उमर अब्दुल्ला को किस आधार पर बंद किया गया है?

उमर अब्दुल्ला

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अनुच्छेद 370 के हटाए जाने और राज्य को दो टुकड़ों में विभाजित किए जाने के बाद से कई प्रमुख राजनीतिक नेताओं को जम्मू-कश्मीर पब्लिक सेफ़्टी एक्ट (1978) के तहत हिरासत में रखा गया है.

इन लोगों को हिरासत में रखने के लिए जो आदेश जारी किया गया है उसमें इस फ़ैसले के आधार गिनाए गए हैं, जिन्हें 'ग्राउंड फ़ॉर डिटेंशन' कहा गया है.

दिलचस्प बात ये है कि इस दस्तावेज़ पर कोई तारीख़ नहीं है, बताया गया है कि पुलिस ने अपनी रिपोर्ट पाँच फ़रवरी, 2020 को दी थी जिसके आधार पर यह आदेश जारी किया जा रहा है.

ये आदेश ज़िला मजिस्ट्रेट के हस्ताक्षर और मुहर के साथ जारी किए गए हैं, इसमें सबसे ऊपर यही लिखा है कि ये ग्राउंड पुलिस की जांच के बाद पाए गए हैं और उन्हें एक फ़ाइल (डॉज़िए) में दर्ज किया गया है जिसके आधार पर इन लोगों को हिरासत में रखा जा रहा है.

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नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता, पूर्व केंद्रीय मंत्री और राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री, उमर अब्दुल्ला के हिरासत में रखे जाने की नौ वजहें बताई गई हैं. तीन पन्नों पर टाइप किए गए ग्राउंड्स यानी आधार कुछ इस तरह हैं:-

  • ज़िले की पुलिस ने ऐसी रिपोर्टें दी हैं जिनमें आशंका व्यक्त की गई है कि उमर अब्दुल्ला (दस्तावेज़ में उन्हें हर जगह सब्जेक्ट लिखा गया है) के संवेदनशील बयानों की वजह से शांति भंग हो सकती है.
  • उनके ख़िलाफ़ सीआरपीसी की धारा 107 के तहत पहले ही कार्रवाई की गई है और उन्हें हिरासत में रखा गया है इसलिए पूरी गहराई से संबद्ध एजेंसियाँ जाँच पूरी न कर लें तब तक उन्हें हिरासत में रखा जाना चाहिए. दिलचस्प बात ये है कि धारा 107 किसी अपराध का आरोप नहीं है बल्कि इसके तहत मजिस्ट्रेट को विशेषाधिकार हासिल है कि वह जिसे पब्लिक सेफ़्टी के लिए ख़तरा माने उसे हिरासत में डाल दे.
  • चीफ़ प्रॉसिक्युशन ऑफ़िसर ने ख़ुद हाज़िर होकर कहा है कि ऐसे किसी राजनीतिक व्यक्ति के संवेदनशील बयान की वजह से राज्य की शांति व्यवस्था और पब्लिक ऑर्डर में गड़बड़ी पैदा हो सकती है इसलिए उन्हें हिरासत में रखना उचित होगा.
  • पुलिस ने जो डॉज़िए सौंपी है उसमें कहा गया है कि राज्य के पुनर्गठन की पूर्व संध्या पर सब्जेक्ट (उमर अब्दुल्ला) ने लोगों का समर्थन हासिल करने के लिए केंद्र सरकार की पुलिस के ख़िलाफ़ लोगों को भड़काने वाले बयान दिए. इलाके के कार्यकर्ताओं और राजनीतिक माहौल को ध्यान में रखते हुए शांति भंग होने की आशंका है इसलिए उन्हें हिरासत में रखा जाना चाहिए.

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  • उमर अब्दुल्ला को हिरासत में रखने का पाँचवा तर्क यह दिया गया है कि वे अपने ज़िले में और कश्मीर वादी के दूसरे हिस्सों में माहौल बिगाड़ रहे हैं. उन पर खुलकर 'गंदी राजनीति' करने और अनुच्छेद 370 हटाए जाने को लेकर लोगों की भावनाओं को भड़काने का आरोप लगाया गया है. इसी दलील में यह भी कहा गया है कि वे फ़ेसबुक और ट्विटर के ज़रिए देश की एकता और अखंडता के खिलाफ़ लोगों को भड़का रहे हैं.
  • उन्होंने अपने पिता के आवास पर कार्यकर्ताओं से कहा था कि अगर अनुच्छेद 370 हटाया गया था तो वे जनआंदोलन छेड़ देंगे. उन्होंने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से कहा था कि वे अपने निर्वाचन क्षेत्र सोनावर के युवाओं से आंदोलन के लिए तैयार रहने को कहें.
  • उमर अब्दुल्ला पर इल्ज़ाम है कि उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी पोस्ट के ज़रिए आम लोगों को केंद्र सरकार का विरोध करने के लिए आइडिया दिया, उन्होंने संसद से पारित आदेश के ख़िलाफ़ आम जनता में आक्रोश को बढ़ावा दिया जिससे हिंसा भड़कने की आशंका पैदा हुई.

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  • उमर अब्दुल्ला को हिरासत में रखे जाने की एक वजह ये भी बताई गई है कि पुलिस ने अपने डॉज़िए में कहा है कि--उनके विचार पूर्वाग्रहों से ग्रस्त हैं और उनकी बातों का आम जनता पर बहुत असर होता है इसलिए आशंका है कि वे एक 'इन्फ़्लुएंसर' (प्रेरक) होने के नाते स्थिति पर असर डाल सकते हैं.
  • अंतिम पैरा में कहा गया है कि मामला बहुत नाज़ुक है, हालात बहुत संगीन है लिहाजा उन्हें ऐसी गतिविधियों में शामिल होने की छूट नहीं दी जा सकती जिससे जनजीवन में गड़बड़ी पैदा हो.

उमर अब्दुल्ला के मामले में क़ानूनी स्थिति क्या है. इसे समझने के लिए बीबीसी संवाददाता विभुराज ने सुप्रीम कोर्ट में मानवाधिकार के मामले देखने वाली एडवोकेट शाहरुख़ आलम से बात की.

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एडवोकेट शाहरुख़ आलम का नज़रिया

चार अगस्त, 2019 को कश्मीर के महत्वपूर्ण नेताओं को सरकार ने प्रिवेंटिव डिटेंशन (यानी एहतियाती तौर पर हिरासत) में लिया था. इसके ठीक अगले दिन से कश्मीर में पाबंदियों का सिलसिला शुरू हो गया था.

उस समय कश्मीरी नेताओं पर सीआरपीसी की धारा 107 लगाई गई थी. धारा 107 प्रशासन को किसी को एहतियाती तौर पर हिरासत में लेने का हक़ देता है.

लेकिन दिलचस्प बात ये थी कि ऐसा फ़ैसला लेते समय ये दलील दी गई कि कुछ भी हो सकता है, हिंसा हो सकती है, आम जनजीवन में खलल पड़ सकता है, लोकशांति भंग हो सकती है. ये भी कहा गया कि इन नेताओं को थोड़े समय के लिए ही प्रिवेंटिव डिटेंशन में रखा जा रहा है.

उस समय न तो उमर अब्दुल्ला ने और न ही मेहबूबा मुफ़्ती ने अदालतों में इसे चुनौती दी. मेहबूबा मुफ़्ती की बेटी ने उस समय हेबियस कॉरपस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) की रिट याचिका दायर की थी लेकिन तब कोर्ट ने उन्हें कहा कि आप अपनी मां से जाकर मिल आइए.

लेकिन मेहबूबा को हिरासत में रखना क़ानूनी तौर पर कितना सही था या ग़लत? इस पर कोर्ट ने कुछ नहीं कहा. लेकिन उमर अब्दुल्ला ने अपने हिरासत को चुनौती नहीं दी.

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उमर अब्दुल्ला का मामला

सीआरपीसी की धारा 107 में साल भर तक प्रिवेंटिव डिटेंशन में रखे जाने का प्रावधान है. सरकार ने सीआरपीसी की धारा 107 तो लगाई है लेकिन वो ये नहीं बता रहे हैं कि छह फरवरी तक उमर अब्दुल्ला को क़ानून के किस प्रावधान के तहत गिरफ़्तार किया गया था.

उसकी वजह ये है कि अभी तक केवल सीआरपीसी की धारा 107 का ही जिक्र किया गया है. धारा 107 कहती है कि गिरफ़्तार व्यक्ति को एग्जिक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाएगा, जहां अभियुक्त को ये बताना होगा कि उसे प्रिवेंटिव डिटेंशन में क्यों नहीं रखा जाए.

अगर एग्जिक्यूटिव मजिस्ट्रेट अभियुक्त की दलील से सहमत हो जाता है तो आप छूट जाते हैं, बॉन्ड भर कर छूट जाते हैं. उमर अब्दुल्ला के मामले में इन पूर्व निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया है.

छह महीने ख़त्म होने पर लोगों को ये लग रहा था कि सरकार उन लोगों को रिहा कर देगी. जिस दिन प्रिवेंटिव डिटेंशन के छह महीने की अवधि ख़त्म हो रही थी, उस दिन सरकार ने उमर अब्दुल्ला पर पब्लिक सेफ़्टी एक्ट जैसे बेरहम क़ानून के तहत मामला दर्ज़ कर लिया.

सरकार के इरादों पर इसलिए भी सवाल उठते हैं कि अगर उन्हें लगा भी कि उमर अब्दुल्ला पर पब्लिक सेफ़्टी एक्ट के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए तो उन्होंने इसके लिए छह महीने इंतज़ार क्यों किया.

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हैबियस कॉर्पस की रिट याचिका

पीएसए लगाने के लिए उस तारीख़ का इंतज़ार क्यों किया गया जिस दिन प्रिवेंटिव डिटेंशन की एक मियाद ख़त्म हो रही थी. ऐसा इसलिए किया गया ताकि हिरासत में रखे गए उमर अब्दुल्ला के पास दूसरा कोई क़ानूनी रास्ता न बचे.

पब्लिक सेफ़्टी एक्ट में ज़मानत नहीं मिलती है और बंदी बनाए गए व्यक्ति को हिरासत में रखने का आधार तो बताया जाता है कि लेकिन गिरफ़्तार व्यक्ति के पास उसे किसी अदालत में चुनौती देने का विकल्प नहीं होता. पीएसए के तहत गिरफ़्तार व्यक्ति के पास हैबियस कॉर्पस की रिट याचिका का विकल्प ही बचता है.

सामान्य स्थिति में किसी गिरफ़्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर कोर्ट में पेश किए जाने का क़ानूनी प्रावधान है लेकिन पब्लिक सेफ़्टी एक्ट के तहत गिरफ़्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर कोर्ट में पेश किए जाने का कोई प्रावधान नहीं है, ट्रायल चलाने की कोई शर्त नहीं है और बिना सुनवाई के किसी को दो साल तक हिरासत में रखा जा सकता है.

पीएसए के तहत गिरफ़्तार व्यक्ति पर सीआरपीसी की सामान्य न्यायिक प्रक्रिया लागू नहीं होती, हां वो संविधान की रिट याचिका के प्रावधान का सहारा ले सकता है.

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पब्लिक सेफ़्टी एक्ट के ग्राउंड्स

उमर अब्दुल्ला के मामले में सरकार ने पहले तो छह महीने प्रिवेंटिव डिटेंशन में रखा और जिस दिन वो समय ख़त्म हुआ, सरकार ने एक दूसरा आरोप लगा दिया. इससे सरकार की नियत का पता चलता है.

उमर पर पीएसए के तहत मामला दर्ज किए जाने के बाद उनकी बहन ने सुप्रीम कोर्ट में हैबियस कॉर्पस की याचिका दायर की.

यहां से मामले में दूसरी पेचीदगी शुरू होती है. हैबियस कॉर्पस के मामलों में ऐसा देखा जाता रहा है कि बड़ी अदालतें इन रिट याचिकाओं पर प्राथमिकता के साथ सुनवाई करती हैं.

जब कोर्ट से ये कहा जाता है कि किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता सरकार ने ग़लत तरीके से भंग की है तो अदालत इसे प्राथमिकता के साथ सुनती है कि ऐसा क्यों हुआ है.

लेकिन उमर के मामले में कोर्ट ने पहले ये कहा कि तीन हफ़्ते का वक़्त दिया जा रहा है. उमर अब्दुल्ला के वकील ने जब ये कहा कि हैबियस कॉर्पस के मामलों में ऐसी परंपरा नहीं रही है तो कोर्ट की तरफ़ से ये कहा गया कि वे पहले सरकार का जवाब सुनना चाहेंगे.

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आज़ादी के बुनियादी हक़ का हनन

इसके जवाब में ये दलील दी गई कि सरकार को पब्लिक सेफ़्टी एक्ट के ग्राउंड्स को लेकर जो कहना था, वो पहले ही कह चुकी है तब अदालत ने सरकार को जवाब देने के लिए दो हफ़्ते की मोहलत दी. अब इस मामले की सुनवाई की अगली तारीख 2 मार्च तय की गई है.

इस तरह से हिरासत में रखने की सूरत में किसी व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता, बात रखने की आज़ादी के बुनियादी हक़ का हनन होता है.

पीएसए के तहत जब किसी को हिरासत में लिया जाता है तो इस बात की वाजिब आशंका होनी चाहिए कि वो व्यक्ति लोकशांति के लिए ख़तरा है, उससे हिंसा फैल सकती है. ये साबित किया जाने की ज़रूरत है कि ख़तरा कितना वास्तविक है.

उमर अबदुल्ला के मामले में सरकार की तरफ़ से जो दलीलें दी गई हैं, उनमें दम नहीं दिखता. जो उमर अबदुल्ला कल तक मॉडरेट माने जाते थे, वो अचानक से कैसे पब्लिक ऑर्डर के लिए ख़तरा हो गए.

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