पश्चिम बंगाल: राज्यपाल जगदीप धनखड़ और ममता सरकार के बीच जारी विवाद कब थमेगा

  • 16 फरवरी 2020
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पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनखड़ और राज्य सरकार के बीच जारी विवाद आख़िर कब जाकर थमेगा?

राज्य के राजनीतिक हलकों के अलावा अब आम लोग भी ये सवाल पूछने लगे हैं.

पिछले साल 30 जुलाई को राज्यपाल के तौर पर धनखड़ के शपथ लेने के बाद से ही विभिन्न मुद्दों पर राज्य सरकार और उनके बीच टकराव का जो सिलसिला शुरू हुआ, वो अब तक जस का तस है.

कभी क़ानून और व्यवस्था के मुद्दे पर सरकार की टिप्पणी, कभी कोलकाता और जादवपुर विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोहों में चांसलर के तौर पर उनको शामिल होने से रोकना, तो कभी बतौर चांसलर उनके अधिकारों में कटौती.

टकराव के मुद्दों की य् सूची समय के साथ लंबी होती जा रही है.

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Image caption राज्य मंत्री सुब्रत मुखर्जी के साथ राज्यपाल जगदीप धनखड़

राज्यपाल और सरकार के बीच ताज़ा विवाद

अब ताज़ा मामला है विधानसभा के बजट सत्र के पहले दिन राज्यपाल के अभिभाषण का सीधा प्रसारण नहीं होने देने का और कूचबिहार स्थित पंचानन बर्मा विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में चांसलर के तौर पर धनखड़ को आमंत्रित नहीं किए जाने का.

इस दीक्षांत समारोह में शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी समेत चार मंत्रियों को तो बुलाया गया है. लेकिन चांसलर के तौर पर राज्यपाल को न्योता नहीं दिया गया.

धनखड़ ने इन दोनों मुद्दों पर नाराज़गी जताई है. उन्होंने एक बार फिर क़ानून और व्यवस्था की लगातार बिगड़ती स्थिति पर सरकार को कटघरे में खड़ा किया है.

राज्यपाल और सरकार के बीच जारी विवाद में तृणमूल कांग्रेस के नेता भी कूद रहे हैं.

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अभिभाषण पर रही खींचतान

ऐसा शायद ही कोई दिन बीतता है जब राज्यपाल की टिप्पणी का तृणमूल कांग्रेस के किसी नेता, मंत्री या सांसद ने जवाब ना दिया हो.

तृणमूल कांग्रेस और उसकी सरकार के मंत्री राज्यपाल पर लगातार अपने अधिकार क्षेत्र के उल्लंघन का आरोप लगाते रहे हैं. लेकिन राज्यपाल का दावा है कि उन्होंने अब तक जो कुछ किया है वह संविधान के दायरे में रह कर ही किया है.

उनका कहना है, "सरकार उनका एक भी ऐसा फ़ैसला बताये जो संविधान सम्मत ना हो."

विधानसभा के बजट सत्र में राज्यपाल और सरकार के बीच मतभेद उस समय सामने आया था जब राज्य मंत्रिमंडल ने राज्यपाल जगदीप धनखड़ की उस सलाह को मानने से मना कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने अभिभाषण में कुछ बदलाव करने की माँग की थी.

राजभवन की ओर से जारी एक बयान में कहा गया था कि राज्यपाल ने भाषण में कुछ बदलाव करने को लेकर राज्य सरकार को सुझाव भेजे थे, लेकिन सरकार ने इसके जवाब में कहा कि जो अभिभाषण तैयार हुआ है, वही फ़ाइनल है.

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सरकार की आशंका

समझा जाता है कि सरकार ने इसी आशंका की वजह से अभिभाषण के सीधे प्रसारण की अनुमति नहीं दी थी कि राज्यपाल उसमें फ़ेरबदल कर सकते हैं.

दरअसल राज्यपाल ने पहले ऐसा ही संकेत दिया था. बाद में संसदीय कार्यमंत्री पार्थ चटर्जी ने राजभवन में उनसे मुलाक़ात की थी और सरकार की ओर से तैयार अभिभाषण पढ़ने का अनुरोध किया था.

राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने इस सप्ताह की शुरुआत में हैरानी जताते हुए कहा था, "वित्त मंत्री अमित मित्रा के बजट भाषण का तो सीधा प्रसारण किया जाता है लेकिन विधानसभा सत्र के पहले दिन राज्यपाल के अभिभाषण का सीधा प्रसारण नहीं होता? क्या यह किसी तरह की 'सेंसरशिप' है?"

धनखड़ ने इसे राज्य के संवैधानिक प्रमुख के प्रति असहिष्णुता करार देते हुए कहा था कि मीडिया इस पूरे घटनाक्रम का मूक दर्शक नहीं रहेगा.

मित्रा ने सोमवार को ममता सरकार का बजट पेश किया था जबकि धनखड़ ने बीते शुक्रवार को सत्र के पहले दिन विधानसभा में अभिभाषण दिया था.

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दीक्षांत समारोह को लेकर नोटिस-बाज़ी

इसके बाद नया विवाद कूचबिहार स्थित पंचानन बर्मा विश्वविद्यालय के तीसरे दीक्षांत समारोह का न्योता नहीं मिलने पर शुरू हुआ. ये कार्यक्रम शुक्रवार 14 फ़रवरी को था.

लेकिन इसमें चांसलर के तौर पर ना तो धनखड़ को आमंत्रित किया गया और ना ही आमंत्रण पत्र पर उनका नाम था.

पूर्व राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी ने बीते साल इस विश्वविद्यालय के दूसरे दीक्षांत समारोह में शिरकत की थी.

इससे नाराज़ राज्यपाल ने बुधवार को अपने एक ट्वीट में कहा था, "पंचानन बर्मा विश्वविद्यालय का दीक्षांत समारोह 14 फ़रवरी को होगा. मंत्री पार्थ चटर्जी, गौतम देब, रवीन्द्र नाथ घोष और बिनय कृष्ण बर्मन उसमें आमंत्रित हैं. चांसलर जिसे अध्यक्षता करने का अधिकार है, उसे इसकी कोई जानकारी नहीं है. हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं?"

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तृणमूल कांग्रेस का आरोप

राज्यपाल ने चांसलर के तौर पर विश्वविद्यालय के वाइस-चांसलर डॉक्टर देव कुमार मुखर्जी को कारण बताओ नोटिस भी भेजा है.

इससे पहले बीते साल के आख़िर में राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने एस/एसटी विधेयक को मंजूरी नहीं दी तो तृणमूल कांग्रेस ने विधानसभा में एक विधेयक पारित कर विश्वविद्यालयों के चांसलर के तौर पर उनके अधिकारों में कटौती कर दी.

तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि 'बंगाल का राजभवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्यालय बनकर रह गया है.'

इससे पहले एक अभूतपूर्व घटना में राज्यपाल की ओर से कई प्रस्तावित विधेयकों को मंज़ूरी नहीं मिलने की वजह से विधानसभा दो दिनों के लिए स्थगित कर दी गई थी.

लेकिन राजभवन की ओर से जारी एक बयान में विधेयकों को मंज़ूरी देने में देरी के लिए सरकारी विभागों को ज़िम्मेदार ठहराया गया था.

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संवैधानिक संकट?

देश में संभवतः यह पहला मौक़ा था जब राज्यपाल की हरी झंडी नहीं मिलने की वजह से विधानसभा का सत्र स्थगित किया गया.

उसके बाद पहले से सूचना होते हुए जब राज्यपाल विधानसभा पहुँचे तो उनके लिए तय गेट पर ताला लगा दिया गया. वो सामान्य लोगों के लिए बने गेट से पैदल ही भीतर गए.

तृणमूल कांग्रेस के महासचिव और संसदीय कार्यमंत्री पार्थ चटर्जी कई बार धनखड़ पर संवैधानिक अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन करने का आरोप लगा चुके हैं.

चटर्जी का कहना है कि 'संवैधानिक पद पर बैठे किसी व्यक्ति का बेवजह अति सक्रिय होना और सरकारी कामकाज में हस्तक्षेप करना उचित नहीं है.'

धनखड़ की तीखी आलोचना करते हुए उन्होंने कहा, "मैंने अपने राजनीतिक करियर में अब तक ऐसा कोई राज्यपाल नहीं देखा जो रोज़ाना मुख्यमंत्री और राज्य सरकार की आलोचना करता हो और मीडिया को बयान देता हो."

उधर, धनखड़ ने तृणमूल कांग्रेस के आरोपों पर पलटवार करते हुए अपनी टिप्पणियों को सही ठहराया है.

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समानांतर सरकार चलाने की कोशिश

कोलकाता में एक कार्यक्रम के दौरान राज्यपाल ने किसी का नाम लिए बिना कहा था, "लोगों को लक्ष्मण रेखा पार किए बिना अपनी ड्यूटी करनी चाहिए. मैं कभी लक्ष्मण रेखा पार नहीं करूंगा. लेकिन सबको इस बात का ख़याल रखना चाहिए."

शुरुआती दौर में राज्यपाल धनखड़ और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कम से कम एक-दूसरे के ख़िलाफ़ कोई टिप्पणी नहीं की थी. लेकिन अब तो दोनों एक दूसरे का नाम लिए बिना खुलकर बोलने लगे हैं.

राज्यपाल ने जहाँ ममता बनर्जी और राज्य सरकार पर उनके पद की गरिमा कम करने, उन्हें अपमानित करने जैसे आरोप लगाए हैं तो ममता भी उनका नाम लिये बिना यह कह चुकी हैं कि 'कुछ लोग समानांतर सरकार चलाने की कोशिश कर रहे हैं.'

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि राजभवन और राज्य सरकार के बीच लगातार बढ़ती कड़वाहट से संवैधानिक संकट पैदा हो सकता है.

राजनीतिक पर्यवेक्षक विश्वनाथ चक्रवर्ती कहते हैं, "राज्य में इस साल कोलकाता नगर निगम समेत सात सौ से ज़्यादा स्थानीय निकायों और उसके बाद वर्ष 2021 में विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में राजभवन और सचिवालय के बीच बढ़ता टकराव लोकतंत्र के हित में नहीं है."

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