगा और कल को इससे बड़ी तादाद में लोग जमा हो गए और सीआरपीसी को ख़त्म करने की मांग करने लगे तो क्या होगा.''

प्रदीप सिंह कहते हैं, ''अगर सुप्रीम कोर्ट कहता है कि आप रास्ता खाली कर दीजिए वहां से हट जाइए, लेकिन अगर वो नहीं हटते तब फोर्स का इस्तेमाल किया जाएगा.''

क्या कहते हैं प्रदर्शनकारी

शाहीन बाग़ के प्रदर्शन में शामिल एक महिला ने कहा, ''हम शुरू से प्रधानमंत्री को बुलाना चाहते हैं. हम अपनी मुहिम को बातचीत के माध्यम से सार्थक मोड़ देना चाहते हैं. हर शुरुआत का एक अंत है और इसका भी अंत होगा. जनता चाहती है वो यहां आएं और हमसे बात करें तो उन्हें आना चाहिए. लेकिन जब तक सरकार सीएए, एनआरसी और एनपीआर वापस नहीं लेती हम यहां से नहीं हटेंगे.''

शाहीन बाग़ में प्रदर्शन कर रही महिलाओं की मांग है कि केंद्र सरकार नागरिकता संशोधन कानून को वापस ले. साथ ही राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) लागू करने को लेकर स्थिति स्पष्ट करे और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) को लागू ना किया जाए.

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने बजट सत्र के दौरान 4 फरवरी को संसद में बहस के दौरान कहा था कि अभी तक केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर एनआरसी लाने का फ़ैसला नहीं किया है. इससे पहले सरकार ने विज्ञापन देकर ऐसा ही आश्वासन दिया था.

लोकसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में उन्होंने कहा, "अभी तक सरकार ने नेशनल रजिस्टर ऑफ़ इंडियन सिटिज़न्स (एनआरआईसी) को राष्ट्रीय स्तर पर तैयार करने को लेकर कोई भी निर्णय नहीं लिया है."

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शाहीन बाग़ में प्रदर्शन कर रहे लोग फ़िलहाल हटने को तैयार नहीं हैं.

वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी का भी मानना है कि शाहीन बाग़ में चल रहा विरोध प्रदर्शन सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ही ख़त्म हो सकते हैं.

वो कहते हैं, ''इस मामले को ज़्यादा दिन खींच कर किसी को कुछ हासिल नहीं होगा. सरकार स्पष्ट कर चुकी है कि वो पीछे नहीं हटेगी. शाहीन बाग़ के आंदोलन की वजह से उसके पीछे हटने का सवाल भी नहीं है. इस प्रदर्शन से बीजेपी का फ़ायदा ही हो रहा है. इसका जो हल है वो सुप्रीम कोर्ट में हो रही सुनवाई से ही मिल सकता है. सुप्रीम कोर्ट शुरुआती सुनवाई के बाद अगर कोई सलाह दे या निर्देश दे जिससे आंदोलन ख़त्म हो.''

वो यह भी मानते हैं कि शाहीन बाग़ के लोग ख़ुद से प्रदर्शन ख़त्म कर देंगे, इसकी उम्मीद नज़र नहीं आती क्योंकि इससे उनकी अपनी छवि को नुकसान हो सकता है.

हालांकि ये भी सच है कि 15 दिंसबर से शुरू हुए इस प्रदर्शन की लौ अब थोड़ी धीमी पड़ गई है. पहले के मुक़ाबले अब वहां प्रदर्शन कर रहे लोगो की तादाद धीरे-धीरे कम हो रही है.

वो कहते हैं, ''केजरीवाल को पहले भी जाना चाहिए था. शायद तब उन्हें लगता था कि अगर वो शाहीन बाग़ गए तो वोटों का ध्रुवीकरण हो सकता है, इसलिए वो नहीं गए क्योंकि वो सिर्फ़ मुसलमानों के वोट से नहीं जीत सकते थे."

लेकिन अब चुनाव भी हो चुके हैं और नतीजों में साफ़ नज़र आ रहा है कि मुसलमानों ने भी उन्हें ही वोट किया है. उनके विधायक की ओखला में 72 हज़ार वोटों से जीत इसका स्पष्ट प्रमाण भी है.

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प्रमोद जोशी का मानना है कि अब केजरीवाल के वहां जाने में कोई हर्ज नहीं है. नैतिकता दिखाते हुए भी वो शाहीन बाग़ जा सकते हैं. उनकी पार्टी ख़ुद आंदोलन से जन्मी है. ऐसे में उनका वहां जाना ग़लत नहीं होगा. वैसे भी वो ख़ुद भी नागरिकता कानून के ख़िलाफ़ बोलते रहे हैं.

प्रमोद जोशी का कहना है कि अगर दिल्ली सरकार किसी तरह की भूमिका इसमें निभा सकती है तो अच्छी बात है लेकिन इसके आसार कम ही नज़र आते हैं.

वो कहते हैं, ''विरोध प्रदर्शन से नागरिकता संशोधन क़ानून की वापसी नहीं होने वाली. इसकी वापसी सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट में क़ानूनी और संवैधानिक लड़ाई के ज़रिए ही हो सकती है. इसलिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश का इंतज़ार करना चाहिए.''

केजरीवाल ने क्या कहा?

एक निजी चैनल को दिसंबर में दिए गए इंटरव्यू में अरविंद केजरीवाल ने नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध किया था और सवाल उठाए थे कि सरकार दूसरे देशों से लोगों को ला रही है, उनके रोज़गार, उनकी ग़रीबी की चिंता है, लेकिन जो अपने ही देश में बेरोज़गार हैं और ग़रीब हैं उनकी फिक्र कौन करेगा?

केजरीवाल ने केंद्र सरकार को सुझाव देते हुए कहा था कि यह बहुत गंदा क़ानून है इसे वापस लिया जाना चाहिए और सरकार सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों और सभी पार्टियों की बैठक बुलाकर बेरोज़गारी और ग़रीबी दूर करने के मुद्दे पर चर्चा करे और उपाय तलाशा जाना चाहिए.

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सवाल उठाया था कि आख़िर सरकार किसे फ़ायदा पहुंचाने के लिए यह क़ानून लाई है.

बीते महीने दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल से शाहीन बाग़ में प्रदर्शन कर रहे लोगों का एक प्रतिनिधि मंडल मिला. इस दौरान उन्होंने अपनी मांगें उपराज्यपाल के सामने रखी थीं.

उपराज्यपाल से मुलाक़ात के दौरान इस बात पर सहमति बनी थी कि प्रदर्शनकारी स्कूली बसों और एंबुलेंस को रास्ता देंगे लेकिन जब तक सरकार सीएए और एनआरसी वापस नहीं लेती, विरोध-प्रदर्शन जारी रहेगा.

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सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 17 को

सुप्रीम कोर्ट ने 10 फरवरी को एक याचिका की सुनवाई करते हुए नागरिकता संशोधन क़ानून (सीएए) के ख़िलाफ़ शाहीन बाग़ में चल रहे विरोध प्रदर्शन को हटाने के लिए कोई अंतरिम आदेश देने से इनकार कर दिया था.

शाहीन बाग़ में बैठे प्रदर्शनकारियों को हटाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि विरोध से दूसरों को परेशानी नहीं होनी चाहिए. कोर्ट ने ये भी कहा कि अनिश्चित काल के लिए प्रदर्शन नहीं होना चाहिए.

बीजेपी नेता और पूर्व विधायक डॉक्टर नंद किशोर गर्ग ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी. याचिका में मांग की गई थी कि अदालत केंद्र सरकार और दूसरी संस्थानों को आदेश दे कि शाहीन बाग़ का प्रदर्शन ख़त्म कराया जाए.

अदालत ने केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया और 17 फ़रवरी को अगली सुनवाई करने का आदेश दिया है.

शाहीन बाग़ के प्रदर्शन को लेकर कोर्ट में एक अन्य याचिका भी दायर की गई है जो विरोध प्रदर्शन में छोटे-छोटे बच्चों को लाने के विरोध में दी गई है.

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