'भारतीय बोल्ट': श्रीनिवास गौड़ा ने कहा, खेल मंत्रालय के ट्रायल में नहीं दौड़ेंगे

  • 17 फरवरी 2020
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कर्नाटक के जिस कंस्ट्रक्शन मजदूर की तुलना ओलंपिक गोल्ड मेडल विनर यूसेन बोल्ट से की जा रही थी, उन्होंने भारतीय खेल प्राधिकरण के ट्रायल में हिस्सा लेने से इनकार कर दिया है.

इस मज़दूर के भैंसा दौड़ में शानदार प्रदर्शन के बाद उनकी तुलना ओलंपिक चैंपियन एथलीट से होने लगी थी.इसके बाद केंद्रीय खेल मंत्री किरण रिजिजू ने उन्हें भारतीय खेल प्राधिकरण के ट्रायल में हिस्सा लेने की सलाह दी थी.

28 साल के श्रीनिवास गौड़ा ने धान के खेत में भैंसे के साथ 142 मीटर की दूरी सनसनीखेज तेज़ अंदाज़ में पूरी की. वो कर्नाटक के समुद्रतटीय शहर मेंगलुरु के एक गांव में परंपरागत खेल 'कंबाला' में हिस्सा ले रहे थे.

स्थानीय मीडिया की रिपोर्टों में बताया जा रहा है कि गौड़ा ने ये 13.42 सेकेंड में तय की थी.

इसके बाद सोशल मीडिया में इस बात की चर्चा होने लगी कि गौड़ा ने यूसेन बोल्ट के ओलंपिक रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया है.

ओलंपिक खेलों में बोल्ट के नाम 9.58 सेकेंड में 100 मीटर की दूरी तय करने का रिकॉर्ड है. सोशल मीडिया में लगातार कहा जा रहा है कि गौड़ा ने100 मीटर की दूरी तय करने में 9.55 सेकेंड का समय लिया.

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भैंसों को बताया तेज़ी की वजह

इसके बाद अपना दमखम साबित करने के लिए गौड़ा के सामने ट्रायल का प्रस्ताव रखा गया लेकिन गौडा ने बीबीसी हिंदी को बताया कि रेस के दौरान उनके पांव में चोट लग गई थी और इस वजह से वे ट्रायल में फ़िलहाल हिस्सा नहीं ले पाएंगे.

श्रीनिवास गौडा ने कहा, "मैं भारतीय खेल प्राधिकरण के ट्रायल में हिस्सा लेने के लिए फ़िट नहीं हूं. मेरे पांव में चोट लग गई थी और मेरा ध्यान भी कंबाला पर है. मुझे धान के खेतों में भैंसों के साथ दौड़ने की आदत है."

कंबाला अकादमी के संस्थापक सचिव प्रोफ़ेसर गुनापाला कादंबा ने कहा, "केंद्रीय खेल मंत्री की ओर से मिली पेशकश का हम स्वागत करते हैं. हम उसे ख़ारिज नहीं करते. हम इसे कंबाला के लिए बड़े सम्मान के तौर पर देख रहे हैं लेकिन वह ना तो आज ट्रायल में हिस्सा ले सकता है और न ही अगले दो-तीन तक वह इसके लायक हो पाएगा."

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प्रोफेसर कादंबा ने कहा, "मुश्किल यह है कि उसे अगले तीन शनिवारों को कंबाला में हिस्सा लेना है. इस प्रतिबद्धता से वह किसी भी स्थिति में पीछे नहीं हट सकता. इसलिए हम उनकी पेशकश को ख़ारिज नहीं कर रहे हैं, लेकिन संभव है कि वो अगले दौर में ट्रायल में हिस्सा ले."

वहीं गौड़ा ने अपनी तेज़ी की वजह भैंसों को बताया है. उनके मुताबिक़ भैंसों की गति बहुत तेज़ थी और वे किसी ट्रैक इवेंट में हिस्सा नहीं लेना नहीं चाहते.

प्रोफेसर कादंबा ने कहा, "मैं दूसरों के साथ किसी तुलना में पड़ना नहीं चाहता. ओलंपिक आयोजकों के पास कहीं ज़्यादा वैज्ञानिक विधि है. उनके पास गति मापने के लिए बेहतरीन इलेक्ट्रनिक उपकरण भी होते हैं."

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कंबाला क्या है?

कंबाला कर्नाटक के तटीय इलाकों में खेला जाने वाला एक पांरपरिक खेल है. स्थानीय तुलु भाषा में कंबाला का शाब्दिक अर्थ है 'कीचड़ से भरे खेत जिसमें धान उग रहा है'.

इस खेल में हिस्सा लेने वालों को 132-142 मीटर के खेत में एकसाथ बंधे दो भैसों के साथ दौड़ना होता है. यह खेल विवादों में रहा है और इसे अक्सर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पशु अधिकार कार्यकर्ताओं की आलोचना का सामना करना पड़ता है

साल 2014 में भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने बैलों और भैंसों की दौड़ पर प्रतिबंध लगा दिया था.

ये प्रतिबंध कर्नाटक के पड़ोसी राज्य तमिलनाडु में खेले जाने वाले जल्लीकट्टू पर प्रतिबंध के बाद लगा था. इसके दो साल बाद कर्नाटक हाई कोर्ट ने कंबाला के सभी कार्यक्रमों पर रोक लगाने का अंतरिम आदेश दिया था.

प्रोफ़ेसर कादंबा बताते हैं कि हाई कोर्ट के प्रतिबंध का जवाब देते हुए इसके आयोजकों ने कहा था कि वो इस खेल और मानवीय बनाएंगे.

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प्रोफ़ेसर कादंबा ने कहा कि गौड़ा समेत उनके मौजूदा और पूर्व छात्रों को अब ये सिखाया जाता है कि वो भैंसों के साथ कैसे 'ज़्यादा मानवीय तरीके से पेश आएं और उन्हें बेवजह चोट न पहुंचाएं.'

साल 2018 में कर्नाटक में कंबाला को फिर से शुरू किया गया लेकिन साथ ही कई शर्तें भी लगा दीं. इन शर्तों में कोड़ों के इस्तेमाल पर भी रोक लगा दी गई. हालांकि इस खेल पर अब भी ख़तरा मंडरा रहा है.

अंतरराष्ट्रीय पशु अधिकार समूह पीटा (PETA) ने सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका दायर कर कहा कि कंबाला को दोबारा शुरू किए जाने का फ़ैसला ग़ैर क़ानूनी है. प्रोफ़ेसर कादंबा कहते है, "आज जो कंबाला होता है वो बरसों पहले के पारंपरिक कंबाला से काफ़ी अलग है."

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