'आज़ादी के शहीदों' के नाम पर केजरीवाल के मंत्री का शपथ लेना कितना सही?

  • मोहम्मद शाहिद
  • बीबीसी संवाददाता
गोपाल राय

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दिल्ली के मंत्री गोपाल राय

दिल्ली में रविवार को अरविंद केजरीवाल ने तीसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली. इस दौरान उनके साथ छह अन्य मंत्रियों ने पद और गोपनीयता की शपथ ली.

शपथ ग्रहण के दौरान कई मंत्रियों ने अलग-अलग तरीक़े से शपथ ली. दिल्ली के मंत्री गोपाल राय ने ईश्वर के नाम की शपथ न लेकर 'आज़ादी के शहीदों' के नाम की शपथ ली.

दिल्ली के उप-राज्यपाल अनिल बैजल ने रामलीला मैदान में सबसे पहले अरविंद केजरीवाल को मुख्यमंत्री के पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई.

मुख्यमंत्री केजरीवाल ने ईश्वर की नाम की शपथ ली. उनके बाद आए मनीष सिसौदिया, सत्येंद्र जैन और कैलाश गहलोत ने भी ईश्वर के नाम की शपथ ली.

लेकिन गोपाल राय, इमरान हुसैन और राजेंद्र पाल गौतम ने ईश्वर के नाम की शपथ नहीं ली. चौथे नंबर पर शपथ लेने आए गोपाल राय ने 'आज़ादी के शहीदों' के नाम पर पद और गोपनीयता की शपथ ली.

इमरान हुसैन ने अल्लाह के नाम पर पद की शपथ ली लेकिन गोपनीयता की शपथ उन्होंने ईश्वर के नाम पर ली. हालांकि, इमरान हुसैन ने पद और गोपनीयता के जिस दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए उसमें ईश्वर का नाम लिखा था.

अंत में शपथ लेने आए राजेंद्र पाल गौतम ने 'तथागत बुद्ध' के नाम पर पद और गोपनीयता की शपथ ली. उनके भी पद और गोपनीयता के दस्तावेज़ में ईश्वर का नाम लिखा था.

तीन मंत्रियों के अलग-अलग तरीक़े से शपथ लेने पर सवाल उठने लगे हैं.

ट्विटर पर संजय बरागटा ने ट्वीट किया है कि दिल्ली के मंत्री गोपाल राय ने 'आज़ादी के शहीदों' के नाम की शपथ ली, 2015 में 'ईश्वर' के नाम पर शपथ ली, महाराष्ट्र में शिवसैनिकों ने बालासाहेब ठाकरे के नाम पर शपथ ली गई थो इस पर विवाद हुआ, आज़ादी के शहीदों का अब कौन विरोध करेगा?

ऐसे शपथ लेना कितना सही?

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क्या शपथ ईश्वर या संविधान के अलावा भी किसी और के नाम पर ली जा सकती है या नहीं? ऐसे सवाल भी किए जा रहे हैं.

हमने संविधान विशेषज्ञ कुमार मिहिर से बात की तो उनका कहना था कि इस तरह से शपथ लिए जाने में कोई दिक़्क़त नहीं है.

वो कहते हैं, "संविधान की तीसरी अनुसूची में शपथ का एक प्रारूप है. जो कहता है कि आपकी शपथ में कुछ चुनिंदा सामग्रियां होनी चाहिए. सभी मंत्रियों की शपथ में वो बातें शामिल थीं, इन बातों के अलावा आप शुरू में किसी का भी नाम ले सकते हैं."

कुमार मिहिर कहते हैं कि संविधान की तीसरी अनुसूची में संसद के सदस्य, मंत्रियों, राज्य मंत्रियों आदि के शपथ ग्रहण के प्रारूप दिए गए हैं.

वो कहते हैं, "उन प्रारूपों में साफ़ लिखा है कि आप पहले नाम बोलेंगे, फिर पद का नाम लेंगे और फिर आप जिस धर्म को मानते हैं या भगवान को मानते हैं उसका नाम लेंगे."

कुमार मिहिर कहते हैं कि आप भगवान का नाम लेकर शपथ लें या न लें लेकिन यह कहना बिलकुल ज़रूरी है कि आप संविधान और क़ानून के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखेंगे और भारत के लोकतंत्र और संप्रभूता को अक्षुण्ण रखेंगे, ये चीज़ें जब तक आपकी शपथ में हैं तब तक वो मान्य है.

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'आज़ादी के शहीदों' के नाम पर

हालांकि हिमाचल प्रदेश नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर चंचल कुमार सिंह का कहना है कि गोपाल राय की शपथ को अदालत में चुनौती दी जा सकती है.

वे कहते हैं, "संविधान में केवल एक ही जगह पर गॉड या ईश्वर शब्द का जिक्र किया गया है और वो है शपथ के प्रारूप में. बाक़ी पूरे संविधान में ईश्वर का जिक्र कहीं नहीं मिलता. वैसे शपथ का प्रारूप संविधान के ऑपरेशनल पार्ट का हिस्सा नहीं है. संविधान की तीसरी अनुसूची में शपथ का प्रारूप दिया हुआ है."

"इस प्रारूप में शपथ किनके नाम पर लेनी है, वो जगह खाली रखी गई है. जो ईश्वर में विश्वास रखते हैं, वो ईश्वर के नाम पर शपथ लेते हैं, इसमें कोई दिक्कत नहीं है. जो लोग ईश्वर में विश्वास नहीं रखते, वे कहते हैं, 'मैं दृढ़तापूर्वक या दृढ़ निश्चय से शपथ लेता हूं...' एक मुसलमान अल्लाह के नाम पर शपथ ले सकता है. इस पर कोई रोक नहीं है."

"अगर इस प्रारूप का अक्षरसह पालन नहीं किया गया तो शपथ लेने वाले मंत्री के ओहदे को अदालत में चुनौती दी जा सकती है. ये इस पर भी निर्भर करेगा कि अदालत इसे मानती है या नहीं. लेकिन जैसा कि गोपाल राय के मामले मैं है कि उन्होंने 'आज़ादी के शहीदों' के नाम पर शपथ ली है, मेरे विचार से वे ऐसा नहीं कर सकते."

"'आज़ादी के शहीद' ईश्वर के विकल्प के तौर पर नहीं हो सकते. बुद्ध के मामले में ऐसा हो सकता है क्योंकि बौद्ध एक मान्यताप्राप्त धर्म है. शपथ के प्रारूप में ईश्वर वाली जगह इसलिए खाली रखी गई है क्योंकि दुनिया के कुछ धर्मों में गॉड होते ही नहीं है. गौतम बुद्ध खुद कहते थे कि न मैं ईश्वर हूं और न कोई ईश्वर होता है, लेकिन बौद्ध धर्म के अनुयायी उन्हें अपना भगवान मानते हैं."

"'आज़ादी के शहीद' या कोई गुरु या कोई और ईश्वर के नाम का विकल्प नहीं हो सकते. गोपाल राय के मामले को कोई न कोई अदालत में चुनौती देगा. इसके दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं, एक मंत्री के तौर पर लिए गए फ़ैसलों को चुनौती दी जा सकती है."

"इन तीनों मंत्रियों के शपथ के मामले में एक पहलू ये भी है कि मौखिक शपथ लेने के बाद उन्होंने शपथ के जिस दस्तावेज़ पर दस्तखत किए, उस पर क्या लिखा था क्योंकि शपथ वही माना जाएगा, जिस पर हस्ताक्षर किए गए. संविधानिक प्रावधानों और परंपराओं के बीच ये वो खाली जगह जिसे लेकर विवाद हो सकता है और बड़ी अदालतें ज़रूरत पड़ने पर इसकी व्याख्या कर सकती हैं."

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गोपाल राय और इमरान हुसैन

संविधान में क्या है प्रावधान

संविधान की तीसरी अनुसूची के अनुच्छेद 75 (4), 99, 124 (6), 148 (2), 164 (3), 188 और 219 पद और गोपनीयता की शपथ से संबंधित हैं. इसमें सांसद, कैबिनेट मंत्री, विधायक, विधानसभा उम्मीदवार से लेकर जज की शपथ ग्रहण का प्रारूप है.

इसमें शपथ को भगवान के नाम पर या सत्यनिष्ठा के आधार पर शपथ लेने का प्रावधान है. तो फिर क्या 'आज़ादी के शहीदों' के नाम पर या अल्लाह या तथागत बुद्ध के नाम पर शपथ लेने में कोई क़ानूनी समस्या है?

इस पर कुमार मिहिर कहते हैं कि प्रारूप में 'गॉड' लिखा है, अगर कोई अल्लाह को मानता है तो वो अल्लाह के नाम पर शपथ लेगा, इसी तरह से जो जिस भगवान को मानता है वो उसके नाम पर शपथ ले सकता है.

वो कहते हैं, "न्यायालयों में जो शपथ दिलवाई जाती हैं उनमें भी लोग अपनी-अपनी आस्था के अनुसार शपथ लेते हैं. संविधान से तब तक टकराव नहीं होता है जब तक कि आप संविधान के प्रति निष्ठा रखने और लोकतंत्र को अक्षुण्ण रखने को लेकर प्रतिबद्धता नहीं दिखाते हैं."

"संविधान में साफ़ लिखा है कि आप अगर ईश्वर को नहीं मानते हैं तो आप निष्ठापूर्वक शपथ ले सकते हैं. यह सुझाव दिया गया है कि आप ईश्वर की जगह अपने भगवान का नाम ले सकते हैं."

गोपाल राय, इमरान हुसैन और राजेंद्र पाल गौतम ने शपथ तो अलग तरीक़े से ली लेकिन हस्ताक्षर करते समय उन्होंने उन्हीं दस्तावेज़ में हस्ताक्षर किया जिनमें ईश्वर लिखा था.

इस पर कुमार मिहिर कहते हैं कि राष्ट्रपति की घोषणा के बाद राजपत्र प्रकाशित होता है उसके बाद ये दस्तावेज़ उप-राज्यपाल कार्यालय से आए हैं इसलिए इन दस्तावेज़ों में हस्ताक्षर करने और मुंह ज़बानी बोलने से शपथ में कोई दिक़्क़त नहीं आएगी.

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