बढ़ती महंगाई को लेकर क्या वाक़ई चिंता होनी चाहिए?

  • 19 फरवरी 2020
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"मुझे नहीं पता क्या हो रहा है? घर के राशन का सारा सामान- सब्ज़ियां, दालें, गैस सिलिंडर, मसाले... सभी चीज़ें मंहगी हो रही हैं. ऐसे में हम खाएंगे क्या? मैंने सुना है कि हमारे देश में महंगाई बीते छह सालों में सबसे ज़्यादा हो गई है."

40 साल की गृहिणी अमिता तावड़े अकेली महिला नहीं हैं जो बढ़ती महंगाई से परेशान हैं.

इसी सप्ताह जारी सरकारी आंकड़े बता रहे हैं कि दिसंबर 2019 में मुद्रास्फीति यानी महंगाई दर 7.35 फ़ीसदी थी, वो जनवरी 2020 आते-आते 7.59 फ़ीसदी तक पहुंच गई है. वहीं जनवरी 2019 में महंगाई दर 2.05 फ़ीसदी पर थी.

फ़िलहाल अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की बढ़ी क़ीमतें इस स्थिति के लिए ज़िम्मेदार हैं. मई 2014 के बाद से ये पहली बार है जब महंगाई दर सबसे अधिक है और चिंता का विषय बन गई है. मई 2014 में यह 8.3 फ़ीसदी थी.

जानकार ख़ुदरा मूल्य सूचकांक पर भी लगातार नज़र बनाए हुए हैं जो जनवरी में बढ़कर 3.1 प्रतिशत हो गया, जबकि बीते महीने ये 2.59 प्रतिशत था.

ख़ुदरा मूल्य सूचकांक के लिए तीन व्यापक क्षेत्रों पर नज़र रखी जाती है- आम तौर पर घर में इस्तेमाल किए जाने वाले सामान की क़ीमतें, कच्चे तेल और बिजली की क़ीमतें और उत्पादन. वहीं खुदरा महंगाई दर के लिए खाने के सामान, पेय, तंबाकू, कपड़े और घर जैसे उत्पादों पर नज़र रखी जाता है.

ये दोनों सूचकांक इस बात की जानकारी देते हैं कि देश की अर्थव्यवस्था किस हाल में हैं. फ़िलहाल जानकरों के लिए ये दोनों चिंता का कारण बन रहे हैं.

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Image caption अमिता तावड़े, गृहिणी

क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ऑफ़ इंडिया यानी आईसीआरए की प्रमुख अर्थशास्त्री अदिति नायर कहती हैं, "जनवरी 2020 की महंगाई दर ख़ुश करने वाली नहीं रही. आशंका यही है कि सब्ज़ियों की कीमतें तो शायद घट जाएंगी लेकिन दालें महंगी ही रहेंगी."

कोटक महिंद्रा बैंक की वरिष्ठ अर्थशास्त्री उपासना भारद्वाज कहती हैं, "खाने की चीज़ों की कीमतें अधिक रहने वाली हैं और इस कारण माना जा रहा है कि कमज़ोर विकास के बावजूद वित्त वर्ष 2020 की पहली छमाही में खुदरा महंगाई दर छह फ़ीसदी से अधिक रह सकती है."

वहीं केयर रेटिंग्स में अर्थशास्त्री, सुशांत हेडे का मानना है, "खाने की चीज़ें महंगी रहने वाली हैं लेकिन ताज़ा सामान थोक बाज़ार में आने के साथ हो सकता है कि क़ीमतें थोड़ी कम हो जाएं. और अगर कच्चे तेल की क़ीमतें अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कम हुईं तो इसका भी असर महंगाई पर पड़ेगा."

कुछ जानकार मानते हैं कि ग्रामीण इलाकों में महंगाई बढ़ने का असर कम ही देखने को मिला है. हालांकि, बीते 19 महीनों में जनवरी में पहली बार गांवों में महंगाई दर शहरी इलाकों की महंगाी दर के मुक़ाबले अधिक तेज़ी से बढ़ी है.

अर्थशास्त्रियों की मानें तो भारत की दो तिहाई आबादी ग्रामीण क्षेत्रों पर निर्भर करती है और खेती-किसानी से जुड़ी है. ये भारत की 2.8 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था का लगभग 15 प्रतिशत है. ऐसे में बढ़ती क़ीमतें इस ओर इशारा कर रही हैं कि अब दाम तय करने की ताकत किसानों के हाथों में लौट रही है.

एलएंडटी फ़ाइनेंशियल होल्डिंग्स की प्रमुख अर्थशास्त्री रूपा रेगे नित्सुरे ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बाताया, "किसानों के लिए ये अच्छा संकेत है क्योंकि आने वाले महीनों में उनके हाथों में अधिक नकदी आ सकती है. मुझे लगता है कि सुधार के पहले संकेत ग्रामीण इलाकों से मिलेंगे."

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क्या महंगाई दर के कारण मंदी की स्थिति है?

कुछ जानकार सवाल कर रहे हैं कि क्या वाक़ई भारत स्टैगफ्ल़ैशन से गुज़र रहा है यानी ऐसी स्थिति जब खुदरा महंगाई दर बढ़ने के कारण मंदी की स्थिति पैदा हो जाती है.

सुशांत हेडे कहते हैं, "स्टैगफ्ल़ैशन तब होता है जब खुदरा महंगाई दर लगातार अधिक रहती है और साथ ही सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी गिरने लगती है. फिलहाल भारत में ये धीमी ज़रूर है लेकिन नकारात्मक नहीं है. कहा जा सकता है कि मंदी या मंदी जैसी स्थिति तो है लेकिन स्टैगफ्ल़ैशन नहीं है. साथ ही खुदरा महंगाई की दर का अधिक नाता खाने-पीने की चीज़ों की क़ीमतों के साथ होता है भले ही दूसरी चीजों की कीमतों में उछाल न आया हो. आने वाले महीनों में खाने पीने की चीज़ें सस्ती होने वाली हैं."

आरबीआई की भूमिका

भारत के केंद्रीय बैंक यानी रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया का अनुमान है कि जनवरी से मार्च के बीच खुदरा महंगाई दर 6.5 फ़ीसदी तक आ सकती है और 1 अप्रैल को शुरू होने वाले अगले वित्त वर्ष की पहली छमाही तक 5 से 5.4 फ़ीसदी के बीच रह सकती है.

रिज़र्व बैंक की पूरी कोशिश होती है कि मुद्रास्फीति 2 से 6 फ़ीसदी के बीच ही रहे.

ब्लूमबर्ग द्वारा किए गए अर्थशास्त्रियों के एक सर्वेक्षण के अनुसार जनवरी-मार्च के बीच खुदरा महंगाई दर 6.3 फ़ीसदी तक हो सकती है जबकि अगली तिमाही में ये 5.3 फ़ीसदी तक पहुंच सकती है.

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रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति ने फ़रवरी में हुई अपनी एक बैठक में ब्याज़ दरों में बदलाव नहीं किया था. बीते साल दिसंबर की नीति समीक्षा से पहले फ़रवरी से अक्तूबर के बीच रिज़र्व बैंक ने ब्याज दरों में 135 बेसिस पॉइंट्स की कमी की थी.

ब्याज दर में हुई कमी का फ़ायदा बैंक अपने उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचा रहे. बैंक अपने उपभोक्ताओं को कम ब्याज दरों में कर्ज़ देना नहीं चाहते क्योंकि वो मानते हैं कि इसका असर उनके बैलेंस शीट पर पड़ेगा.

भारतीय बैंकिंग क्षेत्र पहले से ही कई चुनौतियों का सामना कर रहा है - बढ़े हुए नॉन परफ़ॉर्मिंग ऐसेट्स (ऐसे कर्ज़ जिनकी भरपाई नहीं हुई), कथित तौर पर करोड़ों रुपयों की धोखाधड़ी के मामले और रीटेल बैंकों को कर्ज़ा देने वाले बैंक भी फ़िलहाल संकट से गुज़र रहे हैं.

बीते साल दिसंबर में हुई मौद्रिक नीति समीक्षा के दौरान रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने कहा था, "यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि केंद्रीय बैंक के पास ऐसे कई साधन हैं जिनका इस्तेमाल वो चुनौतियों का सामना कर रही भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति दुरुस्त करने में कर सकता है."

कुछ जानकार मानते हैं कि ये इस बात की ओर इशारा हो सकता है कि आने वाले महीनों में कार, घर या निजी ऋण के ब्याज़ की दरों में कटौती की जाएगी.

एक्सिस एसेट मैनेजमेंट के फ़ंड मैनेजर आर शिवकुमार ने सोशल मीडिया पर कहा कि, "हम मौद्रिक नीति से अधिक एक क्रेडिट पॉलिसी देख रहे हैं."

क्या कहती है सरकार?

एक तरफ़ महंगाई दर बीते छह सालों में सबसे अधिक है तो दूसरी तरफ ख़ुदरा मूल्य सूचकांक बीते आठ महीनों के अपने सबसे ऊंचे स्तर पर है. इन दोनों आंकड़ों का सीधा असर आम आदमी की रसोई पर पड़ता है.

टिफ़िन सप्लाई का बिज़नेस करने वाली भावना शिवराम नाइक कहती हैं, "मैंने अपने तीन कर्मचारियों को नौकरी से हटा दिया है. इस बिज़नेस में अब कोई पैसा नहीं बचा है. मैं इसमें पर्याप्त पैसा नहीं बचा पा रही. तेल का एक टिन जो छह महीने पहले 11,00 रुपये का था अब 16,00 रुपये में आता है."

Image caption भावना शिवराम नाइक

भावना कहती हैं, "मैं ज़्यादा लोगों को काम पर नहीं रख सकती इसलिए मुझे ख़ुद ही सब कुछ करना पड़ता है. मुझे नहीं पता मैं कैसे गुज़ारा करूंगी. बिज़नेस करना मुश्किल होता जा रहा है. मैंने तो खाने में प्याज़ का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दिया है."

देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण में देश को भरोसा दिलाया है कि सबसे बुरी स्थिति को कब का पीछे छोड़ आए हैं. उन्होंने लोकसभा में कहा कि अर्थव्यवस्था को गति मिलने वाली है.

सीतारमण ने अधिक विदेशी प्रत्यक्ष निवेश और जीएसटी कर संग्रह के बेहतर आंकड़ों का ज़िक्र करते हुए कहा कि हमारे पार तीन नए संकेतों (नई शुरुआत) के उदाहरण हैं.

उन्होंने कहा, "सरकार के साथ साथ रिज़र्व बैंक भी ग्रोथ बढ़ाने के लिए कदम उठा रहा है. मुझे यक़ीन है कि इन पहलों से अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी."

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